अयोध्याकाण्ड · सर्ग 63
श्रवण कुमार की कथा
श्लोक 1 (ayodhya.63.1)
प्रतिबुद्धो मुहूर्तेन शोकोपहतचेतनः। अथ राजा दशरथः स चिन्तामभ्यपद्यत ॥ 63.1 ॥
pratibuddho muhūrtena śokopahatacetanaḥ| atha rājā daśarathaḥ sa cintāmabhyapadyata
राजा दशरथ मुहूर्त भर में जाग उठे, उनका मन अब भी शोक से आहत था; तब वे पुनः चिंता में डूब गए।
श्लोक 2 (ayodhya.63.2)
रामलक्ष्मणयोश्चैव विवासाद्वासवोपमम्। आविवेशोपसर्गस्तं तमः सूर्यमिवासुरम् ॥ 63.2 ॥
rāmalakṣmaṇayoścaiva vivāsādvāsavopamam| āviveśopasargastaṃ tamaḥ sūryamivāsuram
राम और लक्ष्मण के वनवास के कारण, इन्द्र के समान तेजस्वी उस राजा पर वैसे ही एक महाविपत्ति आ पड़ी, जैसे राहु का अंधकार सूर्य को ग्रस लेता है।
श्लोक 3 (ayodhya.63.3)
सभार्ये निर्गते रामे कौसल्यां कोसलेश्वरः। विवक्षुरसितापाङ्गां स्मृत्वा दुष्कृतमात्मनः ॥ 63.3 ॥
sabhārye nirgate rāme kausalyāṃ kosaleśvaraḥ| vivakṣurasitāpāṅgāṃ smṛtvā duṣkṛtamātmanaḥ
पत्नी सहित राम के चले जाने पर, कोसलनरेश दशरथ अपने पूर्वकृत दुष्कर्म का स्मरण करके, कजरारी आँखों वाली कौसल्या से वह बात कहना चाहते थे।
श्लोक 4 (ayodhya.63.4)
स राजा रजनीं षष्ठीं रामे प्रव्रजिते वनम्। अर्धरात्रे दशरथः संस्मरन्दुष्कृतं कृतम् ॥ 63.4 ॥
sa rājā rajanīṃ ṣaṣṭhīṃ rāme pravrajite vanam| ardharātre daśarathaḥ saṃsmaranduṣkṛtaṃ kṛtam
राम के वनवास की छठी रात्रि में, अर्धरात्रि के समय राजा दशरथ अपने किए हुए पूर्वकृत दुष्कर्म का स्मरण करने लगे।
श्लोक 5 (ayodhya.63.5)
स राजा पुत्रशोकार्तः स्मरन् दुष्कृतमात्मनः। कौसल्यां पुत्रशोकार्तामिदं वचनमब्रवीत् ॥ 63.5 ॥
sa rājā putraśokārtaḥ smaran duṣkṛtamātmanaḥ| kausalyāṃ putraśokārtāmidaṃ vacanamabravīt
पुत्रशोक से पीड़ित और अपने दुष्कर्म का स्मरण करते हुए राजा ने पुत्रशोक-संतप्त कौसल्या से यह वचन कहा।
श्लोक 6 (ayodhya.63.6)
यदाचरति कल्याणि शुभं वा यदि वाशुभम्। तदेव लभते भद्रे कर्ता कर्मजमात्मनः ॥ 63.6 ॥
yadācarati kalyāṇi śubhaṃ vā yadi vāśubham| tadeva labhate bhadre kartā karmajamātmanaḥ
"हे कल्याणी, हे भद्रे! मनुष्य जो भी शुभ या अशुभ कर्म करता है, वह स्वयं ही अपने कर्म से उत्पन्न फल को प्राप्त करता है।"
श्लोक 7 (ayodhya.63.7)
गुरुलाघवमर्थानामारम्भे कर्मणां फलम्। दोषं वा यो न जानाति स बाल इति होच्यते ॥ 63.7 ॥
gurulāghavamarthānāmārambhe karmaṇāṃ phalam| doṣaṃ vā yo na jānāti sa bāla iti hocyate
"जो कर्म आरंभ करते समय उसके परिणामों के गुरुत्व-लघुत्व को, फल को, या दोष को नहीं समझता, वही मूर्ख कहलाता है।"
श्लोक 8 (ayodhya.63.8)
कश्चिदाम्रवणं छित्त्वा पलाशांश्च निषिञ्चति। पुष्पं दृष्ट्वा फले गृध्नुः स शोचति फलागमे ॥ 63.8 ॥
kaścidāmravaṇaṃ chittvā palāśāṃśca niṣiñcati| puṣpaṃ dṛṣṭvā phale gṛdhnuḥ sa śocati phalāgame
"कोई आम के बाग को काटकर पलाश के वृक्ष सींचता है, उनके फूल देखकर फल का लोभी होकर; फल आने के समय वह पछताता है।"
श्लोक 9 (ayodhya.63.9)
अविज्ञाय फलं यो हि कर्म त्वेवानुधावति। स शोचेत्फलवेलायां यथा किंशुकसेचकः ॥ 63.9 ॥
avijñāya phalaṃ yo hi karma tvevānudhāvati| sa śocetphalavelāyāṃ yathā kiṃśukasecakaḥ
"जो फल जाने बिना ही कर्म के पीछे दौड़ता है, वह फल के समय उसी प्रकार पछताता है जैसे किंशुक वृक्षों को सींचने वाला।"
श्लोक 10 (ayodhya.63.10)
सोऽहमाम्रवणं छित्त्वा पलाशांश्च न्यषेचयम्। रामं फलागमे त्यक्त्वा पश्चाच्छोचामि दुर्मतिः ॥ 63.10 ॥
so'hamāmravaṇaṃ chittvā palāśāṃśca nyaṣecayam| rāmaṃ phalāgame tyaktvā paścācchocāmi durmatiḥ
"मैं वही दुर्बुद्धि हूँ जिसने आम के बाग को काटकर पलाश सींचे; फल आने के समय राम को त्यागकर अब मैं पछता रहा हूँ।"
श्लोक 11 (ayodhya.63.11)
लब्धशब्देन कौसल्ये कुमारेण धनुष्मता। कुमारः शब्दवेधीति मया पापमिदं कृतम् ॥ 63.11 ॥
labdhaśabdena kausalye kumāreṇa dhanuṣmatā| kumāraḥ śabdavedhīti mayā pāpamidaṃ kṛtam
"हे कौसल्या! यह पाप मैंने युवावस्था में, धनुर्धारी होकर, किया था - उस समय मैं 'शब्दभेदी बाण चलाने वाला कुमार' के नाम से प्रसिद्ध था।"
श्लोक 12 (ayodhya.63.12)
तदिदं मेऽनुसम्प्राप्तं देवि दुःखं स्वयं कृतम्। संमोहादिह बालेन यथा स्याद्भक्षितं विषम् ॥ 63.12 ॥
tadidaṃ me'nusamprāptaṃ devi duḥkhaṃ svayaṃ kṛtam| saṃmohādiha bālena yathā syādbhakṣitaṃ viṣam
"हे देवी! यह दुःख जो मुझे प्राप्त हुआ है, वह मेरे अपने ही किए हुए कर्म का फल है - जैसे कोई बालक भ्रमवश विष खा ले।"
श्लोक 13 (ayodhya.63.13)
यथान्यः पुरुषः कश्चित्पलाशैर्मोहितो भवेत्। एवं ममाप्यविज्ञातं शब्दवेध्यमयं फलम् ॥ 63.13 ॥
yathānyaḥ puruṣaḥ kaścitpalāśairmohito bhavet| evaṃ mamāpyavijñātaṃ śabdavedhyamayaṃ phalam
"जैसे कोई अन्य पुरुष पलाश वृक्षों से मोहित हो जाए, वैसे ही शब्दवेधी बाण-विद्या के फल को न जानते हुए मैं भी मोहित हो गया।"
श्लोक 14 (ayodhya.63.14)
देव्यनूढा त्वमभवो युवराजो भवाम्यहम्। ततः प्रावृडनुप्राप्ता मदकामविवर्धिनी ॥ 63.14 ॥
devyanūḍhā tvamabhavo yuvarājo bhavāmyaham| tataḥ prāvṛḍanuprāptā madakāmavivardhinī
"हे देवी! उस समय तुम अविवाहित थीं और मैं युवराज था; तभी वर्षा ऋतु आई, जो उत्साह और शिकार की कामना को बढ़ाने वाली थी।"
श्लोक 15 (ayodhya.63.15)
उपास्यहि रसान्भौमांस्तप्त्वा च जगदंशुभिः। परेताचरितां भीमां रविराविशते दिशम् ॥ 63.15 ॥
upāsyahi rasānbhaumāṃstaptvā ca jagadaṃśubhiḥ| paretācaritāṃ bhīmāṃ ravirāviśate diśam
"अपनी किरणों से सम्पूर्ण जगत को तपाकर तथा पृथ्वी के रसों का पान करके, सूर्य उस भयानक दिशा में प्रवेश करता है जो प्रेतों द्वारा विचरी जाती है।"
श्लोक 16 (ayodhya.63.16)
उष्णमन्तर्दधे सद्यः स्निग्धा ददृशिरे घनाः। ततो जहृषिरे सर्वे भेकसारङ्गबर्हिणः ॥ 63.16 ॥
uṣṇamantardadhe sadyaḥ snigdhā dadṛśire ghanāḥ| tato jahṛṣire sarve bhekasāraṅgabarhiṇaḥ
"गर्मी सहसा लुप्त हो गई, स्निग्ध मेघ दिखाई देने लगे, और तब सभी मेढक, हरिण और मोर हर्षित हो उठे।"
श्लोक 17 (ayodhya.63.17)
क्लिन्नपक्षोत्तराः स्नाताः कृच्छ्रादिव पतत्रिणः। वृष्टिवातावधूताग्रान् पादपानभिपेदिरे ॥ 63.17 ॥
klinnapakṣottarāḥ snātāḥ kṛcchrādiva patatriṇaḥ| vṛṣṭivātāvadhūtāgrān pādapānabhipedire
"पक्षी, जिनके पंखों के सिरे भीग गए थे मानो स्नान करके आए हों, बड़ी कठिनाई से उन वृक्षों तक पहुँचे जिनकी चोटियाँ वर्षा और वायु से पहले ही झकझोर दी गई थीं।"
श्लोक 18 (ayodhya.63.18)
पतितेनाम्भसा च्छन्नः पतमानेन चासकृत्। आबभौ मत्तसारङ्गस्तोयराशिरिवाचलः ॥ 63.18 ॥
patitenāmbhasā cchannaḥ patamānena cāsakṛt| ābabhau mattasāraṅgastoyarāśirivācalaḥ
"बार-बार गिरते हुए और पहले से गिरे हुए जल से आच्छादित, मदमत्त हरिणों वाला वह पर्वत मानो जलराशि के समान दिखाई देने लगा।"
श्लोक 19 (ayodhya.63.19)
पाण्डुरारुणवर्णानि स्रोतांसि विमलान्यपि। सुस्रुवुर्गिरिधातुभ्यः सभस्मानि भुजङ्गवत् ॥ 63.19 ॥
pāṇḍurāruṇavarṇāni srotāṃsi vimalānyapi| susruvurgiridhātubhyaḥ sabhasmāni bhujaṅgavat
"पर्वतीय जलधाराएँ, यद्यपि स्वच्छ थीं, सर्प के समान बहती हुईं, पर्वतीय धातुओं और भस्म के मिश्रण से श्वेत और अरुण वर्ण की हो गईं।"
श्लोक 20 (ayodhya.63.20)
आकुलारुणतोयानि स्रोतांसि विमलान्यपि। उन्मार्गजलवाहीनि बभूवुर्जलदागमे ॥ 63.20 ॥
ākulāruṇatoyāni srotāṃsi vimalānyapi| unmārgajalavāhīni babhūvurjaladāgame
"वे ही स्वच्छ जलधाराएँ वर्षा ऋतु के आगमन पर आकुल और अरुण जल वाली हो गईं, तथा अपने सामान्य मार्ग को छोड़कर बहने लगीं।"
श्लोक 21 (ayodhya.63.21)
तस्मिन्नतिसुखे काले धनुष्मानिषुमान्रथी। व्यायामकृतसङ्कल्पः सरयूमन्वगां नदीम् ॥ 63.21 ॥
tasminnatisukhe kāle dhanuṣmāniṣumānrathī| vyāyāmakṛtasaṅkalpaḥ sarayūmanvagāṃ nadīm
"उस अत्यंत सुखद ऋतु में, धनुष-बाण लेकर रथ पर सवार होकर, व्यायाम [अर्थात् आखेट] करने का संकल्प लिए मैं सरयू नदी के तट पर गया।"
श्लोक 22 (ayodhya.63.22)
निपाने महिषं रात्रौ गजं वाभ्यागतं नदीम्। अन्यं वा श्वापदं कंचिज्जिघांसुरजितेन्द्रियः ॥ 63.22 ॥
nipāne mahiṣaṃ rātrau gajaṃ vābhyāgataṃ nadīm| anyaṃ vā śvāpadaṃ kaṃcijjighāṃsurajitendriyaḥ
"रात्रि में जल पीने नदी पर आए किसी भैंसे, हाथी या अन्य किसी वन्य पशु को मारने की इच्छा से, इन्द्रियों को पूर्णतः वश में न रखते हुए,"
श्लोक 23 (ayodhya.63.23)
तस्मिंस्तत्राहमेकान्ते रात्रौ विवृतकार्मुकः। तत्राहं संवृतं वन्यं हतवांस्तीरमागतम् ॥ 63.23 ॥
tasmiṃstatrāhamekānte rātrau vivṛtakārmukaḥ| tatrāhaṃ saṃvṛtaṃ vanyaṃ hatavāṃstīramāgatam
"वहाँ रात्रि में एकांत में धनुष चढ़ाए खड़ा रहा, और वहीं छिपकर आए हुए एक वन्य पशु को तट पर आते ही मार गिराया।"
श्लोक 24 (ayodhya.63.24)
अन्यं चापि मृगं हिंस्रं शब्दं श्रुत्वाभ्युपागतम्। अथान्धकारे त्वश्रौषं जले कुम्भस्य पूर्यतः ॥ 63.24 ॥
anyaṃ cāpi mṛgaṃ hiṃsraṃ śabdaṃ śrutvābhyupāgatam| athāndhakāre tvaśrauṣaṃ jale kumbhasya pūryataḥ
"और उस शब्द को सुनकर वहाँ आया हुआ एक अन्य हिंस्र पशु भी। तभी अंधकार में मुझे घड़े के जल से भरने जैसी ध्वनि सुनाई दी।"
श्लोक 25 (ayodhya.63.25)
अचक्षुर्विषये घोषं वारणस्येव नर्दतः। ततोऽहं शरमुद्धृत्य दीप्तमाशीविषोपमम् ॥ 63.25 ॥
acakṣurviṣaye ghoṣaṃ vāraṇasyeva nardataḥ| tato'haṃ śaramuddhṛtya dīptamāśīviṣopamam
"जो दृष्टि की सीमा से परे था, मानो किसी गजराज की गर्जना हो। तब मैंने सर्प के समान तेजस्वी एक बाण निकाला,"
श्लोक 26 (ayodhya.63.26)
शब्दं प्रति गजप्रेप्सुरभिलक्ष्य त्वपातयम्। अमुञ्चं निशितं बाणमहमाशीविषोपमम् ॥ 63.26 ॥
śabdaṃ prati gajaprepsurabhilakṣya tvapātayam| amuñcaṃ niśitaṃ bāṇamahamāśīviṣopamam
"और हाथी को पाने की आशा से उस ध्वनि की दिशा में लक्ष्य साधकर मैंने उसे छोड़ दिया - मैंने वह तीक्ष्ण, सर्प-सम बाण चला दिया।"
श्लोक 27 (ayodhya.63.27)
तत्र वागुषसि व्यक्ता प्रादुरासीद्वनौकसः। हा हेति पततस्तोये बाणाभिहतमर्मणः ॥ 63.27 ॥
tatra vāguṣasi vyaktā prādurāsīdvanaukasaḥ| hā heti patatastoye bāṇābhihatamarmaṇaḥ
"वहाँ प्रातःकाल एक स्पष्ट पुकार सुनाई दी - बाण से मर्मस्थल पर आहत हुआ वह वनवासी जल में गिरते हुए 'हा! हा!' चिल्ला उठा।"
श्लोक 28 (ayodhya.63.28)
तस्मिन्निपतिते बाणे वागभूत्तत्र मानुषी। कथमस्मद्विधे शस्त्रं निपतेत्तु तपस्विनि ॥ 63.28 ॥
tasminnipatite bāṇe vāgabhūttatra mānuṣī| kathamasmadvidhe śastraṃ nipatettu tapasvini
उस बाण के लगते ही वहाँ एक मानवीय वाणी गूँज उठी: "मुझ जैसे तपस्वी पर यह शस्त्र कैसे आ पड़ा?"
श्लोक 29 (ayodhya.63.29)
प्रविविक्तां नदीं रात्रावुदाहारोऽहमागतः। इषुणाभिहतः केन कस्य वा किं कृतं मया ॥ 63.29 ॥
praviviktāṃ nadīṃ rātrāvudāhāro'hamāgataḥ| iṣuṇābhihataḥ kena kasya vā kiṃ kṛtaṃ mayā
"मैं तो केवल जल भरने रात्रि में इस निर्जन नदी पर आया था - किसने मुझे बाण से बींध डाला? मैंने किसका क्या बिगाड़ा है?"
श्लोक 30 (ayodhya.63.30)
ऋषेर्हि न्यस्तदण्डस्य वने वन्येन जीवतः। कथं नु शस्त्रेण वधो मद्विधस्य विधीयते ॥ 63.30 ॥
ṛṣerhi nyastadaṇḍasya vane vanyena jīvataḥ| kathaṃ nu śastreṇa vadho madvidhasya vidhīyate
"जिसने हिंसा त्याग दी हो और वन में वन्य पदार्थों पर जीवन बिताता हो, ऐसे मुझ जैसे ऋषि का वध शस्त्र द्वारा कैसे विहित हो सकता है?"
श्लोक 31 (ayodhya.63.31)
जटाभारधरस्यैव वल्कलाजिनवाससः। को वधेन ममार्थी स्यात्किं वास्यापकृतं मया ॥ 63.31 ॥
jaṭābhāradharasyaiva valkalājinavāsasaḥ| ko vadhena mamārthī syātkiṃ vāsyāpakṛtaṃ mayā
"जो केवल जटाओं का भार धारण करता हो, वल्कल और मृगचर्म पहनता हो, उस मुझ जैसे को मारने से किसका क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? मैंने उसका क्या अपराध किया है?"
श्लोक 32 (ayodhya.63.32)
एवं निष्फलमारब्धं केवलानर्थसंहितम्। न कश्चित्साधु मन्येत यथैव गुरुतल्पगम् ॥ 63.32 ॥
evaṃ niṣphalamārabdhaṃ kevalānarthasaṃhitam| na kaścitsādhu manyeta yathaiva gurutalpagam
"इस प्रकार निष्फल और केवल अनर्थकारी इस कर्म को कोई भी उचित नहीं मानेगा, जैसे गुरु-पत्नी का स्पर्श करने वाले को कोई उचित नहीं मानता।"
श्लोक 33 (ayodhya.63.33)
नाहं तथानुशोचामि जीवितक्षयमात्मनः। मातरं पितरं चोभावनुशोचामि मद्विधे ॥ 63.33 ॥
nāhaṃ tathānuśocāmi jīvitakṣayamātmanaḥ| mātaraṃ pitaraṃ cobhāvanuśocāmi madvidhe
"मुझे अपने प्राणों के नाश का उतना शोक नहीं है, जितना अपनी इस दशा में माता-पिता दोनों के लिए है।"
श्लोक 34 (ayodhya.63.34)
तदेतन्मिथुनं वृद्धं चिरकालभृतं मया। मयि पञ्चत्वमापन्ने कां वृत्तिं वर्तयिष्यति ॥ 63.34 ॥
tadetanmithunaṃ vṛddhaṃ cirakālabhṛtaṃ mayā| mayi pañcatvamāpanne kāṃ vṛttiṃ vartayiṣyati
"इस वृद्ध दंपति का, जिसे मैं दीर्घकाल से पालता रहा हूँ, मेरे मृत्यु को प्राप्त होने पर किस वृत्ति से निर्वाह होगा?"
श्लोक 35 (ayodhya.63.35)
वृद्धौ च मातापितरावहं चैकेषुणा हतः। केन स्म निहताः सर्वे सुबालेनाकृतात्मना ॥ 63.35 ॥
vṛddhau ca mātāpitarāvahaṃ caikeṣuṇā hataḥ| kena sma nihatāḥ sarve subālenākṛtātmanā
"मेरे वृद्ध माता-पिता और मैं - हम सब एक ही बाण से मारे गए; किसी अजितेन्द्रिय बालक ने हम सबको मार डाला।"
श्लोक 36 (ayodhya.63.36)
तां गिरं करुणां श्रुत्वा मम धर्मानुकाङ्क्षिणः। कराभ्यां सशरं चापं व्यथितस्यापतद्भुवि ॥ 63.36 ॥
tāṃ giraṃ karuṇāṃ śrutvā mama dharmānukāṅkṣiṇaḥ| karābhyāṃ saśaraṃ cāpaṃ vyathitasyāpatadbhuvi
उस करुण वाणी को सुनकर, धर्म का सदा अनुरागी होने के कारण, व्यथित हुए मेरे हाथों से बाण सहित धनुष भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 37 (ayodhya.63.37)
तस्याहं करुणं श्रुत्वा निशि लालपतो बहु। संभ्रान्तः शोकवेगेन भृशमास विचेतनः ॥ 63.37 ॥
tasyāhaṃ karuṇaṃ śrutvā niśi lālapato bahu| saṃbhrāntaḥ śokavegena bhṛśamāsa vicetanaḥ
रात्रि में उसके बहुत देर तक विलाप करने की करुण वाणी सुनकर, शोक के आवेग से व्याकुल होकर मैं बार-बार मूर्च्छित हो गया।
श्लोक 38 (ayodhya.63.38)
तं देशमहमागम्य दीनसत्त्वः सुदुर्मनाः। अपश्यमिषुणा तीरे सरय्वास्तापसं हतम् ॥ 63.38 ॥
taṃ deśamahamāgamya dīnasattvaḥ sudurmanāḥ| apaśyamiṣuṇā tīre sarayvāstāpasaṃ hatam
उस स्थान पर पहुँचकर, दीन और अत्यंत व्याकुल मन से, मैंने सरयू के तट पर बाण से आहत उस तपस्वी को देखा,
श्लोक 39 (ayodhya.63.39)
अवकीर्णजटाभारं प्रविद्धकलशोदकम्। पांसुशोणितदिग्धाङ्गं शयानं शल्यपीडितम् ॥ 63.39 ॥
avakīrṇajaṭābhāraṃ praviddhakalaśodakam| pāṃsuśoṇitadigdhāṅgaṃ śayānaṃ śalyapīḍitam
उसकी जटाएँ बिखरी हुई थीं, जलपात्र गिरकर बिखर गया था, उसका शरीर धूल और रक्त से सना था, और वह बाण की पीड़ा से तड़पता हुआ पड़ा था।
श्लोक 40 (ayodhya.63.40)
स मामुद्वीक्ष्य नेत्राभ्यां त्रस्तमस्वस्थचेतसम्। इत्युवाच वचः क्रूरं दिधक्षन्निव तेजसा ॥ 63.40 ॥
sa māmudvīkṣya netrābhyāṃ trastamasvasthacetasam| ityuvāca vacaḥ krūraṃ didhakṣanniva tejasā
अपने नेत्रों से मुझे देखकर - मुझे, जो भयभीत और अस्वस्थचित्त खड़ा था - मानो अपने तेज से भस्म कर देना चाहता हो, उसने ये कठोर वचन कहे।
श्लोक 41 (ayodhya.63.41)
किं तवापकृतं राजन् वने निवसता मया। जिहीर्षुरम्भो गुर्वर्थं यदहं ताडितस्त्वया ॥ 63.41 ॥
kiṃ tavāpakṛtaṃ rājan vane nivasatā mayā| jihīrṣurambho gurvarthaṃ yadahaṃ tāḍitastvayā
"हे राजन्! वन में निवास करने वाले मुझसे तुम्हारा क्या बिगड़ा था, कि माता-पिता के लिए जल ले जाने की इच्छा रखने वाले मुझ पर तुमने प्रहार किया?"
श्लोक 42 (ayodhya.63.42)
एकेन खलु बाणेन मर्मण्यभिहते मयि। द्वावन्धौ निहतौ वृद्धौ माता जनयिता च मे ॥ 63.42 ॥
ekena khalu bāṇena marmaṇyabhihate mayi| dvāvandhau nihatau vṛddhau mātā janayitā ca me
"एक ही बाण से मेरे मर्मस्थल को बींधकर तुमने वस्तुतः मेरी अंधी और वृद्ध माता तथा पिता - दोनों को भी मार डाला है।"
श्लोक 43 (ayodhya.63.43)
तौ नूनं दुर्बलावन्धौ मत्प्रतीक्षौ पिपासितौ। चिरमाशाकृतां तृष्णां कष्टां संधारयिष्यतः ॥ 63.43 ॥
tau nūnaṃ durbalāvandhau matpratīkṣau pipāsitau| ciramāśākṛtāṃ tṛṣṇāṃ kaṣṭāṃ saṃdhārayiṣyataḥ
"वे दुर्बल, अंधे और प्यासे मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे, और चिरकाल से आशा में बँधी अपनी तृष्णा को कष्टपूर्वक धारण किए हुए होंगे।"
श्लोक 44 (ayodhya.63.44)
न नूनं तपसो वास्ति फलयोगः श्रुतस्य वा। पिता यन्मां न जानाति शयानं पतितं भुवि ॥ 63.44 ॥
na nūnaṃ tapaso vāsti phalayogaḥ śrutasya vā| pitā yanmāṃ na jānāti śayānaṃ patitaṃ bhuvi
"निश्चय ही मेरी तपस्या और विद्या का कोई फल नहीं मिला, क्योंकि मेरे पिता को यह भी ज्ञात नहीं कि मैं भूमि पर गिरा पड़ा हूँ।"
श्लोक 45 (ayodhya.63.45)
जानन्नपि च किं कुर्यादशक्तिरपरिक्रमः। छिद्यमानमिवाशक्तस्त्रातुमन्यो नगो नगम् ॥ 63.45 ॥
jānannapi ca kiṃ kuryādaśaktiraparikramaḥ| chidyamānamivāśaktastrātumanyo nago nagam
"और जान भी लें तो शक्तिहीन तथा गतिहीन मेरे पिता क्या कर सकते हैं - जैसे एक वृक्ष कटते हुए दूसरे वृक्ष को बचाने में असमर्थ होता है।"
श्लोक 46 (ayodhya.63.46)
पितुस्त्वमेव मे गत्वा शीघ्रमाचक्ष्व राघव। न त्वामनुदहेत्क्रुद्धो वनं वह्निरिवैधितः ॥ 63.46 ॥
pitustvameva me gatvā śīghramācakṣva rāghava| na tvāmanudahetkruddho vanaṃ vahnirivaidhitaḥ
"हे राघव! तुम स्वयं शीघ्र जाकर मेरे पिता को यह बता दो, अन्यथा उनका क्रोध तुम्हें उसी प्रकार भस्म कर देगा जैसे प्रज्वलित अग्नि वन को भस्म कर देती है।"
श्लोक 47 (ayodhya.63.47)
इयमेकपदी राजन् यतो मे पितुराश्रमः। तं प्रसादय गत्वा त्वं न त्वां स कुपितः शपेत् ॥ 63.47 ॥
iyamekapadī rājan yato me piturāśramaḥ| taṃ prasādaya gatvā tvaṃ na tvāṃ sa kupitaḥ śapet
"हे राजन्! यह एक पगडंडी वहीं जाती है जहाँ मेरे पिता का आश्रम है; वहाँ जाकर उन्हें प्रसन्न करो, अन्यथा क्रुद्ध होकर वे तुम्हें शाप दे सकते हैं।"
श्लोक 48 (ayodhya.63.48)
विशल्यं कुरु मां राजन् मर्म मे निशितः शरः। रुणद्धि मृदु सोत्सेधं तीरमम्बुरयो यथा ॥ 63.48 ॥
viśalyaṃ kuru māṃ rājan marma me niśitaḥ śaraḥ| ruṇaddhi mṛdu sotsedhaṃ tīramamburayo yathā
"हे राजन्! मुझमें से यह बाण निकाल दो; यह तीक्ष्ण शर मेरे कोमल मर्मस्थल को उसी प्रकार पीड़ित कर रहा है जैसे जल का वेग ऊँचे तट को काटता है।"
श्लोक 49 (ayodhya.63.49)
सशल्यः क्लिश्यते प्राणैर्विशल्यो विनशिष्यति। इति मामविशच्चिन्ता तस्य शल्यापकर्षणे ॥ 63.49 ॥
saśalyaḥ kliśyate prāṇairviśalyo vinaśiṣyati| iti māmaviśaccintā tasya śalyāpakarṣaṇe
बाण उसके भीतर रहने पर वह पीड़ा सहते हुए भी जीवित रहेगा, और निकालने पर वह मर जाएगा - बाण निकालते समय मुझे यही चिंता घेर गई।
श्लोक 50 (ayodhya.63.50)
दुःखितस्य च दीनस्य मम शोकातुरस्य च। लक्षयामास हृदये चिन्तां मुनिसुतस्तदा ॥ 63.50 ॥
duḥkhitasya ca dīnasya mama śokāturasya ca| lakṣayāmāsa hṛdaye cintāṃ munisutastadā
तब उस मुनिपुत्र ने दुःखी, दीन और शोक से आतुर मेरे हृदय की उस चिंता को भाँप लिया।
श्लोक 51 (ayodhya.63.51)
ताम्यमानः स मां दुःखादुवाच परमार्तवत्। सीदमानो विवृत्ताङ्गो वेष्टमानो गतः क्षयम् ॥ 63.51 ॥
tāmyamānaḥ sa māṃ duḥkhāduvāca paramārtavat| sīdamāno vivṛttāṅgo veṣṭamāno gataḥ kṣayam
अत्यंत व्याकुल, सिकुड़ते हुए, अंगों को मरोड़ते और तड़पते हुए, मृत्यु के निकट पहुँचकर वह अत्यंत पीड़ित स्वर में मुझसे बोला।
श्लोक 52 (ayodhya.63.52)
संस्तभ्य धैर्येण स्थिरचित्तो भवाम्यहम्। ब्रह्महत्याकृतं पापं हृदयादपनीयताम् ॥ 63.52 ॥
saṃstabhya dhairyeṇa sthiracitto bhavāmyaham| brahmahatyākṛtaṃ pāpaṃ hṛdayādapanīyatām
"धैर्य धारण करके मैं अपने चित्त को स्थिर कर रहा हूँ। ब्रह्महत्या के पाप की पीड़ा तुम्हारे हृदय से दूर हो जाए।"
श्लोक 53 (ayodhya.63.53)
न द्विजातिरहं राजन् मा भूत्ते मनसो व्यथा। शूद्रायामस्मि वैश्येन जातो जनपदाधिप ॥ 63.53 ॥
na dvijātirahaṃ rājan mā bhūtte manaso vyathā| śūdrāyāmasmi vaiśyena jāto janapadādhipa
"हे राजन्! मैं द्विज नहीं हूँ, तुम्हारे मन को व्यथा न हो। हे जनपदाधिप! मैं एक वैश्य से शूद्रा माता के गर्भ से उत्पन्न हूँ।"
श्लोक 54 (ayodhya.63.54)
इतीव वदतः कृच्छ्राद्बाणाभिहतमर्मणः। विघूर्णतो विचेष्टस्य वेपमानस्य भूतले ॥ 63.54 ॥
itīva vadataḥ kṛcchrādbāṇābhihatamarmaṇaḥ| vighūrṇato viceṣṭasya vepamānasya bhūtale
इस प्रकार बड़ी कठिनाई से बोलते हुए, बाण से मर्मस्थल में आहत वह पृथ्वी पर लोटता, तड़पता और काँपता रहा।
श्लोक 55 (ayodhya.63.55)
तस्य त्वानम्यमानस्य तं बाणमहमुद्धरम्। स तपोधन उद्वीक्ष्य मां संत्रस्तो जहौ प्राणान् ॥ 63.55 ॥
tasya tvānamyamānasya taṃ bāṇamahamuddharam| sa tapodhana udvīkṣya māṃ saṃtrasto jahau prāṇān
जब वह ढहने लगा, तब मैंने उससे वह बाण निकाल दिया; और वह तपस्वी मुझे भयभीत दृष्टि से देखता हुआ प्राण त्याग बैठा।
श्लोक 56 (ayodhya.63.56)
जलार्द्रगात्रं तु विलप्य कृच्छान् मर्मव्रणं सन्ततमुच्छसन्तम्। ततः सरय्वां तमहं शयानं समीक्ष्य भद्रे सुभृशं विषण्णः ॥ 63.56 ॥
jalārdragātraṃ tu vilapya kṛcchān marmavraṇaṃ santatamucchasantam| tataḥ sarayvāṃ tamahaṃ śayānaṃ samīkṣya bhadre subhṛśaṃ viṣaṇṇaḥ
हे भद्रे कौसल्या! सरयू में जल से भीगे शरीर वाले, कष्ट से विलाप करते और मर्मस्थल के घाव के साथ निरंतर हाँफते हुए उस तपस्वी को देखकर मैं अत्यंत विषण्ण हो गया।