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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 69

भरत का अशुभ स्वप्न

सर्ग 68सर्ग-सूचीसर्ग 70

श्लोक 1 (ayodhya.69.1)

यामेव रात्रिं ते दूताः प्रविशन्ति स्म तां पुरीम्। भरतेनापि तां रात्रिं स्वप्नो दृष्टोऽयमप्रियः॥ २-६९-१ ॥

yāmeva rātriṃ te dūtāḥ praviśanti sma tāṃ purīm| bharatenāpi tāṃ rātriṃ svapno dṛṣṭo'yamapriyaḥ

जिस रात्रि में वे दूत उस नगरी में प्रवेश कर रहे थे, उसी रात्रि भरत ने भी यह अशुभ स्वप्न देखा।

श्लोक 2 (ayodhya.69.2)

व्युष्टामेव तु तां रात्रिं दृष्ट्वा तं स्वप्नमप्रियम्। पुत्रो राजाधिराजस्य सुभृशं पर्यतप्यत॥ २-६९-२ ॥

vyuṣṭāmeva tu tāṃ rātriṃ dṛṣṭvā taṃ svapnamapriyam| putro rājādhirājasya subhṛśaṃ paryatapyata

उस रात्रि के बीतते ही उस अप्रिय स्वप्न को देखकर, राजाधिराज के पुत्र भरत अत्यन्त संतप्त हो उठे।

श्लोक 3 (ayodhya.69.3)

तप्यमानं समाज्ञाय वयस्याः प्रियवादिनः। आयासं हि विनेष्यन्तः सभायां चक्रिरे कथाः॥ २-६९-३ ॥

tapyamānaṃ samājñāya vayasyāḥ priyavādinaḥ| āyāsaṃ hi vineṣyantaḥ sabhāyāṃ cakrire kathāḥ

उन्हें संतप्त जानकर, मधुरभाषी सखाओं ने उनकी पीड़ा दूर करने के लिए सभा में विविध कथाएँ सुनाईं।

श्लोक 4 (ayodhya.69.4)

वादयन्ति तथा शान्तिं लासयन्त्यपि चापरे। नाटकान्यपरे प्राहुर्हास्यानि विविधानि च॥ २-६९-४ ॥

vādayanti tathā śāntiṃ lāsayantyapi cāpare| nāṭakānyapare prāhurhāsyāni vividhāni ca

कुछ शान्ति के लिए वाद्य बजाने लगे, कुछ नृत्य करने लगे, कुछ नाटक प्रस्तुत करने लगे और अनेक प्रकार के परिहास भी सुनाने लगे।

श्लोक 5 (ayodhya.69.5)

स तैर्महात्मा भरतः सखिभिः प्रियवादिभिः। गोष्ठीहास्यानि कुर्वद्भिर्न प्राहृष्यत राघवः॥ २-६९-५ ॥

sa tairmahātmā bharataḥ sakhibhiḥ priyavādibhiḥ| goṣṭhīhāsyāni kurvadbhirna prāhṛṣyata rāghavaḥ

फिर भी उन मधुरभाषी सखाओं द्वारा सभा में परिहास किए जाने पर भी, वह महात्मा भरत प्रसन्न न हो सके।

श्लोक 6 (ayodhya.69.6)

तमब्रवीत् प्रियसखो भरतं सखिभिर्वृतम्। सुहृद्भिः पर्युपासीनः किं सखे नानुमोदसे॥ २-६९-६ ॥

tamabravīt priyasakho bharataṃ sakhibhirvṛtam| suhṛdbhiḥ paryupāsīnaḥ kiṃ sakhe nānumodase

मित्रों से घिरे हुए भरत से एक प्रिय सखा ने कहा - "हे मित्र! सुहृदों के साथ बैठे रहते हुए भी तुम प्रसन्न क्यों नहीं होते?"

श्लोक 7 (ayodhya.69.7)

एवं ब्रुवाणं सुहृदं भरतः प्रत्युवाच ह। शृणु त्वं यन्निमित्तं मे दैन्यमेतदुपागतम्॥ २-६९-७ ॥

evaṃ bruvāṇaṃ suhṛdaṃ bharataḥ pratyuvāca ha| śṛṇu tvaṃ yannimittaṃ me dainyametadupāgatam

ऐसा कहते हुए उस मित्र से भरत ने उत्तर दिया - "सुनो, किस कारण से मुझ पर यह उदासी आई है।"

श्लोक 8 (ayodhya.69.8)

स्वप्ने पितरमद्राक्षं मलिनं मुक्तमूर्धजम्। पतन्तमद्रिशिखरात् कलुषे गोमये ह्रदे॥ २-६९-८ ॥

svapne pitaramadrākṣaṃ malinaṃ muktamūrdhajam| patantamadriśikharāt kaluṣe gomaye hrade

"स्वप्न में मैंने अपने पिता को मलिन शरीर वाले, बिखरे केशों वाले, पर्वत-शिखर से गिरते हुए, गोबर से गंदे किसी ह्रद में देखा।"

श्लोक 9 (ayodhya.69.9)

प्लवमानश्च मे दृष्टः स तस्मिन् गोमयह्रदे। पिबन्नञ्जलिना तैलं हसन्निव मुहुर्मुहुः॥ २-६९-९ ॥

plavamānaśca me dṛṣṭaḥ sa tasmin gomayahrade| pibannañjalinā tailaṃ hasanniva muhurmuhuḥ

उस गोबर-भरे ह्रद में तैरते हुए भी मैंने उन्हें देखा, अंजलि से तेल पीते हुए और बार-बार हँसते हुए से।

श्लोक 10 (ayodhya.69.10)

ततस्तिलोदनं भुक्त्वा पुनः पुनोऽधःशिराः। तैलेनाभ्यक्तसर्वाङ्गस्तैलमेवावगाहत॥ २-६९-१० ॥

tatastilodanaṃ bhuktvā punaḥ puno'dhaḥśirāḥ| tailenābhyaktasarvāṅgastailamevāvagāhata

फिर तिल मिश्रित भात खाकर, बार-बार सिर नीचे किए हुए, तेल से लिप्त सम्पूर्ण शरीर वाले वे तेल में ही डूबते चले गए।

श्लोक 11 (ayodhya.69.11)

स्वप्नेऽपि सागरं शुष्कं चन्द्रं च पतितं भुवि। सहसा चापि संशान्तं ज्वलितं जातवेदसम्॥ २-६९-११ ॥

svapne'pi sāgaraṃ śuṣkaṃ candraṃ ca patitaṃ bhuvi| sahasā cāpi saṃśāntaṃ jvalitaṃ jātavedasam

"स्वप्न में मैंने समुद्र को सूखा हुआ, चन्द्रमा को धरती पर गिरा हुआ, और प्रज्वलित अग्नि को भी सहसा बुझा हुआ देखा।"

श्लोक 12 (ayodhya.69.12)

औपवाह्यस्य नागस्य विषाणं शकलीकृतम्। सहसा चापि संशान्तं ज्वलितं जातवेदसम्॥ २-६९-१२ ॥

aupavāhyasya nāgasya viṣāṇaṃ śakalīkṛtam| sahasā cāpi saṃśāntaṃ jvalitaṃ jātavedasam

"राजा के सवारी वाले हाथी का दाँत टुकड़े-टुकड़े हुआ देखा, और फिर से प्रज्वलित अग्नि को सहसा बुझा हुआ देखा।"

श्लोक 13 (ayodhya.69.13)

अवदीर्णां च पृथिवीं शुष्कांश्च विविधान् द्रुमान्। अहं पश्यामि विध्वस्तान् सधूमांश्चैव पार्वतान्॥ २-६९-१३ ॥

avadīrṇāṃ ca pṛthivīṃ śuṣkāṃśca vividhān drumān| ahaṃ paśyāmi vidhvastān sadhūmāṃścaiva pārvatān

"धरती को फटी हुई, अनेक वृक्षों को सूखा हुआ, और पर्वतों को धूम से आच्छादित, विध्वस्त-सा मैं देखता हूँ।"

श्लोक 14 (ayodhya.69.14)

पीठे कार्ष्णायसे चैनं निषण्णं कृष्णवाससम्। प्रहसन्ति स्म राजानं प्रमदाः कृष्णपिङ्गलाः॥ २-६९-१४ ॥

pīṭhe kārṣṇāyase cainaṃ niṣaṇṇaṃ kṛṣṇavāsasam| prahasanti sma rājānaṃ pramadāḥ kṛṣṇapiṅgalāḥ

"काले वस्त्र पहने हुए, लोहे के आसन पर बैठे हुए उस राजा पर, काले-भूरे रंग की स्त्रियाँ हँस रही थीं।"

श्लोक 15 (ayodhya.69.15)

त्वरमाणश्च धर्मात्मा रक्तमाल्यानुलेपनः। रथेन खरयुक्तेन प्रयातो दक्षिणामुखः॥ २-६९-१५ ॥

tvaramāṇaśca dharmātmā raktamālyānulepanaḥ| rathena kharayuktena prayāto dakṣiṇāmukhaḥ

"वह धर्मात्मा, लाल माला और लेप धारण किए हुए, शीघ्रता करते हुए, गधों से जुते रथ पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके चले गए।"

श्लोक 16 (ayodhya.69.16)

प्रहसन्तीव राजानं प्रमदा रक्तवासिनी। प्रकर्षन्ती मया दृष्टा राक्षसी विकृतासना॥ २-६९-१६ ॥

prahasantīva rājānaṃ pramadā raktavāsinī| prakarṣantī mayā dṛṣṭā rākṣasī vikṛtāsanā

"लाल वस्त्र पहने हुए, राजा पर मानो हँसती हुई, उन्हें घसीटती हुई एक विकृत मुख वाली राक्षसी को भी मैंने देखा।"

श्लोक 17 (ayodhya.69.17)

एवमेतन्मया दृष्टमिमां रात्रिं भयावहाम्। अहं रामोऽथ वा राजा लक्ष्मणो वा मरिष्यति॥ २-६९-१७ ॥

evametanmayā dṛṣṭamimāṃ rātriṃ bhayāvahām| ahaṃ rāmo'tha vā rājā lakṣmaṇo vā mariṣyati

"इस भयावह रात्रि में मैंने यह सब देखा है। इसका अर्थ है कि या तो मैं मरूँगा, या राम, या राजा, या लक्ष्मण।"

श्लोक 18 (ayodhya.69.18)

नरो यानेन यः स्वप्ने खरयुक्तेन याति हि। अचिरात्तस्य धूमाग्रं चितायां संप्रदृश्यते॥ २-६९-१८ ॥

naro yānena yaḥ svapne kharayuktena yāti hi| acirāttasya dhūmāgraṃ citāyāṃ saṃpradṛśyate

"स्वप्न में जो पुरुष गधों से जुते वाहन पर जाता हुआ दिखता है, शीघ्र ही उसकी चिता का धुआँ दिखाई देने लगता है।"

श्लोक 19 (ayodhya.69.19)

एतन्निमित्तं दीनोऽहं तन्न वः प्रतिपूजये। शुष्यतीव च मे कण्ठो न स्वस्थमिव मे मनः॥ २-६९-१९ ॥

etannimittaṃ dīno'haṃ tanna vaḥ pratipūjaye| śuṣyatīva ca me kaṇṭho na svasthamiva me manaḥ

"इसी कारण मैं दुःखी हूँ, इसीलिए मैं तुम्हारा उचित सत्कार नहीं कर पा रहा; मेरा कण्ठ मानो सूख रहा है, और मेरा मन भी स्वस्थ नहीं है।"

श्लोक 20 (ayodhya.69.20)

न पश्यामि भयस्थानं भयं चैवोपधारये। भ्रष्टश्च स्वरयोगो मे छाया चोपहता मम। जुगुप्सन्निव चात्मानं न च पश्यामि कारणम्॥ २-६९-२० ॥

na paśyāmi bhayasthānaṃ bhayaṃ caivopadhāraye| bhraṣṭaśca svarayogo me chāyā copahatā mama| jugupsanniva cātmānaṃ na ca paśyāmi kāraṇam

"मैं इस भय का कोई कारण नहीं देखता, फिर भी भय अनुभव करता हूँ; मेरा स्वर भी बिगड़ गया है, मेरी कान्ति भी नष्ट हो गई है; मानो मुझे अपने ही से घृणा हो रही है, पर इसका कारण भी मुझे नहीं दिखता।"

श्लोक 21 (ayodhya.69.21)

इमां हि दुःस्वप्नगतिं निशाम्य तां अनेकरूपामवितर्कितां पुरा। भयं महत्तद्धृदयान्न याति मे विचिन्त्य राजानमचिन्त्यदर्शनम्॥ २-६९-२१ ॥

imāṃ hi duḥsvapnagatiṃ niśāmya tāṃ anekarūpāmavitarkitāṃ purā| bhayaṃ mahattaddhṛdayānna yāti me vicintya rājānamacintyadarśanam

"इस अनेक रूपों वाली, पूर्व में कभी कल्पना भी न की गई ऐसी दुःस्वप्न की गति को देखकर, तथा राजा के उस अकल्पनीय दृश्य का चिन्तन करके, यह महान भय मेरे हृदय से दूर नहीं होता।"

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