अयोध्याकाण्ड · सर्ग 91
विश्वकर्मा का आतिथ्य
श्लोक 1 (ayodhya.91.1)
कृत बुद्धिम् निवासाय तथैव स मुनिः तदा। भरतम् कैकयी पुत्रम् आतिथ्येन न्यमन्त्रयत्॥ 91.1 ॥
kṛta buddhim nivāsāya tathaiva sa muniḥ tadā| bharatam kaikayī putram ātithyena nyamantrayat
तब यह जानकर कि भरत ने वहीं रात्रि-विश्राम करने का निश्चय कर लिया है, मुनि भरद्वाज ने कैकेयी-पुत्र भरत को आतिथ्य ग्रहण करने के लिए आमंत्रित किया।
श्लोक 2 (ayodhya.91.2)
अब्रवीद् भरतः तु एनम् ननु इदम् भवता कृतम्। पाद्यम् अर्घ्यम् तथा आतिथ्यम् वने यद् उपपद्यते॥ 91.2 ॥
abravīd bharataḥ tu enam nanu idam bhavatā kṛtam| pādyam arghyam tathā ātithyam vane yad upapadyate
भरत ने उनसे कहा—"क्या आपने मुझे यह आतिथ्य नहीं दिया? पाद्य, अर्घ्य और वन में जो कुछ भी उपलब्ध हो सकता था, वह सब तो आपने पहले ही दे दिया है।"
श्लोक 3 (ayodhya.91.3)
अथ उवाच भरद्वाजो भरतम् प्रहसन्न् इव। जाने त्वाम् प्रीति सम्युक्तम् तुष्येः त्वम् येन केनचित्॥ 91.3 ॥
atha uvāca bharadvājo bharatam prahasann iva| jāne tvām prīti samyuktam tuṣyeḥ tvam yena kenacit
तब भरद्वाज मुस्कराते हुए भरत से बोले—"मैं जानता हूँ कि तुम स्नेहशील स्वभाव के हो और जो कुछ भी दिया जाए, उसी से संतुष्ट हो जाते हो।"
श्लोक 4 (ayodhya.91.4)
सेनायाः तु तव एतस्याः कर्तुम् इच्छामि भोजनम्। मम प्रीतिर् यथारूपा त्वम् अर्हो मनुज ऋषभ॥ 91.4 ॥
senāyāḥ tu tava etasyāḥ kartum icchāmi bhojanam| mama prītir yathārūpā tvam arho manuja ṛṣabha
"किन्तु मैं तुम्हारी इस सेना के लिए भोज की व्यवस्था करना चाहता हूँ। हे नरश्रेष्ठ, तुम्हें चाहिए कि मेरे स्नेह को यथोचित रूप से पूर्ण होने दो।"
श्लोक 5 (ayodhya.91.5)
किम् अर्थम् च अपि निक्षिप्य दूरे बलम् इह आगतः। कस्मान् न इह उपयातो असि सबलः पुरुष ऋषभ॥ 91.5 ॥
kim artham ca api nikṣipya dūre balam iha āgataḥ| kasmān na iha upayāto asi sabalaḥ puruṣa ṛṣabha
"हे पुरुषश्रेष्ठ, तुम अपनी सेना को दूर छोड़कर यहाँ अकेले क्यों आए? तुम अपनी सेना के साथ यहाँ क्यों नहीं आए?"
श्लोक 6 (ayodhya.91.6)
भरतः प्रत्युवाच इदम् प्रान्जलिः तम् तपोधनम्। ससैन्यो न उपयातो अस्मि भगवन् भगवद्भयात्॥ 91.6 ॥
bharataḥ pratyuvāca idam prānjaliḥ tam tapodhanam| sasainyo na upayāto asmi bhagavan bhagavadbhayāt
भरत ने हाथ जोड़कर तपोधन भरद्वाज से कहा—"भगवन्, मैं आपको कष्ट होने के भय से ही सेना सहित नहीं आया।"
श्लोक 7 (ayodhya.91.7)
राज्ञा च भगवन् नित्यम् राजपुत्रेण वा सदा। यत्नतः परिहर्तव्या विषयेषु तपस्विनः॥ 91.7 ॥
rājñā ca bhagavan nityam rājaputreṇa vā sadā| yatnataḥ parihartavyā viṣayeṣu tapasvinaḥ
"भगवन्, राजा को अथवा राजपुत्र को सदैव प्रयत्नपूर्वक यह ध्यान रखना चाहिए कि तपस्वीजन उनके राज्य में कभी पीड़ित न हों।"
श्लोक 8 (ayodhya.91.8)
वाजिमुख्या मनुष्याः च मत्ताः च वरवारणाः। प्रच्छाद्य महतीम् भूमिम् भगवन्न् अनुयान्ति माम्॥ 91.8 ॥
vājimukhyā manuṣyāḥ ca mattāḥ ca varavāraṇāḥ| pracchādya mahatīm bhūmim bhagavann anuyānti mām
"भगवन्, श्रेष्ठ अश्व, अनेक पुरुष और मदमत्त गजराज विशाल भूमि को आच्छादित करते हुए मेरे पीछे-पीछे चल रहे हैं।"
श्लोक 9 (ayodhya.91.9)
ते वृक्षान् उदकम् भूमिम् आश्रमेषु उटजान् तथा। न हिंस्युर् इति तेन अहम् एक एव आगतः ततः॥ 91.9 ॥
te vṛkṣān udakam bhūmim āśrameṣu uṭajān tathā| na hiṃsyur iti tena aham eka eva āgataḥ tataḥ
"वे कहीं वृक्षों, जल, भूमि तथा आश्रम की कुटियों को हानि न पहुँचा दें—इसी विचार से मैं यहाँ अकेला ही आया हूँ।"
श्लोक 10 (ayodhya.91.10)
आनीयताम् इतः सेना इत्य् आज्ञप्तः परमर्षिणा। ततस् तु चक्रे भरतः सेनायाः समुपागमम्॥ 91.10 ॥
ānīyatām itaḥ senā ity ājñaptaḥ paramarṣiṇā| tatas tu cakre bharataḥ senāyāḥ samupāgamam
महर्षि की आज्ञा पाकर—"सेना यहीं बुला ली जाए"—भरत ने उसी प्रकार सेना को आश्रम तक बुलवा लिया।
श्लोक 11 (ayodhya.91.11)
अग्निशालाम् प्रविश्य अथ पीत्वा अपः परिमृज्य च। आतिथ्यस्य क्रियाहेतोर् विश्वकर्माणम् आह्वयत्॥ 91.11 ॥
agniśālām praviśya atha pītvā apaḥ parimṛjya ca| ātithyasya kriyāhetor viśvakarmāṇam āhvayat
तत्पश्चात् अग्निशाला में प्रवेश कर, जल पीकर तथा मुख शुद्ध करके, भरद्वाज ने आतिथ्य-कर्म हेतु विश्वकर्मा का आह्वान किया।
श्लोक 12 (ayodhya.91.12)
आह्वये विश्वकर्माणम् अहम् त्वष्टारम् एव च। आतिथ्यम् कर्तुम् इच्छामि तत्र मे संविधीयताम्॥ 91.12 ॥
āhvaye viśvakarmāṇam aham tvaṣṭāram eva ca| ātithyam kartum icchāmi tatra me saṃvidhīyatām
"मैं विश्वकर्मा का तथा त्वष्टा का भी आह्वान करता हूँ—मैं आतिथ्य करना चाहता हूँ, अतः इसके लिए व्यवस्था की जाए।"
श्लोक 13 (ayodhya.91.13)
आह्वये लोकपालान् त्रीन् देवान् शक्रमुखान् तथा। आतिथ्यम् कर्तुम् इच्छामि तत्र मे संविधीयताम्॥ 91.13 ॥
āhvaye lokapālān trīn devān śakramukhān tathā| ātithyam kartum icchāmi tatra me saṃvidhīyatām
"मैं तीनों लोकपालों को तथा इन्द्र-आदि देवताओं को भी आह्वान करता हूँ—मैं आतिथ्य करना चाहता हूँ, अतः इसके लिए व्यवस्था की जाए।"
श्लोक 14 (ayodhya.91.14)
प्राक्स्रोतसः च या नद्यः प्रत्यक्स्रोतस एव च। पृथिव्याम् अन्तरिक्षे च समायान्तु अद्य सर्वशः॥ 91.14 ॥
prāksrotasaḥ ca yā nadyaḥ pratyaksrotasa eva ca| pṛthivyām antarikṣe ca samāyāntu adya sarvaśaḥ
"जो नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं और जो पश्चिम की ओर, पृथ्वी पर हों या अंतरिक्ष में—वे सब आज सब ओर से यहाँ आ मिलें।"
श्लोक 15 (ayodhya.91.15)
अन्याः स्रवन्तु मैरेयम् सुराम् अन्याः सुनिष्ठिताम्। अपराः च उदकम् शीतम् इक्षुकाण्डरस उपमम्॥ 91.15 ॥
anyāḥ sravantu maireyam surām anyāḥ suniṣṭhitām| aparāḥ ca udakam śītam ikṣukāṇḍarasa upamam
"कुछ नदियाँ मैरेय मदिरा बहाएँ, कुछ सुपरिष्कृत सुरा, और कुछ इक्षु-रस के समान मीठा शीतल जल।"
श्लोक 16 (ayodhya.91.16)
आह्वये देवगन्धर्वान् विश्वावसु हहाहुहून्। तथैव अप्सरसो देवीर् गन्धर्वीः च अपि सर्वशः॥ 91.16 ॥
āhvaye devagandharvān viśvāvasu hahāhuhūn| tathaiva apsaraso devīr gandharvīḥ ca api sarvaśaḥ
"मैं देव-गन्धर्व विश्वावसु, हाहा और हूहू का आह्वान करता हूँ, और साथ ही सब दिशाओं से अप्सराओं तथा गन्धर्व-कन्याओं का भी।"
श्लोक 17 (ayodhya.91.17)
घृताचीम् अथ विश्वाचीम् मिश्रकेशीम् अलम्बुसाम्। नागदन्तां च हेमां च हिमाम् अद्रिकृतस्थलाम्॥ 91.17 ॥
ghṛtācīm atha viśvācīm miśrakeśīm alambusām| nāgadantāṃ ca hemāṃ ca himām adrikṛtasthalām
"मैं घृताची, विश्वाची, मिश्रकेशी, अलम्बुषा, नागदन्ता, हेमा तथा पर्वतों में निवास करने वाली हिमा का भी आह्वान करता हूँ।"
श्लोक 18 (ayodhya.91.18)
शक्रम् याः च उपतिष्ठन्ति ब्रह्माणम् याः च भामिनीः। सर्वाः तुम्बुरुणा सार्धम् आह्वये सपरिच्छदाः॥ 91.18 ॥
śakram yāḥ ca upatiṣṭhanti brahmāṇam yāḥ ca bhāminīḥ| sarvāḥ tumburuṇā sārdham āhvaye saparicchadāḥ
"जो तेजस्वी अप्सराएँ इन्द्र की और ब्रह्मा की सेवा में रहती हैं, उन सबका मैं तुम्बुरु सहित, उनके परिवार समेत, आह्वान करता हूँ।"
श्लोक 19 (ayodhya.91.19)
वनम् कुरुषु यद् दिव्यम् वासो भूषणपत्रवत्। दिव्यनारीफलम् शश्वत् तत् कौबेरम् इह एव तु॥ 91.19 ॥
vanam kuruṣu yad divyam vāso bhūṣaṇapatravat| divyanārīphalam śaśvat tat kauberam iha eva tu
"उत्तर कुरु देश में जो वह दिव्य वन है, जिसके पत्ते ही वस्त्र और आभूषण हैं, और जिसका शाश्वत फल दिव्य स्त्रियाँ हैं—कुबेर का वह वन यहीं प्रकट हो।"
श्लोक 20 (ayodhya.91.20)
इह मे भगवान् सोमो विधत्ताम् अन्नम् उत्तमम्। भक्ष्यम् भोज्यम् च चोष्यम् च लेह्यम् च विविधम् बहु॥ 91.20 ॥
iha me bhagavān somo vidhattām annam uttamam| bhakṣyam bhojyam ca coṣyam ca lehyam ca vividham bahu
"यहाँ भगवान् सोम मेरे लिए उत्तम अन्न की व्यवस्था करें—भक्ष्य, भोज्य, चोष्य और लेह्य—इस प्रकार के विविध और प्रचुर पदार्थ।"
श्लोक 21 (ayodhya.91.21)
विचित्राणि च माल्यानि पादपप्रच्युतानि च। सुरादीनि च पेयानि मांसानि विविधानि च॥ 91.21 ॥
vicitrāṇi ca mālyāni pādapapracyutāni ca| surādīni ca peyāni māṃsāni vividhāni ca
"तथा वृक्षों से अभी-अभी गिरी हुई नाना रंग की मालाएँ, सुरा आदि पेय पदार्थ और विविध प्रकार के मांस भी यहाँ उपस्थित हों।"
श्लोक 22 (ayodhya.91.22)
एवम् समाधिना युक्तः तेजसा अप्रतिमेन च। शिक्षास्वरसमायुक्तम् तपसा च अब्रवीन् मुनिः॥ 91.22 ॥
evam samādhinā yuktaḥ tejasā apratimena ca| śikṣāsvarasamāyuktam tapasā ca abravīn muniḥ
इस प्रकार गहन समाधि में लीन और अपने तप के अनुपम तेज से युक्त उस मुनि ने शिक्षा के अनुरूप शुद्ध स्वरों में इन शब्दों का उच्चारण किया।
श्लोक 23 (ayodhya.91.23)
मनसा ध्यायतः तस्य प्राङ्मुखस्य कृतान्जलेः। आजग्मुः तानि सर्वाणि दैवतानि पृथक्पृथक्॥ 91.23 ॥
manasā dhyāyataḥ tasya prāṅmukhasya kṛtānjaleḥ| ājagmuḥ tāni sarvāṇi daivatāni pṛthakpṛthak
पूर्वाभिमुख होकर हाथ जोड़े मन-ही-मन ध्यान करते हुए भरद्वाज के समक्ष वे सभी देवता एक-एक करके आ उपस्थित हुए।
श्लोक 24 (ayodhya.91.24)
मलयम् दर्दुरम् चैव ततः स्वेदनुदो अनिलः। उपस्पृश्य ववौ युक्त्या सुप्रियात्मा सुखः शिवः॥ 91.24 ॥
malayam darduram caiva tataḥ svedanudo anilaḥ| upaspṛśya vavau yuktyā supriyātmā sukhaḥ śivaḥ
तत्पश्चात् मलय और दर्दुर पर्वतों का स्पर्श करके पसीना दूर करने वाली, मन को अत्यंत भाने वाली, सुखद और कल्याणकारी वायु धीरे-धीरे बहने लगी।
श्लोक 25 (ayodhya.91.25)
ततो अभ्यवर्तन्त घना दिव्याः कुसुमवृष्टयः। देवदुन्दुभिघोषः च दिक्षु सर्वासु शुश्रुवे॥ 91.25 ॥
tato abhyavartanta ghanā divyāḥ kusumavṛṣṭayaḥ| devadundubhighoṣaḥ ca dikṣu sarvāsu śuśruve
तत्पश्चात् दिव्य पुष्पों की सघन वर्षा होने लगी और सभी दिशाओं में देव-दुन्दुभियों की गम्भीर ध्वनि सुनाई देने लगी।
श्लोक 26 (ayodhya.91.26)
प्रववुः च उत्तमा वाता ननृतुः च अप्सरोगणाः। प्रजगुर् देवगन्धर्वा वीणाः प्रमुमुचुः स्वरान्॥ 91.26 ॥
pravavuḥ ca uttamā vātā nanṛtuḥ ca apsarogaṇāḥ| prajagur devagandharvā vīṇāḥ pramumucuḥ svarān
श्रेष्ठ वायु बहने लगी, अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे, देव-गन्धर्व गाने लगे और वीणाएँ मधुर स्वर बिखेरने लगीं।
श्लोक 27 (ayodhya.91.27)
स शब्दो द्याम् च भूमिम् च प्राणिनाम् श्रवणानि च। विवेश उच्चारितः श्लक्ष्णः समो लयगुणान्वितः॥ 91.27 ॥
sa śabdo dyām ca bhūmim ca prāṇinām śravaṇāni ca| viveśa uccāritaḥ ślakṣṇaḥ samo layaguṇānvitaḥ
वह मधुर, सम और लय-गुण से संपन्न ध्वनि आकाश में, पृथ्वी पर तथा समस्त प्राणियों के कानों में गूँज उठी।
श्लोक 28 (ayodhya.91.28)
तस्मिन्न् उपरते शब्दे दिव्ये श्रोत्रसुखे नृणाम्। ददर्श भारतम् सैन्यम् विधानम् विश्वकर्मणः॥ 91.28 ॥
tasminn uparate śabde divye śrotrasukhe nṛṇām| dadarśa bhāratam sainyam vidhānam viśvakarmaṇaḥ
जब वह दिव्य, कानों को सुखद लगने वाली ध्वनि शान्त हुई, तब भरत की सेना ने विश्वकर्मा की रची हुई वह अद्भुत रचना देखी।
श्लोक 29 (ayodhya.91.29)
बभूव हि समा भूमिः समन्तात् पन्चयोजनम्। शाद्वलैर् बहुभिः चन्ना नीलवैदूर्यसंनिभैः॥ 91.29 ॥
babhūva hi samā bhūmiḥ samantāt pancayojanam| śādvalair bahubhiḥ cannā nīlavaidūryasaṃnibhaiḥ
चारों ओर पाँच योजन तक भूमि समतल हो गई थी और नीलमणि के समान हरी दूब से आच्छादित थी।
श्लोक 30 (ayodhya.91.30)
तस्मिन् बिल्वाः कपित्थाः च पनसा बीजपूरकाः। आमलक्यो बभूवुः च चूताः च फलभूषणाः॥ 91.30 ॥
tasmin bilvāḥ kapitthāḥ ca panasā bījapūrakāḥ| āmalakyo babhūvuḥ ca cūtāḥ ca phalabhūṣaṇāḥ
वहाँ बिल्व, कैथ, कटहल, बिजौरा और आँवले के वृक्ष तथा फलों से सुशोभित आम के वृक्ष उग आए।
श्लोक 31 (ayodhya.91.31)
उत्तरेभ्यः कुरुभ्यः च वनम् दिव्योपभोगवत्। आजगाम नदी दिव्या तीरजैर् बहुभिर् वृता॥ 91.31 ॥
uttarebhyaḥ kurubhyaḥ ca vanam divyopabhogavat| ājagāma nadī divyā tīrajair bahubhir vṛtā
उत्तर कुरु देश से वह दिव्य भोग-सामग्री से युक्त वन तथा तटों पर अनेक वृक्षों से घिरी हुई एक दिव्य नदी वहाँ आ पहुँची।
श्लोक 32 (ayodhya.91.32)
चतुःशालानि शुभ्राणि शालाः च गजवाजिनाम्। हर्म्यप्रासादसंघाताः तोरणानि शुभानि च॥ 91.32 ॥
catuḥśālāni śubhrāṇi śālāḥ ca gajavājinām| harmyaprāsādasaṃghātāḥ toraṇāni śubhāni ca
श्वेत चतुःशालाएँ, हाथी-घोड़ों की शालाएँ, भवनों और अट्टालिकाओं के समूह तथा सुंदर तोरण-द्वार वहाँ प्रकट हो गए।
श्लोक 33 (ayodhya.91.33)
सित मेघनिभम् च अपि राजवेश्म सुतोरणम्। शुक्लमाल्यकृताकारम् दिव्यगन्धसमुक्षितम्॥ 91.33 ॥
sita meghanibham ca api rājaveśma sutoraṇam| śuklamālyakṛtākāram divyagandhasamukṣitam
और एक राजभवन भी प्रकट हुआ, जो श्वेत मेघ के समान उज्ज्वल था, सुंदर तोरणों से युक्त, श्वेत मालाओं से सुसज्जित तथा दिव्य सुगंध से सिंचित था।
श्लोक 34 (ayodhya.91.34)
चतुरस्रम् असंबाधम् शयनासनयानवत्। दिव्यैः सर्वरसैर् युक्तम् दिव्यभोजनवस्त्रवत्॥ 91.34 ॥
caturasram asaṃbādham śayanāsanayānavat| divyaiḥ sarvarasair yuktam divyabhojanavastravat
वह भवन चतुष्कोणीय, विशाल, शय्या-आसन-यानों से युक्त, समस्त दिव्य रसों से संपन्न तथा दिव्य भोजन एवं वस्त्रों से परिपूर्ण था।
श्लोक 35 (ayodhya.91.35)
उपकल्पितसर्वान्नम् धौतनिर्मलभाजनम्। क्लृप्तसर्वासनम् श्रीमत् स्वास्तीर्णशयनोत्तमम्॥ 91.35 ॥
upakalpitasarvānnam dhautanirmalabhājanam| klṛptasarvāsanam śrīmat svāstīrṇaśayanottamam
सब प्रकार का अन्न स्वच्छ धुले हुए पात्रों में तैयार रखा था, सभी आसन व्यवस्थित थे, और उत्तम शय्याएँ भली-भाँति बिछाई गई थीं—वह भवन अत्यंत शोभायमान था।
श्लोक 36 (ayodhya.91.36)
प्रविवेश महाबाहुर् अनुज्ञातो महर्षिणा। वेश्म तद् रत्नसंपूर्णम् भरतः कैकयीसुतः॥ 91.36 ॥
praviveśa mahābāhur anujñāto maharṣiṇā| veśma tad ratnasaṃpūrṇam bharataḥ kaikayīsutaḥ
महर्षि की अनुमति पाकर महाबाहु कैकेयी-पुत्र भरत ने रत्नों से परिपूर्ण उस भवन में प्रवेश किया।
श्लोक 37 (ayodhya.91.37)
अनुजग्मुः च तम् सर्वे मन्त्रिणः सपुरोहिताः। बभूवुः च मुदा युक्ता तम् दृष्ट्वा वेश्मसंविधिम्॥ 91.37 ॥
anujagmuḥ ca tam sarve mantriṇaḥ sapurohitāḥ| babhūvuḥ ca mudā yuktā tam dṛṣṭvā veśmasaṃvidhim
सभी मंत्री पुरोहितों सहित उनके पीछे-पीछे गए, और उस भवन की भव्य व्यवस्था देखकर वे सब अत्यंत प्रसन्न हो उठे।
श्लोक 38 (ayodhya.91.38)
तत्र राजासनम् दिव्यम् व्यजनम् छत्रम् एव च। भरतो मन्त्रिभिः सार्धम् अभ्यवर्तत राजवत्॥ 91.38 ॥
tatra rājāsanam divyam vyajanam chatram eva ca| bharato mantribhiḥ sārdham abhyavartata rājavat
वहाँ भरत ने अपने मंत्रियों के साथ उस दिव्य राजसिंहासन, चँवर और छत्र की उसी प्रकार परिक्रमा की मानो कोई राजा वहाँ विराजमान हो।
श्लोक 39 (ayodhya.91.39)
आसनम् पूजयाम् आस रामाय अभिप्रणम्य च। वालव्यजनम् आदाय न्यषीदत् सचिवासने॥ 91.39 ॥
āsanam pūjayām āsa rāmāya abhipraṇamya ca| vālavyajanam ādāya nyaṣīdat sacivāsane
उन्होंने उस आसन को मानो साक्षात् राम को प्रणाम करते हुए वंदन किया, और फिर चँवर उठाकर मंत्री के आसन पर बैठ गए।
श्लोक 40 (ayodhya.91.40)
आनुपूर्व्यान् निषेदुः च सर्वे मन्त्रपुरोहिताः। ततः सेनापतिः पश्चात् प्रशास्ता च निषेदतुः॥ 91.40 ॥
ānupūrvyān niṣeduḥ ca sarve mantrapurohitāḥ| tataḥ senāpatiḥ paścāt praśāstā ca niṣedatuḥ
सभी मंत्री और पुरोहित यथाक्रम अपने-अपने आसन पर बैठे; उनके पश्चात् सेनापति और अंत में शिविर के प्रबंधक भी बैठे।
श्लोक 41 (ayodhya.91.41)
ततस् तत्र मुहूर्तेन नद्यः पायसकर्दमाः। उपातिष्ठन्त भरतम् भरद्वाजस्य शासनात्॥ 91.41 ॥
tatas tatra muhūrtena nadyaḥ pāyasakardamāḥ| upātiṣṭhanta bharatam bharadvājasya śāsanāt
तत्पश्चात् भरद्वाज की आज्ञा से क्षणभर में ही ऐसी नदियाँ प्रकट होकर भरत के समीप बहने लगीं, जिनकी कीचड़ भी खीर के समान थी।
श्लोक 42 (ayodhya.91.42)
तासाम् उभयतः कूलम् पाण्डुमृत्तिकलेपनाः। रम्याः च आवसथा दिव्या ब्रह्मणः तु प्रसादजाः॥ 91.42 ॥
tāsām ubhayataḥ kūlam pāṇḍumṛttikalepanāḥ| ramyāḥ ca āvasathā divyā brahmaṇaḥ tu prasādajāḥ
उन नदियों के दोनों तटों पर श्वेत मिट्टी से पुते हुए रमणीय दिव्य आवास प्रकट हुए, जो ब्रह्मा जी की कृपा से उत्पन्न हुए थे।
श्लोक 43 (ayodhya.91.43)
तेन एव च मुहूर्तेन दिव्याभरणभूषिताः। आगुर् विंशतिसाहस्राः ब्राह्मणाः प्रहिताः स्त्रियः॥ 91.43 ॥
tena eva ca muhūrtena divyābharaṇabhūṣitāḥ| āgur viṃśatisāhasrāḥ brāhmaṇāḥ prahitāḥ striyaḥ
उसी क्षण ब्रह्मा जी द्वारा भेजी गई दिव्य आभूषणों से सुसज्जित बीस हजार स्त्रियाँ वहाँ आ पहुँचीं।
श्लोक 44 (ayodhya.91.44)
सुवर्णमणिमुक्तेन प्रवालेन च शोभिताः। आगुर् विंशतिसाहस्राः कुबेरप्रहिताः स्त्रियः॥ 91.44 ॥
suvarṇamaṇimuktena pravālena ca śobhitāḥ| āgur viṃśatisāhasrāḥ kuberaprahitāḥ striyaḥ
सोना, मणि, मोती और मूँगे से सुशोभित बीस हजार अन्य स्त्रियाँ कुबेर द्वारा भेजी हुई वहाँ आईं।
श्लोक 45 (ayodhya.91.45)
याभिर् गृहीतः पुरुषः स उन्माद इव लक्ष्यते। आगुर् विंशतिसाहस्रा नन्दनाद् अप्सरोगणाः॥ 91.45 ॥
yābhir gṛhītaḥ puruṣaḥ sa unmāda iva lakṣyate| āgur viṃśatisāhasrā nandanād apsarogaṇāḥ
नंदनवन से बीस हजार अप्सराओं के समूह भी वहाँ आए, जिनके आलिंगन में बँधा पुरुष मानो उन्मत्त-सा प्रतीत होने लगता है।
श्लोक 46 (ayodhya.91.46)
नारदः तुम्बुरुर् गोपः पर्वतः सूर्यवर्चसः। एते गन्धर्वराजानो भरतस्य अग्रतो जगुः॥ 91.46 ॥
nāradaḥ tumburur gopaḥ parvataḥ sūryavarcasaḥ| ete gandharvarājāno bharatasya agrato jaguḥ
नारद, तुम्बुरु, गोप और पर्वत—सूर्य के समान तेजस्वी ये गन्धर्वराज भरत के समक्ष गान करने लगे।
श्लोक 47 (ayodhya.91.47)
अलम्बुसा मिश्रकेशी पुण्डरीका अथ वामना। उपानृत्यन्त तु भरतम् भरद्वाजस्य शासनात्॥ 91.47 ॥
alambusā miśrakeśī puṇḍarīkā atha vāmanā| upānṛtyanta tu bharatam bharadvājasya śāsanāt
भरद्वाज की आज्ञा से अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका और वामना भरत के समक्ष नृत्य करने लगीं।
श्लोक 48 (ayodhya.91.48)
यानि माल्यानि देवेषु यानि चैत्ररथे वने। प्रयागे तान्य् अदृश्यन्त भरद्वाजस्य शासनात्॥ 91.48 ॥
yāni mālyāni deveṣu yāni caitrarathe vane| prayāge tāny adṛśyanta bharadvājasya śāsanāt
भरद्वाज की आज्ञा से देवताओं के पास और चैत्ररथ वन में मिलने वाली मालाएँ प्रयाग में वहाँ प्रकट हो गईं।
श्लोक 49 (ayodhya.91.49)
बिल्वाः मार्दन्गिकाः आसन् शम्याग्राहा बिभीतकाः। अश्वत्थाः नर्तकाः च आसन् भरद्वाजस्य तेजसा॥ 91.49 ॥
bilvāḥ mārdangikāḥ āsan śamyāgrāhā bibhītakāḥ| aśvatthāḥ nartakāḥ ca āsan bharadvājasya tejasā
भरद्वाज के तेज से बिल्व वृक्ष मृदंग बजाने वाले बने, बिभीतक वृक्ष झाँझ बजाने वाले, और अश्वत्थ वृक्ष नर्तक बन गए।
श्लोक 50 (ayodhya.91.50)
ततः सरलतालाः च तिलका नक्तमालकाः। प्रहृष्टाः तत्र संपेतुः कुब्जीभूताः अथ वामनाः॥ 91.50 ॥
tataḥ saralatālāḥ ca tilakā naktamālakāḥ| prahṛṣṭāḥ tatra saṃpetuḥ kubjībhūtāḥ atha vāmanāḥ
तत्पश्चात् देवदार, ताड़, तिलक और करंज के वृक्ष हर्षित होकर कुबड़े और बौने रूप धारण कर वहाँ दौड़ आए।
श्लोक 51 (ayodhya.91.51)
शिंशपा आमलकी जम्बूर् याः च अन्याः कानने लताः। मालती मल्लिका जातिर् याः च अन्याः कानने लताः॥ 91.51 ॥
śiṃśapā āmalakī jambūr yāḥ ca anyāḥ kānane latāḥ| mālatī mallikā jātir yāḥ ca anyāḥ kānane latāḥ
शिंशपा, आँवला और जामुन के वृक्ष, तथा वन की अन्य लताएँ, और मालती, मल्लिका और जाती की लताएँ भी—
श्लोक 52 (ayodhya.91.52)
प्रमदाविग्रहम् कृत्वा भरद्वाजाश्रमे अवसन्। सुराम् सुरापाः पिबत पायसम् च बुभुक्षिताः॥ 91.52 ॥
pramadāvigraham kṛtvā bharadvājāśrame avasan| surām surāpāḥ pibata pāyasam ca bubhukṣitāḥ
—भरद्वाज के आश्रम में युवतियों का रूप धारण करके निवास करने लगीं और बोलीं—"हे सुरा-प्रेमियो, सुरा पियो! हे भूखे लोगो, खीर खाओ!"
श्लोक 53 (ayodhya.91.53)
मांसानि च सुमेध्यानि भक्ष्यध्वम् यावद् इच्छथ॥ 91.53 ॥
māṃsāni ca sumedhyāni bhakṣyadhvam yāvad icchatha
"और यह शुद्ध मांस भी जितना चाहो, उतना खाओ!"
श्लोक 54 (ayodhya.91.54)
उत्साद्य स्नापयन्ति स्म नदीतीरेषु वल्गुषु। अप्य् एकैकम् पुरुषम् प्रमदाः सप्त च अष्ट च॥ 91.54 ॥
utsādya snāpayanti sma nadītīreṣu valguṣu| apy ekaikam puruṣam pramadāḥ sapta ca aṣṭa ca
नदी के सुंदर तटों पर सात-सात या आठ-आठ युवतियाँ मिलकर प्रत्येक पुरुष का उबटन लगाकर स्नान कराती थीं।
श्लोक 55 (ayodhya.91.55)
संवहन्त्यः समापेतुर् नार्यो रुचिरलोचनाः। परिमृज्य तथा न्यायम् पाययन्ति वराङ्गनाः॥ 91.55 ॥
saṃvahantyaḥ samāpetur nāryo ruciralocanāḥ| parimṛjya tathā nyāyam pāyayanti varāṅganāḥ
सुंदर नेत्रों वाली स्त्रियाँ दौड़ी-दौड़ी आकर उनके अंगों की मालिश करतीं, फिर भली-भाँति पोंछकर उन्हें यथाविधि पेय पदार्थ पिलातीं।
श्लोक 56 (ayodhya.91.56)
हयान् गजान् खरान् उष्ट्रान् तथैव सुरभेः सुतान्। अभोजयन् वाहनपाः तेषाम् भोज्यम् यथाविधि॥ 91.56 ॥
hayān gajān kharān uṣṭrān tathaiva surabheḥ sutān| abhojayan vāhanapāḥ teṣām bhojyam yathāvidhi
घोड़ों, हाथियों, गधों, ऊँटों तथा गौवंश को उनके रखवालों ने यथाविधि उनका उचित भोजन खिलाया।
श्लोक 57 (ayodhya.91.57)
इक्षून् च मधुजालान् च भोजयन्ति स्म वाहनान्। इक्ष्वाकुवरयोधानाम् चोदयन्तो महाबलाः॥ 91.57 ॥
ikṣūn ca madhujālān ca bhojayanti sma vāhanān| ikṣvākuvarayodhānām codayanto mahābalāḥ
इक्ष्वाकुवंश के श्रेष्ठ योद्धाओं के बलिष्ठ सेवक पशुओं को गन्ना और मधु मिश्रित अन्न खिलाते हुए प्रेमपूर्वक उन्हें खाने के लिए प्रेरित करते थे।
श्लोक 58 (ayodhya.91.58)
न अश्वबन्धो अश्वम् आजानान् न गजम् कुन्जरग्रहः। मत्तप्रमत्तमुदिता चमूः सा तत्र सम्बभौ॥ 91.58 ॥
na aśvabandho aśvam ājānān na gajam kunjaragrahaḥ| mattapramattamuditā camūḥ sā tatra sambabhau
घोड़े का रखवाला अपने ही घोड़े को नहीं पहचान पाता था और महावत अपने ही हाथी को नहीं—वह पूरी सेना वहाँ मदमस्त, बेसुध और आनंदमग्न होकर सुशोभित हो रही थी।
श्लोक 59 (ayodhya.91.59)
तर्पिता सर्वकामैः ते रक्तचन्दनरूषिताः। अप्सरोगणसंयुक्ताः सैन्या वाचम् उदैरयन्॥ 91.59 ॥
tarpitā sarvakāmaiḥ te raktacandanarūṣitāḥ| apsarogaṇasaṃyuktāḥ sainyā vācam udairayan
सभी कामनाओं से तृप्त, लाल चन्दन से अनुलिप्त और अप्सराओं के समूह से घिरे हुए सैनिक यह कहने लगे—
श्लोक 60 (ayodhya.91.60)
न एव अयोध्याम् गमिष्यामो न गमिष्याम दण्डकान्। कुशलम् भरतस्य अस्तु रामस्य अस्तु तथा सुखम्॥ 91.60 ॥
na eva ayodhyām gamiṣyāmo na gamiṣyāma daṇḍakān| kuśalam bharatasya astu rāmasya astu tathā sukham
"हम न अयोध्या जाएँगे और न दण्डकारण्य! भरत का कल्याण हो, और राम भी सुखी रहें!"
श्लोक 61 (ayodhya.91.61)
इति पादातयोधाः च हस्त्यश्वारोहबन्धकाः। अनाथाः तम् विधिम् लब्ध्वा वाचम् एताम् उदैरयन्॥ 91.61 ॥
iti pādātayodhāḥ ca hastyaśvārohabandhakāḥ| anāthāḥ tam vidhim labdhvā vācam etām udairayan
इस प्रकार पैदल सैनिक, तथा हाथी-घोड़ों के सवार और रखवाले भी—स्वामीरहित होते हुए भी ऐसा आदर पाकर—यही वचन बोलने लगे।
श्लोक 62 (ayodhya.91.62)
सम्प्रहृष्टा विनेदुः ते नराः तत्र सहस्रशः। भरतस्य अनुयातारः स्वर्गे अयम् इति च अब्रुवन्॥ 91.62 ॥
samprahṛṣṭā vineduḥ te narāḥ tatra sahasraśaḥ| bharatasya anuyātāraḥ svarge ayam iti ca abruvan
भरत के साथ चलने वाले हजारों पुरुष अत्यंत हर्षित होकर वहाँ ऊँचे स्वर में पुकार उठे—"यह तो साक्षात् स्वर्ग ही है!"
श्लोक 63 (ayodhya.91.63)
नृत्यन्ति स्म हसन्ति स्म गायन्ति स्म च सैनिकाः। समन्तात् परिधावन्ति माल्योपेताः सहस्रशः॥ 91.63 ॥
nṛtyanti sma hasanti sma gāyanti sma ca sainikāḥ| samantāt paridhāvanti mālyopetāḥ sahasraśaḥ
सैनिक नाचते, हँसते और गाते थे; मालाओं से सुसज्जित हजारों सैनिक चारों ओर इधर-उधर दौड़ते फिरते थे।
श्लोक 64 (ayodhya.91.64)
ततो भुक्तवताम् तेषाम् तद् अन्नम् अमृतोपमम्। दिव्यान् उद्वीक्ष्य भक्ष्यान् तान् अभवद् भक्षणे मतिः॥ 91.64 ॥
tato bhuktavatām teṣām tad annam amṛtopamam| divyān udvīkṣya bhakṣyān tān abhavad bhakṣaṇe matiḥ
उस अमृत-तुल्य अन्न को खा चुकने पर भी, उन दिव्य पदार्थों को पुनः देखकर उनके मन में फिर से खाने की इच्छा जाग उठती थी।
श्लोक 65 (ayodhya.91.65)
प्रेष्याः चेट्यः च वध्वः च बलस्थाः च अपि सर्वशः। बभूवुः ते भृशम् तृप्ताः सर्वे च आहतवाससः॥ 91.65 ॥
preṣyāḥ ceṭyaḥ ca vadhvaḥ ca balasthāḥ ca api sarvaśaḥ| babhūvuḥ te bhṛśam tṛptāḥ sarve ca āhatavāsasaḥ
सेवक, दासियाँ, सैनिकों की पत्नियाँ और सेना के सभी लोग सर्वत्र भलीभाँति तृप्त हो गए, और सभी नए वस्त्र धारण किए हुए थे।
श्लोक 66 (ayodhya.91.66)
कुन्जराः च खरोष्ट्राः च गवाश्वाः च मृगपक्षिणः। बभूवुः सुभृताः तत्र न अन्यो ह्य् अन्यम् अकल्पयत्॥ 91.66 ॥
kunjarāḥ ca kharoṣṭrāḥ ca gavāśvāḥ ca mṛgapakṣiṇaḥ| babhūvuḥ subhṛtāḥ tatra na anyo hy anyam akalpayat
हाथी, गधे, ऊँट, गाय, घोड़े, मृग और पक्षी—सभी वहाँ भलीभाँति तृप्त होकर पोषित हुए, इसलिए कोई किसी को कष्ट नहीं पहुँचाता था।
श्लोक 67 (ayodhya.91.67)
न अशुक्लवासाः तत्र आसीत् क्षुधितो मलिनो अपि वा। रजसा ध्वस्तकेशो वा नरः कश्चिद् अदृश्यत॥ 91.67 ॥
na aśuklavāsāḥ tatra āsīt kṣudhito malino api vā| rajasā dhvastakeśo vā naraḥ kaścid adṛśyata
वहाँ कोई भी व्यक्ति ऐसा दिखाई नहीं देता था जो मैले वस्त्र पहने हो, भूखा हो, गंदा हो, अथवा जिसके बाल धूल से अस्तव्यस्त हों।
श्लोक 68 (ayodhya.91.68)
आजैः च अपि च वाराहैर् निष्ठानवरसंचयैः। फलनिर्यूहसंसिद्धैः सूपैर् गन्धरसान्वितैः॥ 91.68 ॥
ājaiḥ ca api ca vārāhair niṣṭhānavarasaṃcayaiḥ| phalaniryūhasaṃsiddhaiḥ sūpair gandharasānvitaiḥ
वहाँ बकरे और सूअर के मांस से बने उत्तम व्यंजनों के ढेर थे, तथा फलों के रस से बने सुगंधित और स्वादिष्ट सूप भी थे।
श्लोक 69 (ayodhya.91.69)
पुष्पध्वजवतीः पूर्णाः शुक्लस्य अन्नस्य च अभितः। ददृशुर् विस्मिताः तत्र नरा लौहीः सहस्रशः॥ 91.69 ॥
puṣpadhvajavatīḥ pūrṇāḥ śuklasya annasya ca abhitaḥ| dadṛśur vismitāḥ tatra narā lauhīḥ sahasraśaḥ
सैनिकों ने चकित होकर चारों ओर देखा—पताकाओं से सजे हुए लौह-पात्र श्वेत चावल से भरे हुए वहाँ हजारों की संख्या में रखे थे।
श्लोक 70 (ayodhya.91.70)
बभूवुर् वनपार्श्वेषु कूपाः पायसकर्दमाः। ताः च कामदुघा गावो द्रुमाः च आसन् मधुश्च्युतः॥ 91.70 ॥
babhūvur vanapārśveṣu kūpāḥ pāyasakardamāḥ| tāḥ ca kāmadughā gāvo drumāḥ ca āsan madhuścyutaḥ
वन के किनारों पर ऐसे कुएँ प्रकट हो गए जिनकी कीचड़ भी खीर के समान थी; वहाँ की गौएँ कामधेनु समान हो गईं और वृक्षों से मधु टपकने लगा।
श्लोक 71 (ayodhya.91.71)
वाप्यो मैरेयपूर्णाः च मृष्टमांसचयैर् वृताः। प्रतप्तपिठरैः च अपि मार्गमायूरकौक्कुटैः॥ 91.71 ॥
vāpyo maireyapūrṇāḥ ca mṛṣṭamāṃsacayair vṛtāḥ| prataptapiṭharaiḥ ca api mārgamāyūrakaukkuṭaiḥ
वहाँ मैरेय मदिरा से भरे हुए कुण्ड थे, और कुछ अन्य कुण्ड मृग, मयूर और वन-कुक्कुट के स्वादिष्ट मांस से भरे हुए थे, जो गरम कड़ाहों में पकाए गए थे।
श्लोक 72 (ayodhya.91.72)
पात्रीणाम् च सहस्राणि शातकुम्भमयानि च। स्थाल्यः कुम्भ्यः करम्भ्यः च दधिपूर्णाः सुसंस्कृताः॥ 91.72 ॥
pātrīṇām ca sahasrāṇi śātakumbhamayāni ca| sthālyaḥ kumbhyaḥ karambhyaḥ ca dadhipūrṇāḥ susaṃskṛtāḥ
वहाँ हजारों स्वर्ण-पात्र थे, तथा भलीभाँति स्वच्छ किए हुए कटोरे, छोटे कलश और चौड़े मुँह वाले पात्र भी, जो सब दही से भरे हुए थे।
श्लोक 73 (ayodhya.91.73)
यौवनस्थस्य गौरस्य कपित्थस्य सुगन्धिनः। ह्रदाः पूर्णा रसालस्य दध्नः श्वेतस्य च अपरे। बभूवुः पायसस्य अन्ये शर्करायाः च संचयाः॥ 91.73 ॥
yauvanasthasya gaurasya kapitthasya sugandhinaḥ| hradāḥ pūrṇā rasālasya dadhnaḥ śvetasya ca apare| babhūvuḥ pāyasasya anye śarkarāyāḥ ca saṃcayāḥ
वहाँ पके हुए सुगंधित पीले कैथ के रस से भरे सरोवर थे, कुछ अन्य श्वेत दही से भरे हुए, और कुछ खीर तथा शक्कर के ढेरों से युक्त थे।
श्लोक 74 (ayodhya.91.74)
कल्कान् चूर्णकषायान् च स्नानानि विविधानि च। ददृशुर् भाजनस्थानि तीर्थेषु सरिताम् नराः॥ 91.74 ॥
kalkān cūrṇakaṣāyān ca snānāni vividhāni ca| dadṛśur bhājanasthāni tīrtheṣu saritām narāḥ
लोगों ने नदी के घाटों पर पात्रों में रखे हुए उबटन, चूर्ण, काढ़े और स्नान की विविध सामग्रियाँ देखीं।
श्लोक 75 (ayodhya.91.75)
शुक्लान् अंशुमतः च अपि दन्तधावनसंचयान्। शुक्लान् चन्दनकल्कान् च समुद्गेषु अवतिष्ठतः॥ 91.75 ॥
śuklān aṃśumataḥ ca api dantadhāvanasaṃcayān| śuklān candanakalkān ca samudgeṣu avatiṣṭhataḥ
उन्होंने चमकीली श्वेत दातुनों के ढेर तथा डिब्बों में रखे श्वेत चन्दन के उबटन देखे।
श्लोक 76 (ayodhya.91.76)
दर्पणान् परिमृष्टान् च वाससाम् च अपि संचयान्। पादुकोपानहान् चैव युग्मान् यत्र सहस्रशः॥ 91.76 ॥
darpaṇān parimṛṣṭān ca vāsasām ca api saṃcayān| pādukopānahān caiva yugmān yatra sahasraśaḥ
—चमकाए हुए दर्पण, वस्त्रों के ढेर, तथा वहाँ हज़ारों जोड़ी खड़ाऊँ और जूते भी देखे।
श्लोक 77 (ayodhya.91.77)
आन्जनीः कन्कतान् कूर्चान् शस्त्राणि च धनूंषि च। मर्मत्राणानि चित्राणि शयनान्य् आसनानि च॥ 91.77 ॥
ānjanīḥ kankatān kūrcān śastrāṇi ca dhanūṃṣi ca| marmatrāṇāni citrāṇi śayanāny āsanāni ca
अंजन के डिब्बे, कंघे, ब्रश, शस्त्र और धनुष, अंगों की रक्षा करने वाले विचित्र कवच, तथा शय्याएँ और आसन भी—
श्लोक 78 (ayodhya.91.78)
प्रतिपानह्रदान् पूर्णान् खरोष्ट्रगजवाजिनाम्। अवगाह्य सुतीर्थान् च ह्रदान् सोत्पलपुष्करान्॥ 91.78 ॥
pratipānahradān pūrṇān kharoṣṭragajavājinām| avagāhya sutīrthān ca hradān sotpalapuṣkarān
—गधों, ऊँटों, हाथियों और घोड़ों के लिए जल से भरे पीने के ताल, तथा सुंदर घाटों वाले कमल-कुमुदिनी से भरे स्नान-सरोवर भी।
श्लोक 79 (ayodhya.91.79)
आकाशवर्णप्रतिमान् स्वच्छतोयान् सुखप्लवान्। नीलवैदूर्यवर्णान् च मृदून् यवससंचयान्॥ 91.79 ॥
ākāśavarṇapratimān svacchatoyān sukhaplavān| nīlavaidūryavarṇān ca mṛdūn yavasasaṃcayān
—आकाश के समान नीले वर्ण वाले, स्वच्छ जल से भरे और सुखद स्नान देने वाले सरोवर, तथा नीलमणि के समान कोमल घास के ढेर भी—
श्लोक 80 (ayodhya.91.80)
निर्वापार्थम् पशूनाम् ते ददृशुः तत्र सर्वशः॥ 91.80 ॥
nirvāpārtham paśūnām te dadṛśuḥ tatra sarvaśaḥ
—पशुओं को खिलाने के लिए रखी गई इन सब वस्तुओं को उन्होंने वहाँ सब ओर देखा।
श्लोक 81 (ayodhya.91.81)
व्यस्मयन्त मनुष्याः ते स्वप्नकल्पम् तद् अद्भुतम्। दृष्ट्वा अतिथ्यम् कृतम् तादृक् भरतस्य महर्षिणा॥ 91.81 ॥
vyasmayanta manuṣyāḥ te svapnakalpam tad adbhutam| dṛṣṭvā atithyam kṛtam tādṛk bharatasya maharṣiṇā
महर्षि द्वारा भरत को दिया गया वह स्वप्न-सा अद्भुत आतिथ्य देखकर वे सभी मनुष्य चकित रह गए।
श्लोक 82 (ayodhya.91.82)
इत्य् एवम् रममाणानाम् देवानाम् इव नन्दने। भरद्वाजाश्रमे रम्ये सा रात्रिर् व्यत्यवर्तत॥ 91.82 ॥
ity evam ramamāṇānām devānām iva nandane| bharadvājāśrame ramye sā rātrir vyatyavartata
इस प्रकार नंदनवन में क्रीड़ा करते देवताओं के समान आनंद मनाते हुए, भरद्वाज के उस रमणीय आश्रम में वह रात्रि व्यतीत हो गई।
श्लोक 83 (ayodhya.91.83)
प्रतिजग्मुः च ता नद्यो गन्धर्वाः च यथा आगतम्। भरद्वाजम् अनुज्ञाप्य ताः च सर्वा वराङ्गनाः॥ 91.83 ॥
pratijagmuḥ ca tā nadyo gandharvāḥ ca yathā āgatam| bharadvājam anujñāpya tāḥ ca sarvā varāṅganāḥ
तत्पश्चात् भरद्वाज से आज्ञा लेकर वे नदियाँ, गन्धर्व तथा वे सभी सुंदर स्त्रियाँ जिस मार्ग से आई थीं, उसी मार्ग से लौट गईं।
श्लोक 84 (ayodhya.91.84)
तथैव मत्ता मदिरोत्कटा नराः। तथैव दिव्यागुरुचन्दनोक्षिताः। तथैव दिव्या विविधाः स्रगुत्तमाः। पृथक् प्रकीर्णा मनुजैः प्रमर्दिताः॥ 91.84 ॥
tathaiva mattā madirotkaṭā narāḥ| tathaiva divyāgurucandanokṣitāḥ| tathaiva divyā vividhāḥ sraguttamāḥ| pṛthak prakīrṇā manujaiḥ pramarditāḥ
सैनिक वहाँ अब भी मदिरा के नशे में झूमते पड़े थे; वे अब भी दिव्य अगुरु और चन्दन से लथपथ थे; और वे नाना प्रकार की उत्तम दिव्य मालाएँ भी वहाँ-वहाँ बिखरी और लोगों के पैरों तले कुचली पड़ी थीं।