बालकाण्ड · सर्ग 5
अयोध्या नगरी का वर्णन
श्लोक 1 (bala.5.1)
सर्वा पूर्वमियं येषामासीत्कृत्स्ना वसुंधरा । प्रजापतिमुपादाय नृपाणां जयशालिनाम् ॥ 5.1 ॥
sarvā pūrvam iyam yeṣām āsīt kṛtsnā vasuṃdharā | prajapatim upādāya nṛpāṇam jaya śālinām
प्राचीन काल में यह संपूर्ण पृथ्वी प्रजापति से लेकर विजयी राजाओं की परंपरा के अधीन थी।
श्लोक 2 (bala.5.2)
येषां स सगरो नाम सागरो येन खानितः । षष्टिः पुत्रसहस्राणि यं यान्तं पर्यवारयन् ॥ 5.2 ॥
yeṣām sa sagaro nāma sāgaro yena khānitaḥ | ṣaṣṭiḥ putra sahasrāṇi yam yāntam paryavārayan
उन्हीं में सगर नामक राजा हुए, जिन्होंने सागर को खुदवाया था, और जिनके साठ हजार पुत्र उनके साथ-साथ चला करते थे।
श्लोक 3 (bala.5.3)
इक्ष्वाकूणामिदं तेषां रज्ञां वंशे महात्मनाम् । महदुत्पन्नमाख्यानं रामायणमिति श्रुतम् ॥ 5.3 ॥
ikṣvākūṇām idam teṣām rājñām vaṃśe mahātmanām | mahad utpannam ākhyanam rāmāyaṇam iti śrutam
उन्हीं महात्मा इक्ष्वाकु राजाओं के वंश में यह महान आख्यान उत्पन्न हुआ, जो रामायण के नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 4 (bala.5.4)
तदिदं वर्तयिष्यावः सर्वं निखिलमादितः । धर्मकामार्थसहितं श्रोतव्यमनसूयया ॥ 5.4 ॥
tadidam vartayiṣyāvaḥ sarvam nikhilam āditaḥ | dharma kāma artha sahitam śrotavyam anasūyatā
हम दोनों इसे आदि से लेकर संपूर्ण रूप में सुनाएँगे — यह धर्म, अर्थ और काम से युक्त कथा है, इसे बिना ईर्ष्या के सुना जाए।
श्लोक 5 (bala.5.5)
कोसलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान् । निविष्टः सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान् ॥ 5.5 ॥
kosalo nāma muditaḥ sphīto janapado mahān | niviṣṭa sarayū tīre prabhūta dhana dhānyavān
सरयू के तट पर स्थित, प्रसन्न, समृद्ध और धन-धान्य से परिपूर्ण कोसल नामक एक महान जनपद था।
श्लोक 6 (bala.5.6)
अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता । मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम् ॥ 5.6 ॥
ayodhyā nāma nagarī tatra āsīt loka viśrutā | manunā mānava indreṇa yā purī nirmitā svayam
वहाँ अयोध्या नामक एक लोक-विख्यात नगरी थी, जिसे मानवेन्द्र मनु ने स्वयं बसाया था।
श्लोक 7 (bala.5.7)
आयता दश च द्वे च योजनानि महापुरी । श्रीमती त्रीणि विस्तीर्णा सुविभक्ता महापथा ॥ 5.7 ॥
āyatā daśa ca dve ca yojanāni mahāpurī | śrīmatī trīṇi vistīrṇā su vibhaktā mahāpathā
वह महानगरी बारह योजन लंबी और तीन योजन चौड़ी थी, तथा उसके विशाल मार्ग सुव्यवस्थित थे।
श्लोक 8 (bala.5.8)
राजमार्गेण महता सुविभक्तेन शोभिता । मुक्तपुष्पावकीर्णेन जलसिक्तेन नित्यशः ॥ 5.8 ॥
rāja mārgeṇa mahatā suvibhaktena śobhitā | muktā puṣpa avakīrṇena jala siktena nityaśaḥ
वह एक विशाल और सुव्यवस्थित राजमार्ग से सुशोभित थी, जो सदैव जल से सिंचित और बिखरे हुए फूलों से आच्छादित रहता था।
श्लोक 9 (bala.5.9)
तां तु राजा दशरथो महाराष्ट्रविवर्धनः । पुरीमावासयामास दिवं देवपतिर्यथा ॥ 5.9 ॥
tām tu rājā daśaratho mahārāṣṭra vivardhanaḥ | purīm āvāsayāmāsa divi devapatiḥ yathā
महान राष्ट्र को समृद्ध करने वाले राजा दशरथ उस नगरी में वैसे ही निवास करते थे, जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में निवास करते हैं।
श्लोक 10 (bala.5.10)
कवाटतोरणवतीं सुविभक्तान्तरापणाम् । सर्वयन्त्रायुधवतीमुषितां सर्वशिल्पिभिः ॥ 5.10 ॥
kapāṭa toraṇavartī su vibhakta antarāpaṇām | sarva yaṃtra ayudhavatīm uṣitām sarva śilpibhiḥ
वह किवाड़ों और तोरणों से युक्त, सुव्यवस्थित बाज़ारों वाली, सभी प्रकार के यंत्रों और शस्त्रों से सुसज्जित तथा हर प्रकार के शिल्पकारों से बसी हुई थी।
श्लोक 11 (bala.5.11)
सूतमागधसंबाधां श्रीमातीमतुलप्रभाम् । उच्चाट्टालध्वजवतीं शतघ्नीशतसंकुलाम् ॥ 5.11 ॥
sūta māgadha saṃbādhām śrīmatīm atula prabhām | uccāṭṭāla dhvajavatīm śataghnī śata saṃkulām
वह सूत और मागध जनों से भरी हुई, अतुलनीय कांतिवाली, ऊँचे अट्टालिकाओं और ध्वजाओं से युक्त तथा सैकड़ों शतघ्नी शस्त्रों से भरी हुई थी।
श्लोक 12 (bala.5.12)
वधूनाटकसंङ्घैश्च संयुक्तां सर्वतः पुरीम् । उद्यानाम्रवणोपेतां महतीं सालमेखलाम् ॥ 5.12 ॥
vadhū nāṭaka sanghaiḥ ca saṃyuktām sarvataḥ purīm | udyāna āmra vaṇopetām mahatīm sāla mekhalām
वह नगरी नर्तकियों और अभिनेताओं के समूहों से युक्त, चारों ओर उद्यानों और आम्रवनों से घिरी, तथा अपने विशाल परकोटे रूपी मेखला से सुशोभित थी।
श्लोक 13 (bala.5.13)
दुर्गगंभीरपरिखां दुर्गामन्यैर्दुरासदाम् । वाजिवारणसपूर्णां गोभिरुष्ट्रैः खरैस्तथा ॥ 5.13 ॥
durga gaṃbhīra parikhām durgām anyaiḥ durāsadam | vājīvāraṇa saṃpūrṇām gobhiḥ uṣṭraiḥ kharaiḥ tathā
दुर्गम और गंभीर खाइयों से घिरी, अन्य शत्रुओं के लिए दुर्गम, तथा घोड़ों और हाथियों के साथ-साथ गायों, ऊँटों और गधों से भरी हुई थी।
श्लोक 14 (bala.5.14)
सामन्तराजसंङ्घैश्च बलिकर्मभिरावृताम् । नानादेशनिवासैश्च वणिग्भिरुपशोभिताम् ॥ 5.14 ॥
sāmaṃta rāja sanghaiḥ ca bali karmabhiḥ āvṛtam | nānā deśa nivāsaiḥ ca vaṇigbhiḥ upaśobhitām
वह करदाता सामंत राजाओं के समूहों से घिरी हुई, तथा अनेक देशों के निवासियों और व्यापारियों से सुशोभित थी।
श्लोक 15 (bala.5.15)
प्रासादै रत्नविकृतैः पर्वतैरुपशोभिताम् । कूटागारैश्च सम्पुर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम् ॥ 5.15 ॥
prāsādai ratna vikṛtaiḥ parvataiḥ iva śobhitām | kūṭāgāraiḥ ca saṃpūrṇām indrasya iva amarāvatīm
वह रत्नों से जड़े हुए, पर्वतों के समान ऊँचे प्रासादों से सुशोभित और अट्टालिकाओं से परिपूर्ण, इन्द्र की अमरावती के समान थी।
श्लोक 16 (bala.5.16)
चित्रामष्टापदाकारां वरनारीगणैर्युताम् । सर्वरत्नसमाकीर्णां विमानगृहशोभिताम् ॥ 5.16 ॥
citram aṣṭāpada ākārām vara nārī gaṇair yutām | sarva ratna samākīrṇām vimāna gṛha śobhitām
वह चित्र-विचित्र, अष्टापद के समान बिछाई गई, सुंदर स्त्रियों के समूहों से युक्त, सभी रत्नों से भरपूर और गगनचुंबी भवनों से सुशोभित थी।
श्लोक 17 (bala.5.17)
गृहगाढामविच्छिद्रां समभूमौ निवेशिताम् । शालितण्डुलसम्पूर्णामिक्षुकाण्डरसोदकाम् ॥ 5.17 ॥
gṛha gāḍhām avicchidrām sama bhūmau niveśitām | śāli taṇḍula saṃpūrṇām ikṣu kāṇḍa rasaḥ udakām
सघन गृहों से युक्त, बिना किसी रिक्त स्थान के, समतल भूमि पर बसी हुई, उत्तम चावल से परिपूर्ण और गन्ने के रस के समान मीठे जल वाली थी।
श्लोक 18 (bala.5.18)
दुन्दुभीभिर्मृदङ्गैश्च वीणाभिः पणवैस्तथा । नादितां भृशमत्यर्थं पृथिव्यां तामनुत्तमाम् ॥ 5.18 ॥
dundubhībhiḥ mṛdangaiḥ ca vīṇābhiḥ paṇavaiḥ tathā | nāditām bhṛśam atyartham pṛthivyām tām anuttamām
दुंदुभियों, मृदंगों, वीणाओं और पणवों की ध्वनि से अत्यंत निनादित वह नगरी पृथ्वी पर अनुपम थी।
श्लोक 19 (bala.5.19)
विमानमिव सिद्धानां तपसाधिगतं दिवि । सुनिवेशितवेश्मान्तां नरोत्तमसमावृताम् ॥ 5.19 ॥
vimānam iva siddhānām tapasa adhigatam divi | su niveśita veśmāntām narottama samāvṛtām
तपस्या से सिद्धों द्वारा स्वर्ग में प्राप्त विमान के समान, सुव्यवस्थित भवनों से युक्त और श्रेष्ठ पुरुषों से परिपूर्ण थी।
श्लोक 20 (bala.5.20)
ये च बाणैर्न विध्यन्ति विविक्तमपरापरम् । शब्दवेध्यं च विततं लयुहस्ता विशारदाः ॥ 5.20 ॥
ye ca bāṇaiḥ na vidhyanti viviktam aparā param | śabda vedhyam ca vitatam laghu hastā viśāradāḥ
वहाँ के दक्ष और कुशल-हस्त धनुर्धर किसी अकेले प्राणी को, चाहे वह केवल शब्द से ही पहचाना गया हो और दूर ही क्यों न हो, बाणों से नहीं मारते थे।
श्लोक 21 (bala.5.21)
सिंहव्याघ्रवराहाणां मत्तानां नर्दतां वने । हन्तारो निशितैः शस्त्रैर्बलाद्बाहुबलैरपि ॥ 5.21 ॥
siṃha vyāghra varāhāṇām mattānām nadatām vane | hantāro niśitaiḥ śastraiḥ balāt bāhu balair api
वे वन में गरजते हुए मदमत्त सिंहों, व्याघ्रों और वराहों को तीक्ष्ण शस्त्रों से अथवा केवल भुजबल से भी मार गिराने वाले थे।
श्लोक 22 (bala.5.22)
तादृशानां सहस्रैस्तामभिपूर्णां महारथैः। पुरीमावासयामास राजा दशरथस्तदा ॥ 5.22 ॥
tādṛśānām sahasraiḥ tām abhi pūrṇām mahārathaiḥ | purīm āvasayamāsa rājā daśarathaḥ tadā
ऐसे हजारों महारथियों से परिपूर्ण उस नगरी में राजा दशरथ तब निवास करते थे।
श्लोक 23 (bala.5.23)
तामग्निमद्भिर्गुणवद्भिरावृताम् द्विजोत्तमैः वेदषडङ्गपारगैः । सहस्रदैः सत्यरतैर्महात्मभिः महर्षिकल्पैः ऋषिभिश्च केवलैः ॥ 5.23 ॥
tām agnimadbhiḥ guṇavadbhiḥ āvṛtām dvijottamaiḥ veda ṣaḍaṅga pāragaiḥ | sahasradaiḥ satya rataiḥ mahātmabhiḥ maharṣi kalpaiḥ ṛṣibhiḥ ca kevalaiḥ
वह नगरी अग्निहोत्री, गुणवान, वेद और उसके छह अंगों में पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मणों से, सहस्रों दान देने वाले सत्यनिष्ठ महात्माओं से, तथा महर्षितुल्य शुद्ध ऋषियों से परिपूर्ण थी।