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बालकाण्ड · सर्ग 6

अयोध्या का वैभव

सर्ग 5सर्ग-सूचीसर्ग 7

श्लोक 1 (bala.6.1)

तस्यां पुर्यामयोध्यायां वेदवित्सर्वसंग्रहः । दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः ।। ६.१ ।।

tasyām puryām ayodhyāyām vedavit sarva saṃgrahaḥ | dīrghadarśī mahātejāḥ paura jānapada priyaḥ || 6.1 ||

उस नगरी अयोध्या में वेदों के ज्ञाता और सब कुछ अपने भीतर समेटे हुए, दूरदर्शी, महातेजस्वी तथा नगरवासियों एवं जनपदवासियों के प्रिय एक राजा रहते थे।

श्लोक 2 (bala.6.2)

इक्ष्वाकूणामतिरथो यज्वा धर्मपरो वशी । महर्षिकल्पो राजर्षिः त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।। ६.२ ।।

ikṣvākūṇam atiratho yajvā dharmaparo vaśī | maharṣikalpo rājarṣiḥ triṣu lokeṣu viśrutaḥ || 6.2 ||

वे इक्ष्वाकुवंशियों में सर्वश्रेष्ठ रथी, यज्ञ करने वाले, धर्मपरायण और जितेन्द्रिय थे; महर्षितुल्य राजर्षि थे और तीनों लोकों में विख्यात थे।

श्लोक 3 (bala.6.3)

बलवान्निहतामित्रो मित्रवान्विजितेन्द्रियः । धनैश्च संचयैश्चान्यैः शक्रवैश्रवणोपमः ।। ६.३ ।।

balavān nihata amitro mitravān vijita indriyaḥ | dhanaiḥ ca saṃcayaiḥ ca anyaiḥ śakra vaiśravaṇa upamaḥ || 6.3 ||

वे बलवान थे, शत्रुओं का नाश कर चुके थे, मित्रों से सम्पन्न और जितेन्द्रिय थे; धन और अन्य संचय में इन्द्र तथा कुबेर के समान थे।

श्लोक 4 (bala.6.4)

यथा मनुर्महातेजा लोकस्य परिरक्षिता । तथा दशरथो राजा लोकस्य परिरक्षिता ।। ६.४ ।।

yathā manur mahātejā lokasya parirakṣitā | tathā daśaratho rājā lokasya parirakṣitā || 6.4 ||

जैसे महातेजस्वी मनु संसार के रक्षक थे, वैसे ही राजा दशरथ भी संसार के रक्षक थे।

श्लोक 5 (bala.6.5)

तेन सत्याभिसंधेन त्रिवर्गमनुतिष्ठता । पालिता सा पुरी श्रेष्ठा इन्द्रेणेवामरावती ।। ६.५ ।।

tena satyābhisaṃdhena trivargam anuṣṭitā | pālitā sā purī śreṣṭā indreṇa iva amarāvatī || 6.5 ||

सत्यनिष्ठ तथा धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों पुरुषार्थों का सम्यक् पालन करने वाले उस राजा के द्वारा वह श्रेष्ठ नगरी उसी प्रकार शासित होती थी, जैसे इन्द्र के द्वारा अमरावती।

श्लोक 6 (bala.6.6)

तस्मिन्पुरवरे हृष्टा धर्मात्मानो बहुश्रुताः । नरास्तुष्टा धनैः स्वैः स्वैरलुब्धाः सत्यवादिनः ।। ६.६ ।।

tasmin puravare hṛṣṭā dharmātmano bahuśrutāḥ | narāḥ tuṣṭhāḥ dhanaiḥ svaiḥ svaiḥ alubdhāḥ satyavādinaḥ || 6.6 ||

उस श्रेष्ठ नगरी में लोग प्रसन्न, धर्मात्मा और बहुश्रुत थे; वे अपने-अपने धन से संतुष्ट, लोभरहित तथा सत्यवादी थे।

श्लोक 7 (bala.6.7)

नाल्पसंनिचयः कश्चिदासीत्तस्मिन्पुरोत्तमे । कुटुंबी यो ह्यसिद्धार्थोऽगवाश्वधनधान्यवान् ।। ६.७ ।।

na alpa saṃnicayaḥ kaścid āsīt tasmin purottame | kuṭuṃbī yo hi asiddharthaḥ agavā aśva dhana dhānyavān || 6.7 ||

उस श्रेष्ठ नगरी में कोई भी गृहस्थ अल्प सम्पत्ति वाला नहीं था; कोई भी ऐसा नहीं था जिसकी मनोकामना अपूर्ण रही हो या जिसके पास गौ, अश्व, धन और अन्न न हो।

श्लोक 8 (bala.6.8)

कामी वा न कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित् । द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान्न च नास्तिकः ।। ६.८ ।।

kāmī vā na kadaryo vā nṛśaṃsaḥ puruṣaḥ kvacit | draṣṭum śakyam ayodhyāyām na avidvān na ca nāstikaḥ || 6.8 ||

अयोध्या में कहीं भी कोई कामी, कृपण अथवा क्रूर पुरुष देखने को नहीं मिलता था और न ही कोई अविद्वान या नास्तिक था।

श्लोक 9 (bala.6.9)

सर्वे नराश्च नार्यश्च धर्मशीलाः सुसंयताः । उदिताः शीलवृत्ताभ्यां महर्षय इवामलाः ।। ६.९ ।।

sarve narāḥ ca nāryaḥ ca dharmaśīlāḥ su saṃyatāḥ | muditāḥ śīla vṛttābhyām maharṣaya iva amalāḥ || 6.9 ||

सभी नर-नारी धर्मशील और सुसंयमित थे; वे अपने शील और आचरण से आनन्दित तथा महर्षियों के समान निर्मल थे।

श्लोक 10 (bala.6.10)

नाकुण्डली नामुकुटी नास्रग्वी नाल्पभोगवान् । नामृष्टो नानुलिप्ताङ्गो नासुगन्धश्च विद्यते ।। ६.१० ।।

na akuṇḍalī na amukuṭī na asragvī na alpabhogavān | na amṛṣṭo na aliptāṅgo na asugandhaḥ ca vidyate || 6.10 ||

वहाँ कोई भी बिना कुण्डल के, बिना मुकुट के, बिना माला के अथवा अल्प भोग वाला नहीं था; कोई भी बिना स्नान किए, बिना शरीर पर अनुलेपन लगाए अथवा सुगन्धरहित नहीं रहता था।

श्लोक 11 (bala.6.11)

नामृष्टभोजी नादाता नाप्यनङ्गदनिष्कधृक् । नाहस्ताभरणो वापि दृश्यते नाप्यनात्मवान् ।। ६.११ ।।

na amṛṣṭa bhojī na adātā na api anaṅdaniṣkadhṛk | na ahastābharaṇo vā api dṛśyate na api anātmavān || 6.11 ||

कोई भी बिना स्नान किए भोजन करने वाला, कंजूस, बिना अंगद और निष्क (कंठाभूषण) पहने अथवा हाथों के आभूषणों से रहित नहीं दिखाई देता था, और न ही कोई आत्मसंयमरहित था।

श्लोक 12 (bala.6.12)

नानाहिताग्निर्नायज्वा न क्षुद्रो वा न तस्करः । कश्चिदासीदयोध्यायां न चावृत्तो न संकरः ।। ६.१२ ।।

na anāhita agnīḥ na ayajvā na kṣudro vā na taskaraḥ | kaścit asīt ayodhyāyām na ca āvṛtto na saṃkaraḥ || 6.12 ||

अयोध्या में कोई भी ऐसा नहीं था जिसने अग्नि की स्थापना न की हो अथवा यज्ञ न किया हो; न कोई नीच था, न चोर था, न आचरणभ्रष्ट था और न ही कोई वर्णसंकर था।

श्लोक 13 (bala.6.13)

स्वकर्मनिरता नित्यं ब्राह्मणा विजितेन्द्रियाः । दानाध्यानशीलाश्च संयताश्च प्रतिग्रहे ।। ६.१३ ।।

sva karma niratā nityam brāhmaṇā vijitendriyāḥ | dāna adhyana śīlāḥ ca saṃyatāḥ ca pratigrahe || 6.13 ||

ब्राह्मण सदा अपने-अपने कर्मों में लगे रहते थे और जितेन्द्रिय थे; वे दान और ध्यान में निरत रहते तथा दान ग्रहण करने में संयमी थे।

श्लोक 14 (bala.6.14)

न नास्तिको नानृतको न कश्चिदबहुश्रुतः । नासूयको न चाशक्तो नाविद्वान्विद्यते तदा ।। ६.१४ ।।

nāstiko na anṛtī vā api na kaścit abahuśrutaḥ | na asūyako na ca aśakto na avidvān vidyate kvacit || 6.14 ||

उस समय न कोई नास्तिक था, न कोई असत्यवादी, न ही कोई अल्पज्ञ था; न कोई ईर्ष्यालु था, न असमर्थ और न ही कोई अविद्वान था।

श्लोक 15 (bala.6.15)

नाषडङ्गविदत्रासीन्नाव्रतो नासहस्रदः । न दीनः क्षिप्तचित्तो वा व्यथितो वापि कश्चन ।। ६.१५ ।।

na aṣaḍṃga vit na asti na avrato na asahasradaḥ | na dīnaḥ kṣipta cittao vā vyathito vā api kaścana || 6.15 ||

वहाँ वेद के छहों अंगों का अज्ञाता कोई नहीं था, न कोई व्रतहीन था, न कोई सहस्रों में दान न देने वाला था; न कोई दीन था, न चित्त से विचलित और न ही कोई पीड़ित था।

श्लोक 16 (bala.6.16)

कश्चिन्नरो वा नारी वा नाश्रीमान्नाप्यरूपवान् । द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नापि राजन्यभक्तिमान् ।। ६.१६ ।।

kaścin naro vā nārī vā na aśrīmān na api arūpavān | draṣṭum śakyam ayodhyāyām na api rājanya abhaktimān || 6.16 ||

अयोध्या में कोई भी ऐसा स्त्री या पुरुष देखने को नहीं मिलता था जो सम्पन्न न हो, सुन्दर न हो अथवा राजा के प्रति भक्तिहीन हो।

श्लोक 17 (bala.6.17)

वर्णेष्वग्र्यचतुर्थेषु देवतातिथिपूजकाः । कृतज्ञाश्च वदान्याश्च शूरा विक्रमसंयुताः ।। ६.१७ ।।

varṇeṣu agrya caturtheṣu devatā atithi pūjakāḥ | kṛtajñāḥ ca vadānyaḥ ca śūrā vikrama saṃyutāḥ || 6.17 ||

प्रथम से चतुर्थ वर्ण तक सभी लोग देवताओं और अतिथियों के पूजक, कृतज्ञ, उदार, शूरवीर और पराक्रमी थे।

श्लोक 18 (bala.6.18)

दीर्घायुषो नराः सर्वे धर्मं सत्यं च संश्रिताः । सहिताः पुत्रपौत्रैश्च नित्यं स्त्रीभिः पुरोत्तमे ।। ६.१८ ।।

dīrgha āyuṣo narāḥ sarve dharmam satyam ca saṃśritāḥ | sahitāḥ putra pautraiḥ ca nityam strībhiḥ purottame || 6.18 ||

उस श्रेष्ठ नगरी में सभी मनुष्य दीर्घायु, धर्म और सत्य का आश्रय लेने वाले थे तथा सदा अपने पुत्रों, पौत्रों और पत्नियों के साथ सुखपूर्वक रहते थे।

श्लोक 19 (bala.6.19)

क्षत्रं ब्रह्ममुखं चासीद्वैश्याः क्षत्रमनुव्रताः । शूद्राः स्वधर्मनिरतास्त्रीन्वर्णानुपचारिणः ।। ६.१९ ।।

kṣatram brahmamukham ca āsīt vaiśyāḥ kṣatram anuvratāḥ | śūdrāḥ sva dharma niratāḥ trīn varṇān upacāriṇaḥ || 6.19 ||

क्षत्रिय ब्राह्मणों को अपना मार्गदर्शक मानते थे, वैश्य क्षत्रियों का अनुसरण करते थे, और शूद्र अपने धर्म में तत्पर रहकर शेष तीनों वर्णों की सेवा करते थे।

श्लोक 20 (bala.6.20)

सा तेनेक्ष्वाकुनाथेन पुरी सुपरिरक्षिता । यथा पुरस्तान्मनुना मानवेन्द्रेण धीमता ।। ६.२० ।।

sā tena ikṣvāku nāthena purī su parirakṣitā | yathā purastāt manunā mānavendreṇa dhīmatā || 6.20 ||

वह नगरी उस इक्ष्वाकुनाथ (दशरथ) के द्वारा उसी प्रकार सम्यक् सुरक्षित थी, जैसे पूर्वकाल में बुद्धिमान मनु के द्वारा सुरक्षित थी।

श्लोक 21 (bala.6.21)

योधानामग्निकल्पानां पेशलानाममर्षिणाम् । संपूर्णा कृतविद्यानां गुहा केसरिणामिव ।। ६.२१ ।।

yodhānām agni kalpānām peśalānām amarṣiṇām | saṃpūrṇā kṛta vidyānām guhā kesariṇām iva || 6.21 ||

वह नगरी अग्निसमान तेजस्वी, कुशल, अपमान न सहने वाले और सुशिक्षित योद्धाओं से उसी प्रकार परिपूर्ण थी, जैसे कोई गुफा सिंहों से भरी हो।

श्लोक 22 (bala.6.22)

कांभोजविषये जातैर्बाह्लीकैश्च हयोत्तमैः । वनायुजैर्नदीजैश्च पूर्णा हरिहयोत्तमैः ।। ६.२२ ।।

kāṃbhoja viṣaye jātaiḥ bāhlikaiḥ ca haya uttamaiḥ | vanāyujaiḥ nadījaiḥ ca pūrṇā harihaya uttamaiḥ || 6.22 ||

वह कम्बोज और बाह्लीक देश में उत्पन्न, वनायु देश तथा नदी-तटों में जन्मे उत्तम अश्वों से परिपूर्ण थी, जो इन्द्र के उत्तम अश्व के समान थे।

श्लोक 23 (bala.6.23)

विंध्यपर्वतजैर्मत्तैः पूर्णा हैमवतैरपि । मदान्वितैरतिबलैर्मातङ्गैः पर्वतोपमैः ।। ६.२३ ।।

viṃdhya parvatajaiḥ mattaiḥ pūrṇā haimavataiḥ api | madānvitaiḥ atibalaiḥ mātaṅgaiḥ parvataupamaiḥ || 6.23 ||

वह विंध्य पर्वत में उत्पन्न तथा हिमालय में उत्पन्न, मदमत्त, अत्यन्त बलवान और पर्वताकार गजराजों से परिपूर्ण थी।

श्लोक 24 (bala.6.24)

ऐरावतकुलीनैश्च महापद्मकुलैस्तथा । अंजनादपि निष्क्रान्तैः वामनादपि च द्विपैः ।। ६.२४ ।।

irāvata kulīnaiḥ ca mahāpadma kulaiḥ tathā | aṃjanādapi niṣkrāntaiḥ vāmanādapi ca dvipaiḥ || 6.24 ||

वह नगरी ऐरावत तथा महापद्म कुल में उत्पन्न, और अंजन तथा वामन कुल से उत्पन्न गजराजों से भी युक्त थी।

श्लोक 25 (bala.6.25)

भद्रैर्मन्द्रैर्मृगैश्चैव भद्रमन्द्रमृगैस्तथा । भद्रमन्द्रैर्भद्रमृगैर्मृगमन्द्रैश्च सा पुरी । नित्यमत्तैः सदा पूर्णा नागैरचलसन्निभैः ।। ६.२५ ।।

bhadraiḥ mandraiḥ mṛgaiḥ ca eva bhadra mandra mṛgaiḥ thathā | bhadra mandraiḥ bhadra mṛgaiḥ mṛga mandraiḥ ca sā purī | nitya mattaiḥ sadā pūrṇā nāgaiḥ acala sannibhaiḥ || 6.25 ||

वह नगरी भद्र, मन्द्र और मृग जाति के, तथा भद्र-मन्द्र, भद्र-मृग और मृग-मन्द्र इन मिश्रित जातियों के गजों से भी युक्त थी; वे गज सदा मदमत्त और पर्वत के समान विशाल होकर उस नगरी को सर्वदा भरे रहते थे।

श्लोक 26 (bala.6.26)

सा योजने च द्वे भूयः सत्यनामा प्रकाशते । यस्यां दशरथो राजा वसन् जगदपालयत् ।। ६.२६ ।।

sā yojane ca dve bhūyaḥ satyanāmā prakāśate | yasyām daśaratho rājā vasan jagat apālayat || 6.26 ||

वह नगरी अपने नाम (अयोध्या, अर्थात् अजेय) के अनुरूप दो योजन और आगे तक फैली हुई सुशोभित होती थी; उसी में निवास करते हुए राजा दशरथ पृथ्वी का पालन करते थे।

श्लोक 27 (bala.6.27)

तां पुरीं स महातेजा राजा दशरथो महान् । शशास शमितामित्रो नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ।। ६.२७ ।।

tām purīm sa mahātejā rājā daśaratho mahān | śaśāsa śamita amitro nakṣatrāṇīva candramāḥ || 6.27 ||

उस महातेजस्वी और महान राजा दशरथ ने, जिनके शत्रु शान्त हो चुके थे, उस नगरी पर उसी प्रकार शासन किया, जैसे चन्द्रमा नक्षत्रों पर करता है।

श्लोक 28 (bala.6.28)

तां सत्यनामां दृढतोरणार्गलाम् । गृहैर्विचित्रैरुपशोभितां शिवाम् । पुरीमयोध्यां नृसहस्रसंकुलाम् । शशास वै शक्रसमो महीपतिः ।। ६.२८ ।।

tām satya nāmām dṛḍha toraṇa argalām | gṛhaiḥ vicitraiḥ upaśobhitām śivām | purīm ayodhyām nṛ sahasra saṃkulām | śaśāsa vai śakra samo mahīpatiḥ || 6.28 ||

उस सत्यनामा नगरी को, जिसके द्वार और अर्गलाएँ सुदृढ़ थीं, जो विचित्र भवनों से सुशोभित, मंगलमय और सहस्रों मनुष्यों से भरी थी, उस इन्द्रतुल्य पृथ्वीपति दशरथ ने ही शासित किया।

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