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बालकाण्ड · सर्ग 7

दशरथ के मन्त्री और पुरोहित

सर्ग 6सर्ग-सूचीसर्ग 8

श्लोक 1 (bala.7.1)

तस्यामात्या गुणैरासन्निक्ष्वाकोस्तु महात्मनः । मंत्रज्ञाश्चेङ्गितज्ञाश्च नित्यं प्रियहिते रताः ।। ७.१ ।।

tasya amātyā guṇair āsan ikṣhvakostu mahātmanaḥ | maṃtrajñāḥ ca iṅgitajñāḥ ca nityam priya hite ratāḥ || 7.1 ||

उस महात्मा इक्ष्वाकुवंशी राजा के मन्त्री गुणवान थे; वे मन्त्र (नीति) और इंगित (मनोभाव) के ज्ञाता थे तथा सदा उनके प्रिय और हित में तत्पर रहते थे।

श्लोक 2 (bala.7.2)

अष्टौ बभूवुर्वीरस्य तस्यामात्या यशस्विनः । शुचयश्चानुरक्ताश्च राजकृत्येषु नित्यशः ।। ७.२ ।।

aṣṭau babhūvuḥ vīrasya tasya amātyā yaśasvinaḥ | śucayaḥ ca anuraktāḥ ca rājakṛtyeṣu nityaśaḥ || 7.2 ||

उस वीर और यशस्वी राजा के आठ मंत्री थे, जो पवित्र हृदय वाले, अनुरक्त तथा सदा राजकार्यों में तत्पर रहते थे।

श्लोक 3 (bala.7.3)

धृष्टिर्जयन्तो विजयो सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धनः । अकोपो धर्मपालश्च सुमंत्रश्चाष्टमोऽभवत् ।। ७.३ ।।

dhṛṣṭir jayanto vijayo surāṣṭro rāṣṭra vardhanaḥ | akopo dharmapālaḥ ca sumaṃtraḥ ca aṣṭamo 'bhavat || 7.3 ||

धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप और धर्मपाल—ये सात, तथा सुमन्त्र आठवें मन्त्री थे।

श्लोक 4 (bala.7.4)

ऋत्विजौ द्वावभिमतौ तस्यास्तामृषिसत्तमौ । वशिष्ठो वामदेवश्च मंत्रिणश्च तथापरे ।। ७.४ ।।

ṛtvijau dvau abhimatau tasyāḥ tām ṛṣi sattamau | vaśiṣṭho vāmadevaḥ ca maṃtriṇaḥ ca tathā apare || 7.4 ||

उनके यहाँ वशिष्ठ और वामदेव नामक दो श्रेष्ठ ऋषि उनके अभीष्ट ऋत्विक् (यज्ञाचार्य) थे, और इनके अतिरिक्त अन्य मन्त्री भी थे।

श्लोक 5 (bala.7.5)

सुयज्ञोऽप्यथ जाबालिः काश्यपोऽप्यथ गौतमः । मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुस्तथा कात्यायनो द्विजः ।। ७.५ ।।

suyajño api atha jābāliḥ kāśaypo api atha gautamaḥ | mārkaṇḍeyaḥ tu dīrghāyuḥ tathā kātyāyano dvijaḥ || 7.5 ||

सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, दीर्घायु मार्कण्डेय तथा उसी प्रकार द्विज कात्यायन —

श्लोक 6 (bala.7.6)

एतैर्ब्रह्मर्षिभिर्नित्यमृत्विजस्तस्य पौर्वकाः । विद्याविनीता ह्रीमंतः कुशला नियतेन्द्रियाः ।। ७.६ ।।

etaiḥ brahmarṣibhir nityam ṛtvijaḥ tasya paurvakāḥ | vidyā vinītā hrīmaṃtaḥ kuśalā niyatendriyāḥ || 7.6 ||

— इन ब्रह्मर्षियों के साथ, जो उनके कुल के पुरातन (पैतृक) ऋत्विक् थे, तथा विद्या से विनीत, लज्जाशील, कुशल और जितेन्द्रिय मन्त्रीगण भी थे।

श्लोक 7 (bala.7.7)

श्रीमन्तश्च महात्मानः शास्त्रज्ञा धृढविक्रमाः । कीर्तिमन्तः प्रणिहिता यथावचनकारिणः ।। ७.७ ।।

śrīmantaḥ ca mahātmanaḥ śāstrajñā dhṛḍha vikramāḥ | kīrtimantaḥ praṇihitā yathā vacana kāriṇaḥ || 7.7 ||

वे श्रीसम्पन्न और महात्मा, शास्त्रों के ज्ञाता, दृढ़ पराक्रमी, कीर्तिमान, एकाग्रचित्त तथा अपने वचन के अनुरूप आचरण करने वाले थे —

श्लोक 8 (bala.7.8)

तेजःक्षमायशःप्राप्ताः स्मितपूर्वाभिभाषिणः । क्रोधात्कामार्थहेतोर्वा न ब्रूयुरनृतं वचः ।। ७.८ ।।

tejaḥ kṣamā yaśaḥ prāptāḥ smita pūrva abhibhāṣiṇaḥ | krodhāt kāma artha hetor vā na brūyur anṛtam vacaḥ || 7.8 ||

— वे तेज, क्षमा और यश से सम्पन्न थे तथा सदा पहले मुस्कराकर बातचीत करते थे; क्रोध, काम अथवा अर्थ के लोभ से भी वे कभी असत्य वचन नहीं बोलते थे।

श्लोक 9 (bala.7.9)

तेषामविदितं किंचित्स्वेषु नास्ति परेषु वा । क्रियमाणं कृतं वापि चारेणापि चिकीर्षितम् ।। ७.९ ।।

teṣām aviditam kiṃcat śveṣu nāsti pareṣu vā | kriyamāṇam kṛtam vā api cāreṇa api cikīrṣitam || 7.9 ||

उन्हें अपने अथवा दूसरों के राज्य में होने वाली कोई भी बात अज्ञात नहीं थी; जो कुछ किया जा रहा हो, किया जा चुका हो अथवा करने का विचार मात्र हो, वे अपने गुप्तचरों द्वारा उसे भी जान लेते थे।

श्लोक 10 (bala.7.10)

कुशला व्यवहारेषु सौहृदेषु परीक्षिताः । प्राप्तकालं यथादण्डं धारयेयुः सुतेष्वपि ।। ७.१० ।।

kuśalā vyvahāreṣu sauhṛdeṣu parīkṣitāḥ | prāpta kālam yathā daṇḍam dhārayeyuḥ suteṣu api || 7.10 ||

वे व्यवहार-कार्यों में कुशल तथा मित्रता में भली-भाँति परखे हुए थे; अवसर आने पर वे अपने ही पुत्रों को भी यथोचित दण्ड देने से नहीं चूकते थे।

श्लोक 11 (bala.7.11)

कोशसंग्रहणे युक्ता बलस्य च परिग्रहे । अहितं चापि पुरुषं न हिंस्युरविदूषकम् ।। ७.११ ।।

kośa saṃgrahaṇe yuktā balasya ca parigrahe | ahitam ca api puruṣam na hiṃsyur avidūṣakam || 7.11 ||

वे कोष-संग्रह और सेना के परिपालन में तत्पर रहते थे; अपराधरहित होने पर वे अहितकारी पुरुष को भी कष्ट नहीं पहुँचाते थे।

श्लोक 12 (bala.7.12)

वीराश्च नियतोत्साहा राजशास्त्रमनुष्ठिताः । शुचीनां रक्षितारश्च नित्यं विषयवासिनाम् ।। ७.१२ ।।

vīrāḥ ca niyatotsāhā rāja śāstram anuṣṭhitāḥ | śucīnām rakṣitāraḥ ca nityam viṣaya vāsinām || 7.12 ||

वे वीर, अविचल उत्साह वाले तथा राजशास्त्र (नीतिशास्त्र) का पालन करने वाले थे, और सदा राज्य में रहने वाले सदाचारी प्रजाजनों के रक्षक थे।

श्लोक 13 (bala.7.13)

ब्रह्म क्षत्रमहिंसन्तस्ते कोशं समपूरयन् । सुतीक्ष्णदण्डाः संप्रेक्ष्य पुरुषस्य बलाबलम् ।। ७.१३ ।।

brahma kṣatram ahiṃsantaḥ te kośam samapūrayan | sutīkṣṇa daṇḍāḥ saṃprekṣya puruṣasya balābalam || 7.13 ||

वे ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों को पीड़ा पहुँचाए बिना ही राजकोष को भरते रहते थे, तथा किसी पुरुष के बल-अबल को भली-भाँति परखकर ही कठोर दण्ड देते थे।

श्लोक 14 (bala.7.14)

शुचीनामेकबुद्धीनां सर्वेषां संप्रजानताम् । नासीत्पुरे वा राष्ट्रे वा मृषावादी नरः क्वचित् ।। ७.१४ ।।

śucīnām eka buddhīnām sarveṣām saṃprajānatām | na āsīt pure vā rāṣṭre vā mṛṣā vādī naraḥ kvacit || 7.14 ||

इस प्रकार उन सभी सदाचारी, एकचित्त और सुविज्ञ मन्त्रियों के होते हुए नगर अथवा राष्ट्र में कहीं भी कोई असत्यभाषी पुरुष नहीं था।

श्लोक 15 (bala.7.15)

कश्चिन्न दुष्टस्तत्रासीत्परदाररतो नरः । प्रशांतं सर्वमेवासीद्राष्ट्रं पुरवरं च तत् ।। ७.१५ ।।

kaścin na duṣṭaḥ tatra āsīt para dāra ratir naraḥ | praśāṃtam sarvam eva asīt rāṣṭram puravaram ca tat || 7.15 ||

वहाँ न कोई दुष्ट था, न परस्त्री में आसक्त कोई पुरुष; इस प्रकार वह सम्पूर्ण राष्ट्र तथा वह श्रेष्ठ नगर दोनों ही सर्वथा शान्त थे।

श्लोक 16 (bala.7.16)

सुवाससः सुवेषाश्च ते च सर्वे शुचिव्रताः । हितार्थं च नरेन्द्रस्य जाग्रतो नयचक्षुषा ।। ७.१६ ।।

su vāsasa su veṣāḥ ca te ca sarve śucivratāḥ | hitārthaḥ ca narendrasya jāgrato naya cakṣuṣā || 7.16 ||

वे सब मन्त्री सुन्दर वस्त्र और आभूषण धारण करने वाले, तथा शुद्ध व्रत का पालन करने वाले थे, और राजा के हित के लिए नीति-चक्षु से सदा जागरूक रहते थे।

श्लोक 17 (bala.7.17)

गुरोर्गुणगृहीताश्च प्रख्याताश्च पराक्रमे । विदेशेष्वपि विज्ञाताः सर्वतो बुद्धिनिश्चयाः ।। ७.१७ ।।

guror guṇa gṛhītāḥ ca prakhyātāḥ ca parākrame | videśeṣu api vijñātā sarvato buddhi niścayāḥ || 7.17 ||

वे अपने गुरुजनों से गुण ग्रहण करने वाले तथा पराक्रम में विख्यात थे; विदेशों में भी वे अपनी सुदृढ़ निर्णय-क्षमता के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध थे।

श्लोक 18 (bala.7.18)

अभितो गुणवन्तश्च न चासन् गुणवर्जिताः । सन्धिविग्रहतत्त्वज्ञाः प्रकृत्या संपदान्विताः ।। ७.१८ ।।

abhito guṇavantaḥ ca na ca āsan guṇa varjitāḥ | sandhi vigraha tatvajñāḥ prakṛtyā saṃpadānvitāḥ || 7.18 ||

वे सब ओर से गुणवान थे और उनमें कोई भी गुणरहित नहीं था; वे संधि और विग्रह के तत्त्वों के ज्ञाता तथा स्वभाव से ही सम्पन्न थे।

श्लोक 19 (bala.7.19)

मंत्रसंवरणे शक्ताः शक्ताः सूक्ष्मासु बुद्धिषु । नीतिशास्त्रविशेषज्ञाः सततं प्रियवादिनः ।। ७.१९ ।।

maṃtra saṃvaraṇe śaktāḥ śaktāḥ sūkṣmāsu buddhiṣu | nīti śāstra viśeṣajñāḥ satatam priya vādinaḥ || 7.19 ||

वे गुप्त मन्त्रणा को छिपाए रखने में समर्थ तथा सूक्ष्म बुद्धि-विषयों में भी कुशल थे; नीतिशास्त्र के विशेषज्ञ होते हुए भी वे सदा मधुरभाषी थे।

श्लोक 20 (bala.7.20)

ईदृशैस्तैरमात्यैश्च राजा दशरथोऽनघः । उपपन्नो गुणोपेतैरन्वशासद्वसुंधराम् ।। ७.२० ।।

īdṛśaiḥ taiḥ amātyaiḥ ca rājā daśaratho.anaghaḥ | upapanno guṇopetaiḥ anvaśāsad vasuṃdharām || 7.20 ||

ऐसे ही गुणसम्पन्न मन्त्रियों से युक्त होकर वे निष्पाप राजा दशरथ पृथ्वी का शासन करते थे।

श्लोक 21 (bala.7.21)

अवेक्षमाणश्चारेण प्रजा धर्मेण रक्षयन् । प्रजानां पालनं कुर्वन्नधर्मं परिवर्जयन् ।। ७.२१ ।।

avekṣamāṇaḥ cāreṇa prajā dharmeṇa rakṣayan | prajānām pālanam kurvan adharmam parivarjayan || 7.21 ||

वे गुप्तचरों द्वारा प्रजा का निरीक्षण करते हुए, धर्मपूर्वक उनकी रक्षा करते, प्रजा का पालन करते तथा अधर्म का सर्वथा परित्याग करते थे —

श्लोक 22 (bala.7.22)

विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु वदान्यः सत्यसंगरः । स तत्र पुरुषव्याघ्रः शशास पृथिवीमिमाम् ।। ७.२२ ।।

viśrutaḥ triṣu lokeṣu vadānyaḥ satya saṃgaraḥ | sa tatra puruṣavyāghraḥ śaśāsa pṛthvīm imām || 7.22 ||

— वे तीनों लोकों में विख्यात, उदार तथा सत्यप्रतिज्ञ पुरुषसिंह इस पृथ्वी का शासन करते थे।

श्लोक 23 (bala.7.23)

नाध्यगच्छद्विशिष्टं वा तुल्यं वा शत्रुमात्मनः । मित्रवान्नतसामन्तः प्रतापहतकण्टकः । स शशास जगद्राजा दिवं देवपतिर्यथा ।। ७.२३ ।।

na adhyagacchat viśiṣṭam vā tulyam vā śatrum ātmanaḥ | mitravān nata sāmantaḥ pratāpa hata kaṇṭakaḥ | sa śaśāsa jagat rājā divi deva patir yathā || 7.23 ||

उन्हें अपने बराबर या अपने से श्रेष्ठ कोई शत्रु कहीं नहीं मिला; वे मित्रों से सम्पन्न थे, सामन्त राजा उनके आगे नतमस्तक थे और उनके प्रताप से हर काँटा (विघ्न) नष्ट हो चुका था—इस प्रकार वे इस जगत का शासन उसी प्रकार करते थे, जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग का करते हैं।

श्लोक 24 (bala.7.24)

तैर्मंत्रिभिर्मंत्रहिते निविष्टैः । वृतोऽनुरक्तैः कुशलैः समर्थैः । स पार्थिवो दीप्तिमवाप युक्तः । तेजोमयैर्गोभिरिवोदितोऽर्कः ।। ७.२४ ।।

taiḥ maṃtribhiḥ maṃtra hiteḥ niviṣṭaiḥ | vṛto.anuraktaiḥ kuśalaiḥ samarthaiḥ | sa pārthivo dīptim avāpa yuktaḥ | tejomayaiḥ gobhiḥ iva uditaḥ arkaḥ || 7.24 ||

उन मन्त्रणा-हितैषी, अनुरक्त, कुशल और समर्थ मन्त्रियों से घिरे हुए वे राजा उसी प्रकार तेज को प्राप्त हुए, जैसे तेजोमय किरणों से युक्त उदय होता हुआ सूर्य तेज को प्राप्त होता है।

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