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बालकाण्ड · सर्ग 8

दशरथ का अश्वमेध-संकल्प

सर्ग 7सर्ग-सूचीसर्ग 9

श्लोक 1 (bala.8.1)

तस्य चैवंप्रभावस्य धर्मज्ञस्य महात्मनः । सुतार्थं तप्यमानस्य नासीद्वंशकरः सुतः ।। ८.१ ।।

tasya ca evam prabhāvasya dharmajñasya mahātmanaḥ | sutārtham tapya mānasya na asīt vaṃśakaraḥ sutaḥ || 8.1 ||

इतने प्रभावशाली, धर्मज्ञ और महात्मा उस राजा के, जो पुत्र-प्राप्ति के लिए हृदय में संतप्त रहते थे, कोई भी वंश बढ़ाने वाला पुत्र नहीं था।

श्लोक 2 (bala.8.2)

चिन्तयानस्य तस्यैवं बुद्धिरासीन्महात्मनः । सुतार्थं वाजिमेधेन किमर्थं न यजाम्यहम् ।। ८.२ ।।

cintayānasya tasya evam buddhiḥ āsīn mahātmanaḥ | sutārtham vājimedhena kim artham na yajāmi aham || 8.2 ||

इस प्रकार चिन्तन करते हुए उस महात्मा के मन में यह विचार उठा—'पुत्र-प्राप्ति के लिए मैं अश्वमेध यज्ञ क्यों न करूँ?'

श्लोक 3 (bala.8.3)

स निश्चितां मतिं कृत्वा यष्टव्यमिति बुद्धिमान् । मंत्रिभिः सह धर्मात्मा सर्वैरपि कृतात्मभिः ।। ८.३ ।।

sa niścitām matim kṛtvā yaṣṭavyam iti buddhimān | maṃtribhiḥ saha dharmātmā sarvaiḥ api kṛta ātmabhiḥ || 8.3 ||

उस बुद्धिमान और धर्मात्मा राजा ने यज्ञ करने का निश्चय करके, संयतचित्त उन सभी मन्त्रियों के साथ मिलकर —

श्लोक 4 (bala.8.4)

ततोऽब्रवीदिदं राजा सुमन्त्रं मंत्रिसत्तमम् । शीघ्रमानय मे सर्वान् गुरूंस्तान्सपुरोहितान् ।। ८.४ ।।

tato.abravīt mahātejāḥ sumaṃtram maṃtri sattamam | śīghram ānaya me sarvān gurūn tān sa purohitān || 8.4 ||

— तब सुमन्त्र नामक अपने श्रेष्ठ मन्त्री से यह कहा—'शीघ्र ही मेरे उन सभी गुरुजनों को पुरोहितों सहित यहाँ ले आओ।'

श्लोक 5 (bala.8.5)

ततः सुमंत्रः त्वरितं गत्वा त्वरितविक्रमः । समानयत्स तान्सर्वान्समस्तान्वेदपारगान् ।। ८.५ ।।

tataḥ sumaṃtraḥ tvaritam gatvā tvarita vikramaḥ | sam ānayat sa tān sarvān samastān veda pāragān || 8.5 ||

तब त्वरित पराक्रमी सुमन्त्र शीघ्रता से जाकर उन सम्पूर्ण वेदपारंगत गुरुजनों को एकत्र ले आए —

श्लोक 6 (bala.8.6)

सुयज्ञं वामदेवं च जाबालिमथ काश्यपम् । पुरोहितं वशिष्ठं च ये चाप्यन्ये द्विजोत्तमाः ।। ८.६ ।।

suyajñam vāmadevam ca jābālim atha kāśyapam | purohitam vaśiṣṭham ca ye ca api anye dvijottamāḥ || 8.6 ||

— सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, पुरोहित वशिष्ठ तथा अन्य जो भी श्रेष्ठ द्विज थे, उन सबको।

श्लोक 7 (bala.8.7)

तान्पूजयित्वा धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा । इदं धर्मार्थसहितं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत् ।। ८.७ ।।

tān pūjayitvā dharmātmā rājā daśarathaḥ tadā | idam dharma artha sahitam ślakṣṇam vacanam abravīt || 8.7 ||

तब उनका सत्कार करके धर्मात्मा राजा दशरथ ने धर्म और अर्थ से युक्त यह सौम्य वचन कहा —

श्लोक 8 (bala.8.8)

मम लालप्यमानस्य सुतार्थं नास्ति वै सुखम् । तदर्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम ।। ८.८ ।।

mama lālasya mānasya sutārtham nāsti vai sukham | tadartham hayamedhena yakṣhyāmi iti matir mama || 8.8 ||

'पुत्र के लिए विलाप करते हुए मुझे तनिक भी सुख नहीं मिलता; इसी कारण मेरा विचार है कि मैं अश्वमेध यज्ञ करूँ।'

श्लोक 9 (bala.8.9)

तदहं यष्टुमिच्छमि शास्त्रदृष्टेन कर्मणा । कथं प्राप्स्याम्यहं कामं बुद्धिरत्र विचिन्त्यताम् ।। ८.९ ।।

tat aham yaṣṭum icchami śāstra dṛṣṭena karmaṇā | katham prāpsyāmi aham kāmam buddhiḥ atra vicintyatām || 8.9 ||

'मैं शास्त्रविहित विधि से उस यज्ञ को सम्पन्न करना चाहता हूँ; इस विषय में विचार किया जाए कि मैं अपनी कामना कैसे प्राप्त करूँ।'

श्लोक 10 (bala.8.10)

ततः साध्विति तद्वाक्यं ब्राह्मणाः प्रत्यपूजयन् । वशिष्ठप्रमुखाः सर्वे पार्थिवस्य मुखेरितम् ।। ८.१० ।।

tataḥ sādhu iti tadvākyam brāhmaṇāḥ pratyapūjayan | vaśiṣṭha pramukhāḥ sarve pārthivasya mukheritam || 8.10 ||

तब वशिष्ठ आदि सभी ब्राह्मणों ने राजा के मुख से निकले उस वचन का 'साधु! साधु!' कहकर अभिनन्दन किया।

श्लोक 11 (bala.8.11)

ऊचुश्च परमप्रीताः सर्वे दशरथं वचः । संभाराः संभ्रियंतां ते तुरगश्च विमुच्यताम् ।। ८.११ ।।

ūcuḥ ca parama prītāḥ sarve daśaratham vacaḥ | saṃbhārāḥ saṃbhriyaṃtām te turagaḥ ca vimucyatām || 8.11 ||

और अत्यन्त प्रसन्न होकर उन सबने दशरथ से यह वचन कहा—'सामग्री एकत्र की जाए और अश्व को मुक्त छोड़ा जाए;'

श्लोक 12 (bala.8.12)

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम् । सर्वथा प्राप्स्यसे पुत्रानभिप्रेतांश्च पार्थिव ।। ८.१२ ।।

sarayvāḥ ca uttare tīre yajña bhūmir vidhīyatām | sarvathā prāpsyase putrān abhipretān ca pārthiva || 8.12 ||

'— तथा सरयू के उत्तरी तट पर यज्ञभूमि तैयार की जाए; हे राजन्, आप निश्चय ही अभीष्ट पुत्रों को प्राप्त करेंगे।'

श्लोक 13 (bala.8.13)

यस्य ते धर्मिकी बुद्धिरियं पुत्रार्थमागता । ततस्तुष्टोऽभवद्राजा श्रुत्वैतद् द्विजभाषितम् ।। ८.१३ ।।

yasya te dharmikī buddhiḥ iyam putrārtham āgatā | tataḥ tuṣṭo.abhavat rājā śrutvā tad dvija bhāṣitam || 8.13 ||

'— क्योंकि आपकी यह धार्मिक बुद्धि पुत्र-प्राप्ति के लिए ही उत्पन्न हुई है।' उन ब्राह्मणों का यह वचन सुनकर राजा को बड़ा संतोष हुआ।

श्लोक 14 (bala.8.14)

अमात्यांश्चाब्रवीद्राजा हर्षपर्याकुलेक्षणः । संभाराः संभ्रियंतां मे गुरूणां वचनादिह ।। ८.१४ ।।

amātyān abravīt rājā harṣa paryākula locana | saṃbhārāḥ saṃbhriyaṃtām me gurūṇām vacanāt iha || 8.14 ||

और हर्ष से पूरित नेत्रों वाले राजा ने मन्त्रियों से कहा—'गुरुजनों के इस निर्देश के अनुसार यहाँ सामग्री एकत्र की जाए।'

श्लोक 15 (bala.8.15)

समर्थाधिष्ठितश्चाश्वः सोपाध्यायो विमुच्यताम् । सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम् ।। ८.१५ ।।

samartha adhiṣṭhitaḥ ca aśvaḥ saḥ upādhyāyo vimucyatām | sarayvāḥ ca uttare tīre yajña bhūmir vidhīyatām || 8.15 ||

'समर्थ पुरुषों द्वारा रक्षित तथा उपाध्याय सहित अश्व को मुक्त छोड़ा जाए, और सरयू के उत्तरी तट पर यज्ञभूमि तैयार की जाए।'

श्लोक 16 (bala.8.16)

शान्तयश्चापि वर्धन्तां यथाकल्पं यथाविधि । शक्यः प्राप्तुमयं यज्ञः सर्वेणापि महीक्षिता । नापराधो भवेत् कष्टो यद्यस्मिन् क्रतुसत्तमे ।। ८.१६ ।।

śāntayaḥ ca api vardhantām yathā kalpam yathā vidhi | śakyaḥ prāptum ayam yajñaḥ sarveṇa api mahīkṣitā | na aparādho bhavet kaṣṭo yadi asmin kratu sattame || 8.16 ||

'तथा शान्तिकर्म भी विधि और परम्परा के अनुसार सम्यक् रूप से बढ़ाए जाएँ, जिससे इस उत्तम यज्ञ में कोई कठिन दोष न आने पाए—यह ऐसा यज्ञ है जिसे प्राप्त करने की कामना पृथ्वी का हर राजा करता है।'

श्लोक 17 (bala.8.17)

छिद्रं हि मृगयन्तेऽत्र विद्वांसो ब्रह्मराक्षसाः । विधिहीनस्य यज्ञस्य सद्यः कर्ता विनश्यति ।। ८.१७ ।।

chidram hi mṛgayante sma vidvāṃso brahma rākṣasāḥ | vidhi hīnasya yajñasya sadyaḥ kartā vinaśyati || 8.17 ||

'क्योंकि विद्वान ब्रह्मराक्षस सदा इस यज्ञ में छिद्र (दोष) ढूँढ़ते रहते हैं; विधिहीन यज्ञ का कर्ता शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।'

श्लोक 18 (bala.8.18)

तद्यथा विधिपूर्वं मे क्रतुरेष समाप्यते । तथा विधानं क्रियतां समर्थाः साधनेष्विति ।। ८.१८ ।।

tadyathā vidhi pūrvam me kratureṣa samāpyate | tathā vidhānam kriyatām samarthāḥ sādhaneṣu iti || 8.18 ||

'अतः इस बात का ध्यान रखें कि मेरा यह यज्ञ विधिपूर्वक ही सम्पन्न हो; आप सब लोग ऐसे कार्यों में सक्षम हैं।'

श्लोक 19 (bala.8.19)

तथेति चाब्रुवन्सर्वे मंत्रिणः प्रतिपूजिता । पार्थिवेन्द्रस्य तद्वाक्यं यथापूर्वं निशम्य ते ।। ८.१९ ।।

tathā iti ca abruvan sarve maṃtriṇaḥ pratipūjitā | pārthivendrasya tad vākyam yathā pūrvam niśaṃya te || 8.19 ||

पृथ्वीपति का यह वचन सुनकर सम्मानित उन सभी मन्त्रियों ने पहले की भाँति ही 'ऐसा ही होगा' कहा।

श्लोक 20 (bala.8.20)

तथा द्विजास्ते धर्मज्ञा वर्धयन्तो नृपोत्तमम् । अनुज्ञातास्ततः सर्वे पुनर्जग्मुर्यथागतम् ।। ८.२० ।।

tathā dvijāḥ te dharmajñā varthayato nṛpottamam | anujñātāḥ tataḥ sarve punar jagmur yathā āgatam || 8.20 ||

तब वे धर्मज्ञ ब्राह्मण उस श्रेष्ठ राजा की इस प्रकार प्रशंसा करके, उनसे अनुमति लेकर, जिस प्रकार आए थे, उसी प्रकार वापस चले गए।

श्लोक 21 (bala.8.21)

विसर्जयित्वा तान्विप्रान् सचिवानिदमब्रवीत् । ऋत्विग्भिरुपसंदिष्टो यथावत् क्रतुराप्यताम् ।। ८.२१ ।।

visarjayitvā tān viprān sacivān idam abravīt | ṛtvigbhiḥ upasaṃdiṣṭo yathāvat kratur āpyatām || 8.21 ||

उन ब्राह्मणों को विदा करके राजा ने अपने मन्त्रियों से यह कहा—'ऋत्विजों के निर्देशानुसार यज्ञ यथाविधि सम्पन्न किया जाए।'

श्लोक 22 (bala.8.22)

इत्युक्त्वा नृपशार्दूलः सचिवान्समुपस्थितान् । विसर्जयित्वा स्वं वेश्म प्रविवेश महामतिः ।। ८.२२ ।।

iti uktvā nṛpa śārdūlaḥ sacivān samupasthitān | visarjayitvā svam veśma praviveśa mahāmatiḥ || 8.22 ||

इस प्रकार कहकर उस महामति नृपश्रेष्ठ ने उपस्थित मन्त्रियों को विदा किया और अपने भवन में प्रवेश किया।

श्लोक 23 (bala.8.23)

ततः स गत्वा ताः पत्नीर्नरेन्द्रो हृदयंगमाः । उवाच दीक्षां विशत यक्ष्येऽहं सुतकारणात् ।। ८.२३ ।।

tataḥ sa gatvā tāḥ patnīr narendro hṛdayaṃgamāḥ | uvāca dīkṣām viśata yakṣe.aham suta kāraṇāt || 8.23 ||

तब वह नरेन्द्र अपनी हृदयवल्लभा रानियों के पास जाकर बोले—'मैं पुत्र-प्राप्ति के लिए यज्ञ करने जा रहा हूँ; तुम सब दीक्षा ग्रहण करो।'

श्लोक 24 (bala.8.24)

तासां तेनातिकान्तेन वचनेन सुवर्चसाम् । मुखपद्मान्यशोभन्त पद्मानीव हिमात्यये ।। ८.२४ ।।

tāsām tena ati kāntena vacanena suvarcasām | mukha padmān aśobhanta padmānīva himātyaye || 8.24 ||

राजा के उन अत्यन्त मनोहर वचनों से पहले से ही तेजस्विनी उन रानियों के मुखकमल और भी अधिक शोभायमान हो उठे, मानो हिम के हट जाने पर पद्म खिल उठे हों।

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