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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 22

रावण की चेतावनी और सीता की भर्त्सना

सर्ग 21सर्ग-सूचीसर्ग 23

श्लोक 1 (sundara.22.1)

सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं राक्षसेश्वरः । प्रत्युवाच ततः सीतां विप्रियं प्रियदर्शनाम् ॥ १ ॥

sītāyā vacanaṃ śrutvā paruṣaṃ rākṣaseśvaraḥ | pratyuvāca tataḥ sītāṃ vipriyaṃ priyadarśanām || 1 ||

सीता के कठोर वचन सुनकर राक्षसराज रावण ने उस सुंदरी को प्रिय-सा प्रतीत होने वाला किन्तु वास्तव में अप्रिय उत्तर दिया।

श्लोक 2 (sundara.22.2)

यथा यथा सान्त्वयिता वश्यः स्त्रीणां तथा तथा । यथा यथा प्रियं वक्ता परिभूतस्तथा तथा ॥ २ ॥

yathā yathā sāntvayitā vaśyaḥ strīṇāṃ tathā tathā | yathā yathā priyaṃ vaktā paribhūtastathā tathā || 2 ||

जैसे-जैसे स्त्रियों को समझाया-बुझाया जाता है, वैसे-वैसे वे वश में होती जाती हैं; और जैसे-जैसे पुरुष उनसे मीठी बातें करता है, वैसे-वैसे वह तिरस्कृत होता जाता है।

श्लोक 3 (sundara.22.3)

संनियच्छति मे क्रोधं त्वयि कामः समुत्थितः । द्रवतो मार्गमासाद्य हयानिव सुसारथिः ॥ ३ ॥

saṃniyacchati me krodhaṃ tvayi kāmaḥ samutthitaḥ | dravato mārgamāsādya hayāniva susārathiḥ || 3 ||

तुम्हारे प्रति उठा हुआ मेरा काम मेरे क्रोध को वैसे ही रोक रहा है, जैसे कुशल सारथी बिगड़े मार्ग पर दौड़ते घोड़ों को थाम लेता है।

श्लोक 4 (sundara.22.4)

वामः कामो मनुष्याणां यस्मिन् किल निबध्यते । जने तस्मिंस्त्वनुक्रोशः स्नेहश्च किल जायते ॥ ४ ॥

vāmaḥ kāmo manuṣyāṇāṃ yasmin kila nibadhyate | jane tasmiṃstvanukrośaḥ snehaśca kila jāyate || 4 ||

मनुष्यों के लिए काम प्रतिकूल है - जिस व्यक्ति में यह बंध जाता है, उसी में दया और स्नेह भी उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 5 (sundara.22.5)

एतस्मात् कारणान्न त्वां घातयामि वरानने । वधार्हामवमानार्हां मिथ्या प्रव्रजने रताम् ॥ ५ ॥

etasmāt kāraṇānna tvāṃ ghātayāmi varānane | vadhārhāmavamānārhāṃ mithyā pravrajane ratām || 5 ||

इसी कारण, हे सुमुखी, वध और अपमान के योग्य होते हुए भी, मिथ्या तपस्वी में अनुरक्त तुझे मैं मार नहीं रहा।

श्लोक 6 (sundara.22.6)

परुषाणि हि वाक्यानि यानि यानि ब्रवीषि माम् । तेषु तेषु वधो युक्तस्तव मैथिलि दारुणः ॥ ६ ॥

paruṣāṇi hi vākyāni yāni yāni bravīṣi mām | teṣu teṣu vadho yuktastava maithili dāruṇaḥ || 6 ||

तुम मुझसे जो-जो कठोर वचन कहती हो, हे मैथिली, उन-उन के कारण तो तुम्हारा भयंकर वध ही उचित है।

श्लोक 7 (sundara.22.7)

एवमुक्त्वा तु वैदेहीं रावणो राक्षसाधिपः । क्रोधसंरम्भसंयुक्तः सीतामुत्तरमब्रवीत् ॥ ७ ॥

evamuktvā tu vaidehīṃ rāvaṇo rākṣasādhipaḥ | krodhasaṃrambhasaṃyuktaḥ sītāmuttaramabravīt || 7 ||

वैदेही से यह कहकर, क्रोध और आवेश से भरा राक्षसराज रावण ने सीता से आगे यह कहा -

श्लोक 8 (sundara.22.8)

द्वौ मासौ रक्षितव्यौ मे योऽवधिस्ते मया कृतः । ततः शयनमारोह मम त्वं वरवर्णिनि ॥ ८ ॥

dvau māsau rakṣitavyau me yo'vadhiste mayā kṛtaḥ | tataḥ śayanamāroha mama tvaṃ varavarṇini || 8 ||

मैंने तुम्हारे लिए जो दो मास की अवधि रखी है, वह मुझे पालनी है; हे सुवर्णा, उसके बाद तुम मेरी शय्या पर आ जाओ।

श्लोक 9 (sundara.22.9)

द्वाभ्यामूर्ध्वं तु मासाभ्यां भर्तारं मामनिच्छतीम् । मम त्वां प्रातराशार्थे सूदाश्छेत्स्यन्ति खण्डशः ॥ ९ ॥

dvābhyāmūrdhvaṃ tu māsābhyāṃ bhartāraṃ māmanicchatīm | mama tvāṃ prātarāśārthe sūdāśchetsyanti khaṇḍaśaḥ || 9 ||

दो मास के बाद भी यदि तुम मुझे पति रूप में नहीं चाहोगी, तो मेरे रसोइए मेरे प्रातराश के लिए तुम्हें टुकड़े-टुकड़े काट देंगे।

श्लोक 10 (sundara.22.10)

तां भर्त्स्यमानां सम्प्रेक्ष्य राक्षसेन्द्रेण जानकीम् । देवगन्धर्वकन्यास्ता विषेदुर्विकृतेक्षणाः ॥ १० ॥

tāṃ bhartsyamānāṃ samprekṣya rākṣasendreṇa jānakīm | devagandharvakanyāstā viṣedurvikṛtekṣaṇāḥ || 10 ||

राक्षसराज द्वारा इस प्रकार धमकाई जाती सीता को देखकर वे देव-गन्धर्व कन्याएँ व्याकुल नेत्रों से शोकाकुल हो गईं।

श्लोक 11 (sundara.22.11)

ओष्ठप्रकारैरपरा नेत्रैर्वक्त्रैस्तथापराः । सीतामाश्वासयामासुस्तर्जितां तेन रक्षसा ॥ ११ ॥

oṣṭhaprakārairaparā netrairvaktraistathāparāḥ | sītāmāśvāsayāmāsustarjitāṃ tena rakṣasā || 11 ||

कुछ ने होठों के संकेत से तो कुछ ने नेत्रों और मुख से, राक्षस द्वारा धमकाई गई सीता को सांत्वना दी।

श्लोक 12 (sundara.22.12)

ताभिराश्वासिता सीता रावणं राक्षसाधिपम् । उवाचात्महितं वाक्यं वृत्तशौटीर्यगर्वितम् ॥ १२ ॥

tābhirāśvāsitā sītā rāvaṇaṃ rākṣasādhipam | uvācātmahitaṃ vākyaṃ vṛttaśauṭīryagarvitam || 12 ||

उनसे सांत्वना पाकर सीता ने अपने सद्गुणों के गर्व से युक्त होकर राक्षसराज रावण से अपने हित का वचन कहा -

श्लोक 13 (sundara.22.13)

नूनं न ते जनः कश्चिदस्मिन्निःश्रेयसि स्थितः । निवारयति यो न त्वां कर्मणोऽस्माद् विगर्हितात् ॥ १३ ॥

nūnaṃ na te janaḥ kaścidasminniḥśreyasi sthitaḥ | nivārayati yo na tvāṃ karmaṇo'smād vigarhitāt || 13 ||

निश्चय ही तुम्हारे निकट ऐसा कोई नहीं जो तुम्हारा हितैषी हो, क्योंकि कोई भी तुम्हें इस निन्दित कर्म से रोकता नहीं है।

श्लोक 14 (sundara.22.14)

मां हि धर्मात्मनः पत्नीं शचीमिव शचीपतेः । त्वदन्यस्त्रिषु लोकेषु प्रार्थयेन्मनसापि कः ॥ १४ ॥

māṃ hi dharmātmanaḥ patnīṃ śacīmiva śacīpateḥ | tvadanyastriṣu lokeṣu prārthayenmanasāpi kaḥ || 14 ||

धर्मात्मा राम की पत्नी, इन्द्राणी शची के समान मुझ जैसी को, तीनों लोकों में तुम्हारे सिवा और कौन मन से भी चाहेगा?

श्लोक 15 (sundara.22.15)

राक्षसाधम रामस्य भार्याममिततेजसः । उक्तवानसि यत् पापं क्व गतस्तस्य मोक्ष्यसे ॥ १५ ॥

rākṣasādhama rāmasya bhāryāmamitatejasaḥ | uktavānasi yat pāpaṃ kva gatastasya mokṣyase || 15 ||

हे नीच राक्षस! अतुल तेजस्वी राम की पत्नी के प्रति तूने जो पाप-वचन कहे हैं, उनसे तू भला कहाँ जाकर मुक्त होगा?

श्लोक 16 (sundara.22.16)

यथा दृप्तश्च मातंगः शशश्च सहितौ वने । तथा द्विरदवद् रामस्त्वं नीच शशवत् स्मृतः ॥ १६ ॥

yathā dṛptaśca mātaṃgaḥ śaśaśca sahitau vane | tathā dviradavad rāmastvaṃ nīca śaśavat smṛtaḥ || 16 ||

जैसे वन में मत्त गजराज और शशक साथ हों, वैसे ही राम गजराज के समान हैं और हे नीच, तू शशक के समान स्मरण किया जाता है।

श्लोक 17 (sundara.22.17)

स त्वमिक्ष्वाकुनाथं वै क्षिपन्निह न लज्जसे । चक्षुषो विषये तस्य न यावदुपगच्छसि ॥ १७ ॥

sa tvamikṣvākunāthaṃ vai kṣipanniha na lajjase | cakṣuṣo viṣaye tasya na yāvadupagacchasi || 17 ||

इक्ष्वाकुनाथ राम की निन्दा करते हुए तुझे यहाँ लज्जा नहीं आती, जबकि तू अभी उनकी दृष्टि के क्षेत्र में भी नहीं पहुँचा है।

श्लोक 18 (sundara.22.18)

इमे ते नयने क्रूरे विकृते कृष्णपिंगले । क्षितौ न पतिते कस्मान्मामनार्य निरीक्षतः ॥ १८ ॥

ime te nayane krūre vikṛte kṛṣṇapiṃgale | kṣitau na patite kasmānmāmanārya nirīkṣataḥ || 18 ||

मुझे देखने वाले तेरे ये क्रूर, विकृत, काले-भूरे नेत्र, हे अनार्य, न जाने किस कारण धरती पर गिर नहीं पड़ते।

श्लोक 19 (sundara.22.19)

तस्य धर्मात्मनः पत्नी स्नुषा दशरथस्य च । कथं व्याहरतो मां ते न जिह्वा पाप शीर्यति ॥ १९ ॥

tasya dharmātmanaḥ patnī snuṣā daśarathasya ca | kathaṃ vyāharato māṃ te na jihvā pāpa śīryati || 19 ||

उस धर्मात्मा की पत्नी और दशरथ की पुत्रवधू मुझसे ऐसी बातें कहते हुए तेरी जिह्वा, हे पापी, आखिर टूट क्यों नहीं जाती?

श्लोक 20 (sundara.22.20)

असंदेशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥ २० ॥

asaṃdeśāttu rāmasya tapasaścānupālanāt | na tvāṃ kurmi daśagrīva bhasma bhasmārhatejasā || 20 ||

राम की अनुमति न होने से और अपनी तपस्या के पालन के कारण ही, हे दशग्रीव, मैं तुझे अपने तेज से भस्म नहीं कर रही, वरना तू भस्म होने योग्य ही है।

श्लोक 21 (sundara.22.21)

नापहर्तुमहं शक्या तस्य रामस्य धीमतः । विधिस्तव वधार्थाय विहितो नात्र संशयः ॥ २१ ॥

nāpahartumahaṃ śakyā tasya rāmasya dhīmataḥ | vidhistava vadhārthāya vihito nātra saṃśayaḥ || 21 ||

मैं बुद्धिमान राम से वस्तुतः हरी ही नहीं जा सकती; यह सब तेरे वध के लिए ही विधाता ने रचा है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 22 (sundara.22.22)

शूरेण धनदभ्रात्रा बलैः समुदितेन च । अपोह्य रामं कस्माच्चिद् दारचौर्यं त्वया कृतम् ॥ २२ ॥

śūreṇa dhanadabhrātrā balaiḥ samuditena ca | apohya rāmaṃ kasmāccid dāracauryaṃ tvayā kṛtam || 22 ||

कुबेर के भाई, शूरवीर और सेनाओं से युक्त होकर भी तूने किसी प्रकार राम को दूर करके यह दारचौर्य किया है।

श्लोक 23 (sundara.22.23)

सीताया वचनं श्रुत्वा रावणो राक्षसाधिपः । विवृत्य नयने क्रूरे जानकीमन्ववैक्षत ॥ २३ ॥

sītāyā vacanaṃ śrutvā rāvaṇo rākṣasādhipaḥ | vivṛtya nayane krūre jānakīmanvavaikṣata || 23 ||

सीता के वचन सुनकर राक्षसराज रावण ने अपने क्रूर नेत्र घुमाकर जानकी की ओर देखा।

श्लोक 24 (sundara.22.24)

नीलजीमूतसंकाशो महाभुजशिरोधरः । सिंहसत्त्वगतिः श्रीमान् दीप्तजिह्वोग्रलोचनः ॥ २४ ॥

nīlajīmūtasaṃkāśo mahābhujaśirodharaḥ | siṃhasattvagatiḥ śrīmān dīptajihvogralocanaḥ || 24 ||

वह नीले मेघ के समान, विशाल भुजाओं और ग्रीवा वाला, सिंह के समान बल-गति वाला, तेजस्वी, दीप्त जिह्वा और उग्र नेत्रों वाला था।

श्लोक 25 (sundara.22.25)

चलाग्रमुकुटप्रांशुश्चित्रमाल्यानुलेपनः । रक्तमाल्याम्बरधरस्तप्तांगदविभूषणः ॥ २५ ॥

calāgramukuṭaprāṃśuścitramālyānulepanaḥ | raktamālyāmbaradharastaptāṃgadavibhūṣaṇaḥ || 25 ||

चंचल शिखर वाले मुकुट से ऊँचा, विचित्र मालाओं और अनुलेपन से सुसज्जित, लाल माला-वस्त्र धारण किए, तपाए स्वर्ण के अंगदों से विभूषित।

श्लोक 26 (sundara.22.26)

श्रोणीसूत्रेण महता मेचकेन सुसंवृतः । अमृतोत्पादने नद्धो भुजंगेनेव मन्दरः ॥ २६ ॥

śroṇīsūtreṇa mahatā mecakena susaṃvṛtaḥ | amṛtotpādane naddho bhujaṃgeneva mandaraḥ || 26 ||

विशाल काली करधनी से भली-भाँति आबद्ध, मानो अमृत मन्थन के लिए सर्प से बंधा मंदराचल हो।

श्लोक 27 (sundara.22.27)

ताभ्यां स परिपूर्णाभ्यां भुजाभ्यां राक्षसेश्वरः । शुशुभेऽचलसंकाशः शृंगाभ्यामिव मन्दरः ॥ २७ ॥

tābhyāṃ sa paripūrṇābhyāṃ bhujābhyāṃ rākṣaseśvaraḥ | śuśubhe'calasaṃkāśaḥ śṛṃgābhyāmiva mandaraḥ || 27 ||

उन दोनों भरी-पूरी भुजाओं से वह राक्षसराज पर्वत के समान शोभित हो रहा था, मानो दो शिखरों वाला मंदराचल हो।

श्लोक 28 (sundara.22.28)

तरुणादित्यवर्णाभ्यां कुण्डलाभ्यां विभूषितः । रक्तपल्लवपुष्पाभ्यामशोकाभ्यामिवाचलः ॥ २८ ॥

taruṇādityavarṇābhyāṃ kuṇḍalābhyāṃ vibhūṣitaḥ | raktapallavapuṣpābhyāmaśokābhyāmivācalaḥ || 28 ||

नवोदित सूर्य के रंग वाले कुण्डलों से विभूषित, वह लाल पल्लव-पुष्पों वाले अशोक वृक्षों से युक्त पर्वत के समान लग रहा था।

श्लोक 29 (sundara.22.29)

स कल्पवृक्षप्रतिमो वसन्त इव मूर्तिमान् । श्मशानचैत्यप्रतिमो भूषितोऽपि भयंकरः ॥ २९ ॥

sa kalpavṛkṣapratimo vasanta iva mūrtimān | śmaśānacaityapratimo bhūṣito'pi bhayaṃkaraḥ || 29 ||

वह कल्पवृक्ष के समान, मानो साक्षात् वसन्त की मूर्ति था; परन्तु आभूषित होते हुए भी श्मशान के चैत्य-स्तूप के समान भयंकर था।

श्लोक 30 (sundara.22.30)

अवेक्षमाणो वैदेहीं कोपसंरक्तलोचनः । उवाच रावणः सीतां भुजंग इव निःश्वसन् ॥ ३० ॥

avekṣamāṇo vaidehīṃ kopasaṃraktalocanaḥ | uvāca rāvaṇaḥ sītāṃ bhujaṃga iva niḥśvasan || 30 ||

क्रोध से लाल नेत्रों वाला रावण वैदेही की ओर देखते हुए सर्प के समान श्वास लेते हुए सीता से बोला -

श्लोक 31 (sundara.22.31)

अनयेनाभिसम्पन्नमर्थहीनमनुव्रते । नाशयाम्यहमद्य त्वां सूर्यः संध्यामिवौजसा ॥ ३१ ॥

anayenābhisampannamarthahīnamanuvrate | nāśayāmyahamadya tvāṃ sūryaḥ saṃdhyāmivaujasā || 31 ||

तू अनुचित और अर्थहीन व्यक्ति की अनुगामिनी है; आज मैं तुझे वैसे ही नष्ट कर दूँगा जैसे सूर्य अपने तेज से संध्या को नष्ट कर देता है।

श्लोक 32 (sundara.22.32)

इत्युक्त्वा मैथिलीं राजा रावणः शत्रुरावणः । संददर्श ततः सर्वा राक्षसीर्घोरदर्शनाः ॥ ३२ ॥

ityuktvā maithilīṃ rājā rāvaṇaḥ śatrurāvaṇaḥ | saṃdadarśa tataḥ sarvā rākṣasīrghoradarśanāḥ || 32 ||

शत्रुओं को रुलाने वाला राजा रावण मैथिली से यह कहकर, फिर घोर रूप वाली सभी राक्षसियों को बुलवाया।

श्लोक 33 (sundara.22.33)

एकाक्षीमेककर्णां च कर्णप्रावरणां तथा । गोकर्णीं हस्तिकर्णीं च लम्बकर्णीमकर्णिकाम् ॥ ३३ ॥

ekākṣīmekakarṇāṃ ca karṇaprāvaraṇāṃ tathā | gokarṇīṃ hastikarṇīṃ ca lambakarṇīmakarṇikām || 33 ||

एक आँख वाली, एक कान वाली, कान को ही ओढ़नी बनाए हुए, गाय जैसे कानों वाली, हाथी जैसे कानों वाली, लटकते कानों वाली और कान-रहित,

श्लोक 34 (sundara.22.34)

हस्तिपद्यश्वपद्यौ च गोपदीं पादचूलिकाम् । एकाक्षीमेकपादीं च पृथुपादीमपादिकाम् ॥ ३४ ॥

hastipadyaśvapadyau ca gopadīṃ pādacūlikām | ekākṣīmekapādīṃ ca pṛthupādīmapādikām || 34 ||

हाथी और घोड़े के पैरों वाली, गाय के पैरों वाली, पैरों पर बाल वाली, एक आँख और एक पैर वाली, चौड़े पैरों वाली और पैर-रहित,

श्लोक 35 (sundara.22.35)

अतिमात्रशिरोग्रीवामतिमात्रकुचोदरीम् । अतिमात्रास्यनेत्रां च दीर्घजिह्वानखामपि ॥ ३५ ॥

atimātraśirogrīvāmatimātrakucodarīm | atimātrāsyanetrāṃ ca dīrghajihvānakhāmapi || 35 ||

अत्यधिक बड़े सिर-गर्दन वाली, अत्यधिक बड़े स्तन-उदर वाली, अत्यधिक बड़े मुख-नेत्र वाली, लंबी जीभ और नाखूनों वाली,

श्लोक 36 (sundara.22.36)

अनासिकां सिंहमुखीं गोमुखीं सूकरीमुखीम् । यथा मद्वशगा सीता क्षिप्रं भवति जानकी ॥ ३६ ॥

anāsikāṃ siṃhamukhīṃ gomukhīṃ sūkarīmukhīm | yathā madvaśagā sītā kṣipraṃ bhavati jānakī || 36 ||

नाक-रहित, सिंह-मुखी, गौ-मुखी, शूकर-मुखी राक्षसियों को - उसने आज्ञा दी कि जनकपुत्री सीता शीघ्र मेरे वश में आ जाए, यह तुम सब मिलकर शीघ्र करो।

श्लोक 37 (sundara.22.37)

तथा कुरुत राक्षस्यः सर्वाः क्षिप्रं समेत्य वा । प्रतिलोमानुलोमैश्च सामदानादिभेदनैः ॥ ३७ ॥

tathā kuruta rākṣasyaḥ sarvāḥ kṣipraṃ sametya vā | pratilomānulomaiśca sāmadānādibhedanaiḥ || 37 ||

प्रतिकूल और अनुकूल उपायों से, साम-दाम-भेद आदि नीतियों से,

श्लोक 38 (sundara.22.38)

आवर्जयत वैदेहीं दण्डस्योद्यमनेन च । इति प्रतिसमादिश्य राक्षसेन्द्रः पुनः पुनः ॥ ३८ ॥

āvarjayata vaidehīṃ daṇḍasyodyamanena ca | iti pratisamādiśya rākṣasendraḥ punaḥ punaḥ || 38 ||

वैदेही को वश में करो, और आवश्यकता हो तो दण्ड की धमकी से भी। इस प्रकार बार-बार आदेश देकर,

श्लोक 39 (sundara.22.39)

काममन्युपरीतात्मा जानकीं प्रति गर्जत । उपगम्य ततः क्षिप्रं राक्षसी धान्यमालिनी ॥ ३९ ॥

kāmamanyuparītātmā jānakīṃ prati garjata | upagamya tataḥ kṣipraṃ rākṣasī dhānyamālinī || 39 ||

काम और क्रोध से व्याप्तचित्त राक्षसराज जानकी के प्रति गरजता रहा। तभी धान्यमालिनी नामक राक्षसी शीघ्र पास आई,

श्लोक 40 (sundara.22.40)

परिष्वज्य दशग्रीवमिदं वचनमब्रवीत् । मया क्रीड महाराज सीतया किं तवानया ॥ ४० ॥

pariṣvajya daśagrīvamidaṃ vacanamabravīt | mayā krīḍa mahārāja sītayā kiṃ tavānayā || 40 ||

और दशग्रीव का आलिंगन करके यह वचन बोली - हे महाराज! मुझसे क्रीड़ा करो; हे राक्षसेश्वर! तुम्हें इस सीता से क्या प्रयोजन,

श्लोक 41 (sundara.22.41)

विवर्णया कृपणया मानुष्या राक्षसेश्वर । नूनमस्यां महाराज न देवा भोगसत्तमान् ॥ ४१ ॥

vivarṇayā kṛpaṇayā mānuṣyā rākṣaseśvara | nūnamasyāṃ mahārāja na devā bhogasattamān || 41 ||

जो वर्णहीन, दीन और साधारण मानुषी है? हे महाराज! निश्चय ही देवगण

श्लोक 42 (sundara.22.42)

विदधत्यमरश्रेष्ठास्तव बाहुबलार्जितान् । अकामां कामयानस्य शरीरमुपतप्यते ॥ ४२ ॥

vidadhatyamaraśreṣṭhāstava bāhubalārjitān | akāmāṃ kāmayānasya śarīramupatapyate || 42 ||

तुम्हारी भुजाओं के बल से अर्जित उत्तम भोग इसे प्रदान नहीं करेंगे। जो अनिच्छुक स्त्री की कामना करता है, उसका शरीर संतप्त होता है;

श्लोक 43 (sundara.22.43)

इच्छतीं कामयानस्य प्रीतिर्भवति शोभना । एवमुक्तस्तु राक्षस्या समुत्क्षिप्तस्ततो बली । प्रहसन् मेघसंकाशो राक्षसः स न्यवर्तत ॥ ४३ ॥

icchatīṃ kāmayānasya prītirbhavati śobhanā | evamuktastu rākṣasyā samutkṣiptastato balī | prahasan meghasaṃkāśo rākṣasaḥ sa nyavartata || 43 ||

पर जो इच्छुक स्त्री की कामना करता है, उसे सुंदर प्रीति प्राप्त होती है। उस राक्षसी के इस प्रकार कहने पर, मेघ के समान वह बलवान राक्षस

श्लोक 44 (sundara.22.44)

प्रस्थितः स दशग्रीवः कम्पयन्निव मेदिनीम् । ज्वलद्भास्करसंकाशं प्रविवेश निवेशनम् ॥ ४४ ॥

prasthitaḥ sa daśagrīvaḥ kampayanniva medinīm | jvaladbhāskarasaṃkāśaṃ praviveśa niveśanam || 44 ||

हँसते हुए वहाँ से मुड़ गया और लौट पड़ा। दशग्रीव प्रस्थान करते हुए मानो पृथ्वी को कंपाता हुआ,

श्लोक 45 (sundara.22.45)

देवगन्धर्वकन्याश्च नागकन्याश्च तास्ततः । परिवार्य दशग्रीवं प्रविशुस्ता गृहोत्तमम् ॥ ४५ ॥

devagandharvakanyāśca nāgakanyāśca tāstataḥ | parivārya daśagrīvaṃ praviśustā gṛhottamam || 45 ||

जलते सूर्य के समान तेजस्वी अपने भवन में प्रविष्ट हुआ। देव-गन्धर्व कन्याएँ और नाग-कन्याएँ भी दशग्रीव को घेरकर उस उत्तम भवन में प्रविष्ट हुईं।

श्लोक 46 (sundara.22.46)

स मैथिलीं धर्मपरामवस्थितां प्रवेपमानां परिभर्त्स्य रावणः । विहाय सीतां मदनेन मोहितः स्वमेव वेश्म प्रविवेश रावणः ॥ ४६ ॥

sa maithilīṃ dharmaparāmavasthitāṃ pravepamānāṃ paribhartsya rāvaṇaḥ | vihāya sītāṃ madanena mohitaḥ svameva veśma praviveśa rāvaṇaḥ || 46 ||

इस प्रकार धर्मपरायणा और थर-थर कांपती मैथिली को धमकाकर, काम से मोहित रावण उसे छोड़कर अपने ही भवन में प्रविष्ट हुआ।

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