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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 32

सीता की शंका और देवताओं से प्रार्थना

सर्ग 31सर्ग-सूचीसर्ग 33

श्लोक 1 (sundara.32.1)

ततः शाखान्तरे लीनं दृष्ट्वा चलितमानसा । वेष्टितार्जुनवस्त्रं तं विद्युत्संघातपिंगलम् ॥ 32.1 ॥

tataḥ śākhāntare līnaṃ dṛṣṭvā calitamānasā | veṣṭitārjunavastraṃ taṃ vidyutsaṃghātapiṃgalam || 32.1 ||

तब शाखाओं के बीच छिपे हुए, श्वेत वस्त्र में लिपटे, बिजली की चमक के समान पिंगल आभा वाले उस वानर को देखकर उनका मन विचलित हो उठा --

श्लोक 2 (sundara.32.2)

सा ददर्श कपिं तत्र प्रश्रितं प्रियवादिनम् । फुल्लाशोकोत्कराभासं तप्तचामीकरेक्षणम् ॥ 32.2 ॥

sā dadarśa kapiṃ tatra praśritaṃ priyavādinam | phullāśokotkarābhāsaṃ taptacāmīkarekṣaṇam || 32.2 ||

...उन्होंने वहाँ उस विनम्र, मधुरभाषी वानर को देखा, जो खिले हुए अशोक-पुष्पों के समूह-सा दीप्तिमान् था और जिसके नेत्र तपाए हुए स्वर्ण के समान थे।

श्लोक 3 (sundara.32.3)

साथ दृष्ट्वा हरिश्रेष्ठं विनीतवदवस्थितम् । मैथिली चिन्तयामास विस्मयं परमं गता ॥ 32.3 ॥

sātha dṛṣṭvā hariśreṣṭhaṃ vinītavadavasthitam | maithilī cintayāmāsa vismayaṃ paramaṃ gatā || 32.3 ||

उस वानरश्रेष्ठ को विनम्रतापूर्वक खड़ा देखकर मैथिली अत्यन्त विस्मय को प्राप्त होकर सोचने लगीं --

श्लोक 4 (sundara.32.4)

अहो भीममिदं सत्त्वं वानरस्य दुरासदम् । दुर्निरीक्ष्यमिदं मत्वा पुनरेव मुमोह सा ॥ 32.4 ॥

aho bhīmamidaṃ sattvaṃ vānarasya durāsadam | durnirīkṣyamidaṃ matvā punareva mumoha sā || 32.4 ||

'अहो, यह वानर-रूप प्राणी अत्यन्त भयंकर और दुर्गम्य है!' ऐसा मानकर, इसे देखना भी कठिन जानकर वह पुनः मूर्च्छित हो गईं।

श्लोक 5 (sundara.32.5)

विललाप भृशं सीता करुणं भयमोहिता । राम रामेति दुःखार्ता लक्ष्मणेति च भामिनी ॥ 32.5 ॥

vilalāpa bhṛśaṃ sītā karuṇaṃ bhayamohitā | rāma rāmeti duḥkhārtā lakṣmaṇeti ca bhāminī || 32.5 ||

भय से मोहित सीता अत्यन्त करुणतापूर्वक विलाप करने लगीं; दुःख से पीड़ित वह भामिनी 'हे राम! हे राम!' और 'हे लक्ष्मण!' पुकारने लगीं।

श्लोक 6 (sundara.32.6)

रुरोद सहसा सीता मन्दमन्दस्वरा सती । साथ दृष्ट्वा हरिवरं विनीतवदुपागतम् । मैथिली चिन्तयामास स्वप्नोऽयमिति भामिनी ॥ 32.6 ॥

ruroda sahasā sītā mandamandasvarā satī | sātha dṛṣṭvā harivaraṃ vinītavadupāgatam | maithilī cintayāmāsa svapno'yamiti bhāminī || 32.6 ||

सती सीता सहसा अत्यन्त मन्द स्वर में रोने लगीं। तब उस श्रेष्ठ वानर को विनम्रतापूर्वक समीप आते देखकर मैथिली को यह स्वप्न-सा प्रतीत हुआ।

श्लोक 7 (sundara.32.7)

सा वीक्षमाणा पृथुभुग्नवक्त्रं शाखामृगेन्द्रस्य यथोक्तकारम् । ददर्श पिंगप्रवरं महार्हं वातात्मजं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ॥ 32.7 ॥

sā vīkṣamāṇā pṛthubhugnavaktraṃ śākhāmṛgendrasya yathoktakāram | dadarśa piṃgapravaraṃ mahārhaṃ vātātmajaṃ buddhimatāṃ variṣṭham || 32.7 ||

उसे निहारती हुई उन्होंने चौड़े व वक्र मुख वाले, वानरराज की आज्ञा का पालन करने वाले, पिंगल वानरों में श्रेष्ठ, अत्यन्त पूज्य और बुद्धिमानों में वरिष्ठ उस पवनपुत्र को देखा।

श्लोक 8 (sundara.32.8)

सा तं समीक्ष्यैव भृशं विपन्ना गतासुकल्पेव बभूव सीता । चिरेण संज्ञां प्रतिलभ्य चैवं विचिन्तयामास विशालनेत्रा ॥ 32.8 ॥

sā taṃ samīkṣyaiva bhṛśaṃ vipannā gatāsukalpeva babhūva sītā | cireṇa saṃjñāṃ pratilabhya caivaṃ vicintayāmāsa viśālanetrā || 32.8 ||

उसे देखते ही सीता अत्यन्त विषण्ण हो गईं और मानो प्राणहीन-सी हो गईं। बहुत देर बाद चेतना पाकर वह विशाल-नेत्रा इस प्रकार सोचने लगीं --

श्लोक 9 (sundara.32.9)

स्वप्नो मयायं विकृतोऽद्य दृष्टः शाखामृगः शास्त्रगणैर्निषिद्धः । स्वस्त्यस्तु रामाय सलक्ष्मणाय तथा पितुर्मे जनकस्य राज्ञः ॥ 32.9 ॥

svapno mayāyaṃ vikṛto'dya dṛṣṭaḥ śākhāmṛgaḥ śāstragaṇairniṣiddhaḥ | svastyastu rāmāya salakṣmaṇāya tathā piturme janakasya rājñaḥ || 32.9 ||

'आज मैंने स्वप्न में यह विकृत शाखामृग देखा है, जिसे शास्त्रों के अनेक ग्रन्थों ने अशुभ बताया है। लक्ष्मण-सहित राम का तथा मेरे पिता राजा जनक का कल्याण हो।'

श्लोक 10 (sundara.32.10)

स्वप्नो हि नायं नहि मेऽस्ति निद्रा शोकेन दुःखेन च पीडितायाः । सुखं हि मे नास्ति यतो विहीना तेनेन्दुपूर्णप्रतिमाननेन ॥ 32.10 ॥

svapno hi nāyaṃ nahi me'sti nidrā śokena duḥkhena ca pīḍitāyāḥ | sukhaṃ hi me nāsti yato vihīnā tenendupūrṇapratimānanena || 32.10 ||

'किन्तु यह स्वप्न नहीं है, क्योंकि शोक और दुःख से पीड़ित मुझे नींद ही नहीं आती। पूर्णचन्द्र के समान मुखवाले उन राम से विहीन होने के कारण मुझे कोई सुख भी नहीं है।'

श्लोक 11 (sundara.32.11)

रामेति रामेति सदैव बुद्ध्या विचिन्त्य वाचा ब्रुवती तमेव । तस्यानुरूपं च कथां तदर्था- मेवं प्रपश्यामि तथा शृणोमि ॥ 32.11 ॥

rāmeti rāmeti sadaiva buddhyā vicintya vācā bruvatī tameva | tasyānurūpaṃ ca kathāṃ tadarthā- mevaṃ prapaśyāmi tathā śṛṇomi || 32.11 ||

'सदैव मन से राम-राम का चिन्तन करती और वाणी से उन्हीं का नाम उच्चारण करती हुई मैं, उन्हीं के अनुरूप और उन्हीं से सम्बन्धित यह कथा इस प्रकार देख और सुन रही हूँ।'

श्लोक 12 (sundara.32.12)

अहं हि तस्याद्य मनोभवेन सम्पीडिता तद्गतसर्वभावा । विचिन्तयन्ती सततं तमेव तथैव पश्यामि तथा शृणोमि ॥ 32.12 ॥

ahaṃ hi tasyādya manobhavena sampīḍitā tadgatasarvabhāvā | vicintayantī satataṃ tameva tathaiva paśyāmi tathā śṛṇomi || 32.12 ||

'आज कामदेव से उत्पन्न वेदना से पीड़ित, अपना सम्पूर्ण मन उन्हीं में लगाए, सदैव उन्हीं का चिन्तन करती हुई मैं इसी प्रकार उन्हें देख रही हूँ और इसी प्रकार सुन रही हूँ।'

श्लोक 13 (sundara.32.13)

मनोरथः स्यादिति चिन्तयामि तथापि बुद्ध्यापि वितर्कयामि । किं कारणं तस्य हि नास्ति रूपं सुव्यक्तरूपश्च वदत्ययं माम् ॥ 32.13 ॥

manorathaḥ syāditi cintayāmi tathāpi buddhyāpi vitarkayāmi | kiṃ kāraṇaṃ tasya hi nāsti rūpaṃ suvyaktarūpaśca vadatyayaṃ mām || 32.13 ||

'मैं सोचती हूँ कि यह केवल मन की कल्पना हो सकती है, फिर भी बुद्धि से विचार करती हूँ -- किस कारण से, जिसका कोई वास्तविक रूप नहीं होना चाहिए था, वह इतने स्पष्ट रूप में प्रकट होकर मुझसे बोल रहा है?'

श्लोक 14 (sundara.32.14)

नमोऽस्तु वाचस्पतये सवज्रिणे स्वयम्भुवे चैव हुताशनाय । अनेन चोक्तं यदिदं ममाग्रतो वनौकसा तच्च तथास्तु नान्यथा ॥ 32.14 ॥

namo'stu vācaspataye savajriṇe svayambhuve caiva hutāśanāya | anena coktaṃ yadidaṃ mamāgrato vanaukasā tacca tathāstu nānyathā || 32.14 ||

'वज्रधारी इन्द्र-सहित वाचस्पति (बृहस्पति) को, स्वयम्भू ब्रह्मा को और अग्निदेव को मेरा नमस्कार हो! इस वनवासी वानर ने मेरे समक्ष जो कुछ कहा है, वह वैसा ही सत्य हो, अन्यथा न हो!'

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