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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 49

रावण-दर्शन

सर्ग 48सर्ग-सूचीसर्ग 50

श्लोक 1 (sundara.49.1)

ततः स कर्मणा तस्य विस्मितो भीमविक्रमः। हनूमान् क्रोधताम्राक्षो रक्षोऽधिपमवैक्षत ॥ 49.1 ॥

tataḥ sa karmaṇā tasya vismito bhīmavikramaḥ| hanūmān krodhatāmrākṣo rakṣo'dhipamavaikṣata || 49.1 ||

तत्पश्चात् भयंकर पराक्रमी हनुमान, उसके कृत्यों से चकित होकर, क्रोध से ताम्रवर्ण नेत्रों वाले होकर राक्षसराज की ओर देखने लगे।

श्लोक 2 (sundara.49.2)

भ्राजमानं महार्हेण काञ्चनेन विराजता। मुक्ताजालवृतेनाथ मुकुटेन महाद्युतिम् ॥ 49.2 ॥

bhrājamānaṃ mahārheṇa kāñcanena virājatā| muktājālavṛtenātha mukuṭena mahādyutim || 49.2 ||

— जो अत्यंत मूल्यवान, चमकते हुए स्वर्ण-मुकुट से सुशोभित था, जो मोतियों के जाल से आवृत था, अत्यंत तेजस्वी,

श्लोक 3 (sundara.49.3)

वज्रसंयोगसंयुक्तैर्महार्हमणिविग्रहैः। हैमैराभरणैश्चित्रैर्मनसेव प्रकल्पितैः ॥ 49.3 ॥

vajrasaṃyogasaṃyuktairmahārhamaṇivigrahaiḥ| haimairābharaṇaiścitrairmanaseva prakalpitaiḥ || 49.3 ||

— जो हीरों से जड़े तथा अमूल्य मणियों से युक्त, विचित्र स्वर्णाभूषणों से अलंकृत था, मानो वे आभूषण मन के संकल्प से ही रचे गए हों,

श्लोक 4 (sundara.49.4)

महार्हक्षौमसंवीतं रक्तचन्दनरूषितम्। स्वनुलिप्तं विचित्राभिर्विविधाभिश्च भक्तिभिः ॥ 49.4 ॥

mahārhakṣaumasaṃvītaṃ raktacandanarūṣitam| svanuliptaṃ vicitrābhirvividhābhiśca bhaktibhiḥ || 49.4 ||

— जो बहुमूल्य रेशमी वस्त्र धारण किए, लाल चंदन से चर्चित, तथा विचित्र और विविध प्रकार के अनुलेपनों से सुसज्जित था,

श्लोक 5 (sundara.49.5)

विचित्रं दर्शनीयैश्च रक्ताक्षैर्भीमदर्शनैः। दीप्ततीक्ष्णमहादंष्ट्रं प्रलम्बं दशनच्छदैः ॥ 49.5 ॥

vicitraṃ darśanīyaiśca raktākṣairbhīmadarśanaiḥ| dīptatīkṣṇamahādaṃṣṭraṃ pralambaṃ daśanacchadaiḥ || 49.5 ||

— जो देखने में विचित्र, रक्त-वर्ण तथा भयंकर नेत्रों वाला था, जिसकी तीक्ष्ण और विशाल दाढ़ें चमक रही थीं, तथा जिसके ओंठ दांतों पर लंबे लटके हुए थे,

श्लोक 6 (sundara.49.6)

शिरोभिर्दशभिर्वीरो भ्राजमानं महौजसम्। नानाव्यालसमाकीर्णैः शिखरैरिव मन्दरम् ॥ 49.6 ॥

śirobhirdaśabhirvīro bhrājamānaṃ mahaujasam| nānāvyālasamākīrṇaiḥ śikharairiva mandaram || 49.6 ||

— दस सिरों से देदीप्यमान, महाबलशाली उस रावण को, वह वीर हनुमान इस प्रकार देखने लगे मानो नाना सर्पों से आकीर्ण मंदराचल अपने अनेक शिखरों सहित सुशोभित हो,

श्लोक 7 (sundara.49.7)

नीलाञ्जनचयप्रख्यं हारेणोरसि राजता। पूर्णचन्द्राभवक्त्रेण सबालार्कमिवाम्बुदम् ॥ 49.7 ॥

nīlāñjanacayaprakhyaṃ hāreṇorasi rājatā| pūrṇacandrābhavaktreṇa sabālārkamivāmbudam || 49.7 ||

— नील अंजन के समूह के समान श्यामवर्ण, वक्षस्थल पर हार से सुशोभित, पूर्णचंद्र के समान मुख वाले, मानो बाल-सूर्य सहित कोई मेघ हो,

श्लोक 8 (sundara.49.8)

बाहुभिर्बद्धकेयूरैश्चन्दनोत्तमरूषितैः। भ्राजमानाङ्गदैर्भीमैः पञ्चशीर्षैरिवोरगैः ॥ 49.8 ॥

bāhubhirbaddhakeyūraiścandanottamarūṣitaiḥ| bhrājamānāṅgadairbhīmaiḥ pañcaśīrṣairivoragaiḥ || 49.8 ||

— केयूरों से बँधी, उत्तम चंदन से चर्चित, तेजोमय अंगदों से सुशोभित, पाँच सिरों वाले भयंकर सर्पों के समान भुजाओं से युक्त,

श्लोक 9 (sundara.49.9)

महति स्फाटिके चित्रे रत्नसंयोगचित्रिते। उत्तमास्तरणास्तीर्णे सूपविष्टं वरासने ॥ 49.9 ॥

mahati sphāṭike citre ratnasaṃyogacitrite| uttamāstaraṇāstīrṇe sūpaviṣṭaṃ varāsane || 49.9 ||

— रत्नों से जटित, विशाल तथा सुंदर स्फटिक के उत्तम आसन पर, जो श्रेष्ठ बिछौनों से आच्छादित था, भलीभाँति बैठा हुआ,

श्लोक 10 (sundara.49.10)

अलंकृताभिरत्यर्थं प्रमदाभिः समन्ततः। वालव्यजनहस्ताभिरारात्समुपसेवितम् ॥ 49.10 ॥

alaṃkṛtābhiratyarthaṃ pramadābhiḥ samantataḥ| vālavyajanahastābhirārātsamupasevitam || 49.10 ||

— जो चारों ओर से अत्यंत सुसज्जित, हाथों में चँवर लिए हुए स्त्रियों द्वारा समीप में सेवित था,

श्लोक 11 (sundara.49.11)

दुर्धरेण प्रहस्तेन महापार्श्वेन रक्षसा। मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैर्निकुम्भेन च मन्त्रिणा ॥ 49.11 ॥

durdhareṇa prahastena mahāpārśvena rakṣasā| mantribhirmantratattvajñairnikumbhena ca mantriṇā || 49.11 ||

— दुर्धर, प्रहस्त, राक्षस महापार्श्व, मंत्र के तत्त्व को जानने वाले मंत्रियों तथा मंत्री निकुंभ द्वारा सेवित,

श्लोक 12 (sundara.49.12)

उपोपविष्टं रक्षोभिश्चतुर्भिर्बलदर्पितम्। कृत्स्नं परिवृतं लोकं चतुर्भिरिव सागरैः ॥ 49.12 ॥

upopaviṣṭaṃ rakṣobhiścaturbhirbaladarpitam| kṛtsnaṃ parivṛtaṃ lokaṃ caturbhiriva sāgaraiḥ || 49.12 ||

— बल के अभिमान से युक्त उन चारों राक्षसों से समीप बैठा हुआ, मानो संपूर्ण लोक चारों समुद्रों से घिरा हो,

श्लोक 13 (sundara.49.13)

मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैरन्यैश्च शुभदर्शिभिः। आश्वास्यमानं सचिवैः सुरैरिव सुरेश्वरम् ॥ 49.13 ॥

mantribhirmantratattvajñairanyaiśca śubhadarśibhiḥ| āśvāsyamānaṃ sacivaiḥ surairiva sureśvaram || 49.13 ||

— मंत्र के तत्त्व को जानने वाले तथा शुभ-दर्शी अन्य मंत्रियों द्वारा भी आश्वस्त किया जाता हुआ, जैसे देवराज इंद्र देवताओं द्वारा आश्वस्त किए जाते हैं,

श्लोक 14 (sundara.49.14)

अपश्यद् राक्षसपतिं हनूमानतितेजसम्। वेष्टितं मेरुशिखरे सतोयमिव तोयदम् ॥ 49.14 ॥

apaśyad rākṣasapatiṃ hanūmānatitejasam| veṣṭitaṃ meruśikhare satoyamiva toyadam || 49.14 ||

— हनुमान ने उस अत्यंत तेजस्वी राक्षसराज को इस प्रकार घिरा हुआ देखा, मानो मेरु पर्वत के शिखर पर जलपूर्ण मेघ छाया हो।

श्लोक 15 (sundara.49.15)

स तैः सम्पीड्यमानोऽपि रक्षोभिर्भीमविक्रमैः। विस्मयं परमं गत्वा रक्षोऽधिपमवैक्षत ॥ 49.15 ॥

sa taiḥ sampīḍyamāno'pi rakṣobhirbhīmavikramaiḥ| vismayaṃ paramaṃ gatvā rakṣo'dhipamavaikṣata || 49.15 ||

वह हनुमान, उन भीषण पराक्रमी राक्षसों द्वारा पीड़ित किए जाते हुए भी, परम विस्मय को प्राप्त होकर राक्षसराज को देखते रहे।

श्लोक 16 (sundara.49.16)

भ्राजमानं ततो दृष्ट्वा हनुमान् राक्षसेश्वरम्। मनसा चिन्तयामास तेजसा तस्य मोहितः ॥ 49.16 ॥

bhrājamānaṃ tato dṛṣṭvā hanumān rākṣaseśvaram| manasā cintayāmāsa tejasā tasya mohitaḥ || 49.16 ||

तब उस देदीप्यमान राक्षसेश्वर को देखकर, उसके तेज से मोहित हुए हनुमान मन ही मन विचार करने लगे —

श्लोक 17 (sundara.49.17)

अहो रूपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः। अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता ॥ 49.17 ॥

aho rūpamaho dhairyamaho sattvamaho dyutiḥ| aho rākṣasarājasya sarvalakṣaṇayuktatā || 49.17 ||

"अहो, कैसा रूप है! अहो, कैसा धैर्य है! अहो, कैसा सत्त्व है! अहो, कैसा तेज है! अहो, इस राक्षसराज में सभी शुभ लक्षणों का कैसा समावेश है!"

श्लोक 18 (sundara.49.18)

यद्यधर्मो न बलवान् स्यादयं राक्षसेश्वरः। स्यादयं सुरलोकस्य सशक्रस्यापि रक्षिता ॥ 49.18 ॥

yadyadharmo na balavān syādayaṃ rākṣaseśvaraḥ| syādayaṃ suralokasya saśakrasyāpi rakṣitā || 49.18 ||

"यदि इसमें अधर्म इतना प्रबल न होता, तो यह राक्षसराज इंद्र सहित संपूर्ण देवलोक का भी रक्षक बन सकता था।"

श्लोक 19 (sundara.49.19)

अस्य क्रूरैर्नृशंसैश्च कर्मभिर्लोककुत्सितैः। सर्वे बिभ्यति खल्वस्माल्लोकाः सामरदानवाः ॥ 49.19 ॥

asya krūrairnṛśaṃsaiśca karmabhirlokakutsitaiḥ| sarve bibhyati khalvasmāllokāḥ sāmaradānavāḥ || 49.19 ||

"इसके क्रूर, निर्दय तथा लोक-निंदित कर्मों के कारण ही संसार के सभी लोक — देवों और दानवों सहित — इससे भयभीत रहते हैं।"

श्लोक 20 (sundara.49.20)

अयं ह्युत्सहते क्रुद्धः कर्तुमेकार्णवं जगत्। इति चिन्तां बहुविधामकरोन्मतिमान् कपिः। दृष्ट्वा राक्षसराजस्य प्रभावममितौजसः ॥ 49.20 ॥

ayaṃ hyutsahate kruddhaḥ kartumekārṇavaṃ jagat| iti cintāṃ bahuvidhāmakaronmatimān kapiḥ| dṛṣṭvā rākṣasarājasya prabhāvamamitaujasaḥ || 49.20 ||

"यह क्रुद्ध होने पर संपूर्ण जगत को एक ही समुद्र बना डालने का साहस रखता है।" इस प्रकार अपार तेजस्वी राक्षसराज के प्रभाव को देखकर, वह बुद्धिमान वानर हनुमान नाना प्रकार से विचार करने लगे।

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