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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 54

लंका-दहन

सर्ग 53सर्ग-सूचीसर्ग 55

श्लोक 1 (sundara.54.1)

वीक्षमाणः ततो लन्काम् कपिः कृत मनो रथः । वर्धमान समुत्साहः कार्य शेषम् अचिन्तयत् ॥ 54.1 ॥

vīkṣamāṇaḥ tato lankām kapiḥ kṛta mano rathaḥ | vardhamāna samutsāhaḥ kārya śeṣam acintayat || 54.1 ||

तब लंका को निहारते हुए उस वानर ने, जिसका मनोरथ पूर्ण हो चुका था, बढ़ते उत्साह के साथ शेष कार्य के विषय में विचार किया।

श्लोक 2 (sundara.54.2)

किम् नु खल्व् अविशिष्टम् मे कर्तव्यम् इह साम्प्रतम् । यत् एषाम् रक्षसाम् भूयः सम्ताप जननम् भवेत् ॥ 54.2 ॥

kim nu khalv aviśiṣṭam me kartavyam iha sāmpratam | yat eṣām rakṣasām bhūyaḥ samtāpa jananam bhavet || 54.2 ||

"अब यहाँ मुझे और क्या करना शेष है, जिससे इन राक्षसों को और भी संताप पहुँचे?"

श्लोक 3 (sundara.54.3)

वनम् तावत् प्रमथितम् प्रकृष्टा राक्षसा हताः । बल एक देशः क्षपितः शेषम् दुर्ग विनाशनम् ॥ 54.3 ॥

vanam tāvat pramathitam prakṛṣṭā rākṣasā hatāḥ | bala eka deśaḥ kṣapitaḥ śeṣam durga vināśanam || 54.3 ||

"वन को तो मैंने रौंद डाला, श्रेष्ठ राक्षसों को मार डाला, सेना का एक भाग नष्ट कर दिया — केवल इस दुर्ग का विनाश शेष है।"

श्लोक 4 (sundara.54.4)

दुर्गे विनाशिते कर्म भवेत् सुख परिश्रमम् । अल्प यत्नेन कार्ये अस्मिन् मम स्यात् सफलः श्रमः ॥ 54.4 ॥

durge vināśite karma bhavet sukha pariśramam | alpa yatnena kārye asmin mama syāt saphalaḥ śramaḥ || 54.4 ||

"दुर्ग के नष्ट होने पर यह कार्य सुगम हो जाएगा; इस कार्य में थोड़े ही प्रयास से मेरा परिश्रम सफल होगा।"

श्लोक 5 (sundara.54.5)

यो हि अयम् मम लान्गूले दीप्यते हव्य वाहनः । अस्य सम्तर्पणम् न्याय्यम् कर्तुम् एभिः गृह उत्तमैः ॥ 54.5 ॥

yo hi ayam mama lāngūle dīpyate havya vāhanaḥ | asya samtarpaṇam nyāyyam kartum ebhiḥ gṛha uttamaiḥ || 54.5 ||

"मेरी पूँछ पर यह जो अग्नि प्रज्वलित हो रही है, इन उत्तम भवनों से इसे तृप्त करना ही उचित है।"

श्लोक 6 (sundara.54.6)

ततः प्रदीप्त लान्गूलः सविद्युत् इव तोयदः । भवन अग्रेषु लन्काया विचचार महाकपिः ॥ 54.6 ॥

tataḥ pradīpta lāngūlaḥ savidyut iva toyadaḥ | bhavana agreṣu lankāyā vicacāra mahākapiḥ || 54.6 ||

तब प्रज्वलित पूँछ वाले महाकपि हनुमान बिजली से युक्त मेघ के समान लंका के भवनों की चोटियों पर विचरण करने लगे।

श्लोक 7 (sundara.54.7)

गृहाद्गृहम् राक्षसानामुद्यानानि च वानरः । वीक्षमाणो ह्यसम्त्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः ॥ 54.7 ॥

gṛhādgṛham rākṣasānāmudyānāni ca vānaraḥ | vīkṣamāṇo hyasamtrastaḥ prāsādāṃśca cacāra saḥ || 54.7 ||

वह वानर निर्भय होकर राक्षसों के एक घर से दूसरे घर में, उनके उद्यानों और प्रासादों को देखते हुए विचरण करने लगा।

श्लोक 8 (sundara.54.8)

अवप्लुत्य महावेगः प्रहस्तस्य निवेशनम् । अग्निम् तत्र स निक्षिप्य श्वसनेन समो बली ॥ 54.8 ॥

avaplutya mahāvegaḥ prahastasya niveśanam | agnim tatra sa nikṣipya śvasanena samo balī || 54.8 ||

अत्यंत वेग से प्रहस्त के भवन पर कूदकर, वायु के समान बलवान् उस वीर ने वहाँ अग्नि फेंकी,

श्लोक 9 (sundara.54.9)

ततोऽन्यत्पुप्लुवे वेश्म महापार्श्वस्य वीर्यवान् । मुमोच हनुमान् अग्निम् काल अनल शिखा उपमम् ॥ 54.9 ॥

tato'nyatpupluve veśma mahāpārśvasya vīryavān | mumoca hanumān agnim kāla anala śikhā upamam || 54.9 ||

फिर वह पराक्रमी महापार्श्व के भवन पर कूद पड़ा; और वहाँ भी हनुमान ने प्रलयकालीन अग्नि-शिखा के समान आग छोड़ दी।

श्लोक 10 (sundara.54.10)

वज्रदंष्ट्र स्य च तदा पुप्लुवे स महाकपिः । शुकस्य च महातेजाः सारणस्य च धीमतः ॥ 54.10 ॥

vajradaṃṣṭra sya ca tadā pupluve sa mahākapiḥ | śukasya ca mahātejāḥ sāraṇasya ca dhīmataḥ || 54.10 ||

फिर वह महातेजस्वी महाकपि वज्रदंष्ट्र, शुक और बुद्धिमान् सारण के भवनों पर भी कूद पड़ा।

श्लोक 11 (sundara.54.11)

तथा चेन्द्रजितो वेश्म ददाह हरियूथपः । जम्बुमालेः सुमालेश्च ददाह भवनम् ततः ॥ 54.11 ॥

tathā cendrajito veśma dadāha hariyūthapaḥ | jambumāleḥ sumāleśca dadāha bhavanam tataḥ || 54.11 ||

उसी प्रकार उस वानरयूथपति ने इन्द्रजित का भवन जला दिया; फिर जम्बुमाली और सुमाली का भवन भी जला डाला,

श्लोक 12 (sundara.54.12)

रश्मिकेतोश्च भवनम् सूर्यशत्रोस्तथैव च । ह्रस्वकर्णस्य दंष्ट्रस्य रोमशस्य च रक्षसः ॥ 54.12 ॥

raśmiketośca bhavanam sūryaśatrostathaiva ca | hrasvakarṇasya daṃṣṭrasya romaśasya ca rakṣasaḥ || 54.12 ||

और रश्मिकेतु का भवन, तथा सूर्यशत्रु का, ह्रस्वकर्ण का, दंष्ट्र का, और राक्षस रोमश का भवन भी,

श्लोक 13 (sundara.54.13)

युद्धोन्मत्तस्य मत्तस्य ध्वजग्रीवस्य रक्षसः । विद्युज्जिह्वस्य घोरस्य तथा हस्तिमुखस्य च ॥ 54.13 ॥

yuddhonmattasya mattasya dhvajagrīvasya rakṣasaḥ | vidyujjihvasya ghorasya tathā hastimukhasya ca || 54.13 ||

और युद्धोन्मत्त, मत्त, राक्षस ध्वजग्रीव, भयंकर विद्युज्जिह्व, तथा हस्तिमुख का भी,

श्लोक 14 (sundara.54.14)

कराळस्य पिशाचस्य शोणिताक्षस्य चैव हि । कुम्भकर्णस्य भवनम् मकराक्षस्य चैव हि ॥ 54.14 ॥

karāḷasya piśācasya śoṇitākṣasya caiva hi | kumbhakarṇasya bhavanam makarākṣasya caiva hi || 54.14 ||

और पिशाच कराल का, तथा शोणिताक्ष का भी, कुम्भकर्ण का भवन, और मकराक्ष का भी,

श्लोक 15 (sundara.54.15)

यज्ञशत्रोश्च भवनम् ब्रह्मशत्रोस्तथैव च। नरान्तकस्य कुम्भस्य निकुम्भस्य दुरात्मनः ॥ 54.15 ॥

yajñaśatrośca bhavanam brahmaśatrostathaiva ca| narāntakasya kumbhasya nikumbhasya durātmanaḥ || 54.15 ||

यज्ञशत्रु का भवन, तथा ब्रह्मशत्रु का, नरान्तक, कुम्भ और दुरात्मा निकुम्भ का भवन भी —

श्लोक 16 (sundara.54.16)

वर्जयित्वा महातेजा विभीषणगृहम् प्रति । क्रममाणः क्रमेणैव ददाह हरिपुङ्गवः ॥ 54.16 ॥

varjayitvā mahātejā vibhīṣaṇagṛham prati | kramamāṇaḥ krameṇaiva dadāha haripuṅgavaḥ || 54.16 ||

केवल विभीषण के घर को छोड़कर, महातेजस्वी उस वानरश्रेष्ठ ने क्रमशः एक के बाद एक सभी को जला दिया।

श्लोक 17 (sundara.54.17)

तेषु तेषु महार्हेषु भवनेषु महायशाः । गृहेष्वृद्धिमतामृद्धिम् ददाह स महाकपिः ॥ 54.17 ॥

teṣu teṣu mahārheṣu bhavaneṣu mahāyaśāḥ | gṛheṣvṛddhimatāmṛddhim dadāha sa mahākapiḥ || 54.17 ||

उन-उन महामूल्य भवनों में, उस महायशस्वी महाकपि ने धनवानों की समृद्धि को भी भस्म कर दिया।

श्लोक 18 (sundara.54.18)

सर्वेषाम् समतिक्रम्य राक्षसेन्द्रस्य वीर्यवान् । आससादाथ लक्ष्मीवान् रावणस्य निवेशनम् ॥ 54.18 ॥

sarveṣām samatikramya rākṣasendrasya vīryavān | āsasādātha lakṣmīvān rāvaṇasya niveśanam || 54.18 ||

उन सबको लाँघकर, वह पराक्रमी और तेजस्वी हनुमान अंततः राक्षसराज रावण के निवास पर जा पहुँचा।

श्लोक 19 (sundara.54.19)

ततस्तस्मिन् गृहे मुख्ये नानारत्नविभूषिते । मेरुमन्दरसंकाशे सर्वमङ्गळशोभिते ॥ 54.19 ॥

tatastasmin gṛhe mukhye nānāratnavibhūṣite | merumandarasaṃkāśe sarvamaṅgaḷaśobhite || 54.19 ||

तब नाना रत्नों से सुशोभित, मेरु-मंदर पर्वतों के समान, और सभी मंगल चिह्नों से युक्त उस प्रधान भवन पर,

श्लोक 20 (sundara.54.20)

प्रदीप्तमग्निमुत्सृज्य लाङ्गूलाग्रे प्रतिष्ठितम् । ननाद हनुमान् वीरो युगान्तजलदो यथा ॥ 54.20 ॥

pradīptamagnimutsṛjya lāṅgūlāgre pratiṣṭhitam | nanāda hanumān vīro yugāntajalado yathā || 54.20 ||

अपनी पूँछ के अग्रभाग पर स्थित प्रज्वलित अग्नि को फेंककर, वीर हनुमान प्रलयकाल के मेघ के समान गरज उठे।

श्लोक 21 (sundara.54.21)

श्वसनेन च सम्योगात् अतिवेगो महाबलः । काल अग्निः इव जज्वाल प्रावर्धत हुत अशनः ॥ 54.21 ॥

śvasanena ca samyogāt ativego mahābalaḥ | kāla agniḥ iva jajvāla prāvardhata huta aśanaḥ || 54.21 ||

वायु के संयोग से अत्यंत वेगवान् और महाबली हुई वह अग्नि प्रलयाग्नि के समान धधकने और बढ़ने लगी।

श्लोक 22 (sundara.54.22)

प्रदीप्तम् अग्निम् पवनः तेषु वेश्मसु चारयत् । अभूच्छ्वसनसम्योगादतिवेगो हुताशनः ॥ 54.22 ॥

pradīptam agnim pavanaḥ teṣu veśmasu cārayat | abhūcchvasanasamyogādativego hutāśanaḥ || 54.22 ||

वायु ने उस प्रज्वलित अग्नि को उन भवनों पर फैला दिया; और वायु के संयोग से वह अग्नि अत्यंत वेगवान् हो गई।

श्लोक 23 (sundara.54.23)

तानि कान्चन जालानि मुक्ता मणिमयानि च । भवनानि अवशीर्यन्त रत्नवन्ति महान्ति च ॥ 54.23 ॥

tāni kāncana jālāni muktā maṇimayāni ca | bhavanāni avaśīryanta ratnavanti mahānti ca || 54.23 ||

सोने की जालियों वाले, मोतियों और मणियों से जड़े, रत्नों से भरे वे विशाल भवन ढहकर बिखर गए।

श्लोक 24 (sundara.54.24)

सम्जज्ञे तुमुलः शब्दो राक्षसानाम् प्रधावताम् । स्वग्ऱिहस्य परित्राणे भग्नोत्साहोर्जिअश्रियाम् ॥ 54.24 ॥

samjajñe tumulaḥ śabdo rākṣasānām pradhāvatām | svagऱिhasya paritrāṇe bhagnotsāhorjiaśriyām || 54.24 ||

अपने घरों की रक्षा में इधर-उधर दौड़ते, उत्साह और शोभा से रहित हो चुके राक्षसों से एक तुमुल कोलाहल उठने लगा —

श्लोक 25 (sundara.54.25)

नूनेमेषाऽग्निरायातः कपिरूपेण हा इति । क्रन्दन्त्यः सहसा पेतुः स्तनंधयधराः स्त्रियः ॥ 54.25 ॥

nūnemeṣā'gnirāyātaḥ kapirūpeṇa hā iti | krandantyaḥ sahasā petuḥ stanaṃdhayadharāḥ striyaḥ || 54.25 ||

"निश्चय ही यह वानर के रूप में स्वयं अग्निदेव ही आए हैं!" — यह कहते हुए, स्तन से लगे शिशुओं को लिए स्त्रियाँ विलाप करती हुई अचानक गिर पड़ीं,

श्लोक 26 (sundara.54.26)

काश्चिरग्निपरीतेभ्यो हर्म्येभ्यो मुक्तमूर्धजाः । पतन्त्यो रेजिरेऽभ्रेभ्यः सौदामिन्य इवाम्बरात् ॥ 54.26 ॥

kāściragniparītebhyo harmyebhyo muktamūrdhajāḥ | patantyo rejire'bhrebhyaḥ saudāminya ivāmbarāt || 54.26 ||

बिखरे केशों वाली वे कुछ स्त्रियाँ अग्नि से घिरे भवनों से गिरती हुईं, आकाश से टूटती हुई बिजलियों के समान चमक रही थीं।

श्लोक 27 (sundara.54.27)

वज्र विद्रुम वैदूर्य मुक्ता रजत सम्हितान् । विचित्रान् भवनात् धातून् स्यन्दमानान् ददर्श सः ॥ 54.27 ॥

vajra vidruma vaidūrya muktā rajata samhitān | vicitrān bhavanāt dhātūn syandamānān dadarśa saḥ || 54.27 ||

उसने उन विचित्र भवनों से हीरे, मूँगे, वैदूर्य, मोती और चाँदी से मिश्रित पिघली हुई धातुओं को बहते हुए देखा।

श्लोक 28 (sundara.54.28)

न अग्निः तृप्यति काष्ठानाम् तृणानाम् च यथा तथा । हनूमान् राक्षस इन्द्राणाम् वधे किंचिन् न तृप्यति ॥ 54.28 ॥

na agniḥ tṛpyati kāṣṭhānām tṛṇānām ca yathā tathā | hanūmān rākṣasa indrāṇām vadhe kiṃcin na tṛpyati || 54.28 ||

जैसे लकड़ी और तिनकों से अग्नि कभी तृप्त नहीं होती, वैसे ही राक्षसश्रेष्ठों के वध में हनुमान भी तनिक भी तृप्त नहीं हुए;

श्लोक 29 (sundara.54.29)

न हनूमद्विशस्तानाम् राक्षसानाम् वसुन्धरा । क्वचित्किंशुकसम्काशाः क्वचिच्छाल्मलिसन्निभाः ॥ 54.29 ॥

na hanūmadviśastānām rākṣasānām vasundharā | kvacitkiṃśukasamkāśāḥ kvacicchālmalisannibhāḥ || 54.29 ||

और हनुमान द्वारा मारे गए राक्षसों को धारण करने में पृथ्वी भी नहीं थकी। कहीं वे ज्वालाएँ किंशुक के फूलों के समान दिखतीं, कहीं शाल्मली के,

श्लोक 30 (sundara.54.30)

क्वचित्कुङ्कुमसम्काशाः शिखा वह्नेश्चकाशिरे । हनूमता वेगवता वानरेण महात्मना । लङ्कापुरम् प्रदग्धम् तद्रुद्रेण त्रिपुरम् यथा ॥ 54.30 ॥

kvacitkuṅkumasamkāśāḥ śikhā vahneścakāśire | hanūmatā vegavatā vānareṇa mahātmanā | laṅkāpuram pradagdham tadrudreṇa tripuram yathā || 54.30 ||

और कहीं वे अग्नि-शिखाएँ केसर के समान चमक रही थीं। इस प्रकार वेगवान् और महात्मा वानर हनुमान द्वारा लंकापुरी उसी प्रकार जला दी गई, जैसे रुद्र ने त्रिपुर को जलाया था।

श्लोक 31 (sundara.54.31)

ततस्तु लङ्कापुरपर्वताग्रे । स्मुत्थितो भीमपराक्रमोऽग्निः । प्रसार्य चूडावलयम् प्रदीप्तो । हनूमता वेगवता विसृष्टः ॥ 54.31 ॥

tatastu laṅkāpuraparvatāgre | smutthito bhīmaparākramo'gniḥ | prasārya cūḍāvalayam pradīpto | hanūmatā vegavatā visṛṣṭaḥ || 54.31 ||

तब वेगवान् हनुमान द्वारा छोड़ी गई वह भयंकर पराक्रम वाली अग्नि, ज्वालाओं का घेरा फैलाते हुए, लंकापुरी के पर्वत-शिखर पर उठ खड़ी हुई।

श्लोक 32 (sundara.54.32)

युगान्तकालानलतुल्यवेगः । समारुतोऽग्निर्ववृधे दिवस्पृक् । विधूमरश्मिर्भवनेषु सक्तो । रक्षः शरीराज्यसमर्पितार्चिः ॥ 54.32 ॥

yugāntakālānalatulyavegaḥ | samāruto'gnirvavṛdhe divaspṛk | vidhūmaraśmirbhavaneṣu sakto | rakṣaḥ śarīrājyasamarpitārciḥ || 54.32 ||

वायु के साथ मिलकर, प्रलयकालीन अग्नि के समान वेग वाली वह अग्नि आकाश तक जा पहुँची — धुआँरहित प्रकाश वाली, भवनों में जा चिपकी, मानो राक्षसों के शरीर ही उसकी ज्वाला के लिए घी बन गए हों।

श्लोक 33 (sundara.54.33)

आदित्यकोटीसदृशः सुतेजा । लङ्काम् समस्ताम् परिवार्य तिष्ठन् । शब्दैरनेकैरशनिप्ररूडै । र्भिन्दन्निवाण्डम् प्रबभौ महाग्निः ॥ 54.33 ॥

ādityakoṭīsadṛśaḥ sutejā | laṅkām samastām parivārya tiṣṭhan | śabdairanekairaśaniprarūḍai | rbhindannivāṇḍam prababhau mahāgniḥ || 54.33 ||

करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी वह महान् अग्नि संपूर्ण लंका को घेरकर खड़ी हो गई, मानो अनेक वज्रपातों की ध्वनियों से ब्रह्मांड को ही विदीर्ण कर रही हो।

श्लोक 34 (sundara.54.34)

तत्राम्बरादग्निरतिप्रवृद्धो । रूक्षप्रभः किंशुकपुष्पचूडाः । निर्वाणधूमाकुलराजयश्च । नीलोत्पलाभाः प्रचकाशिरेऽभ्राः ॥ 54.34 ॥

tatrāmbarādagniratipravṛddho | rūkṣaprabhaḥ kiṃśukapuṣpacūḍāḥ | nirvāṇadhūmākularājayaśca | nīlotpalābhāḥ pracakāśire'bhrāḥ || 54.34 ||

वहाँ आकाश तक बढ़ी हुई वह कठोर प्रभा वाली अग्नि किंशुक के फूलों जैसी शिखाओं वाली थी; और बुझती हुई अग्नि के धुएँ से आवृत बादल नीले कमल के समान चमकने लगे।

श्लोक 35 (sundara.54.35)

वज्री महेन्द्रस्त्रिदशेश्वरो वा । साक्षाद्यमो वा वरुणोऽनिलो वा । रुद्रोग्निरर्को धनदश्च सोमो । न वानरोऽयम् स्वयमेव कालः ॥ 54.35 ॥

vajrī mahendrastridaśeśvaro vā | sākṣādyamo vā varuṇo'nilo vā | rudrognirarko dhanadaśca somo | na vānaro'yam svayameva kālaḥ || 54.35 ||

"यह वानर नहीं है! यह अवश्य ही वज्रधारी त्रिदशेश्वर इन्द्र है, अथवा साक्षात् यम, वरुण या वायु, अथवा रुद्र, अग्नि, सूर्य, कुबेर या चन्द्रमा — अथवा स्वयं काल ही है।"

श्लोक 36 (sundara.54.36)

किम् ब्रह्मण सर्वपितामहस्य । सर्वस्य धातुश्चतुराननस्य । इहागतो वानररूपधारी । रक्षोपसम्हारकरः प्रतापः ॥ 54.36 ॥

kim brahmaṇa sarvapitāmahasya | sarvasya dhātuścaturānanasya | ihāgato vānararūpadhārī | rakṣopasamhārakaraḥ pratāpaḥ || 54.36 ||

"अथवा क्या यह स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा का ही तेज है, जो सबके पितामह और सबके रचयिता होकर, राक्षसों के संहार के लिए यहाँ वानर-रूप धारण कर आए हैं?"

श्लोक 37 (sundara.54.37)

किम् वैष्णवम् वा कपिरूपमेत्य । रक्षोविनाशाय परम् सुतेजः । अनन्तमव्यक्तमचिन्त्यमेकम् । स्वमायया साम्प्रतमागतम् वा ॥ 54.37 ॥

kim vaiṣṇavam vā kapirūpametya | rakṣovināśāya param sutejaḥ | anantamavyaktamacintyamekam | svamāyayā sāmpratamāgatam vā || 54.37 ||

"अथवा क्या यह विष्णु की वह अनंत, अव्यक्त, अचिंत्य और एकमेव परम तेजस्विनी शक्ति ही है, जो अपनी माया से राक्षसों के विनाश हेतु वानर-रूप में अब आई है?"

श्लोक 38 (sundara.54.38)

इत्येवमूचुर्बहवो विशिष्टा । रक्षोगणास्तत्र समेत्य सर्वे । सप्राणिसम्घां सगृहाम् सवृक्षाम् । दग्धाम् पुरीम् ताम् सहसा समीक्ष्य ॥ 54.38 ॥

ityevamūcurbahavo viśiṣṭā | rakṣogaṇāstatra sametya sarve | saprāṇisamghāṃ sagṛhām savṛkṣām | dagdhām purīm tām sahasā samīkṣya || 54.38 ||

वहाँ एकत्र हुए अनेक श्रेष्ठ राक्षस-समूह, अपने प्राणियों, घरों और वृक्षों सहित उस नगरी को इस प्रकार अचानक जली हुई देखकर, इस प्रकार कहने लगे।

श्लोक 39 (sundara.54.39)

ततस्तु लङ्का सहसा प्रदग्धा । सराक्षसा साश्वरथा सनागा । सपक्षिसम्घा समृगा सवृक्षा । रुरोद दीना तुमुलम् सशब्दम् ॥ 54.39 ॥

tatastu laṅkā sahasā pradagdhā | sarākṣasā sāśvarathā sanāgā | sapakṣisamghā samṛgā savṛkṣā | ruroda dīnā tumulam saśabdam || 54.39 ||

तब अपने राक्षसों, अश्व-रथों, हाथियों, पक्षी-समूहों, पशुओं और वृक्षों सहित अचानक जली हुई वह दीन लंका तुमुल स्वर में विलाप करने लगी।

श्लोक 40 (sundara.54.40)

हा तात हा पुत्रक कान्त मित्र । हा जीवितम् भोगयुतम् सुपुण्यम् । रक्षोभिरेवम् बहुधा ब्रुवद्भिः । शब्दः कृतो घोररवः सुभीमः ॥ 54.40 ॥

hā tāta hā putraka kānta mitra | hā jīvitam bhogayutam supuṇyam | rakṣobhirevam bahudhā bruvadbhiḥ | śabdaḥ kṛto ghoraravaḥ subhīmaḥ || 54.40 ||

"हाय पिता! हाय पुत्र! हाय प्रियतम! हाय मित्र! हाय भोगों से भरा यह पुण्यमय जीवन!" — इस प्रकार अनेक ढंग से पुकारते राक्षसों का वह घोर और अत्यंत भयंकर स्वर उठने लगा।

श्लोक 41 (sundara.54.41)

हुताशनज्वालसमावृता सा । हतप्रवीरा परिवृत्तयोधा । हनूमतः क्रोधबलाभिभूता । बभूव शापोपहतेअ लङ्का ॥ 54.41 ॥

hutāśanajvālasamāvṛtā sā | hatapravīrā parivṛttayodhā | hanūmataḥ krodhabalābhibhūtā | babhūva śāpopahatea laṅkā || 54.41 ||

अग्नि की ज्वालाओं से आवृत, अपने श्रेष्ठ वीरों के मारे जाने पर, अपने योद्धाओं के पीछे हट जाने पर, हनुमान के क्रोधबल से अभिभूत वह लंका मानो शाप से ग्रस्त हो उठी।

श्लोक 42 (sundara.54.42)

स सम्भ्रामत्रस्तविषण्णराक्षसां । समुज्ज्वलज्ज्वालहुताशनाङ्किताम् । ददर्श लङ्काम् हनुमान् महामानाः । स्वयम्भूकोपोपहतामिवावनिम् ॥ 54.42 ॥

sa sambhrāmatrastaviṣaṇṇarākṣasāṃ | samujjvalajjvālahutāśanāṅkitām | dadarśa laṅkām hanumān mahāmānāḥ | svayambhūkopopahatāmivāvanim || 54.42 ||

महामना हनुमान ने भयभीत, व्याकुल और विषण्ण राक्षसों वाली, प्रज्वलित ज्वालाओं से चिह्नित उस लंका को इस प्रकार देखा, मानो वह स्वयं ब्रह्मा के क्रोध से पीड़ित पृथ्वी ही हो।

श्लोक 43 (sundara.54.43)

भम्क्त्वा वनम् पादपरत्नसम्कुलम् । हत्वा तु रक्षांसि महान्ति सम्युगे । दग्ध्वा पुरीम् ताम् गृहरत्नमालिनीम् । तस्थौ हनूमान् पवनात्मजः कपिः ॥ 54.43 ॥

bhamktvā vanam pādaparatnasamkulam | hatvā tu rakṣāṃsi mahānti samyuge | dagdhvā purīm tām gṛharatnamālinīm | tasthau hanūmān pavanātmajaḥ kapiḥ || 54.43 ||

श्रेष्ठ वृक्षों से भरे उस वन को उजाड़कर, युद्ध में बड़े-बड़े राक्षसों को मारकर, और रत्नमय भवनों वाली उस नगरी को जलाकर, पवनपुत्र वानर हनुमान निश्चिंत होकर खड़े हो गए।

श्लोक 44 (sundara.54.44)

त्रिकूटशृङ्गाग्रतले विचित्रे । प्रतिष्ठितो वानरराजसिम्हः । प्रदीप्तलाङ्गूलकृतार्चिमाली । व्यराजतादित्य इवांशुमाली ॥ 54.44 ॥

trikūṭaśṛṅgāgratale vicitre | pratiṣṭhito vānararājasimhaḥ | pradīptalāṅgūlakṛtārcimālī | vyarājatāditya ivāṃśumālī || 54.44 ||

त्रिकूट पर्वत के विचित्र और समतल शिखर पर खड़े हुए वानरराज-सिंह हनुमान, अपनी जलती पूँछ की ज्वालाओं की माला से युक्त होकर, किरणों की माला धारण करने वाले सूर्य के समान सुशोभित हो रहे थे।

श्लोक 45 (sundara.54.45)

स राक्षसांस्तान् सुबहूंश्च हत्वा । वनम् च भम्क्त्वा बहूपादपम् तत् । विसृज्य रक्षोभवनेषु चाग्निम् । जगाम रामम् मनसा महात्मा ॥ 54.45 ॥

sa rākṣasāṃstān subahūṃśca hatvā | vanam ca bhamktvā bahūpādapam tat | visṛjya rakṣobhavaneṣu cāgnim | jagāma rāmam manasā mahātmā || 54.45 ||

उन अनेक राक्षसों को मारकर, बहुवृक्ष वाले उस वन को उजाड़कर, और राक्षसों के भवनों में अग्नि फेंककर, वह महात्मा मन ही मन राम की ओर चल पड़े।

श्लोक 46 (sundara.54.46)

ततस्तु तम् वानवीरमुख्यम् । महाबलम् मारुततुल्यवेगम् । महामतिम् वायुसुतम् वरिष्ठम् । प्रतुष्टवुर्देवगणाश्च सर्वे ॥ 54.46 ॥

tatastu tam vānavīramukhyam | mahābalam mārutatulyavegam | mahāmatim vāyusutam variṣṭham | pratuṣṭavurdevagaṇāśca sarve || 54.46 ||

तब देवताओं के समस्त समूहों ने उस वानरवीरों में श्रेष्ठ, महाबली, वायु के समान वेगवान्, महाबुद्धिमान् और वायुपुत्रों में सर्वश्रेष्ठ हनुमान की स्तुति की।

श्लोक 47 (sundara.54.47)

भम्क्त्वा वनम् महातेजा हत्वा रक्षांसि सम्युगे । दग्ध्वा लङ्कापुरीम् रम्याम् रराज स महाकपिः ॥ 54.47 ॥

bhamktvā vanam mahātejā hatvā rakṣāṃsi samyuge | dagdhvā laṅkāpurīm ramyām rarāja sa mahākapiḥ || 54.47 ||

वन को उजाड़कर, युद्ध में राक्षसों को मारकर, और रमणीय लंकापुरी को जलाकर, वह महातेजस्वी महाकपि अत्यंत शोभायमान हुए।

श्लोक 48 (sundara.54.48)

तत्र देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्ष्यः । दृष्ट्वा लङ्काम् प्रद्ग्धाम् ताम् विस्मयम् परमम् गताः ॥ 54.48 ॥

tatra devāḥ sagandharvāḥ siddhāśca paramarṣyaḥ | dṛṣṭvā laṅkām pradgdhām tām vismayam paramam gatāḥ || 54.48 ||

वहाँ गंधर्वों सहित देवताओं और परम ऋषियों सहित सिद्धों ने उस जली हुई लंका को देखकर परम आश्चर्य का अनुभव किया।

श्लोक 49 (sundara.54.49)

तम् दृष्ट्वा वानरश्रेष्ठम् हनुमन्तम् महाकपिम् । कालाग्निरिति संचिन्त्य सर्वभूतानि तत्रसुः ॥ 54.49 ॥

tam dṛṣṭvā vānaraśreṣṭham hanumantam mahākapim | kālāgniriti saṃcintya sarvabhūtāni tatrasuḥ || 54.49 ||

वानरश्रेष्ठ उस महाकपि हनुमान को देखकर, उसे प्रलयाग्नि समझकर समस्त प्राणी भयभीत हो उठे।

श्लोक 50 (sundara.54.50)

देवाश्च सर्वे मुनिपुङ्गवाश्च । गन्धर्वविद्याधरनागयक्षाः । भूतानि सर्वाणि महान्ति तत्र । जग्मुः पराम् प्रीतिमतुल्यरूपाम् ॥ 54.50 ॥

devāśca sarve munipuṅgavāśca | gandharvavidyādharanāgayakṣāḥ | bhūtāni sarvāṇi mahānti tatra | jagmuḥ parām prītimatulyarūpām || 54.50 ||

वहाँ समस्त देवता, श्रेष्ठ मुनिजन, गंधर्व, विद्याधर, नाग और यक्ष, तथा समस्त महान् प्राणी अत्यंत अनुपम आनंद को प्राप्त हुए।

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