सुन्दरकाण्ड · सर्ग 53
हनुमान की पूँछ का दहन
श्लोक 1 (sundara.53.1)
तस्य तत् वचनम् श्रुत्वा दशग्रीवो महाबलः । देश काल हितम् वाक्यम् भ्रातुः उत्तमम् अब्रवीत् ॥ 53.1 ॥
tasya tat vacanam śrutvā daśagrīvo mahābalaḥ | deśa kāla hitam vākyam bhrātuḥ uttamam abravīt || 53.1 ||
उसके वे वचन सुनकर, महाबली दशग्रीव रावण ने अपने भाई से देश और काल के अनुकूल उत्तम वचन कहा।
श्लोक 2 (sundara.53.2)
सम्यग् उक्तम् हि भवता दूत वध्या विगर्हिता । अवश्यम् तु वधात् अन्यः क्रियताम् अस्य निग्रहः ॥ 53.2 ॥
samyag uktam hi bhavatā dūta vadhyā vigarhitā | avaśyam tu vadhāt anyaḥ kriyatām asya nigrahaḥ || 53.2 ||
"तुमने अच्छा ही कहा है कि दूत का वध निंदनीय है; परंतु वध के अतिरिक्त इसे अवश्य ही कोई दूसरा दंड दिया जाए।"
श्लोक 3 (sundara.53.3)
कपीनाम् किल लान्गूलम् इष्टम् भवति भूषणम् । तत् अस्य दीप्यताम् शीघ्रम् तेन दग्धेन गच्छतु ॥ 53.3 ॥
kapīnām kila lāngūlam iṣṭam bhavati bhūṣaṇam | tat asya dīpyatām śīghram tena dagdhena gacchatu || 53.3 ||
"कहते हैं कि वानरों को पूँछ अत्यंत प्रिय आभूषण होती है; अतः इसकी पूँछ शीघ्र जला दी जाए, और यह जली हुई पूँछ लेकर ही यहाँ से जाए।"
श्लोक 4 (sundara.53.4)
ततः पश्यन्तु इमम् दीनम् अन्ग वैरूप्य कर्शितम् । समित्रा ज्ञातयः सर्वे बान्धवाः ससुहृज् जनाः ॥ 53.4 ॥
tataḥ paśyantu imam dīnam anga vairūpya karśitam | samitrā jñātayaḥ sarve bāndhavāḥ sasuhṛj janāḥ || 53.4 ||
"फिर इसके मित्रों, ज्ञातियों, समस्त बंधुओं और सुहृदों सहित सब लोग इसे विकृत अंगों वाला, दीन और क्षीण देखें।"
श्लोक 5 (sundara.53.5)
आज्ञापयत् राक्षस इन्द्रः पुरम् सर्वम् सचत्वरम् । लान्गूलेन प्रदीप्तेन रक्षोभिः परिणीयताम् ॥ 53.5 ॥
ājñāpayat rākṣasa indraḥ puram sarvam sacatvaram | lāngūlena pradīptena rakṣobhiḥ pariṇīyatām || 53.5 ||
राक्षसेन्द्र रावण ने आज्ञा दी: "जलती हुई पूँछ के साथ राक्षसों द्वारा इसे चौराहों सहित समस्त नगर में घुमाया जाए।"
श्लोक 6 (sundara.53.6)
तस्य तत् वचनम् श्रुत्वा राक्षसाः कोप कर्कशाः । वेष्टन्ते तस्य लान्गूलम् जीर्णैः कार्पासिकैः पटैः ॥ 53.6 ॥
tasya tat vacanam śrutvā rākṣasāḥ kopa karkaśāḥ | veṣṭante tasya lāngūlam jīrṇaiḥ kārpāsikaiḥ paṭaiḥ || 53.6 ||
उसके वे वचन सुनकर, क्रोध से कठोर हुए राक्षसों ने उसकी पूँछ में पुराने सूती चिथड़े लपेट दिए।
श्लोक 7 (sundara.53.7)
सम्वेष्ट्यमाने लान्गूले व्यवर्धत महाकपिः । शुष्कम् इन्धनम् आसाद्य वनेष्व् इव हुत अशनः ॥ 53.7 ॥
samveṣṭyamāne lāngūle vyavardhata mahākapiḥ | śuṣkam indhanam āsādya vaneṣv iva huta aśanaḥ || 53.7 ||
पूँछ के लिपटते ही महाकपि हनुमान का शरीर बढ़ने लगा, जैसे वन में सूखी लकड़ी पाकर अग्नि बढ़ जाती है।
श्लोक 8 (sundara.53.8)
तैलेन परिषिच्य अथ ते अग्निम् तत्र अवपातयन् । लान्गूलेन प्रदीप्तेन राक्षसान् तान् अपातयत् ॥ 53.8 ॥
tailena pariṣicya atha te agnim tatra avapātayan | lāngūlena pradīptena rākṣasān tān apātayat || 53.8 ||
फिर तेल से सींचकर उन्होंने उस पर अग्नि प्रज्वलित कर दी; और अपनी जलती पूँछ से हनुमान ने उन राक्षसों को गिरा दिया।
श्लोक 9 (sundara.53.9)
रोष अमर्ष परीत आत्मा बाल सूर्य सम आननः । लाङ्गूलम् सम्प्रदीप्तम् तु द्रष्टुम् तस्य हनूमतः ॥ 53.9 ॥
roṣa amarṣa parīta ātmā bāla sūrya sama ānanaḥ | lāṅgūlam sampradīptam tu draṣṭum tasya hanūmataḥ || 53.9 ||
क्रोध और असहनशीलता से भरे, उदीयमान सूर्य के समान मुख वाले हनुमान की उस प्रज्वलित पूँछ को देखने के लिए,
श्लोक 10 (sundara.53.10)
सहस्त्रीबालवृद्धाश्च जग्मुः प्रीता निशाचराः । स भूयः सम्गतैः क्रूरै राकसैः हरि सत्तमः ॥ 53.10 ॥
sahastrībālavṛddhāśca jagmuḥ prītā niśācarāḥ | sa bhūyaḥ samgataiḥ krūrai rākasaiḥ hari sattamaḥ || 53.10 ||
स्त्रियों, बालकों और वृद्धों सहित प्रसन्न निशाचर वहाँ चले आए; और वह वानरश्रेष्ठ हनुमान क्रूर राक्षसों द्वारा पुनः घेर लिया गया।
श्लोक 11 (sundara.53.11)
निबद्धः कृतवान् वीरः तत् काल सदृशीम् मतिम् । कामम् खलु न मे शक्ता निबधस्य अपि राक्षसाः ॥ 53.11 ॥
nibaddhaḥ kṛtavān vīraḥ tat kāla sadṛśīm matim | kāmam khalu na me śaktā nibadhasya api rākṣasāḥ || 53.11 ||
बाँधे जाने पर उस वीर ने उस क्षण के अनुकूल यह विचार किया: "बंधन में पड़ा होने पर भी ये राक्षस वास्तव में मुझ पर बलपूर्वक कुछ नहीं कर सकते;"
श्लोक 12 (sundara.53.12)
चित्त्वा पाशान् समुत्पत्य हन्याम् अहम् इमान् पुनः । यदिभर्तुर्हतार्थाय चरन्तम् भर्तृशासनात् ॥ 53.12 ॥
cittvā pāśān samutpatya hanyām aham imān punaḥ | yadibharturhatārthāya carantam bhartṛśāsanāt || 53.12 ||
"मैं इन बंधनों को तोड़कर उछल पड़ूँ और इन्हें फिर से मार डालूँ। यदि ये दुरात्मा अपने स्वामी की आज्ञा से, स्वामी के हित में विचरते मुझे बाँधते हैं,"
श्लोक 13 (sundara.53.13)
बध्नन्त्येते दुरात्मनो न तु मे निष्कृतिः कृता । सर्वेषाम् एव पर्याप्तो राक्षसानाम् अहम् युधि ॥ 53.13 ॥
badhnantyete durātmano na tu me niṣkṛtiḥ kṛtā | sarveṣām eva paryāpto rākṣasānām aham yudhi || 53.13 ||
"तो इसमें मेरा कोई अपमान नहीं हुआ। युद्ध में मैं अकेला ही समस्त राक्षसों के लिए पर्याप्त हूँ;"
श्लोक 14 (sundara.53.14)
किम् तु रामस्य प्रीति अर्थम् विषहिष्ये अहम् ईदृशम् । लन्का चरयितव्या मे पुनः एव भवेत् इति ॥ 53.14 ॥
kim tu rāmasya prīti artham viṣahiṣye aham īdṛśam | lankā carayitavyā me punaḥ eva bhavet iti || 53.14 ||
"किंतु राम की प्रसन्नता के लिए मैं इसे सह लूँगा — जिससे यह लंका पुनः मेरे द्वारा भली-भाँति देख ली जाए।"
श्लोक 15 (sundara.53.15)
रात्रौ न हि सुदृष्टा मे दुर्ग कर्म विधानतः । अवश्यम् एव द्रष्टव्या मया लन्का निशा क्षये ॥ 53.15 ॥
rātrau na hi sudṛṣṭā me durga karma vidhānataḥ | avaśyam eva draṣṭavyā mayā lankā niśā kṣaye || 53.15 ||
"रात्रि में दुर्ग की संरचना मुझे भली-भाँति नहीं दिखी थी; अतः रात्रि के अंत में मुझे यह लंका अवश्य ही (दिन के प्रकाश में) देखनी है।"
श्लोक 16 (sundara.53.16)
कामम् बन्धैः च मे भूयः पुच्छस्य उद्दीपनेन च । पीडाम् कुर्वन्तु रक्षांसि न मे अस्ति मनसः श्रमः ॥ 53.16 ॥
kāmam bandhaiḥ ca me bhūyaḥ pucchasya uddīpanena ca | pīḍām kurvantu rakṣāṃsi na me asti manasaḥ śramaḥ || 53.16 ||
"राक्षस चाहें तो मुझे फिर से बाँधें और मेरी पूँछ जलाकर मुझे कष्ट पहुँचाएँ — मेरे मन को इससे कोई श्रम नहीं है।"
श्लोक 17 (sundara.53.17)
ततः ते सम्वृत आकारम् सत्त्ववन्तम् महाकपिम् । परिगृह्य ययुः हृष्टा राक्षसाः कपि कुन्जरम् ॥ 53.17 ॥
tataḥ te samvṛta ākāram sattvavantam mahākapim | parigṛhya yayuḥ hṛṣṭā rākṣasāḥ kapi kunjaram || 53.17 ||
तब वे प्रसन्न राक्षस उस बलवान् महाकपि को, जिसने अपने भावों को पूर्णतः छिपा रखा था, पकड़कर ले चले।
श्लोक 18 (sundara.53.18)
शन्ख भेरी निनादैः तैः घोषयन्तः स्व कर्मभिः । राक्षसाः क्रूर कर्माणः चारयन्ति स्म ताम् पुरीम् ॥ 53.18 ॥
śankha bherī ninādaiḥ taiḥ ghoṣayantaḥ sva karmabhiḥ | rākṣasāḥ krūra karmāṇaḥ cārayanti sma tām purīm || 53.18 ||
शंख और भेरी के नाद से उसके कर्मों की घोषणा करते हुए, वे क्रूरकर्मा राक्षस उसे उस नगरी में घुमाने लगे।
श्लोक 19 (sundara.53.19)
अन्वीयमानो रक्षोभिर्ययौ सुखमरिंदमः । हनुमान् चारयामास राक्षसानाम् महापुरीम् ॥ 53.19 ॥
anvīyamāno rakṣobhiryayau sukhamariṃdamaḥ | hanumān cārayāmāsa rākṣasānām mahāpurīm || 53.19 ||
राक्षसों से घिरे हुए, शत्रुदमन हनुमान सुखपूर्वक चलते हुए राक्षसों की उस महानगरी में घुमाए गए।
श्लोक 20 (sundara.53.20)
अथ अपश्यत् विमानानि विचित्राणि महाकपिः । सम्वृतान् भूमि भागान् च सुविभक्तान् च चत्वरान् ॥ 53.20 ॥
atha apaśyat vimānāni vicitrāṇi mahākapiḥ | samvṛtān bhūmi bhāgān ca suvibhaktān ca catvarān || 53.20 ||
तब महाकपि हनुमान ने विचित्र विमानों, घिरे हुए भूखंडों और सुव्यवस्थित चौराहों को देखा,
श्लोक 21 (sundara.53.21)
वीथीश्च गृहसम्बाधाः कपिः शृङ्गटकानि च । तथा रथ्योपरथ्याश्च तथैव गृहकान्तरान् ॥ 53.21 ॥
vīthīśca gṛhasambādhāḥ kapiḥ śṛṅgaṭakāni ca | tathā rathyoparathyāśca tathaiva gṛhakāntarān || 53.21 ||
घरों से भरी गलियों, चौराहों, राजमार्गों और उपमार्गों को, तथा भवनों के भीतरी आँगनों को भी,
श्लोक 22 (sundara.53.22)
गृहांश्च मेघसम्काशान् ददर्श पवनात्मजः । चत्वरेषु चतुष्केषु राज मार्गे तथैव च ॥ 53.22 ॥
gṛhāṃśca meghasamkāśān dadarśa pavanātmajaḥ | catvareṣu catuṣkeṣu rāja mārge tathaiva ca || 53.22 ||
और मेघों के समान दिखने वाले भवनों को पवनपुत्र हनुमान ने देखा; और सभी चौराहों, चतुष्कों और राजमार्ग पर भी,
श्लोक 23 (sundara.53.23)
घोषयन्ति कपिम् सर्वे चारीक इति राक्षसाः । स्त्रीबालवृद्धा निर्जग्मुस्तत्र तत्र कुतूहलात् ॥ 53.23 ॥
ghoṣayanti kapim sarve cārīka iti rākṣasāḥ | strībālavṛddhā nirjagmustatra tatra kutūhalāt || 53.23 ||
समस्त राक्षस हनुमान को "यह गुप्तचर है" कहकर घोषित करते जा रहे थे; और स्त्री, बालक, वृद्ध सब कुतूहलवश हर ओर से निकल आए,
श्लोक 24 (sundara.53.24)
तम् प्रदीपितलाङ्गूलम् हनुमन्तम् दिदृक्षवः । दीप्यमाने ततः तस्य लान्गूल अग्रे हनूमतः ॥ 53.24 ॥
tam pradīpitalāṅgūlam hanumantam didṛkṣavaḥ | dīpyamāne tataḥ tasya lāngūla agre hanūmataḥ || 53.24 ||
जलती हुई पूँछ वाले उस हनुमान को देखने की इच्छा से। तब हनुमान की पूँछ के अग्रभाग के प्रज्वलित होते ही,
श्लोक 25 (sundara.53.25)
राक्षस्यः ता विरूप अक्ष्यः शंसुः देव्याः तत् अप्रियम् । यः त्वया कृत सम्वादः सीते ताम्र मुखः कपिः ॥ 53.25 ॥
rākṣasyaḥ tā virūpa akṣyaḥ śaṃsuḥ devyāḥ tat apriyam | yaḥ tvayā kṛta samvādaḥ sīte tāmra mukhaḥ kapiḥ || 53.25 ||
विकृत नेत्रों वाली उन राक्षसियों ने वह अप्रिय समाचार देवी सीता को सुनाया: "हे सीते! तुमसे बातचीत करने वाला वह ताम्रमुख वानर —"
श्लोक 26 (sundara.53.26)
लान्गूलेन प्रदीप्तेन स एष परिणीयते । श्रुत्वा तत् वचनम् क्रूरम् आत्म अपहरण उपमम् ॥ 53.26 ॥
lāngūlena pradīptena sa eṣa pariṇīyate | śrutvā tat vacanam krūram ātma apaharaṇa upamam || 53.26 ||
"वही अब अपनी जलती हुई पूँछ के साथ नगर में घुमाया जा रहा है।" अपने ही हरण के समान वह क्रूर समाचार सुनकर,
श्लोक 27 (sundara.53.27)
वैदेही शोक सम्तप्ता हुत अशनम् उपागमत् । मन्गला अभिमुखी तस्य सा तदा आसीन् महाकपेः ॥ 53.27 ॥
vaidehī śoka samtaptā huta aśanam upāgamat | mangalā abhimukhī tasya sā tadā āsīn mahākapeḥ || 53.27 ||
शोक से संतप्त वैदेही अग्निदेव के समीप गई; और तब वह विशाललोचना उस महाकपि के कल्याण की कामना करती हुई,
श्लोक 28 (sundara.53.28)
उपतस्थे विशाल अक्षी प्रयता हव्य वाहनम् । यदि अस्ति पति शुश्रूषा यदि अस्ति चरितम् तपः ॥ 53.28 ॥
upatasthe viśāla akṣī prayatā havya vāhanam | yadi asti pati śuśrūṣā yadi asti caritam tapaḥ || 53.28 ||
शुद्ध चित्त से अग्निदेव की उपासना करने लगी: "यदि मैंने सचमुच पति की सेवा की है, यदि मैंने सच्चा तप किया है,"
श्लोक 29 (sundara.53.29)
यदि च अस्ति एक पत्नीत्वम् शीतो भव हनूमतः । यदि कश्चित् अनुक्रोशः तस्य मयि अस्ति धीमतः ॥ 53.29 ॥
yadi ca asti eka patnītvam śīto bhava hanūmataḥ | yadi kaścit anukrośaḥ tasya mayi asti dhīmataḥ || 53.29 ||
"और यदि मैं एकपत्नीव्रता हूँ — तो हनुमान के लिए शीतल हो जाओ। यदि उन बुद्धिमान् राम को मुझ पर तनिक भी अनुकंपा है,"
श्लोक 30 (sundara.53.30)
यदि वा भाग्य शेषम् मे शीतो भव हनूमतः । यदि माम् वृत्त सम्पन्नाम् तत् समागम लालसाम् ॥ 53.30 ॥
yadi vā bhāgya śeṣam me śīto bhava hanūmataḥ | yadi mām vṛtta sampannām tat samāgama lālasām || 53.30 ||
"अथवा यदि मेरे भाग्य में अभी कुछ शेष है — तो हनुमान के लिए शीतल हो जाओ। यदि वे मुझे सदाचार-संपन्ना और उनके ही मिलन के लिए लालायित जानते हैं,"
श्लोक 31 (sundara.53.31)
स विजानाति धर्म आत्मा शीतो भव हनूमतः । यदि माम् तारयति आर्यः सुग्रीवः सत्य सम्गरः ॥ 53.31 ॥
sa vijānāti dharma ātmā śīto bhava hanūmataḥ | yadi mām tārayati āryaḥ sugrīvaḥ satya samgaraḥ || 53.31 ||
"तो वह धर्मात्मा राम मुझे पहचानते हैं — हनुमान के लिए शीतल हो जाओ। यदि अपने वचन के सत्य आर्य सुग्रीव मुझे"
श्लोक 32 (sundara.53.32)
अस्मात् दुह्खान् महाबाहुः शीतो भव हनूमतः । ततः तीक्ष्ण अर्चिः अव्यग्रः प्रदक्षिण शिखो अनलः ॥ 53.32 ॥
asmāt duhkhān mahābāhuḥ śīto bhava hanūmataḥ | tataḥ tīkṣṇa arciḥ avyagraḥ pradakṣiṇa śikho analaḥ || 53.32 ||
"इस दुःख-सागर से पार कर दें, वे महाबाहु — हनुमान के लिए शीतल हो जाओ।" तब तीक्ष्ण ज्वालाओं वाली, अविचल, दाहिनी ओर घूमती शिखा वाली वह अग्नि,
श्लोक 33 (sundara.53.33)
जज्वाल मृग शाव अक्ष्याः शंसन्न् इव शिवम् कपेः । हनुमज्जनकश्चापि पुच्छानलयुतोऽनिलः ॥ 53.33 ॥
jajvāla mṛga śāva akṣyāḥ śaṃsann iva śivam kapeḥ | hanumajjanakaścāpi pucchānalayuto'nilaḥ || 53.33 ||
मृगनयनी सीता को मानो हनुमान के कुशल का संदेश देते हुए प्रज्वलित हो उठी; और वायुदेव भी, हनुमान के ही पिता, पूँछ की अग्नि के साथ मिलकर,
श्लोक 34 (sundara.53.34)
ववौ स्वास्थ्यकरो देव्याः प्रालेयानिलशीतलः । दह्यमाने च लान्गूले चिन्तयामास वानरः ॥ 53.34 ॥
vavau svāsthyakaro devyāḥ prāleyānilaśītalaḥ | dahyamāne ca lāngūle cintayāmāsa vānaraḥ || 53.34 ||
हिम के समान शीतल होकर देवी को स्वस्थता प्रदान करते हुए बहने लगे। और पूँछ के जलते समय ही वह वानर हनुमान यह सोचने लगा:
श्लोक 35 (sundara.53.35)
प्रदीप्तो अग्निः अयम् कस्मान् न माम् दहति सर्वतः । दृश्यते च महाज्वालः करोति च न मे रुजम् ॥ 53.35 ॥
pradīpto agniḥ ayam kasmān na mām dahati sarvataḥ | dṛśyate ca mahājvālaḥ karoti ca na me rujam || 53.35 ||
"यह प्रज्वलित अग्नि सब ओर से मुझे क्यों नहीं जला रही? इसकी विशाल ज्वालाएँ तो दिखाई देती हैं, फिर भी यह मुझे पीड़ा नहीं दे रही —"
श्लोक 36 (sundara.53.36)
शिशिरस्य इव सम्पातो लान्गूल अग्रे प्रतिष्ठितः । अथवा तत् इदम् व्यक्तम् यत् दृष्टम् प्लवता मया ॥ 53.36 ॥
śiśirasya iva sampāto lāngūla agre pratiṣṭhitaḥ | athavā tat idam vyaktam yat dṛṣṭam plavatā mayā || 53.36 ||
"मानो मेरी पूँछ के अग्रभाग पर हिम की राशि ही रखी हो। अथवा यह भी स्पष्ट हो गया कि सागर पार करते समय मैंने जो देखा था,"
श्लोक 37 (sundara.53.37)
राम प्रभावात् आश्चर्यम् पर्वतः सरिताम् पतौ । यदि तावत् समुद्रस्य मैनाकस्य च धीमथ ॥ 53.37 ॥
rāma prabhāvāt āścaryam parvataḥ saritām patau | yadi tāvat samudrasya mainākasya ca dhīmatha || 53.37 ||
"वह राम के ही प्रभाव से नदियों के स्वामी समुद्र में उत्पन्न हुआ आश्चर्यजनक पर्वत (मैनाक) था। यदि समुद्र और बुद्धिमान् मैनाक पर्वत को भी"
श्लोक 38 (sundara.53.38)
राम अर्थम् सम्भ्रमः तादृक् किम् अग्निः न करिष्यति । सीतायाः च आनृशंस्येन तेजसा राघवस्य च ॥ 53.38 ॥
rāma artham sambhramaḥ tādṛk kim agniḥ na kariṣyati | sītāyāḥ ca ānṛśaṃsyena tejasā rāghavasya ca || 53.38 ||
"राम के निमित्त वैसी उत्सुकता हुई, तो अग्नि ऐसा क्यों नहीं करेगी? वस्तुतः सीता की करुणा से, राघव के तेज से,"
श्लोक 39 (sundara.53.39)
पितुः च मम सख्येन न माम् दहति पावकः । भूयः स चिन्तयामास मुहूर्तम् कपि कुन्जरः ॥ 53.39 ॥
pituḥ ca mama sakhyena na mām dahati pāvakaḥ | bhūyaḥ sa cintayāmāsa muhūrtam kapi kunjaraḥ || 53.39 ||
"और मेरे पिता की मैत्री से ही यह अग्नि मुझे नहीं जला रही।" वह महाकपि हनुमान इस प्रकार कुछ क्षण और सोचता रहा,
श्लोक 40 (sundara.53.40)
उत्पपात अथ वेगेन ननाद च महाकपिः । पुर द्वारम् ततः श्रीमान् शैल शृन्गम् इव उन्नतम् ॥ 53.40 ॥
utpapāta atha vegena nanāda ca mahākapiḥ | pura dvāram tataḥ śrīmān śaila śṛngam iva unnatam || 53.40 ||
फिर वेगपूर्वक उछल पड़ा और उस महाकपि ने गर्जना की; तब वह श्रीमान् पर्वत-शिखर के समान ऊँचे नगर-द्वार के पास,
श्लोक 41 (sundara.53.41)
विभक्त रक्षः सम्बाधम् आससाद अनिल आत्मजः । स भूत्वा शैल सम्काशः क्षणेन पुनः आत्मवान् ॥ 53.41 ॥
vibhakta rakṣaḥ sambādham āsasāda anila ātmajaḥ | sa bhūtvā śaila samkāśaḥ kṣaṇena punaḥ ātmavān || 53.41 ||
जहाँ राक्षसों की भीड़ छँट गई थी, वायुपुत्र वहाँ जा पहुँचा। पर्वत के समान विशाल रूप धारण करके, वह आत्मवान् क्षणभर में ही पुनः,
श्लोक 42 (sundara.53.42)
ह्रस्वताम् परमाम् प्राप्तो बन्धनानि अवशातयत् । विमुक्तः च अभवत् श्रीमान् पुनः पर्वत सम्निभः ॥ 53.42 ॥
hrasvatām paramām prāpto bandhanāni avaśātayat | vimuktaḥ ca abhavat śrīmān punaḥ parvata samnibhaḥ || 53.42 ||
अत्यंत लघु रूप धारण कर अपने बंधनों से मुक्त हो गया। श्रीमान् हनुमान मुक्त होते ही पुनः पर्वत के समान विशाल हो गए,
श्लोक 43 (sundara.53.43)
वीक्षमाणः च ददृशे परिघम् तोरण आश्रितम् । स तम् गृह्य महाबाहुः काल आयस परिष्कृतम् ॥ 53.43 ॥
vīkṣamāṇaḥ ca dadṛśe parigham toraṇa āśritam | sa tam gṛhya mahābāhuḥ kāla āyasa pariṣkṛtam || 53.43 ||
और चारों ओर देखते हुए उन्होंने द्वार-मेहराब पर लगी एक लोहे की छड़ देखी; उस महाबाहु ने काले लोहे से बनी उस छड़ को पकड़कर,
श्लोक 44 (sundara.53.44)
रक्षिणः तान् पुनः सर्वान् सूदयामास मारुतिः । स तान् निहत्वा रण चण्ड विक्रमः । समीक्षमाणः पुनः एव लन्काम् । प्रदीप्त लान्गूल कृत अर्चि माली । प्रकाशत आदित्य इव अंशु माली ॥ 53.44 ॥
rakṣiṇaḥ tān punaḥ sarvān sūdayāmāsa mārutiḥ | sa tān nihatvā raṇa caṇḍa vikramaḥ | samīkṣamāṇaḥ punaḥ eva lankām | pradīpta lāngūla kṛta arci mālī | prakāśata āditya iva aṃśu mālī || 53.44 ||
पुनः उन सभी रक्षकों को मार डाला। युद्ध में उग्र पराक्रम वाले उस वानर ने उन्हें मारकर, फिर से लंका को निहारते हुए, अपनी जलती पूँछ की ज्वालाओं की माला धारण किए, किरणों की माला धारण करने वाले सूर्य के समान प्रकाशित हो उठा।