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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 52

विभीषण का हनुमान के प्राणों के लिए निवेदन

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श्लोक 1 (sundara.52.1)

तस्य तत् वचनम् श्रुत्वा वानरस्य महात्मनः । आज्ञापयत् वधम् तस्य रावणः क्रोध मूर्चितः ॥ 52.1 ॥

tasya tat vacanam śrutvā vānarasya mahātmanaḥ | ājñāpayat vadham tasya rāvaṇaḥ krodha mūrcitaḥ || 52.1 ||

उस महात्मा वानर के वे वचन सुनकर, क्रोध से उन्मत्त रावण ने उसके वध की आज्ञा दे दी।

श्लोक 2 (sundara.52.2)

वधे तस्य समाज्ञप्ते रावणेन दुरात्मना । निवेदितवतो दौत्यम् न अनुमेने विभीषणः ॥ 52.2 ॥

vadhe tasya samājñapte rāvaṇena durātmanā | niveditavato dautyam na anumene vibhīṣaṇaḥ || 52.2 ||

दुरात्मा रावण द्वारा उसके वध की आज्ञा दिए जाने पर, दौत्य-कर्म में नियुक्त उस वानर के वध का विभीषण ने समर्थन नहीं किया।

श्लोक 3 (sundara.52.3)

तम् रक्षो अधिपतिम् क्रुद्धम् तच् च कार्यम् उपस्थितम् । विदित्वा चिन्तयामास कार्यम् कार्य विधौ स्थितः ॥ 52.3 ॥

tam rakṣo adhipatim kruddham tac ca kāryam upasthitam | viditvā cintayāmāsa kāryam kārya vidhau sthitaḥ || 52.3 ||

क्रुद्ध राक्षसाधिपति को और सामने उपस्थित उस कार्य को समझकर, कार्य-नीति में स्थिर विभीषण ने उचित उपाय पर विचार किया।

श्लोक 4 (sundara.52.4)

निश्चित अर्थः ततः साम्ना आपूज्य शत्रुजित् अग्रजम् । उवाच हितम् अत्यर्थम् वाक्यम् वाक्य विशारदः ॥ 52.4 ॥

niścita arthaḥ tataḥ sāmnā āpūjya śatrujit agrajam | uvāca hitam atyartham vākyam vākya viśāradaḥ || 52.4 ||

उचित निश्चय करके वाक्य-कुशल विभीषण ने अपने बड़े भाई की सम्मानपूर्वक स्तुति करते हुए अत्यंत हितकर वचन कहा।

श्लोक 5 (sundara.52.5)

क्षमस्व रोषम् त्यज राक्षसेन्द्र । प्रसीद मद्वाक्यमिदम् शृणुष्व । वधम् न कुर्वन्ति परावरज्ञा । दूतस्य सन्तो वसुधाधिपेन्द्राः ॥ 52.5 ॥

kṣamasva roṣam tyaja rākṣasendra | prasīda madvākyamidam śṛṇuṣva | vadham na kurvanti parāvarajñā | dūtasya santo vasudhādhipendrāḥ || 52.5 ||

"हे राक्षसेन्द्र! क्षमा करो, क्रोध त्याग दो, प्रसन्न होओ और मेरे इस वचन को सुनो — सज्जन और भूमि के स्वामी, आगे-पीछे का विचार करने वाले राजा, दूत का वध नहीं करते।"

श्लोक 6 (sundara.52.6)

राजन् धर्म विरुद्धम् च लोक वृत्तेः च गर्हितम् । तव च असदृशम् वीर कपेः अस्य प्रमापणम् ॥ 52.6 ॥

rājan dharma viruddham ca loka vṛtteḥ ca garhitam | tava ca asadṛśam vīra kapeḥ asya pramāpaṇam || 52.6 ||

"हे राजन्! इस वानर का वध धर्म के विरुद्ध है और लोकाचार में भी निंदित है; हे वीर! यह तुम्हारे लिए भी उचित नहीं है।"

श्लोक 7 (sundara.52.7)

धर्मज्ञ्श्च कृतज्ञ्श्च राजधर्मविशारदः । परावरज्ञो भूतानाम् त्वमेव परमार्थवित् ॥ 52.7 ॥

dharmajñśca kṛtajñśca rājadharmaviśāradaḥ | parāvarajño bhūtānām tvameva paramārthavit || 52.7 ||

"तुम धर्मज्ञ हो, कृतज्ञ हो, राजधर्म में निपुण हो; तुम स्वयं ही आगे-पीछे को जानने वाले और परम अर्थ के ज्ञाता हो।"

श्लोक 8 (sundara.52.8)

गृह्यन्ते यदि रोषेण त्वादृशोऽपि विपश्चितः । ततः शास्त्रविपश्चित्त्वम् श्रम एव हि केवलम् ॥ 52.8 ॥

gṛhyante yadi roṣeṇa tvādṛśo'pi vipaścitaḥ | tataḥ śāstravipaścittvam śrama eva hi kevalam || 52.8 ||

"यदि तुम्हारे जैसे विद्वान् भी क्रोध के वशीभूत हो जाएँ, तो शास्त्रों की समस्त विद्वत्ता केवल परिश्रम मात्र सिद्ध होगी।"

श्लोक 9 (sundara.52.9)

तस्मात्प्रसीद शत्रुघ्न राक्षसेन्द्र दुरासद । ततः शास्त्रविपश्चित्त्वम् श्रम एव हि केवल्म् ॥ 52.9 ॥

tasmātprasīda śatrughna rākṣasendra durāsada | tataḥ śāstravipaścittvam śrama eva hi kevalm || 52.9 ||

"अतः हे शत्रुघ्न, हे दुरासद राक्षसेन्द्र! प्रसन्न होओ; उचित-अनुचित का निश्चय करके ही इस दूत को दंड दिया जाए।"

श्लोक 10 (sundara.52.10)

विभीषणवचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः । रोषेण महताविष्टो वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ 52.10 ॥

vibhīṣaṇavacaḥ śrutvā rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ | roṣeṇa mahatāviṣṭo vākyamuttaramabravīt || 52.10 ||

विभीषण के इन वचनों को सुनकर, राक्षसों के स्वामी रावण ने अत्यंत क्रोध से भरकर उत्तर में यह वचन कहा।

श्लोक 11 (sundara.52.11)

न पापानाम् वधे पापम् विद्यते शत्रुसूदन । तस्मादेनम् वधिष्यामि वानरम् पापचारिणम् ॥ 52.11 ॥

na pāpānām vadhe pāpam vidyate śatrusūdana | tasmādenam vadhiṣyāmi vānaram pāpacāriṇam || 52.11 ||

"हे शत्रुसूदन! पापियों का वध करने में कोई पाप नहीं है; अतः मैं इस पापाचारी वानर को अवश्य मार डालूँगा।"

श्लोक 12 (sundara.52.12)

अधर्ममूलम् बहुदोषयुक्त । मनार्यजुष्टम् वचनम् निशम्य । उवाच वाक्यम् परमार्थतत्त्वम् । विभीषणो बुद्धिमताम् वरिष्ठः ॥ 52.12 ॥

adharmamūlam bahudoṣayukta | manāryajuṣṭam vacanam niśamya | uvāca vākyam paramārthatattvam | vibhīṣaṇo buddhimatām variṣṭhaḥ || 52.12 ||

अधर्ममूलक, अनेक दोषों से युक्त और अनार्यों द्वारा ही अपनाए जाने योग्य उन वचनों को सुनकर, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषण ने परमार्थतत्त्व से युक्त वचन कहा।

श्लोक 13 (sundara.52.13)

प्रसीद लङ्केश्वर राक्षसेन्द्र । धर्मार्थयुक्तम् वचनम् शृणुष्व । दूतानवध्यान् समयेषु राजन् । सर्वेषु सर्वत्र वदन्ति सन्तः ॥ 52.13 ॥

prasīda laṅkeśvara rākṣasendra | dharmārthayuktam vacanam śṛṇuṣva | dūtānavadhyān samayeṣu rājan | sarveṣu sarvatra vadanti santaḥ || 52.13 ||

"हे लंकेश्वर, हे राक्षसेन्द्र! प्रसन्न होओ और धर्म-अर्थ से युक्त मेरे वचन को सुनो — हे राजन्! सज्जन सर्वत्र और सदा ही कहते हैं कि दूत अवध्य होते हैं।"

श्लोक 14 (sundara.52.14)

असंशयम् शत्रुः अयम् प्रवृद्धः । कृतम् हि अनेन अप्रियम् अप्रमेयम् । न दूत वध्याम् प्रवदन्ति सन्तो । दूतस्य दृष्टा बहवो हि दण्डाः ॥ 52.14 ॥

asaṃśayam śatruḥ ayam pravṛddhaḥ | kṛtam hi anena apriyam aprameyam | na dūta vadhyām pravadanti santo | dūtasya dṛṣṭā bahavo hi daṇḍāḥ || 52.14 ||

"इसमें संदेह नहीं कि यह शत्रु उद्दंड है, और इसने हमारा अत्यंत अप्रिय कार्य किया है; परंतु सज्जन दूत के वध की बात नहीं कहते — दूत के लिए तो अनेक अन्य दंड बताए गए हैं।"

श्लोक 15 (sundara.52.15)

वैरूप्याम् अन्गेषु कश अभिघातो । मौण्ड्यम् तथा लक्ष्मण सम्निपातः । एतान् हि दूते प्रवदन्ति दण्डान् । वधः तु दूतस्य न नः श्रुतो अपि ॥ 52.15 ॥

vairūpyām angeṣu kaśa abhighāto | mauṇḍyam tathā lakṣmaṇa samnipātaḥ | etān hi dūte pravadanti daṇḍān | vadhaḥ tu dūtasya na naḥ śruto api || 52.15 ||

"अंगों को विरूप करना, कोड़ों से मारना, सिर मूँड़ना, अथवा शरीर पर चिह्न अंकित करना — दूत के लिए ये ही दंड बताए जाते हैं; किंतु दूत के वध की बात हमने कभी नहीं सुनी।"

श्लोक 16 (sundara.52.16)

कथम् च धर्म अर्थ विनीत बुद्धिः । पर अवर प्रत्यय निश्चित अर्थः । भवत् विधः कोप वशे हि तिष्ठेत् । कोपम् नियच्छन्ति हि सत्त्ववन्तः ॥ 52.16 ॥

katham ca dharma artha vinīta buddhiḥ | para avara pratyaya niścita arthaḥ | bhavat vidhaḥ kopa vaśe hi tiṣṭhet | kopam niyacchanti hi sattvavantaḥ || 52.16 ||

"धर्म और अर्थ में प्रशिक्षित बुद्धि वाला, कारण और परिणाम का निश्चित ज्ञाता, तुम्हारे जैसा व्यक्ति क्रोध के वश में कैसे रह सकता है? क्योंकि सत्त्ववान् पुरुष अपने क्रोध को सदा वश में रखते हैं।"

श्लोक 17 (sundara.52.17)

न धर्म वादे न च लोक वृत्ते । न शास्त्र बुद्धि ग्रहणेषु वा अपि । विद्येत कश्चित् तव वीर तुल्यः । त्वम् हि उत्तमः सर्व सुर असुराणाम् ॥ 52.17 ॥

na dharma vāde na ca loka vṛtte | na śāstra buddhi grahaṇeṣu vā api | vidyeta kaścit tava vīra tulyaḥ | tvam hi uttamaḥ sarva sura asurāṇām || 52.17 ||

"हे वीर! धर्म-विवेचन में, लोकाचार के ज्ञान में, अथवा शास्त्र की बुद्धि ग्रहण करने में भी तुम्हारे तुल्य कोई नहीं है — तुम तो समस्त देवों और असुरों में श्रेष्ठ हो।"

श्लोक 18 (sundara.52.18)

शूरेण वीरेण निशाचरेन्द्र । सुरासुराणामपि दुर्जयेन । त्वया प्रगल्भाः सुरदैत्यसम्घा । जिताश्च युद्धेष्वसकृन्नरेन्द्राः ॥ 52.18 ॥

śūreṇa vīreṇa niśācarendra | surāsurāṇāmapi durjayena | tvayā pragalbhāḥ suradaityasamghā | jitāśca yuddheṣvasakṛnnarendrāḥ || 52.18 ||

"हे निशाचरेन्द्र! शूरवीर तुमने, जिसे देवता और असुर भी नहीं जीत सकते, अनेक बार युद्धों में उद्दंड देव-दैत्य-समूहों को उनके राजाओं सहित पराजित किया है।"

श्लोक 19 (sundara.52.19)

न च अपि अस्य कपेः घाते कंचित् पश्यामि अहम् गुणम् । तेष्व् अयम् पात्यताम् दण्डो यैः अयम् प्रेषितः कपिः ॥ 52.19 ॥

na ca api asya kapeḥ ghāte kaṃcit paśyāmi aham guṇam | teṣv ayam pātyatām daṇḍo yaiḥ ayam preṣitaḥ kapiḥ || 52.19 ||

"इस वानर के वध में मुझे कोई गुण नहीं दिखाई देता; जिन्होंने इस वानर को भेजा है, यह दंड उन्हीं पर डाला जाए।"

श्लोक 20 (sundara.52.20)

साधुः वा यदि वा असाधुः परैः एष समर्पितः । ब्रुवन् पर अर्थम् परवान् न दूतो वधम् अर्हति ॥ 52.20 ॥

sādhuḥ vā yadi vā asādhuḥ paraiḥ eṣa samarpitaḥ | bruvan para artham paravān na dūto vadham arhati || 52.20 ||

"चाहे यह साधु हो या असाधु, शत्रुओं द्वारा भेजा गया है; दूसरे के अर्थ के लिए बोलने वाला, पराधीन दूत वध के योग्य नहीं होता।"

श्लोक 21 (sundara.52.21)

अपि च अस्मिन् हते राजन् न अन्यम् पश्यामि खे चरम् । इह यः पुनः आगच्छेत् परम् पारम् महाउदधिः ॥ 52.21 ॥

api ca asmin hate rājan na anyam paśyāmi khe caram | iha yaḥ punaḥ āgacchet param pāram mahāudadhiḥ || 52.21 ||

"हे राजन्! इसके अतिरिक्त, यदि यह मार डाला गया, तो मुझे आकाश में विचरने वाला ऐसा कोई अन्य नहीं दिखता जो पुनः महासागर के इस पार तक आ सके।"

श्लोक 22 (sundara.52.22)

तस्मान् न अस्य वधे यत्नः कार्यः पर पुरम् जय । भवान् स इन्द्रेषु देवेषु यत्नम् आस्थातुम् अर्हति ॥ 52.22 ॥

tasmān na asya vadhe yatnaḥ kāryaḥ para puram jaya | bhavān sa indreṣu deveṣu yatnam āsthātum arhati || 52.22 ||

"हे शत्रुनगर-विजयी! अतः इसके वध का प्रयास मत करो; इसके बदले तुम्हें इंद्र सहित देवताओं पर ही अपना प्रयत्न केंद्रित करना चाहिए।"

श्लोक 23 (sundara.52.23)

अस्मिन् विनष्टे न हि दूतम् अन्यम् । पश्यामि यः तौ नर राज पुत्रौ । युद्धाय युद्ध प्रिय दुर्विनीताव् । उद्योजयेत् दीर्घ पथ अवरुद्धौ ॥ 52.23 ॥

asmin vinaṣṭe na hi dūtam anyam | paśyāmi yaḥ tau nara rāja putrau | yuddhāya yuddha priya durvinītāv | udyojayet dīrgha patha avaruddhau || 52.23 ||

"हे युद्धप्रिय! यदि यह नष्ट हो गया, तो मुझे कोई अन्य ऐसा नहीं दिखता जो दूर के मार्ग से रुके हुए उन दुर्दम्य राजपुत्रों को युद्ध के लिए उकसा सके।"

श्लोक 24 (sundara.52.24)

पराक्रम उत्साह मनस्विनाम् च । सुर असुराणाम् अपि दुर्जयेन । त्वया मनो नन्दन नैरृतानाम् । युद्ध आयतिः नाशयितुम् न युक्ता ॥ 52.24 ॥

parākrama utsāha manasvinām ca | sura asurāṇām api durjayena | tvayā mano nandana nairṛtānām | yuddha āyatiḥ nāśayitum na yuktā || 52.24 ||

"हे निशाचरों के मन को आनंदित करने वाले! पराक्रम, उत्साह और मनस्विता से युक्त, देव-असुरों के लिए भी दुर्जय तुम्हारे लिए युद्ध के आगमन को नष्ट करना उचित नहीं है।"

श्लोक 25 (sundara.52.25)

हिताः च शूराः च समाहिताः च । कुलेषु जाताः च महागुणेषु । मनस्विनः शस्त्रभृताम् वरिष्ठाः । कोटि अग्र शस्ते सुभृताः च योधाः ॥ 52.25 ॥

hitāḥ ca śūrāḥ ca samāhitāḥ ca | kuleṣu jātāḥ ca mahāguṇeṣu | manasvinaḥ śastrabhṛtām variṣṭhāḥ | koṭi agra śaste subhṛtāḥ ca yodhāḥ || 52.25 ||

"तुम्हारे यहाँ हितैषी, शूर, सावधान, महागुणी कुलों में उत्पन्न, मनस्वी, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, एक करोड़ से भी अधिक सुपोषित योद्धा हैं।"

श्लोक 26 (sundara.52.26)

तत् एक देशेन बलस्य तावत् । केचित् तव आदेश कृतो अपयान्तु । तौ राज पुत्रौ विनिगृह्य मूढौ । परेषु ते भावयितुम् प्रभावम् ॥ 52.26 ॥

tat eka deśena balasya tāvat | kecit tava ādeśa kṛto apayāntu | tau rāja putrau vinigṛhya mūḍhau | pareṣu te bhāvayitum prabhāvam || 52.26 ||

"अतः तुम्हारी आज्ञा से कुछ सैनिक सेना के एक भाग के साथ जाएँ, और उन दोनों मूढ़ राजपुत्रों को दबाकर शत्रुओं पर तुम्हारा प्रभाव प्रकट करें।"

श्लोक 27 (sundara.52.27)

निशाचराणामधिपोऽनुजस्य । विभीषणस्योत्तमवाक्यमिष्टम् । जग्राह बुद्ध्या सुरलोकशत्रु । र्महाबलो राक्षसराजमुख्यः ॥ 52.27 ॥

niśācarāṇāmadhipo'nujasya | vibhīṣaṇasyottamavākyamiṣṭam | jagrāha buddhyā suralokaśatru | rmahābalo rākṣasarājamukhyaḥ || 52.27 ||

निशाचरों के स्वामी, देवलोक के शत्रु, वह महाबली और श्रेष्ठ राक्षसराज रावण ने अपने अनुज विभीषण के इस उत्तम और अभीष्ट वचन को अपनी बुद्धि से ग्रहण किया।

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