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उत्तरकाण्ड · सर्ग 111

रामायण-श्रवण का फल

सर्ग 110सर्ग-सूची

श्लोक 1 (uttara.111.1)

एतावदेतदाख्यानं सोत्तरं ब्रह्मपूजितम् । रामायणमिति ख्यातं मुख्यं वाल्मीकीना कृतम् ।। ७.१११.१ ।।

etāvad etad ākhyānaṃ sottaraṃ brahmapūjitam | rāmāyaṇam iti khyātaṃ mukhyaṃ vālmīkinā kṛtam || 7.111.1 ||

यह वृत्तांत, उत्तरकाण्ड सहित, ब्रह्मा द्वारा पूजित, इतना ही है -- रामायण नाम से प्रसिद्ध, वाल्मीकि द्वारा रचा गया यह मुख्य काव्य।

श्लोक 2 (uttara.111.2)

ततः प्रतिष्ठितो विष्णुः स्वर्गलोके यथा पुरम् । येन व्याप्तमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।। ७.१११.२ ।।

tataḥ pratiṣṭhito viṣṇuḥ svargaloke yathā puram | yena vyāptam idaṃ sarvaṃ trailokyaṃ sacarācaram || 7.111.2 ||

तब विष्णु स्वर्गलोक में उसी प्रकार प्रतिष्ठित हो गये, जैसे पहले वे नगर [अयोध्या] में थे; उन्हीं से यह चराचर सहित समस्त त्रैलोक्य व्याप्त है।

श्लोक 3 (uttara.111.3)

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । नित्यं शृण्वन्ति सन्तुष्टाः दिव्यं रामायणं दिवि ।। ७.१११.३ ।।

tato devāḥ sagandharvāḥ siddhāś ca paramarṣayaḥ | nityaṃ śṛṇvanti santuṣṭāḥ divyaṃ rāmāyaṇaṃ divi || 7.111.3 ||

तब से देवता, गन्धर्वों सहित, सिद्धगण तथा परम ऋषिगण, संतुष्ट होकर स्वर्ग में नित्य इस दिव्य रामायण को सुनते हैं।

श्लोक 4 (uttara.111.4)

इदमाख्यानमायुष्यं सौभाग्यं पापनाशनम् । रामायणं वेदसमं श्राद्धेषु श्रावयेद्बुधः ।। ७.१११.४ ।।

idam ākhyānam āyuṣyaṃ saubhāgyaṃ pāpanāśanam | rāmāyaṇaṃ vedasamaṃ śrāddheṣu śrāvayed budhaḥ || 7.111.4 ||

यह आख्यान आयु बढ़ाने वाला, सौभाग्यदायक, पापनाशक है; बुद्धिमान व्यक्ति को श्राद्ध के अवसरों पर वेदतुल्य इस रामायण को सुनाना चाहिए।

श्लोक 5 (uttara.111.5)

अपुत्रो लभते पुत्रमधनो लभते धनम् । सर्वपापैः प्रमुच्येत पदमप्यस्य यः पठेत् ।। ७.१११.५ ।।

aputro labhate putram adhano labhate dhanam | sarvapāpaiḥ pramucyeta padam apy asya yaḥ paṭhet || 7.111.5 ||

पुत्रहीन व्यक्ति पुत्र प्राप्त कर लेता है, धनहीन व्यक्ति धन प्राप्त कर लेता है; जो इसका एक पद भी पढ़ता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 6 (uttara.111.6)

पापान्यपि च यः कुर्यादहन्यहनि मानवः । पठत्येकमपि श्लोकं पापात्स परिमुच्यते ।। ७.१११.६ ।।

pāpāny api ca yaḥ kuryād ahany ahani mānavaḥ | paṭhaty ekam api ślokaṃ pāpāt sa parimucyate || 7.111.6 ||

और जो मनुष्य दिन-प्रतिदिन पाप भी करता हो, यदि वह एक श्लोक भी पढ़ता है, तो वह उस पाप से पूर्णतः मुक्त हो जाता है।

श्लोक 7 (uttara.111.7)

वाचकाय च दातव्यं वस्त्रं धेनुं हिरण्यकम् । वाचके परितुष्टे तु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ।। ७.१११.७ ।।

vācakāya ca dātavyaṃ vastraṃ dhenuṃ hiraṇyakam | vācake parituṣṭe tu tuṣṭāḥ syuḥ sarvadevatāḥ || 7.111.7 ||

पाठ करने वाले को वस्त्र, गाय और सुवर्ण देना चाहिए; पाठक के संतुष्ट होने पर समस्त देवता भी संतुष्ट होते हैं।

श्लोक 8 (uttara.111.8)

एतदाख्यानमायुष्यं पठन्रामायणं नरः । सपुत्रपौत्रो लोके ऽस्मिन्प्रेत्य चेह महीयते ।। ७.१११.८ ।।

etad ākhyānam āyuṣyaṃ paṭhan rāmāyaṇaṃ naraḥ | saputrapautro loke 'smin pretya ceha mahīyate || 7.111.8 ||

यह आयुवर्धक आख्यान, रामायण, पढ़ने वाला मनुष्य अपने पुत्र-पौत्रों सहित इस लोक में, और मृत्यु के बाद भी, सम्मानित होता है।

श्लोक 9 (uttara.111.9)

अयोध्या ऽपि पुरी रम्या शून्या वर्षगणान्बहून् । ऋषभं प्राप्य राजानं निवासमुपयास्यति ।। ७.१११.९ ।।

ayodhyāpi purī ramyā śūnyā varṣagaṇān bahūn | ṛṣabhaṃ prāpya rājānaṃ nivāsam upayāsyati || 7.111.9 ||

अयोध्या नगरी भी, जो अनेक वर्षों तक सुनसान रहेगी, भविष्य में एक श्रेष्ठ राजा को प्राप्त कर पुनः बसाई जायेगी।

श्लोक 10 (uttara.111.10)

एतदाख्यानमायुष्यं सभविष्यं सहोत्तरम् । कृतवान्प्रचेतसः पुत्रस्तद्ब्रह्माप्यन्वमन्यत ।। ७.१११.१० ।।

etad ākhyānam āyuṣyaṃ sabhaviṣyaṃ sahottaram | kṛtavān pracetasaḥ putras tad brahmāpy anvamanyata || 7.111.10 ||

इस आयुवर्धक आख्यान को, भविष्य सहित, उत्तरकाण्ड सहित, प्रचेता के पुत्र [वाल्मीकि] ने रचा, और उसे ब्रह्मा ने भी अनुमोदित किया।

श्लोक 11 (uttara.111.11)

अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयायुतस्य च । लभते श्रावणादेव सर्गस्यैकस्य मानवः ।। ७.१११.११ ।।

aśvamedhasahasrasya vājapeyāyutasya ca | labhate śrāvaṇād eva sargasyaikasya mānavaḥ || 7.111.11 ||

एक ही सर्ग के श्रवण मात्र से मनुष्य सहस्र अश्वमेध यज्ञों तथा अयुत वाजपेय यज्ञों का फल प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 12 (uttara.111.12)

प्रयागादीनि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा । नैमिशादीन्यरण्यानि कुरुक्षेत्रादिकान्यपि । गतानि तेन लोके ऽस्मिन्येन रामायणं श्रुतम् ।। ७.१११.१२ ।।

prayāgādīni tīrthāni gaṅgādyāḥ saritas tathā | naimiśādīny araṇyāni kurukṣetrādikāny api | gatāni tena loke 'smin yena rāmāyaṇaṃ śrutam || 7.111.12 ||

प्रयाग आदि तीर्थ, गंगा आदि नदियाँ, नैमिष आदि वन, तथा कुरुक्षेत्र आदि स्थान -- इन सबका फल इस लोक में उसी को प्राप्त हो जाता है, जिसने रामायण को सुना है।

श्लोक 13 (uttara.111.13)

हेमभारं कुरुक्षेत्रे ग्रस्ते भानौ प्रयच्छति । यश्च रामायणं लोके शृणोति सदृशावुभौ ।। ७.१११.१३ ।।

hemabhāraṃ kurukṣetre graste bhānau prayacchati | yaś ca rāmāyaṇaṃ loke śṛṇoti sadṛśāv ubhau || 7.111.13 ||

जो व्यक्ति कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय स्वर्ण का भार दान करता है, और जो व्यक्ति संसार में रामायण को सुनता है -- ये दोनों समान फल पाते हैं।

श्लोक 14 (uttara.111.14)

सम्यक्छ्रद्धासमायुक्तः शृणुते राघवीं कथाम् । सर्वपापात्प्रमुच्येत विष्णुलोकं स गच्छति ।। ७.१११.१४ ।।

samyakchraddhāsamāyuktaḥ śṛṇute rāghavīṃ kathām | sarvapāpāt pramucyeta viṣṇulokaṃ sa gacchati || 7.111.14 ||

जो पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर राघव की इस कथा को सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 15 (uttara.111.15)

आदिकाव्यमिदं त्वार्षं पुरा वाल्मीकिना कृतम् । यः शृणोति सदा भक्त्या स गच्छेद्वैष्णवीं तनुम् ।। ७.१११.१५ ।।

ādikāvyam idaṃ tv ārṣaṃ purā vālmīkinā kṛtam | yaḥ śṛṇoti sadā bhaktyā sa gacched vaiṣṇavīṃ tanum || 7.111.15 ||

यह प्रथम काव्य, ऋषिकृत, प्राचीन काल में वाल्मीकि द्वारा रचा गया था; जो सदा भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह विष्णु के दिव्य रूप को प्राप्त होता है।

श्लोक 16 (uttara.111.16)

पुत्रदाराश्च वर्धन्ते सम्पदः सन्ततिस्तथा । सत्यमेतद्विदित्वा तु श्रोतव्यं नियतात्मभिः ।। ७.१११.१६ ।।

putradārāś ca vardhante sampadaḥ santatis tathā | satyam etad viditvā tu śrotavyaṃ niyatātmabhiḥ || 7.111.16 ||

पुत्र, पत्नी, समृद्धि तथा संतति -- ये सब बढ़ते हैं; इस सत्य को जानकर, संयमी पुरुषों को इसे अवश्य सुनना चाहिए।

श्लोक 17 (uttara.111.17)

गायत्र्याश्च स्वरूपं तद्रामायणमनुत्तमम् ।। ७.१११.१७ ।।

gāyatryāś ca svarūpaṃ tad rāmāyaṇam anuttamam || 7.111.17 ||

यह सर्वोत्तम रामायण साक्षात् गायत्री का ही स्वरूप है।

श्लोक 18 (uttara.111.18)

अपुत्रो लभते पुत्रमधनो लभते धनम् । सर्वपापैः प्रमुच्येत पदमप्यस्य यः पठेत् ।। ७.१११.१८ ।।

aputro labhate putram adhano labhate dhanam | sarvapāpaiḥ pramucyeta padam apy asya yaḥ paṭhet || 7.111.18 ||

पुत्रहीन व्यक्ति पुत्र प्राप्त कर लेता है, धनहीन व्यक्ति धन प्राप्त कर लेता है; जो इसका एक पद भी पढ़ता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 19 (uttara.111.19)

यः पठेच्छृणुयान्नित्यं चरितं राघवस्य ह । भक्त्या निष्कल्मषो भूत्वा दीर्घमायुरवाप्नुयात् ।। ७.१११.१९ ।।

yaḥ paṭhec chṛṇuyān nityaṃ caritaṃ rāghavasya ha | bhaktyā niṣkalmaṣo bhūtvā dīrgham āyur avāpnuyāt || 7.111.19 ||

जो नित्य राघव के इस चरित्र को पढ़ता या सुनता है, वह भक्तिपूर्वक निष्पाप होकर दीर्घायु प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (uttara.111.20)

चिन्तयेद्राघवं नित्यं श्रेयः प्राप्तुं य इच्छति । श्रावयेदिदमाख्यानं ब्राह्मणेभ्यो दिने दिने ।। ७.१११.२० ।।

cintayed rāghavaṃ nityaṃ śreyaḥ prāptuṃ ya icchati | śrāvayed idam ākhyānaṃ brāhmaṇebhyo dine dine || 7.111.20 ||

जो कल्याण प्राप्त करना चाहता है, उसे नित्य राघव का चिंतन करना चाहिए, और प्रतिदिन ब्राह्मणों को यह आख्यान सुनाना चाहिए।

श्लोक 21 (uttara.111.21)

यस्त्विदं रघुनाथस्य चरितं सकलं पठेत् । सो ऽसुक्षये विष्णुलोकं गच्छत्येव न संशयः ।। ७.१११.२१ ।।

yas tv idaṃ raghunāthasya caritaṃ sakalaṃ paṭhet | so 'sukṣaye viṣṇulokaṃ gacchaty eva na saṃśayaḥ || 7.111.21 ||

और जो इस रघुनाथ के सम्पूर्ण चरित्र को पढ़ता है, वह प्राणों के अंत होने पर निःसंदेह विष्णुलोक को ही प्राप्त होता है।

श्लोक 22 (uttara.111.22)

पिता पितामहस्तस्य तथैव प्रपितामहः । तत्पिता तत्पिता चैव विष्णुं यान्ति न संशयः ।। ७.१११.२२ ।।

pitā pitāmahas tasya tathaiva prapitāmahaḥ | tatpitā tatpitā caiva viṣṇuṃ yānti na saṃśayaḥ || 7.111.22 ||

उसके पिता, पितामह, तथा प्रपितामह, उसके भी पिता और उसके भी पिता -- ये सब भी निःसंदेह विष्णु को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 23 (uttara.111.23)

चतुर्वर्गप्रदं नित्यं चरितं राघवस्य तु । तस्माद्यत्नवता नित्यं श्रोतव्यं परमं सदा ।। ७.१११.२३ ।।

caturvargapradaṃ nityaṃ caritaṃ rāghavasya tu | tasmād yatnavatā nityaṃ śrotavyaṃ paramaṃ sadā || 7.111.23 ||

राघव का यह चरित्र सदा ही चतुर्वर्ग [धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष] को प्रदान करने वाला है; इसलिए प्रयत्नशील व्यक्ति को इसे सदा परम आदरपूर्वक सुनना चाहिए।

श्लोक 24 (uttara.111.24)

शृण्वन्रामायणं भक्त्या यः पादं पदमेव वा । स याति ब्रह्मणः स्थानं ब्रह्मणा पूज्यते सदा ।। ७.१११.२४ ।।

śṛṇvan rāmāyaṇaṃ bhaktyā yaḥ pādaṃ padam eva vā | sa yāti brahmaṇaḥ sthānaṃ brahmaṇā pūjyate sadā || 7.111.24 ||

जो भक्तिपूर्वक रामायण के एक चरण या एक पद को भी सुनता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है और सदा ब्रह्मा द्वारा पूजित होता है।

श्लोक 25 (uttara.111.25)

एवमेतत्पुरावृत्तमाख्यानं भद्रमस्तु वः । प्रव्याहरत विस्रब्धं बलं विष्णोः प्रवर्धताम् ।। ७.१११.२५ ।। इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे श्रीमद्वाल्मीकीये आदिकाव्ये चतुर्विंशत्सहस्रिकायां संहितायां श्रीमदुत्तरकाण्डे एकादशोत्तरशततमः सर्गः ।। १११ ।। इत्युत्तरकाण्डः समाप्तः ।। इत्यार्षे श्रीमद्वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीमद्रामायणं सम्पूर्णम् ।। श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ।।

evam etat purāvṛttam ākhyānaṃ bhadram astu vaḥ | pravyāharata visrabdhaṃ balaṃ viṣṇoḥ pravardhatām || 7.111.25 || iti ārṣe śrīmadrāmāyaṇe śrīmadvālmīkīye ādikāvye caturviṃśatsahasrikāyāṃ saṃhitāyāṃ śrīmaduttarakāṇḍe ekādaśottaraśatatamaḥ sargaḥ || 111 || iti uttarakāṇḍaḥ samāptaḥ || iti ārṣe śrīmadvālmīkīye ādikāvye śrīmadrāmāyaṇaṃ sampūrṇam || śrīsītārāmacandrārpaṇam astu ||

"इस प्रकार यह प्राचीन घटित आख्यान है; तुम्हारा कल्याण हो। निःशंक होकर इसका उच्चारण करो; विष्णु का बल सदा बढ़ता रहे।" इस प्रकार वाल्मीकि-रचित आदिकाव्य, श्रीमद्रामायण के, चौबीस सहस्र श्लोकों की संहिता में, श्रीमद् उत्तरकाण्ड का यह एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग है। इस प्रकार उत्तरकाण्ड समाप्त हुआ। इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित आदिकाव्य श्रीमद्रामायण सम्पूर्ण हुआ। यह श्री सीतारामचन्द्र को समर्पित हो।

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