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युद्धकाण्ड · सर्ग 111

मन्दोदरी का विलाप और रावण का अंत्येष्टि संस्कार

सर्ग 110सर्ग-सूचीसर्ग 112

श्लोक 1 (yuddha.111.1)

तासां विलपमानानां तदा राक्षसयोषिताम् । ज्येष्ठपत्नी प्रिया दीना भर्तारं समुदैक्षत ॥ 111.1 ॥

tāsāṃ vilapamānānāṃ tadā rākṣasayoṣitām | jyeṣṭhapatnī priyā dīnā bhartāraṃ samudaikṣata || 111.1 ||

जब वे राक्षस-स्त्रियाँ विलाप कर रही थीं, तब रावण की प्रिय और ज्येष्ठ पत्नी मन्दोदरी दुःखी होकर अपने पति को देखने लगीं।

श्लोक 2 (yuddha.111.2)

दशग्रीवं हतं दृष्ट्वा रामेणाचिन्त्यकर्मणा । पतिं मन्दोदरी तत्र कृपणा पर्यदेवयत् ॥ 111.2 ॥

daśagrīvaṃ hataṃ dṛṣṭvā rāmeṇācintyakarmaṇā | patiṃ mandodarī tatra kṛpaṇā paryadevayat || 111.2 ||

अचिन्त्य कर्म करने वाले राम द्वारा मारे गए अपने पति दशग्रीव को देखकर मन्दोदरी वहाँ करुण स्वर में विलाप करने लगीं।

श्लोक 3 (yuddha.111.3)

ननु नाम महाबाहो तव वैश्रवणानुज । क्रुद्धस्य प्रमुखे स्थातुं त्रस्यत्यपि पुरंदरः ॥ 111.3 ॥

nanu nāma mahābāho tava vaiśravaṇānuja | kruddhasya pramukhe sthātuṃ trasyatyapi puraṃdaraḥ || 111.3 ||

"हे महाबाहो! हे वैश्रवण के अनुज! क्रुद्ध होने पर तुम्हारे सामने खड़े होने में तो इन्द्र भी काँपते थे।"

श्लोक 4 (yuddha.111.4)

ऋषयश्च महीदेवा गन्धर्वाश्च यशस्विनः । ननु नाम तवोद्वेगाच्चारणाश्च दिशो गताः ॥ 111.4 ॥

ṛṣayaśca mahīdevā gandharvāśca yaśasvinaḥ | nanu nāma tavodvegāccāraṇāśca diśo gatāḥ || 111.4 ||

"ऋषिगण, ब्राह्मणदेव, यशस्वी गन्धर्व और चारण तुम्हारे भय से दिशाओं में भाग गए थे।"

श्लोक 5 (yuddha.111.5)

स त्वां मानुषमात्रेण रामेण युधि निर्जितः । न व्यपत्रपसे राजन् किमिदं राक्षसर्षभ ॥ 111.5 ॥

sa tvāṃ mānuṣamātreṇa rāmeṇa yudhi nirjitaḥ | na vyapatrapase rājan kimidaṃ rākṣasarṣabha || 111.5 ||

"वही तुम एक साधारण मनुष्य राम द्वारा युद्ध में पराजित हो गए — क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती, हे राजन्, हे राक्षसर्षभ? यह क्या हुआ?"

श्लोक 6 (yuddha.111.6)

कथं त्रैलोक्यमाक्रम्य श्रिया वीर्येण चान्वितम् । अविषह्यं जघान त्वां मानुषो वनगोचरः ॥ 111.6 ॥

kathaṃ trailokyamākramya śriyā vīryeṇa cānvitam | aviṣahyaṃ jaghāna tvāṃ mānuṣo vanagocaraḥ || 111.6 ||

"जो तुमने तीनों लोकों को जीत लिया था, जो श्री और पराक्रम से युक्त और अजेय थे, उस तुम्हें वन में विचरने वाला एक मनुष्य कैसे मार सका?"

श्लोक 7 (yuddha.111.7)

मानुषाणामविषये चरतः कामरूपिणः । विनाशस्तव रामेण संयुगे नोपपद्यते ॥ 111.7 ॥

mānuṣāṇāmaviṣaye carataḥ kāmarūpiṇaḥ | vināśastava rāmeṇa saṃyuge nopapadyate || 111.7 ||

"मनुष्यों की पहुँच से परे विचरण करने वाले और इच्छानुसार रूप धारण करने वाले तुम्हारा युद्ध में राम द्वारा विनाश होना संभव प्रतीत नहीं होता।"

श्लोक 8 (yuddha.111.8)

न चैतत् कर्म रामस्य श्रद्दधामि चमूमुखे । सर्वतः समुपेतस्य तव तेनाभिमर्शनम् ॥ 111.8 ॥

na caitat karma rāmasya śraddadhāmi camūmukhe | sarvataḥ samupetasya tava tenābhimarśanam || 111.8 ||

"मुझे विश्वास नहीं होता कि यह राम का ही कार्य था — कि उसने अकेले, चारों ओर से सुसज्जित तुम्हारी सेना के सम्मुख तुम पर आक्रमण किया हो।"

श्लोक 9 (yuddha.111.9)

यदैव च जनस्थाने राक्षनैर्बहुभिर्वृतः । खरस्तु हतो भ्राता तदैवानौ न मानुषः ॥ 111.9 ॥

yadaiva ca janasthāne rākṣanairbahubhirvṛtaḥ | kharastu hato bhrātā tadaivānau na mānuṣaḥ || 111.9 ||

"जिस क्षण जनस्थान में अनेक राक्षसों से घिरे हुए तुम्हारे भाई खर का वध हुआ, उसी क्षण यह स्पष्ट हो गया था कि वह मनुष्य नहीं है।"

श्लोक 10 (yuddha.111.10)

यदिअव नगरीं लङ्कां दुष्प्रवेशां सुरैरपि । प्रविष्टो हनुमान् वीर्यात् तदैव व्यथिता वयम् ॥ 111.10 ॥

yadiava nagarīṃ laṅkāṃ duṣpraveśāṃ surairapi | praviṣṭo hanumān vīryāt tadaiva vyathitā vayam || 111.10 ||

"जिस क्षण हनुमान अपने पराक्रम से, देवताओं के लिए भी दुष्प्रवेश्य लंका नगरी में प्रविष्ट हुए, उसी क्षण हम व्यथित हो गए थे।"

श्लोक 11 (yuddha.111.11)

यदिअव वानरैर्घोरैर्बद्दः सेतुर्महार्णवे । तदैव हृदयेनाहं शङ्के रामममानुषम् ॥ 111.11 ॥

yadiava vānarairghorairbaddaḥ seturmahārṇave | tadaiva hṛdayenāhaṃ śaṅke rāmamamānuṣam || 111.11 ||

"जिस क्षण भयंकर वानरों ने महासागर पर सेतु बाँधा, उसी क्षण मेरे हृदय में शंका हो गई थी कि राम मनुष्य नहीं हैं।"

श्लोक 12 (yuddha.111.12)

अथवा रामरूपेण कृतान्तः स्वयमागतः । मायां तव विनाशाय विधायाप्रतितर्किताम् ॥ 111.12 ॥

athavā rāmarūpeṇa kṛtāntaḥ svayamāgataḥ | māyāṃ tava vināśāya vidhāyāpratitarkitām || 111.12 ||

"अथवा स्वयं मृत्यु ही राम का रूप धारण कर, तुम्हारे विनाश के लिए एक अकल्पनीय माया रचकर आया है।"

श्लोक 13 (yuddha.111.13)

अथवा वासवेन त्वां धर्षितोऽसि महाबल । वासवस्य तु का शक्तिस्त्वां द्रष्टुमपि संयुगे ॥ 111.13 ॥

athavā vāsavena tvāṃ dharṣito'si mahābala | vāsavasya tu kā śaktistvāṃ draṣṭumapi saṃyuge || 111.13 ||

"अथवा, हे महाबल! क्या तुम इन्द्र द्वारा पराजित हुए हो — किंतु इन्द्र में तो युद्ध में तुम्हारी ओर देखने की भी सामर्थ्य कहाँ थी?"

श्लोक 14 (yuddha.111.14)

व्यक्तमेष महायोगी परमात्मा सनातनः । अनादिमध्यनिधनो महतः परमो महान् ॥ 111.14 ॥

vyaktameṣa mahāyogī paramātmā sanātanaḥ | anādimadhyanidhano mahataḥ paramo mahān || 111.14 ||

"स्पष्ट है कि यह राम कोई महायोगी, सनातन परमात्मा है — जिसका न आदि है, न मध्य, न अंत, जो महानों में भी महान है,

श्लोक 15 (yuddha.111.15)

तमसः परमो धाता शङ्खचक्रगदाधरः । श्रीवत्सवक्षा नित्यश्रीरजय्यः शाश्वतो ध्रुवः ॥ 111.15 ॥

tamasaḥ paramo dhātā śaṅkhacakragadādharaḥ | śrīvatsavakṣā nityaśrīrajayyaḥ śāśvato dhruvaḥ || 111.15 ||

अंधकार से परे, सबका पालनकर्ता, शंख-चक्र-गदाधारी, वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न धारण करने वाला, नित्य श्रीसंपन्न, अजेय, शाश्वत, अचल —

श्लोक 16 (yuddha.111.16)

मानुषं रूपमास्थाय विष्णुः सत्यपराक्रमः । सर्वैः परिवृतो देवैर्वानरत्वमुपागतैः ॥ 111.16 ॥

mānuṣaṃ rūpamāsthāya viṣṇuḥ satyaparākramaḥ | sarvaiḥ parivṛto devairvānaratvamupāgataiḥ || 111.16 ||

सत्यपराक्रमी स्वयं विष्णु, जिसने मानव रूप धारण किया है, और जो वानर-रूप धारण करने वाले समस्त देवताओं से घिरा हुआ है —

श्लोक 17 (yuddha.111.17)

सर्वलोकेश्वरः श्रीमान् लोकानां हितकाम्यया । सराक्षस परीवारम् हतवांस्त्वां महाद्युतिः ॥ 111.17 ॥

sarvalokeśvaraḥ śrīmān lokānāṃ hitakāmyayā | sarākṣasa parīvāram hatavāṃstvāṃ mahādyutiḥ || 111.17 ||

समस्त लोकों का ईश्वर, श्रीमान्, लोकों के हित की कामना से, अत्यंत तेजस्वी उस राम ने तुम्हें तुम्हारे राक्षस-परिवार सहित मार डाला है।"

श्लोक 18 (yuddha.111.18)

इन्द्रियाणि पुरा जित्वा जितन् त्रिभुवनं त्वया । स्मरद्भिरिव तद् वैरमिन्द्रियैरेव निर्जितः ॥ 111.18 ॥

indriyāṇi purā jitvā jitan tribhuvanaṃ tvayā | smaradbhiriva tad vairamindriyaireva nirjitaḥ || 111.18 ||

"पहले इन्द्रियों को जीतकर तुमने तीनों लोकों को जीता था; अब मानो उसी पुराने वैर का स्मरण करते हुए उन्हीं इन्द्रियों ने तुम्हें जीत लिया।"

श्लोक 19 (yuddha.111.19)

यदैव हि जनस्थाने राक्षसैर्बहुभिर्वृतः । खरस्तु हतो भ्राता तदैवासौ न मानुषः ॥ 111.19 ॥

yadaiva hi janasthāne rākṣasairbahubhirvṛtaḥ | kharastu hato bhrātā tadaivāsau na mānuṣaḥ || 111.19 ||

"जिस क्षण जनस्थान में अनेक राक्षसों से घिरे हुए तुम्हारे भाई खर का वध हुआ, उसी क्षण वह राम मनुष्य नहीं रहा —

श्लोक 20 (yuddha.111.20)

यदैव नगरीं लङ्कां दुष्प्रवेशां सुरैरपि । प्रविष्टो हनुमान् वीर्यात् तदैव व्यथिता वयम् ॥ 111.20 ॥

yadaiva nagarīṃ laṅkāṃ duṣpraveśāṃ surairapi | praviṣṭo hanumān vīryāt tadaiva vyathitā vayam || 111.20 ||

और जिस क्षण हनुमान अपने पराक्रम से देवताओं के लिए भी दुर्गम लंका नगरी में प्रविष्ट हुए, उसी क्षण हम व्यथित हो गए थे।"

श्लोक 21 (yuddha.111.21)

क्रियतामविरोधश्च राघवेणेति यन्मया । उच्यमानो न गृह्णासि तस्येयं व्युष्टिरागता ॥ 111.21 ॥

kriyatāmavirodhaśca rāghaveṇeti yanmayā | ucyamāno na gṛhṇāsi tasyeyaṃ vyuṣṭirāgatā || 111.21 ||

"यह विपत्ति तुम पर इसलिए आई है कि मेरे बार-बार यह कहने पर भी कि राघव से शत्रुता मत करो, तुमने मेरी बात नहीं मानी।"

श्लोक 22 (yuddha.111.22)

अकस्माच्चाभिकामोऽसि सीतां राक्षसपुङ्गव । ऐश्वर्यस्य विनाशाय देहस्य स्वजनस्य च ॥ 111.22 ॥

akasmāccābhikāmo'si sītāṃ rākṣasapuṅgava | aiśvaryasya vināśāya dehasya svajanasya ca || 111.22 ||

"हे राक्षसपुंगव! तुमने अचानक सीता की कामना कर ली, जो तुम्हारे ऐश्वर्य, शरीर और अपने ही जनों के विनाश का कारण बनी।"

श्लोक 23 (yuddha.111.23)

अरुन्धत्या विशिष्टां तान् रोहिण्याश्चापि दुर्मते । सीतां धर्षयता मान्यां त्वया ह्यसदृशं कृतम् ॥ 111.23 ॥

arundhatyā viśiṣṭāṃ tān rohiṇyāścāpi durmate | sītāṃ dharṣayatā mānyāṃ tvayā hyasadṛśaṃ kṛtam || 111.23 ||

"हे दुर्मते! अरुन्धती और रोहिणी से भी श्रेष्ठ, आदरणीय सीता का अपमान करके तुमने अपने योग्य नहीं, बल्कि निंदनीय कार्य किया।"

श्लोक 24 (yuddha.111.24)

वसुधाया हि वसुधां श्रियाः श्रीं भर्तृवत्सलाम् । सीतां सर्वानवद्याङ्गीमरण्ये विजने शुभाम् ॥ 111.24 ॥

vasudhāyā hi vasudhāṃ śriyāḥ śrīṃ bhartṛvatsalām | sītāṃ sarvānavadyāṅgīmaraṇye vijane śubhām || 111.24 ||

"सीता, जो धरती के समान सहनशील और लक्ष्मी के समान सुंदर हैं, अपने पति के प्रति अनुरक्त, समस्त अंगों में निर्दोष तथा शुभ हैं, जो सुनसान वन में रहते हुए भी —

श्लोक 25 (yuddha.111.25)

आनयित्वा तु तां दीनां छद्मनाऽऽत्मस्वदूषणम् । अप्राप्य तं चैव कामं मैथिलीसंगमे कृतम् । पतिव्रतायास्तपसा नूनं दग्धोऽसि मे प्रभो ॥ 111.25 ॥

ānayitvā tu tāṃ dīnāṃ chadmanā''tmasvadūṣaṇam | aprāpya taṃ caiva kāmaṃ maithilīsaṃgame kṛtam | pativratāyāstapasā nūnaṃ dagdho'si me prabho || 111.25 ||

उस दुःखिनी को छल से यहाँ लाकर तुमने स्वयं अपना ही विनाश किया, और मैथिली के साथ संगम की उस कामना को भी प्राप्त न कर सके — निश्चय ही, हे स्वामी, तुम उस पतिव्रता के तप से भस्म हो गए।"

श्लोक 26 (yuddha.111.26)

तदैव यन्न दग्धस्त्वं धर्षयंस्तनुमध्यमाम् । देवा बिभ्यति ते सर्वे सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ॥ 111.26 ॥

tadaiva yanna dagdhastvaṃ dharṣayaṃstanumadhyamām | devā bibhyati te sarve sendrāḥ sāgnipurogamāḥ || 111.26 ||

"उस क्षीण-कटि सीता पर बलपूर्वक हाथ डालते समय भी तुम भस्म नहीं हुए, यह केवल इसलिए कि इंद्र और अग्नि सहित सभी देवता तुमसे भयभीत थे।"

श्लोक 27 (yuddha.111.27)

अवश्यमेव लभते फलं पापस्य कर्मणः । घोरं पर्यागते काले कर्ता नास्त्यत्र संशयः ॥ 111.27 ॥

avaśyameva labhate phalaṃ pāpasya karmaṇaḥ | ghoraṃ paryāgate kāle kartā nāstyatra saṃśayaḥ || 111.27 ||

"समय आने पर पापकर्म करने वाला उसका भयंकर फल अवश्य भोगता है — इसमें कोई संदेह नहीं है।"

श्लोक 28 (yuddha.111.28)

शुभकृच्छुभमाप्नोति पापकृत् पापमश्नुते । विभीषणः सुखं प्राप्तस्त्वं प्राप्तः पापमीदृशम् ॥ 111.28 ॥

śubhakṛcchubhamāpnoti pāpakṛt pāpamaśnute | vibhīṣaṇaḥ sukhaṃ prāptastvaṃ prāptaḥ pāpamīdṛśam || 111.28 ||

"शुभ करने वाला शुभ पाता है, पाप करने वाला पाप भोगता है। विभीषण को सुख मिला, और तुम्हें ऐसा दुर्भाग्य प्राप्त हुआ।"

श्लोक 29 (yuddha.111.29)

सन्त्यन्याः प्रमदास्तुभ्यं रूपेणाभ्यधिकास्ततः । अनङ्गवशमापन्नस्त्वं तु मोहान्न बुद्ध्यसे ॥ 111.29 ॥

santyanyāḥ pramadāstubhyaṃ rūpeṇābhyadhikāstataḥ | anaṅgavaśamāpannastvaṃ tu mohānna buddhyase || 111.29 ||

"तुम्हारे लिए उससे भी अधिक सुंदर स्त्रियाँ उपलब्ध थीं; परंतु काम के वशीभूत होकर तुम मोहवश यह नहीं समझ सके।"

श्लोक 30 (yuddha.111.30)

न कुलेन न रूपेण न दाक्षिण्येन मैथिली । मयाधिका वा तुल्या वा त्वन् तु मोहान्न बुद्ध्यसे ॥ 111.30 ॥

na kulena na rūpeṇa na dākṣiṇyena maithilī | mayādhikā vā tulyā vā tvan tu mohānna buddhyase || 111.30 ||

"न कुल में, न रूप में, न सुशीलता में मैथिली मुझसे बढ़कर या मेरे समान है — परंतु यह भी तुम मोहवश नहीं समझ सके।"

श्लोक 31 (yuddha.111.31)

सर्वदा सर्वभूतानां नास्ति मृत्युरलक्षणः । तव तद्वदयं मृत्युर्मैथिलीकृतलक्षणः ॥ 111.31 ॥

sarvadā sarvabhūtānāṃ nāsti mṛtyuralakṣaṇaḥ | tava tadvadayaṃ mṛtyurmaithilīkṛtalakṣaṇaḥ || 111.31 ||

"किसी भी प्राणी की मृत्यु कभी बिना कारण नहीं होती; उसी प्रकार तुम्हारी यह मृत्यु मैथिली के निमित्त से चिह्नित है।"

श्लोक 32 (yuddha.111.32)

सीतानिमित्तजो मृत्युस्त्वया दूरादुपाहृतः । मैथिली सह रामेण विशोका विहरिष्यति ॥ 111.32 ॥

sītānimittajo mṛtyustvayā dūrādupāhṛtaḥ | maithilī saha rāmeṇa viśokā vihariṣyati || 111.32 ||

"सीता के निमित्त से उत्पन्न यह मृत्यु तुमने स्वयं दूर से बुला ली। अब मैथिली शोकरहित होकर राम के साथ विचरण करेंगी।"

श्लोक 33 (yuddha.111.33)

अल्पपुण्या त्वहं घोरे पतिता शोकसागरे । कैलासे मन्दरे मेरौ तदा चैत्ररथे वने ॥ 111.33 ॥

alpapuṇyā tvahaṃ ghore patitā śokasāgare | kailāse mandare merau tadā caitrarathe vane || 111.33 ||

"किंतु मैं, अल्पपुण्या, इस भीषण शोकसागर में डूब गई हूँ — मैं, जो कभी तुम्हारे साथ कैलास, मंदराचल, मेरु और चैत्ररथ वन में विचरण करती थी,

श्लोक 34 (yuddha.111.34)

देवोद्यानेषु सर्वेषु विहृत्य सहिता त्वया । विमानेनानुरूपेण या याम्यतुलया श्रिया ॥ 111.34 ॥

devodyāneṣu sarveṣu vihṛtya sahitā tvayā | vimānenānurūpeṇa yā yāmyatulayā śriyā || 111.34 ||

देवताओं के समस्त उद्यानों में तुम्हारे साथ उपयुक्त विमान में, अतुलनीय शोभा के साथ विचरण करती थी,

श्लोक 35 (yuddha.111.35)

पश्यन्ती विविधान् देशांस्तांस्तांश्चित्रस्रगम्बरा । भ्रंशिता कामभोगेभ्यः सास्मि वीरवधात्तव ॥ 111.35 ॥

paśyantī vividhān deśāṃstāṃstāṃścitrasragambarā | bhraṃśitā kāmabhogebhyaḥ sāsmi vīravadhāttava || 111.35 ||

नाना प्रकार के देशों को देखती, चित्र-वर्ण मालाओं और वस्त्रों से सुसज्जित — मैं आज, हे वीर, तुम्हारे वध से समस्त भोगों से वंचित हो गई हूँ।"

श्लोक 36 (yuddha.111.36)

हा राजन् सुकुमारं ते सुभ्रु सुत्वक्समुन्नसम् ॥ 111.36 ॥

hā rājan sukumāraṃ te subhru sutvaksamunnasam || 111.36 ||

"हाय राजन्! तुम्हारा वह कोमल मुख, सुंदर भौंहों, कोमल त्वचा, उन्नत नासिका से युक्त,

श्लोक 37 (yuddha.111.37)

कान्तिश्रीद्युतिभिस्तुल्यमिन्दुपद्मदिवाकरैः । किरीटकूटोज्ज्वलितं ताम्रास्यं दीप्तकुण्डलम् ॥ 111.37 ॥

kāntiśrīdyutibhistulyamindupadmadivākaraiḥ | kirīṭakūṭojjvalitaṃ tāmrāsyaṃ dīptakuṇḍalam || 111.37 ||

सौंदर्य, शोभा और कांति में चंद्रमा, कमल और सूर्य के समान, मुकुट से देदीप्यमान, ताम्र-वर्ण अधरों वाला, कुंडलों से चमकता हुआ,

श्लोक 38 (yuddha.111.38)

मदव्याकुललोलाक्षं भूत्वा यत्पानभूमिषु । विविधस्रग्धरं चारु वल्गुस्मितकथं शुभम् ॥ 111.38 ॥

madavyākulalolākṣaṃ bhūtvā yatpānabhūmiṣu | vividhasragdharaṃ cāru valgusmitakathaṃ śubham || 111.38 ||

मदिरालयों में मद से अलसाई, चंचल आँखों वाला, नाना मालाओं से सुशोभित, मनोहर, मधुर मुस्कान और वार्तालाप से सुशोभित —

श्लोक 39 (yuddha.111.39)

तदेवाद्य तवैवं हि वक्त्रं न भ्राजते प्रभो । रामसायकनिर्भिन्नं रक्तं रुधिरविस्रवैः । विशीर्णमेदोमस्तिष्कं रूक्षं स्यन्दनरेणुभिः ॥ 111.39 ॥

tadevādya tavaivaṃ hi vaktraṃ na bhrājate prabho | rāmasāyakanirbhinnaṃ raktaṃ rudhiravisravaiḥ | viśīrṇamedomastiṣkaṃ rūkṣaṃ syandanareṇubhiḥ || 111.39 ||

वही मुख आज, हे स्वामी, नहीं चमकता — राम के बाणों से बिंधा हुआ, रक्त की धाराओं से रक्तरंजित, मेद और मस्तिष्क बिखरा हुआ, रथों की धूल से रूखा।"

श्लोक 40 (yuddha.111.40)

हा पश्चिमा मे सम्प्राप्ता दशा वैधव्यदायिनी । या मयाऽऽसीन्न सम्बुद्धा कदाचिदपि मन्दया ॥ 111.40 ॥

hā paścimā me samprāptā daśā vaidhavyadāyinī | yā mayā''sīnna sambuddhā kadācidapi mandayā || 111.40 ||

"हाय! मेरी यह अंतिम, वैधव्य देने वाली दशा आ पहुँची — जिसकी कल्पना मैंने, मूढ़ ने, कभी भी नहीं की थी।"

श्लोक 41 (yuddha.111.41)

पिता दानवराजो मे भर्ता मे राक्षसेश्वरः । पुत्रो मे शक्रनिर्जेता इत्यहं गर्विता भृशम् ॥ 111.41 ॥

pitā dānavarājo me bhartā me rākṣaseśvaraḥ | putro me śakranirjetā ityahaṃ garvitā bhṛśam || 111.41 ||

"मेरे पिता दानवराज थे, मेरे पति राक्षसेश्वर थे, मेरा पुत्र इन्द्र का विजेता था — इस कारण मुझे अत्यंत गर्व था।"

श्लोक 42 (yuddha.111.42)

दृप्तारिमथनाः शूराः प्रख्यातबलपौरुषाः । अकुतश्चिद्भया नाथा ममेत्यासीन्मतिर्ध्रुवा ॥ 111.42 ॥

dṛptārimathanāḥ śūrāḥ prakhyātabalapauruṣāḥ | akutaścidbhayā nāthā mametyāsīnmatirdhruvā || 111.42 ||

"'मेरे रक्षक अभिमानी शत्रुओं के मर्दनकर्ता, बल और पराक्रम में विख्यात वीर हैं, जिन्हें किसी से कोई भय नहीं' — यही मेरी दृढ़ मान्यता थी।"

श्लोक 43 (yuddha.111.43)

तेषामेवंप्रभावाणां युष्माकं राक्षसर्षभाः । कथं भयमसम्बुद्धं मानुषादिदमागतम् ॥ 111.43 ॥

teṣāmevaṃprabhāvāṇāṃ yuṣmākaṃ rākṣasarṣabhāḥ | kathaṃ bhayamasambuddhaṃ mānuṣādidamāgatam || 111.43 ||

"हे राक्षसर्षभों! इतने प्रभावशाली होते हुए भी तुम पर एक साधारण मनुष्य से यह अनजाना भय कैसे आ पड़ा?"

श्लोक 44 (yuddha.111.44)

स्निग्धेन्द्रनीलनीलं तु प्रांशुशैलोपमं महत् ॥ 111.44 ॥

snigdhendranīlanīlaṃ tu prāṃśuśailopamaṃ mahat || 111.44 ||

"हे राजन्! तुम्हारा वह विशाल शरीर, स्निग्ध इन्द्रनील मणि के समान श्याम, ऊँचे पर्वत के समान महान्,

श्लोक 45 (yuddha.111.45)

केयूराङ्गदवैदूर्यमुक्ताहारस्रगुज्ज्वलम् । कान्तं विहारेष्वधिकं दीप्तं संग्रामभूमिषु ॥ 111.45 ॥

keyūrāṅgadavaidūryamuktāhārasragujjvalam | kāntaṃ vihāreṣvadhikaṃ dīptaṃ saṃgrāmabhūmiṣu || 111.45 ||

केयूर, अंगद, वैदूर्यमणि, मोतियों के हार और मालाओं से देदीप्यमान, विहार में और भी सुंदर, युद्धभूमि में और भी तेजोमय,

श्लोक 46 (yuddha.111.46)

भात्याभरणभाभिर्यद् विद्युद्भिरिव तोयदः । तदेवाद्य शरीरं ते तीक्ष्णैर्नैकशरैश्चितम् ॥ 111.46 ॥

bhātyābharaṇabhābhiryad vidyudbhiriva toyadaḥ | tadevādya śarīraṃ te tīkṣṇairnaikaśaraiścitam || 111.46 ||

जो अपने आभूषणों की आभा से बिजली से जगमगाते मेघ के समान चमकता था — वही तुम्हारा शरीर आज अनेक तीक्ष्ण बाणों से आच्छादित है।"

श्लोक 47 (yuddha.111.47)

पुनर्दुर्लभसंस्पर्शं परिष्वक्तुं न शक्यते । श्वाविधः शललैर्यद्वद् बाणैर्लग्नैर्निरन्तरम् ॥ 111.47 ॥

punardurlabhasaṃsparśaṃ pariṣvaktuṃ na śakyate | śvāvidhaḥ śalalairyadvad bāṇairlagnairnirantaram || 111.47 ||

"अब उसे छूना भी दुर्लभ है, आलिंगन करना तो असंभव ही — जैसे साही की पीठ काँटों से भरी हो, वैसे ही यह शरीर निरंतर बाणों से भरा है,

श्लोक 48 (yuddha.111.48)

स्वर्पितैर्मर्मसु भृशं संछिन्नस्नायुबन्धनम् । क्षितौ निपतितं राजन् श्यामं वै रुधिरच्छवि । वज्रप्रहाराभिहतो विकीर्ण इव पर्वतः ॥ 111.48 ॥

svarpitairmarmasu bhṛśaṃ saṃchinnasnāyubandhanam | kṣitau nipatitaṃ rājan śyāmaṃ vai rudhiracchavi | vajraprahārābhihato vikīrṇa iva parvataḥ || 111.48 ||

जो मर्मस्थलों में गहरे धँसे हुए हैं, जिसकी नसें कट चुकी हैं, हे राजन् — भूमि पर गिरा हुआ, अपने श्याम वर्ण को त्यागकर रक्तवर्ण हो गया, मानो वज्राघात से खंडित पर्वत हो।"

श्लोक 49 (yuddha.111.49)

हा स्वप्नः सत्यमेवेदं त्वां रामेण कथं हतः । त्वां मृत्योरपि मृत्युः स्याः कथं मृत्युवशं गतः ॥ 111.49 ॥

hā svapnaḥ satyamevedaṃ tvāṃ rāmeṇa kathaṃ hataḥ | tvāṃ mṛtyorapi mṛtyuḥ syāḥ kathaṃ mṛtyuvaśaṃ gataḥ || 111.49 ||

"हाय! क्या यह स्वप्न है, या यह सत्य ही है? तुम राम द्वारा कैसे मारे गए? तुम जो स्वयं मृत्यु के लिए भी मृत्यु थे, मृत्यु के वश में कैसे हो गए?"

श्लोक 50 (yuddha.111.50)

त्रैलोक्यवसुभोक्तारं त्रैलोक्योद्वेगदं महत् । जेतारं लोकपालानां क्षेप्तारं शंकरस्य च ॥ 111.50 ॥

trailokyavasubhoktāraṃ trailokyodvegadaṃ mahat | jetāraṃ lokapālānāṃ kṣeptāraṃ śaṃkarasya ca || 111.50 ||

"तुम, जो तीनों लोकों के ऐश्वर्य के भोक्ता थे, जिसने तीनों लोकों में भय फैलाया, लोकपालों के विजेता, शंकर तक को उखाड़ फेंकने वाले,

श्लोक 51 (yuddha.111.51)

दृप्तानां निग्रहीतारमाविष्कृतपराक्रमम् । लोकक्षोभयितारं च नादैर्भूतविराविणम् ॥ 111.51 ॥

dṛptānāṃ nigrahītāramāviṣkṛtaparākramam | lokakṣobhayitāraṃ ca nādairbhūtavirāviṇam || 111.51 ||

अभिमानियों के दमनकर्ता, अपने पराक्रम को प्रकट करने वाले, लोकों को क्षुब्ध करने वाले, अपनी गर्जना से प्राणियों को कँपाने वाले,

श्लोक 52 (yuddha.111.52)

ओजसा दृप्तवाक्यानां वक्तारं रिपुसंनिधौ । स्वयूथभृत्यगोप्तारं हन्तारंभीमकर्मणाम् ॥ 111.52 ॥

ojasā dṛptavākyānāṃ vaktāraṃ ripusaṃnidhau | svayūthabhṛtyagoptāraṃ hantāraṃbhīmakarmaṇām || 111.52 ||

जो अपने शत्रुओं के सामने भी ओजपूर्ण, गर्वीले वचन बोलते थे, अपने वर्ग और सेवकों के रक्षक, भीषण कर्म करने वालों के संहारक,

श्लोक 53 (yuddha.111.53)

हन्तारं दानवेन्द्राणां यक्षाणां च सहस्रशः । निवातकवचानां च निग्रहीतारमाहवे ॥ 111.53 ॥

hantāraṃ dānavendrāṇāṃ yakṣāṇāṃ ca sahasraśaḥ | nivātakavacānāṃ ca nigrahītāramāhave || 111.53 ||

दानवेन्द्रों और सहस्रों यक्षों के संहारक, युद्ध में निवातकवच राक्षसों के दमनकर्ता,

श्लोक 54 (yuddha.111.54)

नैकयज्ञविलोप्तारं त्रातारं स्वजनस्य च । धर्मव्यवस्थाभेत्तारं मायास्रष्टारमाहवे ॥ 111.54 ॥

naikayajñaviloptāraṃ trātāraṃ svajanasya ca | dharmavyavasthābhettāraṃ māyāsraṣṭāramāhave || 111.54 ||

अनेक यज्ञों के विध्वंसक, अपने जनों के त्राता, धर्म-व्यवस्था को तोड़ने वाले, युद्ध में माया रचने वाले,

श्लोक 55 (yuddha.111.55)

देवासुरनृकन्यानामाहर्तारं ततस्ततः । शत्रुस्त्रीशोकदातारं नेतारं स्वजनस्य च ॥ 111.55 ॥

devāsuranṛkanyānāmāhartāraṃ tatastataḥ | śatrustrīśokadātāraṃ netāraṃ svajanasya ca || 111.55 ||

देवताओं, असुरों और मनुष्यों की कन्याओं को यहाँ-वहाँ से हरने वाले, शत्रुओं की पत्नियों को शोक देने वाले, अपने जनों के नेता,

श्लोक 56 (yuddha.111.56)

लङ्काद्वीपस्य गोप्तारं कर्तारं भीमकर्मणाम् । अस्माकं कामभोगानां दातारं रथिनां वरम् ॥ 111.56 ॥

laṅkādvīpasya goptāraṃ kartāraṃ bhīmakarmaṇām | asmākaṃ kāmabhogānāṃ dātāraṃ rathināṃ varam || 111.56 ||

लंकाद्वीप के रक्षक, भीषण कर्मों के कर्ता, हमें समस्त इच्छित भोग देने वाले, रथियों में श्रेष्ठ —

श्लोक 57 (yuddha.111.57)

एवंप्रभावं भर्तारं दृष्ट्वा रामेण पातितम् । स्थिरास्मि या देहमिमं धारयामि हतप्रिया ॥ 111.57 ॥

evaṃprabhāvaṃ bhartāraṃ dṛṣṭvā rāmeṇa pātitam | sthirāsmi yā dehamimaṃ dhārayāmi hatapriyā || 111.57 ||

"ऐसे प्रभावशाली पति को राम द्वारा गिराया गया देखकर भी — मैं, जिसका प्रिय मारा गया, इतनी कठोर हूँ कि अब भी यह शरीर धारण किए हूँ।"

श्लोक 58 (yuddha.111.58)

शयनेषु महार्हेषु शयित्वा राक्षसेश्वर । इह कस्मात् प्रसुप्तोऽसि धरण्यां रेणुगुण्ठितः ॥ 111.58 ॥

śayaneṣu mahārheṣu śayitvā rākṣaseśvara | iha kasmāt prasupto'si dharaṇyāṃ reṇuguṇṭhitaḥ || 111.58 ||

"हे राक्षसेश्वर! जो कभी बहुमूल्य शय्याओं पर शयन करते थे, वे तुम आज यहाँ धूल से ढके, धरती पर क्यों सोए हो?"

श्लोक 59 (yuddha.111.59)

यदा ते तनयः शस्तो लक्ष्मणेनेन्द्रजिद् युधि । तदा त्वभिहता तीव्रमद्य त्वस्मिन् निपातिता ॥ 111.59 ॥

yadā te tanayaḥ śasto lakṣmaṇenendrajid yudhi | tadā tvabhihatā tīvramadya tvasmin nipātitā || 111.59 ||

"जब तुम्हारा पुत्र इन्द्रजित लक्ष्मण द्वारा युद्ध में मारा गया, तभी मुझे गहरा आघात लगा था — और अब इस पर मैं पूर्णतः ढह गई हूँ।"

श्लोक 60 (yuddha.111.60)

साहं बन्धुजनैर्हीना हीना नाथेन च त्वया । विहीना कामभोगैश्च शोचिष्ये शाश्वतीः समाः ॥ 111.60 ॥

sāhaṃ bandhujanairhīnā hīnā nāthena ca tvayā | vihīnā kāmabhogaiśca śociṣye śāśvatīḥ samāḥ || 111.60 ||

"अपने स्वजनों से रहित, और अब तुम्हारे, अपने स्वामी के बिना, समस्त सुखों से वंचित होकर मैं युगों-युगों तक शोक करती रहूँगी।"

श्लोक 61 (yuddha.111.61)

प्रपन्नो दीर्घमध्वानं राजन्नद्य सुदुर्गमम् । नय मामपि दुःखार्तां न वर्तिष्ये त्वया विना ॥ 111.61 ॥

prapanno dīrghamadhvānaṃ rājannadya sudurgamam | naya māmapi duḥkhārtāṃ na vartiṣye tvayā vinā || 111.61 ||

"हे राजन्! तुमने आज एक लंबी, अत्यंत दुर्गम यात्रा आरंभ कर दी है — मुझे भी, इस दुःख से पीड़ित को, साथ ले चलो; तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।"

श्लोक 62 (yuddha.111.62)

कस्मात् त्वं मां विहायेह कृपणां गन्तुमिच्छसि । दीनां विलपतीं मन्दां किं वा मां नाभिभाषसे ॥ 111.62 ॥

kasmāt tvaṃ māṃ vihāyeha kṛpaṇāṃ gantumicchasi | dīnāṃ vilapatīṃ mandāṃ kiṃ vā māṃ nābhibhāṣase || 111.62 ||

"तुम मुझ अभागिन को यहाँ छोड़कर क्यों जाना चाहते हो? विलाप करती हुई इस दीन, मंदबुद्धि को तुम उत्तर क्यों नहीं देते?"

श्लोक 63 (yuddha.111.63)

दृष्ट्वा न खल्वभिक्रुद्धो मामिहानवगुण्ठिताम् । निर्गतां नगरद्वारात् पद्भ्यामेवागतां प्रभो ॥ 111.63 ॥

dṛṣṭvā na khalvabhikruddho māmihānavaguṇṭhitām | nirgatāṃ nagaradvārāt padbhyāmevāgatāṃ prabho || 111.63 ||

"हे प्रभो! क्या तुम मुझे यहाँ इस प्रकार बिना घूँघट के, नगरद्वार से निकलकर पैदल आई हुई देखकर क्रुद्ध नहीं हो?"

श्लोक 64 (yuddha.111.64)

पश्येष्टदार दारांस्ते भ्रष्टलज्जावगुण्ठनान् । बहिर्निष्पतितान् सर्वान् कथं दृष्ट्वा न कुप्यसि ॥ 111.64 ॥

paśyeṣṭadāra dārāṃste bhraṣṭalajjāvaguṇṭhanān | bahirniṣpatitān sarvān kathaṃ dṛṣṭvā na kupyasi || 111.64 ||

"हे अपनी रानियों के प्रेमी! देखो, तुम्हारी सभी रानियाँ लज्जा और घूँघट त्यागकर बाहर निकल आई हैं — यह देखकर भी तुम्हें क्रोध क्यों नहीं आता?"

श्लोक 65 (yuddha.111.65)

अयम् क्रीडासहायस्तेऽनाथो लालप्यते जनः । न चैनमाश्वासयसि किं वा न बहुमन्यसे ॥ 111.65 ॥

ayam krīḍāsahāyaste'nātho lālapyate janaḥ | na cainamāśvāsayasi kiṃ vā na bahumanyase || 111.65 ||

"तुम्हारी क्रीड़ा-सहचरी यह स्त्री अनाथ के समान विलाप कर रही है — तुम इसे सांत्वना क्यों नहीं देते? क्या अब इसका तुम्हें कोई मूल्य नहीं?"

श्लोक 66 (yuddha.111.66)

यास्त्वया विधवा राजन् क्ऱिता नैकाः कुलस्त्रियः ॥ 111.66 ॥

yāstvayā vidhavā rājan kऱitā naikāḥ kulastriyaḥ || 111.66 ||

"हे राजन्! जिन अनेक कुलीन स्त्रियों को तुमने विधवा बनाया —

श्लोक 67 (yuddha.111.67)

पतिव्रता धर्मरता गुरुशुश्रूषणे रताः । ताभिः शोकाभितप्ताभिः शप्तः परवशं गतः । त्वया विप्रकृताभिश्च तदा शप्तं तदागतम् ॥ 111.67 ॥

pativratā dharmaratā guruśuśrūṣaṇe ratāḥ | tābhiḥ śokābhitaptābhiḥ śaptaḥ paravaśaṃ gataḥ | tvayā viprakṛtābhiśca tadā śaptaṃ tadāgatam || 111.67 ||

जो पतिव्रता, धर्मपरायणा और गुरुजनों की सेवा में रत थीं, उन्हीं शोकसंतप्त, तुम्हारे द्वारा सताई गई स्त्रियों ने तुम्हें शाप दिया था; उसी शाप के फलस्वरूप तुम आज इस दशा को प्राप्त हुए हो।"

श्लोक 68 (yuddha.111.68)

प्रवादः सत्यमेवायं त्वां प्रति प्रायशो नृप । पतिव्रतानां नाकस्मात् पतन्त्यश्रूणि भूतले ॥ 111.68 ॥

pravādaḥ satyamevāyaṃ tvāṃ prati prāyaśo nṛpa | pativratānāṃ nākasmāt patantyaśrūṇi bhūtale || 111.68 ||

"हे नृप! यह कहावत तुम्हारे विषय में सत्य सिद्ध हुई कि पतिव्रता स्त्रियों के आँसू पृथ्वी पर व्यर्थ नहीं गिरते।"

श्लोक 69 (yuddha.111.69)

कथं च नाम ते राजँल्लोकानाक्रम्य तेजसा । नारीचौर्यमिदं क्षुद्रं कृतं शौण्डीर्यमानिना ॥ 111.69 ॥

kathaṃ ca nāma te rājam̐llokānākramya tejasā | nārīcauryamidaṃ kṣudraṃ kṛtaṃ śauṇḍīryamāninā || 111.69 ||

"हे राजन्! जिसने अपने तेज से लोकों को जीत लिया और अपने पराक्रम पर इतना गर्व किया, उसने यह नारी-चोरी जैसा नीच कार्य कैसे किया?"

श्लोक 70 (yuddha.111.70)

अपनीयाश्रमाद् रामं यन्मृगच्छद्मना त्वया । आनीता रामपत्नी स तत्ते कातर्यलक्षणम् ॥ 111.70 ॥

apanīyāśramād rāmaṃ yanmṛgacchadmanā tvayā | ānītā rāmapatnī sa tatte kātaryalakṣaṇam || 111.70 ||

"मृग का छल रचकर तुमने राम को आश्रम से दूर किया और राम की पत्नी को हर लाए — यही तुम्हारी कायरता का प्रमाण था।"

श्लोक 71 (yuddha.111.71)

कातर्यं न च ते युद्धे कदाचित्संस्मराम्यहम् । तत्तु भाग्यविपर्यासान्नूनं ते पक्वलक्षणम् ॥ 111.71 ॥

kātaryaṃ na ca te yuddhe kadācitsaṃsmarāmyaham | tattu bhāgyaviparyāsānnūnaṃ te pakvalakṣaṇam || 111.71 ||

"फिर भी मुझे स्मरण नहीं आता कि युद्ध में तुम कभी कायर रहे हो — निश्चय ही वह तो तुम्हारे भाग्य के विपर्यय और परिपक्व होते दुष्कर्मों का लक्षण था।"

श्लोक 72 (yuddha.111.72)

अतीतानागतार्थज्ञो वर्तमानविचक्षणः ॥ 111.72 ॥

atītānāgatārthajño vartamānavicakṣaṇaḥ || 111.72 ||

"हे महाबाहो! मेरे देवर विभीषण, जो भूत और भविष्य के ज्ञाता तथा वर्तमान में भी दूरदर्शी हैं —

श्लोक 73 (yuddha.111.73)

मैथिलीमाहृतां दृष्ट्वा ध्यात्वा निःश्वस्य चायतम् । सत्यवाक् स महाबाहो देवरो मे यदब्रवीत् ॥ 111.73 ॥

maithilīmāhṛtāṃ dṛṣṭvā dhyātvā niḥśvasya cāyatam | satyavāk sa mahābāho devaro me yadabravīt || 111.73 ||

मैथिली को यहाँ बंदी बनाकर लाया हुआ देखकर, गहराई से विचार कर और लंबी साँस लेकर, उस सत्यवादी ने मुझसे कहा —

श्लोक 74 (yuddha.111.74)

अयन् राक्षसमुख्यानां विनाशः प्रत्युपस्थितः । कामक्रोधसमुत्थेन व्यसनेन प्रसङ्गिना ॥ 111.74 ॥

ayan rākṣasamukhyānāṃ vināśaḥ pratyupasthitaḥ | kāmakrodhasamutthena vyasanena prasaṅginā || 111.74 ||

'राक्षस-प्रमुखों का विनाश अब निकट आ पहुँचा है, जो काम और क्रोध से उत्पन्न इस अनर्थकारी आसक्ति के कारण हुआ है।'"

श्लोक 75 (yuddha.111.75)

निवृत्तस्त्वत्कृतेनार्थः सोऽयं मूलहरो महान् । त्वया कृतमिदं सर्वमनाथं रक्षसान् कुलम् ॥ 111.75 ॥

nivṛttastvatkṛtenārthaḥ so'yaṃ mūlaharo mahān | tvayā kṛtamidaṃ sarvamanāthaṃ rakṣasān kulam || 111.75 ||

"तुम्हारे ही कर्मों के कारण यह महान विपत्ति, जो हमारी जड़ ही उखाड़ फेंकती है, अब घटित हो गई है; तुम्हीं ने इस संपूर्ण राक्षसकुल को अनाथ कर दिया।"

श्लोक 76 (yuddha.111.76)

नहि त्वां शोचितव्यो मे प्रख्यातबलपौरुषः । स्त्रीस्वभावात् तु मे बुद्धिः कारुण्ये परिवर्तते ॥ 111.76 ॥

nahi tvāṃ śocitavyo me prakhyātabalapauruṣaḥ | strīsvabhāvāt tu me buddhiḥ kāruṇye parivartate || 111.76 ||

"तुम, अपने विख्यात बल और पराक्रम के कारण, मेरे शोक के योग्य नहीं हो; फिर भी स्त्री-स्वभाव के कारण मेरा मन करुणा की ओर मुड़ जाता है।"

श्लोक 77 (yuddha.111.77)

सुकृतं दुष्कृतं च त्वां गृहीत्वा स्वां गतिं गतः । आत्मानमनुशोचामि त्वद्विनाशेन दुःखिताम् ॥ 111.77 ॥

sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ ca tvāṃ gṛhītvā svāṃ gatiṃ gataḥ | ātmānamanuśocāmi tvadvināśena duḥkhitām || 111.77 ||

"अपने पुण्य और पाप को साथ लेकर तुम अपनी गति को प्राप्त हो गए; मैं तो तुम्हारे विनाश से दुःखी होकर अपने ही लिए शोक कर रही हूँ।"

श्लोक 78 (yuddha.111.78)

सुहृदां हितकामानां न श्रुतं वचनं त्वया । भ्रातॄणां चैव कात्स्र्न्येन हितमुक्तं दशानन ॥ 111.78 ॥

suhṛdāṃ hitakāmānāṃ na śrutaṃ vacanaṃ tvayā | bhrātṝṇāṃ caiva kāts‍‍rnyena hitamuktaṃ daśānana || 111.78 ||

"हे दशानन! तुमने अपने हितैषी मित्रों की बात नहीं सुनी, न ही अपने भाइयों द्वारा कहे गए हितकारी वचनों को पूर्णतः माना।"

श्लोक 79 (yuddha.111.79)

हेत्वर्थयुक्तं विधिवच्छ्रेयस्करमदारुणम् । विभीषणेनाभिहितं न कृतं हेतुमत् त्वया ॥ 111.79 ॥

hetvarthayuktaṃ vidhivacchreyaskaramadāruṇam | vibhīṣaṇenābhihitaṃ na kṛtaṃ hetumat tvayā || 111.79 ||

"विभीषण द्वारा दिया गया युक्तिसंगत, कारणसहित, विधिपूर्वक, कल्याणकारी और सौम्य परामर्श तुमने नहीं माना।"

श्लोक 80 (yuddha.111.80)

मारीचकुम्भकर्णाभ्यां वाक्यं मम पितुस्तथा । न श्रुतं वीर्यमत्तेन तस्येदं फलमीदृशम् ॥ 111.80 ॥

mārīcakumbhakarṇābhyāṃ vākyaṃ mama pitustathā | na śrutaṃ vīryamattena tasyedaṃ phalamīdṛśam || 111.80 ||

"अपने पराक्रम के मद में तुमने मारीच, कुंभकर्ण और मेरे पिता के वचनों को भी नहीं सुना — यह उसी का फल है।"

श्लोक 81 (yuddha.111.81)

नीलजीमूतसंकाश पीताम्बर शुभाङ्गद । स्वगात्राणि विनिक्षिप्य किं शेषे रुधिरावृतः ॥ 111.81 ॥

nīlajīmūtasaṃkāśa pītāmbara śubhāṅgada | svagātrāṇi vinikṣipya kiṃ śeṣe rudhirāvṛtaḥ || 111.81 ||

"हे नीले मेघ के समान श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, सुंदर अंगदों से सुशोभित! तुम अपने अंगों को यूँ फैलाए, रक्त से लथपथ क्यों पड़े हो?"

श्लोक 82 (yuddha.111.82)

प्रसुप्त इव शोकार्तां किं मां न प्रतिभाषसे । महावीर्यस्य दक्षस्य संयुगेष्वपलायिनः । यातुधानस्य दौहित्रीं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ 111.82 ॥

prasupta iva śokārtāṃ kiṃ māṃ na pratibhāṣase | mahāvīryasya dakṣasya saṃyugeṣvapalāyinaḥ | yātudhānasya dauhitrīṃ kiṃ māṃ na pratibhāṣase || 111.82 ||

"मानो गहरी नींद में सोए हुए, तुम मुझ शोकाकुल को उत्तर क्यों नहीं देते? महापराक्रमी, कुशल तथा युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले राक्षस सुमाली की इस दौहित्री को तुम उत्तर क्यों नहीं देते?"

श्लोक 83 (yuddha.111.83)

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे नवे परिभवे कृते । अद्य वै निर्भया लङ्कां प्रविष्टाः सूर्यरश्मयः ॥ 111.83 ॥

uttiṣṭhottiṣṭha kiṃ śeṣe nave paribhave kṛte | adya vai nirbhayā laṅkāṃ praviṣṭāḥ sūryaraśmayaḥ || 111.83 ||

"उठो, उठो! इस नए अपमान के बाद भी तुम क्यों पड़े हो? आज सूर्य की किरणें निर्भय होकर लंका में प्रविष्ट हो गई हैं।"

श्लोक 84 (yuddha.111.84)

येन सूदयसे शत्रून् समरे सूर्यवर्चसा ॥ 111.84 ॥

yena sūdayase śatrūn samare sūryavarcasā || 111.84 ||

"तुम्हारा वह गदा-आयुध, जो सूर्य के समान तेजस्वी, इंद्र के वज्र के समान था, जिससे तुम युद्ध में शत्रुओं का संहार करते थे —

श्लोक 85 (yuddha.111.85)

वज्रं वज्रधरस्येव सोऽयं ते सततार्चितः । रणे बहुप्रहरणो हेमजालपरिष्कृतः । परिघो व्यवकीर्णस्ते बाणैश्छिन्नः सहस्रधा ॥ 111.85 ॥

vajraṃ vajradharasyeva so'yaṃ te satatārcitaḥ | raṇe bahupraharaṇo hemajālapariṣkṛtaḥ | parigho vyavakīrṇaste bāṇaiśchinnaḥ sahasradhā || 111.85 ||

सदा तुम्हारे द्वारा पूजित, युद्ध में अनेक प्रहार करने वाला, स्वर्ण-जालों से सुसज्जित वह परिघ आज बाणों से खंडित होकर सहस्रों टुकड़ों में बिखर गया है।"

श्लोक 86 (yuddha.111.86)

प्रियामिवोपसंगृह्य किम् शेषे रणमेदिनीम् । अप्रियामिव कस्माच्च मां नेच्छस्यभिभाषितुम् ॥ 111.86 ॥

priyāmivopasaṃgṛhya kim śeṣe raṇamedinīm | apriyāmiva kasmācca māṃ necchasyabhibhāṣitum || 111.86 ||

"रणभूमि को प्रिया के समान आलिंगन किए हुए तुम क्यों पड़े हो? मुझसे बात करना क्यों नहीं चाहते, मानो मैं तुम्हें अप्रिय हो गई हूँ?"

श्लोक 87 (yuddha.111.87)

धिगस्तु हृदयं यस्या ममेदं न सहस्रधा । त्वयि पञ्चत्वमापन्ने फलते शोकपीडितम् ॥ 111.87 ॥

dhigastu hṛdayaṃ yasyā mamedaṃ na sahasradhā | tvayi pañcatvamāpanne phalate śokapīḍitam || 111.87 ||

"धिक्कार है मेरे इस हृदय को, जो शोक से पीड़ित होकर भी सहस्र टुकड़ों में नहीं फट गया, जबकि तुम पंचतत्त्व में विलीन हो चुके हो।"

श्लोक 88 (yuddha.111.88)

इत्येवं विलपन्ती सा बाष्पपर्याकुलेक्षणा । स्नेहोपस्कन्नहृदया तदा मोहमुपागमत् ॥ 111.88 ॥

ityevaṃ vilapantī sā bāṣpaparyākulekṣaṇā | snehopaskannahṛdayā tadā mohamupāgamat || 111.88 ||

इस प्रकार विलाप करती हुई, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली और स्नेह से आप्लावित हृदय वाली मन्दोदरी उसी क्षण मूर्च्छित हो गईं।

श्लोक 89 (yuddha.111.89)

कश्मलाभिहता सन्ना बभौ सा रावणोरसि । सन्ध्यानुरक्ते जलदे दीप्ता विद्युदिवोज्ज्वला ॥ 111.89 ॥

kaśmalābhihatā sannā babhau sā rāvaṇorasi | saṃdhyānurakte jalade dīptā vidyudivojjvalā || 111.89 ||

दुःख से अभिभूत होकर रावण की छाती पर गिरी हुई वे संध्या की लालिमा से रंजित मेघ में चमकती हुई विद्युत के समान शोभित हुईं।

श्लोक 90 (yuddha.111.90)

तथागतां समुत्थाप्य सपत्न्यस्तां भृशातुराः । पर्यवस्थापयामासू रुदत्यो रुदतीं भृशम् ॥ 111.90 ॥

tathāgatāṃ samutthāpya sapatnyastāṃ bhṛśāturāḥ | paryavasthāpayāmāsū rudatyo rudatīṃ bhṛśam || 111.90 ||

उस स्थिति में पड़ी हुई उन्हें उनकी सौतें, स्वयं अत्यंत व्यथित होकर, रोते हुए उठाकर सांत्वना देने लगीं।

श्लोक 91 (yuddha.111.91)

किं ते न विदिता देवि लोकानां स्थितिरध्रुवा । दशाविभागपर्याये राज्ञां वै चञ्चलाः श्रियाः ॥ 111.91 ॥

kiṃ te na viditā devi lokānāṃ sthitiradhruvā | daśāvibhāgaparyāye rājñāṃ vai cañcalāḥ śriyāḥ || 111.91 ||

"हे देवी! क्या आप नहीं जानतीं कि संसार की स्थिति कितनी अस्थिर है — भाग्य का चक्र बदलने पर राजाओं की समृद्धि भी चंचल हो जाती है?"

श्लोक 92 (yuddha.111.92)

इत्येवमुच्यमाना सा सशब्दं प्ररुरोद ह । स्नपयन्ती तदास्रेण स्तनौ वक्त्रं सुनिर्मलम् ॥ 111.92 ॥

ityevamucyamānā sā saśabdaṃ praruroda ha | snapayantī tadāsreṇa stanau vaktraṃ sunirmalam || 111.92 ||

इस प्रकार समझाई जाने पर भी वे उच्च स्वर में रोने लगीं और अपने आँसुओं से अपने वक्षस्थल तथा निर्मल मुख को भिगो दिया।

श्लोक 93 (yuddha.111.93)

एतस्मिन्नन्तरे रामो विभीषणमुवाच ह । संस्कारः क्रियतां भ्रातुः स्त्रियश्चैता निवर्तय ॥ 111.93 ॥

etasminnantare rāmo vibhīṣaṇamuvāca ha | saṃskāraḥ kriyatāṃ bhrātuḥ striyaścaitā nivartaya || 111.93 ||

इसी बीच राम ने विभीषण से कहा: "अपने भाई का अंत्येष्टि संस्कार करो, और इन स्त्रियों को वापस भेज दो।"

श्लोक 94 (yuddha.111.94)

तमुवाच ततो धीमान् विभीषण इदं वचः । विमृश्य बुद्ध्या धर्मज्ञो धर्मार्थसहितं हितम् ॥ 111.94 ॥

tamuvāca tato dhīmān vibhīṣaṇa idaṃ vacaḥ | vimṛśya buddhyā dharmajño dharmārthasahitaṃ hitam || 111.94 ||

तब बुद्धिमान, धर्मज्ञ विभीषण ने अपनी बुद्धि से विचार करके, धर्म और अर्थ से युक्त हितकारी वचन कहे।

श्लोक 95 (yuddha.111.95)

त्यक्तधर्मव्रतं क्रूरं नृशंसमनृतं तदा । नाहमर्हामि संस्कर्तुं परदाराभिमर्शनम् ॥ 111.95 ॥

tyaktadharmavrataṃ krūraṃ nṛśaṃsamanṛtaṃ tadā | nāhamarhāmi saṃskartuṃ paradārābhimarśanam || 111.95 ||

"जिसने धर्म-व्रत त्याग दिया, जो क्रूर, नृशंस, असत्यवादी और परस्त्री का अपमान करने वाला था, उसका संस्कार करने का मैं अधिकारी नहीं हूँ।"

श्लोक 96 (yuddha.111.96)

भ्रातृरूपो हि मे शत्रुरेष सर्वाहिते रतः । रावणो नार्हते पूजां पूज्योऽपि गुरुगौरवात् ॥ 111.96 ॥

bhrātṛrūpo hi me śatrureṣa sarvāhite rataḥ | rāvaṇo nārhate pūjāṃ pūjyo'pi gurugauravāt || 111.96 ||

"सबका अहित करने में रत यह रावण भाई के रूप में मेरा शत्रु ही है; गुरुजन होने के नाते सम्माननीय होते हुए भी वह आदर के योग्य नहीं है।"

श्लोक 97 (yuddha.111.97)

नृशंस इति मान् राम वक्ष्यन्ति मनुजा भुवि । श्रुत्वा तस्य गुणान्सर्वे वक्ष्यन्ति सुकृतं पुनः ॥ 111.97 ॥

nṛśaṃsa iti mān rāma vakṣyanti manujā bhuvi | śrutvā tasya guṇānsarve vakṣyanti sukṛtaṃ punaḥ || 111.97 ||

"हे राम! यदि मैं ऐसा नहीं करूँगा तो लोग मुझे निर्दयी कहेंगे; परंतु उसके गुणों को सुनकर सभी इसे पुनः एक सत्कर्म ही कहेंगे।"

श्लोक 98 (yuddha.111.98)

तच्छ्रुत्वा परमप्रीतो रामो धर्मभृतां वरः । विभीषणमुवाचेदं वाक्यज्ञं वाक्यकोविदः ॥ 111.98 ॥

tacchrutvā paramaprīto rāmo dharmabhṛtāṃ varaḥ | vibhīṣaṇamuvācedaṃ vākyajñaṃ vākyakovidaḥ || 111.98 ||

यह सुनकर धर्मपरायणों में श्रेष्ठ और वाणी में निपुण राम अत्यंत प्रसन्न हुए और वाणी के मर्मज्ञ विभीषण से यह वचन कहा।

श्लोक 99 (yuddha.111.99)

तवापि मे प्रियं कार्यं त्वत्प्रभावान्मया जितम् । अवश्यं तु क्षमं वाच्यो मया त्वां राक्षसेश्वर ॥ 111.99 ॥

tavāpi me priyaṃ kāryaṃ tvatprabhāvānmayā jitam | avaśyaṃ tu kṣamaṃ vācyo mayā tvāṃ rākṣaseśvara || 111.99 ||

"हे राक्षसेश्वर! मुझे भी तुम्हारा प्रिय करना है — तुम्हारे ही प्रभाव से मैंने यह विजय प्राप्त की है। फिर भी मुझे तुम्हें उचित बात अवश्य कहनी होगी।"

श्लोक 100 (yuddha.111.100)

अधर्मानृतसंयुक्तः कामं त्वेष निशाचरः । तेजस्वी बलवाञ्छूरः संग्रामेषु च नित्यशः ॥ 111.100 ॥

adharmānṛtasaṃyuktaḥ kāmaṃ tveṣa niśācaraḥ | tejasvī balavāñchūraḥ saṃgrāmeṣu ca nityaśaḥ || 111.100 ||

"यद्यपि यह राक्षस अधर्म और असत्य से युक्त था, तथापि यह तेजस्वी, बलवान और युद्धों में सदा शूरवीर भी था।"

श्लोक 101 (yuddha.111.101)

शतक्रतुमुखैर्देवैः श्रूयते न पराजितः । महात्मा बलसम्पन्नो रावणो लोकरावणः ॥ 111.101 ॥

śatakratumukhairdevaiḥ śrūyate na parājitaḥ | mahātmā balasampanno rāvaṇo lokarāvaṇaḥ || 111.101 ||

"सुना जाता है कि महात्मा, बलसंपन्न, लोकों को रुलाने वाला यह रावण इंद्र आदि देवताओं द्वारा भी कभी पराजित नहीं हुआ।"

श्लोक 102 (yuddha.111.102)

मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम् । क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥ 111.102 ॥

maraṇāntāni vairāṇi nirvṛttaṃ naḥ prayojanam | kriyatāmasya saṃskāro mamāpyeṣa yathā tava || 111.102 ||

"वैर मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है; हमारा प्रयोजन पूर्ण हो चुका है। इसका संस्कार करो — यह जितना तुम्हारा है, उतना ही अब मेरा भी है।"

श्लोक 103 (yuddha.111.103)

त्वत्सकाशान्महाबाहो सन्स्कारन् विधिपूर्वकम् । क्षिप्रमर्हति धर्मेण त्वां यशोभाग् भविष्यसि ॥ 111.103 ॥

tvatsakāśānmahābāho sanskāran vidhipūrvakam | kṣipramarhati dharmeṇa tvāṃ yaśobhāg bhaviṣyasi || 111.103 ||

"हे महाबाहो! तुम्हारे द्वारा शीघ्र ही विधिपूर्वक इसका संस्कार होना धर्मसंगत है, और इससे तुम्हें भी यश प्राप्त होगा।"

श्लोक 104 (yuddha.111.104)

राघवस्य वचः श्रुत्वा त्वरमाणो विभीषणः । सन्स्कारेणानुरूपेण भ्रातरं रावणं हतम् ॥ 111.104 ॥

rāghavasya vacaḥ śrutvā tvaramāṇo vibhīṣaṇaḥ | sanskāreṇānurūpeṇa bhrātaraṃ rāvaṇaṃ hatam || 111.104 ||

राघव के इन वचनों को सुनकर विभीषण ने बिना विलंब किए अपने मारे गए भाई रावण का यथोचित संस्कार आरंभ किया।

श्लोक 105 (yuddha.111.105)

स प्रविश्य पुरीं लङ्कां राक्षसेन्द्रो विभीषणः । रावणस्याग्निहोत्रं तु निर्यापयति सत्वरम् ॥ 111.105 ॥

sa praviśya purīṃ laṅkāṃ rākṣasendro vibhīṣaṇaḥ | rāvaṇasyāgnihotraṃ tu niryāpayati satvaram || 111.105 ||

लंका नगरी में प्रवेश कर राक्षसराज विभीषण ने रावण के अग्निहोत्र को शीघ्र ही बाहर मंगवाया।

श्लोक 106 (yuddha.111.106)

शकटान् दारुरूपाणि अग्नीन् वै याजकांस्तथा ॥ 111.106 ॥

śakaṭān dārurūpāṇi agnīn vai yājakāṃstathā || 111.106 ||

उन्होंने गाड़ियाँ, लकड़ी के भंडार, पवित्र अग्नियाँ और यज्ञ कराने वाले पुरोहितों को मंगवाया,

श्लोक 107 (yuddha.111.107)

तदा चन्दनकाष्ठानि काष्ठानि विविधानि च । अगरूणि सुगन्धीनि गन्धांश्च सुरभींस्तथा । मणिमुक्ताप्रवालानि निर्यापयति राक्षसः ॥ 111.107 ॥

tadā candanakāṣṭhāni kāṣṭhāni vividhāni ca | agarūṇi sugandhīni gandhāṃśca surabhīṃstathā | maṇimuktāpravālāni niryāpayati rākṣasaḥ || 111.107 ||

तथा चंदन की लकड़ियाँ, नाना प्रकार की काष्ठ, सुगंधित अगर, सुरभित द्रव्य, और मणि, मोती व मूँगे भी मंगवाए।

श्लोक 108 (yuddha.111.108)

आजगाम मुहूर्तेन राक्षसैः परिवारितः । ततो माल्यवता सार्धं क्रियामेव चकार सः ॥ 111.108 ॥

ājagāma muhūrtena rākṣasaiḥ parivāritaḥ | tato mālyavatā sārdhaṃ kriyāmeva cakāra saḥ || 111.108 ||

राक्षसों से घिरे हुए वे थोड़ी ही देर में लौट आए, और फिर मल्यवान् के साथ अंत्येष्टि क्रिया आरंभ की।

श्लोक 109 (yuddha.111.109)

सौवर्णीं शिबिकां दिव्यामारोप्य क्षौमवाससम् ॥ 111.109 ॥

sauvarṇīṃ śibikāṃ divyāmāropya kṣaumavāsasam || 111.109 ||

क्षौम वस्त्र पहनाए हुए राक्षसाधीश रावण को एक दिव्य स्वर्ण पालकी पर रखकर,

श्लोक 110 (yuddha.111.110)

रावणं राक्षसाधीशमश्रुवर्णमुखा द्विजाः । तूर्यघोषैश्च विविधैः स्तुवद्भिश्चाभिनन्दितम् ॥ 111.110 ॥

rāvaṇaṃ rākṣasādhīśamaśruvarṇamukhā dvijāḥ | tūryaghoṣaiśca vividhaiḥ stuvadbhiścābhinanditam || 111.110 ||

नाना वाद्यों की ध्वनि और स्तुतिपाठकों की वंदना के बीच, अश्रुपूर्ण मुख वाले ब्राह्मण उनके चारों ओर खड़े होकर,

श्लोक 111 (yuddha.111.111)

पताकाभिश्च चित्राभिः सुमनोभिश्च चित्रिताम् । उत्क्षिप्य शिबिकां तां तु विभीषणपुरोगमाः । दक्षिणाभिमुखाः सर्वे गृह्य काष्ठानि भेजिरे ॥ 111.111 ॥

patākābhiśca citrābhiḥ sumanobhiśca citritām | utkṣipya śibikāṃ tāṃ tu vibhīṣaṇapurogamāḥ | dakṣiṇābhimukhāḥ sarve gṛhya kāṣṭhāni bhejire || 111.111 ||

चित्र-विचित्र पताकाओं और फूलों से सजी उस पालकी को उठाकर, विभीषण को आगे कर, सभी ने काष्ठ लेकर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 112 (yuddha.111.112)

अग्नयो दीप्यमानास्ते तदाध्वर्युसमीरिताः । शरणाभिगताः सर्वे पुरस्तात् तस्य ते ययुः ॥ 111.112 ॥

agnayo dīpyamānāste tadādhvaryusamīritāḥ | śaraṇābhigatāḥ sarve purastāt tasya te yayuḥ || 111.112 ||

अध्वर्यु पुरोहितों द्वारा प्रज्वलित की गई वे अग्नियाँ पात्रों में रखकर उनके आगे-आगे ले जाई गईं।

श्लोक 113 (yuddha.111.113)

अन्तःपुराणि सर्वाणि रुदमानानि सत्वरम् । पृष्ठतोऽनुययुस्तानि प्लवमानानि सर्वतः ॥ 111.113 ॥

antaḥpurāṇi sarvāṇi rudamānāni satvaram | pṛṣṭhato'nuyayustāni plavamānāni sarvataḥ || 111.113 ||

अंतःपुर की सभी स्त्रियाँ रोती हुई, शीघ्रता से, हर ओर लड़खड़ाती हुई पीछे-पीछे चलीं।

श्लोक 114 (yuddha.111.114)

रावणं प्रयते देशे स्थाप्य ते भृशदुःखिताः ॥ 111.114 ॥

rāvaṇaṃ prayate deśe sthāpya te bhṛśaduḥkhitāḥ || 111.114 ||

रावण के शरीर को एक पवित्र स्थान पर रखकर, अत्यंत दुःखी होकर उन्होंने,

श्लोक 115 (yuddha.111.115)

चितां चन्दनकाष्ठैश्च पद्मकोशीरसंवृताम् । ब्राह्म्या संवर्तयामासू राङ्कवास्तरणावृताम् । वर्तते वेदविहितो राज्ञो वै पश्चिमः क्रतुः ॥ 111.115 ॥

citāṃ candanakāṣṭhaiśca padmakośīrasaṃvṛtām | brāhmyā saṃvartayāmāsū rāṅkavāstaraṇāvṛtām | vartate vedavihito rājño vai paścimaḥ kratuḥ || 111.115 ||

चंदन की लकड़ियों से, पद्मक और कोशीर सुगंधों से युक्त तथा हिरण-चर्म से आच्छादित एक पवित्र चिता बनाई — इस प्रकार राजा का वेदविहित अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।

श्लोक 116 (yuddha.111.116)

प्रचक्रू राक्षसेन्द्रस्य पितृमेधमनुत्तमम् । वेदिं च दक्षिणाप्राचीं यथास्थानं च पावकम् ॥ 111.116 ॥

pracakrū rākṣasendrasya pitṛmedhamanuttamam | vediṃ ca dakṣiṇāprācīṃ yathāsthānaṃ ca pāvakam || 111.116 ||

उन्होंने राक्षसराज का उत्तम पितृ-यज्ञ संपन्न किया, दक्षिण-पूर्व दिशा में वेदी बनाई और यथास्थान अग्नि स्थापित की।

श्लोक 117 (yuddha.111.117)

पृषदाज्येन सम्पूर्णं स्रुवं स्कन्धे प्रचिक्षिपुः । पादयोः शकटं प्रापुरूर्वोश्चोलूखलं तदा ॥ 111.117 ॥

pṛṣadājyena sampūrṇaṃ sruvaṃ skandhe pracikṣipuḥ | pādayoḥ śakaṭaṃ prāpurūrvoścolūkhalaṃ tadā || 111.117 ||

उन्होंने दही मिश्रित घृत से भरा स्रुव उनके कंधों पर रखा, पैरों पर एक गाड़ी और जाँघों पर एक ओखली रखी।

श्लोक 118 (yuddha.111.118)

दारुपात्राणि सर्वाणि अरणिं चोत्तरारणिम् । दत्त्वा तु मुसलं चान्यं यथास्थानं विचक्रमुः ॥ 111.118 ॥

dārupātrāṇi sarvāṇi araṇiṃ cottarāraṇim | dattvā tu musalaṃ cānyaṃ yathāsthānaṃ vicakramuḥ || 111.118 ||

सभी काष्ठपात्र, अरणि और उत्तरारणि, तथा मूसल आदि यथास्थान रखकर वे चिता की परिक्रमा करने लगे।

श्लोक 119 (yuddha.111.119)

शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च ॥ 111.119 ॥

śāstradṛṣṭena vidhinā maharṣivihitena ca || 111.119 ||

शास्त्रोक्त और महर्षियों द्वारा विहित विधि के अनुसार,

श्लोक 120 (yuddha.111.120)

तत्र मेध्यं पशुं हत्वा राक्षसेन्द्रस्य राक्षसाः । परिस्तरणिकां राज्ञो घृताक्तां समवेशयन् ॥ 111.120 ॥

tatra medhyaṃ paśuṃ hatvā rākṣasendrasya rākṣasāḥ | paristaraṇikāṃ rājño ghṛtāktāṃ samaveśayan || 111.120 ||

वहाँ राक्षसों ने एक यज्ञ-योग्य पशु का बलिदान किया और अपने राजा के शरीर पर घृत से सिक्त परिस्तरणिका बिछाई।

श्लोक 121 (yuddha.111.121)

गन्धैर्माल्यैरलंकृत्य रावणं दीनमानसाः ॥ 111.121 ॥

gandhairmālyairalaṃkṛtya rāvaṇaṃ dīnamānasāḥ || 111.121 ||

रावण के शरीर को गंध और मालाओं से अलंकृत करके, वे दुःखी राक्षस, विभीषण के साथ,

श्लोक 122 (yuddha.111.122)

विभीषणसहायास्ते वस्त्रैश्च विविधैरपि । लाजैरवकिरन्ति स्म बाष्पपूर्णमुखास्तथा ॥ 111.122 ॥

vibhīṣaṇasahāyāste vastraiśca vividhairapi | lājairavakiranti sma bāṣpapūrṇamukhāstathā || 111.122 ||

नाना प्रकार के वस्त्रों से भी उसे ढककर, अश्रुपूर्ण मुख से उस पर लाजा (भुने चावल) बिखेरने लगे।

श्लोक 123 (yuddha.111.123)

स ददौ पावकं तस्य विधियुक्तं विभीषणः । स्नात्वा चैवार्द्रवस्त्रेण तिलान् दर्भविमिश्रितान् ॥ 111.123 ॥

sa dadau pāvakaṃ tasya vidhiyuktaṃ vibhīṣaṇaḥ | snātvā caivārdravastreṇa tilān darbhavimiśritān || 111.123 ||

स्नान करके गीले वस्त्रों में ही विभीषण ने विधिपूर्वक चिता में अग्नि दी और दर्भ-मिश्रित तिल अर्पित किए,

श्लोक 124 (yuddha.111.124)

उदकेन च सम्मिश्रान् प्रदाय विधिपूर्वकम् । प्रदाय चोदकं तस्मै मूर्ध्ना चैनं नमस्य च ॥ 111.124 ॥

udakena ca sammiśrān pradāya vidhipūrvakam | pradāya codakaṃ tasmai mūrdhnā cainaṃ namasya ca || 111.124 ||

जल में मिलाकर विधिपूर्वक चढ़ाए; और उन्हें जलांजलि देकर तथा सिर झुकाकर प्रणाम करके,

श्लोक 125 (yuddha.111.125)

ताः स्त्रियोऽनुनयामास सान्त्वयित्वा पुनः पुनः । गम्यतामिति ताः सर्वा विविशुर्नगरं ततः ॥ 111.125 ॥

tāḥ striyo'nunayāmāsa sāntvayitvā punaḥ punaḥ | gamyatāmiti tāḥ sarvā viviśurnagaraṃ tataḥ || 111.125 ||

उन्होंने उन स्त्रियों को बार-बार सांत्वना देते हुए "चलिए" कहकर मनाया — तब वे सभी नगर में लौट गईं।

श्लोक 126 (yuddha.111.126)

प्रविष्टासु च सर्वासु राक्षसीषु विभीषणः । रामपार्श्वमुपागम्य समतिष्ठद् विनीतवत् ॥ 111.126 ॥

praviṣṭāsu ca sarvāsu rākṣasīṣu vibhīṣaṇaḥ | rāmapārśvamupāgamya samatiṣṭhad vinītavat || 111.126 ||

जब सभी राक्षस-स्त्रियाँ नगर में प्रवेश कर गईं, तब विभीषण राम के समीप आकर विनम्रतापूर्वक खड़े हो गए।

श्लोक 127 (yuddha.111.127)

रामोऽपि सह सैन्येन ससुग्रीवः सलक्ष्मणः । हर्षं लेभे रिपुं हत्वा यथा वृत्रं वज्रधरो यथा ॥ 111.127 ॥

rāmo'pi saha sainyena sasugrīvaḥ salakṣmaṇaḥ | harṣaṃ lebhe ripuṃ hatvā yathā vṛtraṃ vajradharo yathā || 111.127 ||

और राम भी अपनी सेना सहित, सुग्रीव और लक्ष्मण के साथ, शत्रु का वध करके वैसे ही हर्षित हुए जैसे वज्रधारी इंद्र वृत्रासुर का वध करके हर्षित हुए थे।

श्लोक 128 (yuddha.111.128)

ततो विमुक्त्वा सशरं शरासनं । महेन्द्रदत्तं कवचं च तन्महत् । विमुच्य रोषं रिपुनिग्रहात् ततो । रामः स सौम्यत्वमुपागतोऽरिहा ॥ 111.128 ॥

tato vimuktvā saśaraṃ śarāsanaṃ | mahendradattaṃ kavacaṃ ca tanmahat | vimucya roṣaṃ ripunigrahāt tato | rāmaḥ sa saumyatvamupāgato'rihā || 111.128 ||

तब अपने बाण सहित धनुष को तथा महेंद्र द्वारा दिए गए उस महान कवच को उतारकर, और शत्रु के पराभूत होने पर अपने क्रोध को भी त्यागकर, शत्रुघाती राम पुनः अपने सौम्य स्वभाव को प्राप्त हो गए।

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