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युद्धकाण्ड · सर्ग 112

विभीषण का राज्याभिषेक

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श्लोक 1 (yuddha.112.1)

ते रावणवधं दृष्ट्वा देवगन्धर्वदानवाः । जग्मुः स्वैः स्वैर्विमानैस्ते कथयन्तः शुभाः कथाः ॥ 112.1 ॥

te rāvaṇavadhaṃ dṛṣṭvā devagandharvadānavāḥ | jagmuḥ svaiḥ svairvimānaiste kathayantaḥ śubhāḥ kathāḥ || 112.1 ||

रावण के वध को देखकर वे देवता, गन्धर्व और दानव अपने-अपने विमानों में उस शुभ कथा को आपस में कहते हुए चले गए।

श्लोक 2 (yuddha.112.2)

रावणस्य वधं घोरं राघवस्य पराक्रमम् । सुयुद्धं वानराणां च सुग्रीवस्य च मन्त्रितम् ॥ 112.2 ॥

rāvaṇasya vadhaṃ ghoraṃ rāghavasya parākramam | suyuddhaṃ vānarāṇāṃ ca sugrīvasya ca mantritam || 112.2 ||

वे रावण के भयानक वध, राघव के पराक्रम, वानरों के उत्तम युद्ध और सुग्रीव की नीति-सलाह की चर्चा करते हुए,

श्लोक 3 (yuddha.112.3)

अनुरागं च वीर्यं च सौमित्रे र्लक्ष्मणस्य च । पतिव्रतात्वं सीताया हनूमति पराक्रमम् । कथयन्तो महाभागा जग्मुर्हृष्टा यथागतम् ॥ 112.3 ॥

anurāgaṃ ca vīryaṃ ca saumitre rlakṣmaṇasya ca | pativratātvaṃ sītāyā hanūmati parākramam | kathayanto mahābhāgā jagmurhṛṣṭā yathāgatam || 112.3 ||

सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण के अनुराग और पराक्रम की, सीता के पातिव्रत्य की तथा हनुमान के पराक्रम की भी चर्चा करते हुए — इस प्रकार परस्पर बातें करते हुए वे तेजस्वी देवगण अत्यंत हर्षित होकर जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 4 (yuddha.112.4)

राघवस्तु रथं दिव्यमिन्द्रदत्तं शिखिप्रभम् । अनुज्ञाप्य महाबाहुर्मातलिं प्रत्यपूजयत् ॥ 112.4 ॥

rāghavastu rathaṃ divyamindradattaṃ śikhiprabham | anujñāpya mahābāhurmātaliṃ pratyapūjayat || 112.4 ||

तत्पश्चात् महाबाहु राघव ने इन्द्र द्वारा दिए गए, अग्नि के समान तेजस्वी उस दिव्य रथ से विदा लेकर मातलि का सम्मानपूर्वक पूजन किया।

श्लोक 5 (yuddha.112.5)

राघवेणाभ्यनुज्ञातो मातलिः शक्रसारथिः । दिव्यं तं रथमास्थाय दिवमेवोत्पपात ह ॥ 112.5 ॥

rāghaveṇābhyanujñāto mātaliḥ śakrasārathiḥ | divyaṃ taṃ rathamāsthāya divamevotpapāta ha || 112.5 ||

राघव की अनुमति पाकर इन्द्र के सारथि मातलि उस दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर सीधे स्वर्गलोक की ओर उड़ चले।

श्लोक 6 (yuddha.112.6)

तस्मिंस्तु दिवमारूढे सरथे रथिनां वरः । राघवः परमप्रीतः सुग्रीवं परिषस्वजे ॥ 112.6 ॥

tasmiṃstu divamārūḍhe sarathe rathināṃ varaḥ | rāghavaḥ paramaprītaḥ sugrīvaṃ pariṣasvaje || 112.6 ||

जब मातलि अपने रथ सहित स्वर्ग की ओर चले गए, तब रथियों में श्रेष्ठ राघव अत्यंत प्रसन्न होकर सुग्रीव से गले मिले।

श्लोक 7 (yuddha.112.7)

परिष्वज्य च सुग्रीवं लक्ष्मणेनाभिवादितः । पूज्यमानो हरिगणैराजगाम बलालयम् ॥ 112.7 ॥

pariṣvajya ca sugrīvaṃ lakṣmaṇenābhivāditaḥ | pūjyamāno harigaṇairājagāma balālayam || 112.7 ||

सुग्रीव को गले लगाकर, लक्ष्मण द्वारा अभिवादन पाकर और वानर-समूहों द्वारा सम्मानित होते हुए वे सेना के शिविर में पहुँचे।

श्लोक 8 (yuddha.112.8)

अथोवाच स काकुत्स्थः समीपपरिवर्तिनम् । सौमित्रिं सत्त्वसम्पन्नं लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ॥ 112.8 ॥

athovāca sa kākutsthaḥ samīpaparivartinam | saumitriṃ sattvasampannaṃ lakṣmaṇaṃ śubhalakṣaṇam || 112.8 ||

तब काकुत्स्थ राम ने पास ही खड़े, बल-सम्पन्न और शुभ लक्षणों से युक्त सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण से कहा।

श्लोक 9 (yuddha.112.9)

विभीषणमिमं सौम्य लङ्कायामभिषेचय । अनुरक्तं च भक्तं च तथा पूर्वोपकारिणम् ॥ 112.9 ॥

vibhīṣaṇamimaṃ saumya laṅkāyāmabhiṣecaya | anuraktaṃ ca bhaktaṃ ca tathā pūrvopakāriṇam || 112.9 ||

"हे सौम्य! इस विभीषण का, जो हमारा अनुरागी और भक्त है तथा जिसने पहले भी हमारी सहायता की है, लंका के राज्य पर अभिषेक करो।"

श्लोक 10 (yuddha.112.10)

एष मे परमः कामो यदिमं रावणानुजम् । लङ्कायां सौम्य पश्येयमभिषिक्तं विभीषणम् ॥ 112.10 ॥

eṣa me paramaḥ kāmo yadimaṃ rāvaṇānujam | laṅkāyāṃ saumya paśyeyamabhiṣiktaṃ vibhīṣaṇam || 112.10 ||

"हे सौम्य! मेरी सबसे बड़ी अभिलाषा यही है कि मैं रावण के इस भाई विभीषण को लंका के सिंहासन पर अभिषिक्त देखूँ।"

श्लोक 11 (yuddha.112.11)

एवमुक्तस्तु सौमित्री राघवेण महात्मना । तथेत्युक्त्वा सुसंहृष्टः सौवर्णं घटमाददे ॥ 112.11 ॥

evamuktastu saumitrī rāghaveṇa mahātmanā | tathetyuktvā susaṃhṛṣṭaḥ sauvarṇaṃ ghaṭamādade || 112.11 ||

महात्मा राघव के इस प्रकार कहने पर सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण ने "ऐसा ही हो" कहकर अत्यंत हर्षपूर्वक एक स्वर्ण-कलश उठा लिया।

श्लोक 12 (yuddha.112.12)

तं घटं वानरेन्द्राणां हस्ते दत्त्वा मनोजवान् । व्यादिदेश महासत्त्वान् समुद्रसलिलं तदा ॥ 112.12 ॥

taṃ ghaṭaṃ vānarendrāṇāṃ haste dattvā manojavān | vyādideśa mahāsattvān samudrasalilaṃ tadā || 112.12 ||

उस कलश को वानरराजों के हाथों में देकर उस महाबली लक्ष्मण ने मन के समान वेगवान् और महाबलशाली वानरों को समुद्र-जल लाने की आज्ञा दी।

श्लोक 13 (yuddha.112.13)

अतिशीघ्रं ततो गत्वा वानरास्ते मनोजवाः । आगतास्तु जलं गृह्य समुद्राद् वानरोत्तमाः ॥ 112.13 ॥

atiśīghraṃ tato gatvā vānarāste manojavāḥ | āgatāstu jalaṃ gṛhya samudrād vānarottamāḥ || 112.13 ||

तब वे मन के समान वेगवान् श्रेष्ठ वानर अत्यंत शीघ्रता से जाकर समुद्र से जल लेकर लौट आए।

श्लोक 14 (yuddha.112.14)

ततस्त्वेकं घटं गृह्य संस्थाप्य परमासने ॥ 112.14 ॥

tatastvekaṃ ghaṭaṃ gṛhya saṃsthāpya paramāsane || 112.14 ||

तत्पश्चात् एक कलश लेकर और विभीषण को उत्तम सिंहासन पर बिठाकर,

श्लोक 15 (yuddha.112.15)

घटेन तेन सौमित्रिरभ्यषिञ्चद् विभीषणम् । लङ्कायां रक्षसां मध्ये राजानं रामशासनात् । विधिना मन्त्रदृष्टेन सुहृद्गणसमावृतम् ॥ 112.15 ॥

ghaṭena tena saumitrirabhyaṣiñcad vibhīṣaṇam | laṅkāyāṃ rakṣasāṃ madhye rājānaṃ rāmaśāsanāt | vidhinā mantradṛṣṭena suhṛdgaṇasamāvṛtam || 112.15 ||

सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण ने, अपने मित्रों से घिरे हुए, उस कलश के जल से, मन्त्रविधि के अनुसार, राक्षसों के मध्य, राम की आज्ञा से विभीषण को लंका के राजा के रूप में अभिषिक्त किया।

श्लोक 16 (yuddha.112.16)

अभ्यषिञ्चस्तदा सर्वे राक्षसा वानरास्तथा । प्रहर्षमतुलं गत्वा तुष्टुवू राममेव ह ॥ 112.16 ॥

abhyaṣiñcastadā sarve rākṣasā vānarāstathā | praharṣamatulaṃ gatvā tuṣṭuvū rāmameva ha || 112.16 ||

तब सभी राक्षसों और वानरों ने भी विभीषण का अभिषेक किया, और अत्यंत हर्ष से भरकर उन्होंने राम की ही स्तुति की।

श्लोक 17 (yuddha.112.17)

तस्यामात्या जहृषिरे भक्ता ये चास्य राक्षसाः । दृष्ट्वाभिषिक्तं लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ॥ 112.17 ॥

tasyāmātyā jahṛṣire bhaktā ye cāsya rākṣasāḥ | dṛṣṭvābhiṣiktaṃ laṅkāyāṃ rākṣasendraṃ vibhīṣaṇam || 112.17 ||

विभीषण के मन्त्रीगण और उसके प्रति भक्ति रखने वाले जो राक्षस थे, वे राक्षसराज विभीषण को लंका के सिंहासन पर अभिषिक्त देखकर हर्षित हो उठे।

श्लोक 18 (yuddha.112.18)

राघवः परमां प्रीतिं जगाम सहलक्ष्मणः । स तद् राज्यं महत् प्राप्य रामदत्तं विभीषणः ॥ 112.18 ॥

rāghavaḥ paramāṃ prītiṃ jagāma sahalakṣmaṇaḥ | sa tad rājyaṃ mahat prāpya rāmadattaṃ vibhīṣaṇaḥ || 112.18 ||

राघव लक्ष्मण सहित परम प्रसन्नता को प्राप्त हुए, और राम द्वारा दिए गए उस महान राज्य को पाकर विभीषण भी अत्यंत आनंदित हुए।

श्लोक 19 (yuddha.112.19)

प्रकृतीः सान्त्ययित्वा च ततो राममुपागमत् ॥ 112.19 ॥

prakṛtīḥ sāntyayitvā ca tato rāmamupāgamat || 112.19 ||

अपनी प्रजा को सांत्वना देकर विभीषण तत्पश्चात् राम के पास आए।

श्लोक 20 (yuddha.112.20)

दध्यक्षतान् मोदकांश्च लाजाः सुमनसस्तथा । आजह्रुरथ संहृष्टाः पौरास्तस्मै निशाचराः ॥ 112.20 ॥

dadhyakṣatān modakāṃśca lājāḥ sumanasastathā | ājahruratha saṃhṛṣṭāḥ paurāstasmai niśācarāḥ || 112.20 ||

नगर में रहने वाले राक्षस अत्यंत प्रसन्न होकर उनके लिए दही, अक्षत, मोदक, लाजा (भुने चावल) और फूल भेंट स्वरूप ले आए।

श्लोक 21 (yuddha.112.21)

स तान् गृहीत्वा दुर्धर्षो राघवाय न्यवेदयत् । मङ्गल्यं मङ्गलं सर्वं लक्ष्मणाय च वीर्यवान् ॥ 112.21 ॥

sa tān gṛhītvā durdharṣo rāghavāya nyavedayat | maṅgalyaṃ maṅgalaṃ sarvaṃ lakṣmaṇāya ca vīryavān || 112.21 ||

उन्हें ग्रहण करके उस अजेय, पराक्रमी विभीषण ने वे सभी शुभ मंगल-द्रव्य प्रसन्नतापूर्वक राम और लक्ष्मण को अर्पित किए।

श्लोक 22 (yuddha.112.22)

कृतकार्यं समृद्धार्थं दृष्ट्वा रामो विभीषणम् । प्रतिजग्राह तत् सर्वं तस्यैव प्रतिकाम्यया ॥ 112.22 ॥

kṛtakāryaṃ samṛddhārthaṃ dṛṣṭvā rāmo vibhīṣaṇam | pratijagrāha tat sarvaṃ tasyaiva pratikāmyayā || 112.22 ||

अपना कार्य सिद्ध कर चुके, समृद्ध विभीषण को देखकर राम ने केवल उन्हें प्रसन्न करने की इच्छा से वह सब कुछ ग्रहण कर लिया।

श्लोक 23 (yuddha.112.23)

ततह् शैलोपमं वीरं प्राञ्जलिं प्रणतं स्थितम् । उवाचेदं वचो रामो हनूमन्तं प्लवङ्गमम् ॥ 112.23 ॥

tatah śailopamaṃ vīraṃ prāñjaliṃ praṇataṃ sthitam | uvācedaṃ vaco rāmo hanūmantaṃ plavaṅgamam || 112.23 ||

तत्पश्चात् राम ने, पर्वत के समान विशालकाय, हाथ जोड़े विनम्रतापूर्वक खड़े वीर वानर हनुमान से यह वचन कहा।

श्लोक 24 (yuddha.112.24)

अनुज्ञाप्य महाराजमिमं सौम्य विभीषणम् । प्रविश्य नगरीं लङ्कां कौशलं ब्रूहि मैथिलीम् ॥ 112.24 ॥

anujñāpya mahārājamimaṃ saumya vibhīṣaṇam | praviśya nagarīṃ laṅkāṃ kauśalaṃ brūhi maithilīm || 112.24 ||

"हे सौम्य! इस महाराज विभीषण से अनुमति लेकर लंका नगरी में प्रवेश करो और मैथिली सीता को हमारी कुशलता का समाचार सुनाओ।"

श्लोक 25 (yuddha.112.25)

वैदेह्यै मां कुशलिनं सुग्रीवं च सलक्ष्मणम् । आचक्ष्व वदतां श्रेष्ठ रावणं च हतं रणे ॥ 112.25 ॥

vaidehyai māṃ kuśalinaṃ sugrīvaṃ ca salakṣmaṇam | ācakṣva vadatāṃ śreṣṭha rāvaṇaṃ ca hataṃ raṇe || 112.25 ||

"हे वाणी में श्रेष्ठ हनुमान! वैदेही से कहो कि मैं, लक्ष्मण सहित, और सुग्रीव सब कुशल हैं, और यह भी कि रावण युद्ध में मारा जा चुका है।"

श्लोक 26 (yuddha.112.26)

प्रियमेतदुदाहृत्य वैदेह्यास्त्वं हरीश्वर । प्रतिगृह्य च संदेशमुपावर्तितुमर्हसि ॥ 112.26 ॥

priyametadudāhṛtya vaidehyāstvaṃ harīśvara | pratigṛhya ca saṃdeśamupāvartitumarhasi || 112.26 ||

"हे वानरेश्वर! यह प्रिय समाचार वैदेही को सुनाकर तुम्हें उनका संदेश लेकर लौट आना चाहिए।"

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