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युद्धकाण्ड · सर्ग 122

पुष्पक-आरोहण

सर्ग 121सर्ग-सूचीसर्ग 123

श्लोक 1 (yuddha.122.1)

उपस्थितं तु तं कृत्वा पुष्पकं पुष्पभूषितम्। अविदूरे स्थितो राममित्युवाच विभीषणः॥ 122.1 ॥

upasthitaṃ tu taṃ kṛtvā puṣpakaṃ puṣpabhūṣitam| avidūre sthito rāmamityuvāca vibhīṣaṇaḥ|| 122.1 ||

उस फूलों से सजे हुए पुष्पक विमान को उपस्थित कराकर, समीप ही खड़े विभीषण ने राम से कहा —

श्लोक 2 (yuddha.122.2)

स तु बद्धाञ्जलिपुटो विनीतो राक्षसेश्वरः। अब्रवीत् त्वरयोपेतः किं करोमीति राघवम्॥ 122.2 ॥

sa tu baddhāñjalipuṭo vinīto rākṣaseśvaraḥ| abravīt tvarayopetaḥ kiṃ karomīti rāghavam|| 122.2 ||

विनम्र और हाथ जोड़े हुए वह राक्षसेश्वर उतावलेपन से राघव से बोला, "अब मैं और क्या करूँ?"

श्लोक 3 (yuddha.122.3)

तमब्रवीन्महातेजा लक्ष्मणस्योपशृण्वतः। विमृश्य राघवो वाक्यमिदं स्नेहपुरस्कृतम्॥ 122.3 ॥

tamabravīnmahātejā lakṣmaṇasyopaśṛṇvataḥ| vimṛśya rāghavo vākyamidaṃ snehapuraskṛtam|| 122.3 ||

लक्ष्मण के सुनते हुए महातेजस्वी राघव ने विचार करके उससे स्नेहपूर्ण यह वचन कहा —

श्लोक 4 (yuddha.122.4)

कृतप्रयत्नकर्माणः सर्व एव वनौकसः। रत्नैरर्थैश्च विविधैः सम्पूज्यन्तां विभीषण॥ 122.4 ॥

kṛtaprayatnakarmāṇaḥ sarva eva vanaukasaḥ| ratnairarthaiśca vividhaiḥ sampūjyantāṃ vibhīṣaṇa|| 122.4 ||

"हे विभीषण, जिन वनवासियों ने पूरे परिश्रम से यह कार्य किया है, उन सबको बहुमूल्य रत्नों और नाना धन से भलीभाँति सम्मानित करो।

श्लोक 5 (yuddha.122.5)

सहामीभिस्त्वया लङ्का निर्जिता राक्षसेश्वर। हृष्टैः प्राणभयं त्यक्त्वा संग्रामेष्वनिवर्तिभिः॥ 122.5 ॥

sahāmībhistvayā laṅkā nirjitā rākṣaseśvara| hṛṣṭaiḥ prāṇabhayaṃ tyaktvā saṃgrāmeṣvanivartibhiḥ|| 122.5 ||

हे राक्षसेश्वर, तुमने इन्हीं के साथ मिलकर लंका पर विजय पाई है — इन प्राणभय त्यागकर आनन्दपूर्वक युद्धों में पीठ न दिखाने वालों के साथ।

श्लोक 6 (yuddha.122.6)

त इमे कृतकर्माणः सर्व एव वनौकसः। धनरत्नप्रदानैश्च कर्मैषां सफलं कुरु॥ 122.6 ॥

ta ime kṛtakarmāṇaḥ sarva eva vanaukasaḥ| dhanaratnapradānaiśca karmaiṣāṃ saphalaṃ kuru|| 122.6 ||

इन सभी वनवासियों ने अपना कार्य पूरा किया है, धन और रत्नों के दान से इनके इस कर्म को सफल बनाओ।

श्लोक 7 (yuddha.122.7)

एवं सम्मानिताश्चैते नन्द्यमाना यथा त्वया। भविष्यन्ति कृतज्ञेन निर्वृता हरियूथपाः॥ 122.7 ॥

evaṃ sammānitāścaite nandyamānā yathā tvayā| bhaviṣyanti kṛtajñena nirvṛtā hariyūthapāḥ|| 122.7 ||

इस प्रकार तुम्हारे द्वारा सम्मानित और अभिनन्दित होकर ये वानर-सेनापति तुम्हें कृतज्ञ जानकर सुखी होंगे।

श्लोक 8 (yuddha.122.8)

त्यागिनं संग्रहीतारं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम्। सर्वे त्वामभिगच्छन्ति ततः सम्बोधयामि ते॥ 122.8 ॥

tyāginaṃ saṃgrahītāraṃ sānukrośaṃ jitendriyam| sarve tvāmabhigacchanti tataḥ sambodhayāmi te|| 122.8 ||

त्यागी, सबको साथ रखने वाले, दयालु और जितेन्द्रिय के पास ही सब आते हैं — इसीलिए मैं तुम्हें यह स्मरण कराता हूँ।

श्लोक 9 (yuddha.122.9)

हीनं रतिगुणैः सर्वैरभिहन्तारमाहवे। सेना त्यजति संविग्ना नृपतिं तं नरेश्वर॥ 122.9 ॥

hīnaṃ ratiguṇaiḥ sarvairabhihantāramāhave| senā tyajati saṃvignā nṛpatiṃ taṃ nareśvara|| 122.9 ||

हे नरेश्वर, जो राजा प्रेम के सभी गुणों से रहित है और युद्ध में केवल संहार ही करता है, उसे उद्विग्न सेना त्याग देती है।"

श्लोक 10 (yuddha.122.10)

एवमुक्तस्तु रामेण वानरांस्तान् विभीषणः। रत्नार्थसंविभागेन सर्वानेवाभ्यपूजयत्॥ 122.10 ॥

evamuktastu rāmeṇa vānarāṃstān vibhīṣaṇaḥ| ratnārthasaṃvibhāgena sarvānevābhyapūjayat|| 122.10 ||

राम के इस प्रकार कहने पर विभीषण ने रत्न और धन बाँटकर उन सब वानरों को सम्मानित किया।

श्लोक 11 (yuddha.122.11)

ततस्तान् पूजितान् दृष्ट्वा रत्नार्थैर्हरियूथपान्। आरुरोह तदा रामस्तद् विमानमनुत्तमम्॥ 122.11 ॥

tatastān pūjitān dṛṣṭvā ratnārthairhariyūthapān| āruroha tadā rāmastad vimānamanuttamam|| 122.11 ||

तदनन्तर उन वानर-सेनापतियों को रत्नों और धन से सम्मानित देखकर राम उस उत्तम विमान पर आरूढ़ हुए।

श्लोक 12 (yuddha.122.12)

अङ्केनादाय वैदेहीं लज्जमानां मनस्विनीम्। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विक्रान्तेन धनुष्मता॥ 122.12 ॥

aṅkenādāya vaidehīṃ lajjamānāṃ manasvinīm| lakṣmaṇena saha bhrātrā vikrāntena dhanuṣmatā|| 122.12 ||

लज्जाशील और मनस्विनी वैदेही को गोद में लेकर, धनुर्धर और पराक्रमी भाई लक्ष्मण के साथ,

श्लोक 13 (yuddha.122.13)

अब्रवीत् स विमानस्थः पूजयन् सर्ववानरान्। सुग्रीवं च महावीर्यं काकुत्स्थः सविभीषणम्॥ 122.13 ॥

abravīt sa vimānasthaḥ pūjayan sarvavānarān| sugrīvaṃ ca mahāvīryaṃ kākutsthaḥ savibhīṣaṇam|| 122.13 ||

विमान में बैठे हुए उन्होंने सब वानरों का, महापराक्रमी सुग्रीव का और विभीषण का सम्मान करते हुए यह वचन कहा —

श्लोक 14 (yuddha.122.14)

मित्रकार्यं कृतमिदं भवद्भिर्वानरर्षभाः। अनुज्ञाता मया सर्वे यथेष्टं प्रतिगच्छत॥ 122.14 ॥

mitrakāryaṃ kṛtamidaṃ bhavadbhirvānararṣabhāḥ| anujñātā mayā sarve yatheṣṭaṃ pratigacchata|| 122.14 ||

"हे वानरश्रेष्ठो, तुमने मित्र का यह कार्य पूर्ण किया है। मेरी अनुमति से अब तुम सब यथेच्छ जा सकते हो।

श्लोक 15 (yuddha.122.15)

यत् तु कार्यं वयस्येन स्निग्धेन च हितेन च। कृतं सुग्रीव तत् सर्वं भवता धर्मभीरुणा॥ 122.15 ॥

yat tu kāryaṃ vayasyena snigdhena ca hitena ca| kṛtaṃ sugrīva tat sarvaṃ bhavatā dharmabhīruṇā|| 122.15 ||

हे सुग्रीव, धर्मभीरु स्नेही और हितैषी सखा के रूप में जो कुछ करना था, वह सब तुमने किया है।

श्लोक 16 (yuddha.122.16)

किष्किन्धां प्रति याह्याशु स्वसैन्येनाभिसंवृतः। स्वराज्ये वस लङ्कायां मया दत्ते विभीषण। न त्वां धर्षयितुं शक्ताः सेन्द्रा अपि दिवौकसः॥ 122.16 ॥

kiṣkindhāṃ prati yāhyāśu svasainyenābhisaṃvṛtaḥ| svarājye vasa laṅkāyāṃ mayā datte vibhīṣaṇa| na tvāṃ dharṣayituṃ śaktāḥ sendrā api divaukasaḥ|| 122.16 ||

अब शीघ्र अपनी सेना के साथ किष्किन्धा को लौट जाओ। हे विभीषण, मेरे द्वारा दी गई लंका के अपने राज्य में निवास करो — इन्द्र सहित देवता भी तुम्हें आक्रान्त करने में समर्थ नहीं होंगे।

श्लोक 17 (yuddha.122.17)

अयोध्यां प्रति यास्यामि राजधानीं पितुर्मम। अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि सर्वानामन्त्रयामि वः॥ 122.17 ॥

ayodhyāṃ prati yāsyāmi rājadhānīṃ piturmama| abhyanujñātumicchāmi sarvānāmantrayāmi vaḥ|| 122.17 ||

मैं अपने पिता की राजधानी अयोध्या की ओर जा रहा हूँ। मैं तुम सबसे विदा लेना चाहता हूँ और तुम सबको सम्बोधित करना चाहता हूँ।"

श्लोक 18 (yuddha.122.18)

एवमुक्तास्तु रामेण हरीन्द्रा हरयस्तथा। ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे राक्षसश्च विभीषणः॥ 122.18 ॥

evamuktāstu rāmeṇa harīndrā harayastathā| ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve rākṣasaśca vibhīṣaṇaḥ|| 122.18 ||

राम के इस प्रकार कहने पर वानरराज, वानर और राक्षस विभीषण — इन सबने हाथ जोड़कर कहा —

श्लोक 19 (yuddha.122.19)

अयोध्यां गन्तुमिच्छामः सर्वान् नयतु नो भवान्। मुद्युक्ता विचरिष्यामो वनान्युपवनानि च॥ 122.19 ॥

ayodhyāṃ gantumicchāmaḥ sarvān nayatu no bhavān| mudyuktā vicariṣyāmo vanānyupavanāni ca|| 122.19 ||

"हम भी अयोध्या जाना चाहते हैं, आप हम सबको वहाँ ले चलें; हर्षित होकर हम वहाँ के वन और उपवनों में विचरण करेंगे।

श्लोक 20 (yuddha.122.20)

दृष्ट्वा त्वामभिषेकार्द्रं कौसल्यामभिवाद्य च। अचिरादागमिष्यामः स्वगृहान् नृपसत्तम॥ 122.20 ॥

dṛṣṭvā tvāmabhiṣekārdraṃ kausalyāmabhivādya ca| acirādāgamiṣyāmaḥ svagṛhān nṛpasattama|| 122.20 ||

हे नृपश्रेष्ठ, राज्याभिषेक से भीगे हुए आपको देखकर और कौसल्या को प्रणाम करके, हम शीघ्र ही अपने घरों को लौट आएँगे।"

श्लोक 21 (yuddha.122.21)

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा वानरैः सविभीषणैः। अब्रवीद् वानरान् रामः ससुग्रीवविभीषणान्॥ 122.21 ॥

evamuktastu dharmātmā vānaraiḥ savibhīṣaṇaiḥ| abravīd vānarān rāmaḥ sasugrīvavibhīṣaṇān|| 122.21 ||

वानरों और विभीषण के इस प्रकार कहने पर, उस धर्मात्मा राम ने सुग्रीव और विभीषण सहित वानरों से कहा —

श्लोक 22 (yuddha.122.22)

प्रियात् प्रियतरं लब्धं यदहं ससुहृज्जनः। सर्वैर्भवद्भिः सहितः प्रीतिं लप्स्ये पुरीं गतः॥ 122.22 ॥

priyāt priyataraṃ labdhaṃ yadahaṃ sasuhṛjjanaḥ| sarvairbhavadbhiḥ sahitaḥ prītiṃ lapsye purīṃ gataḥ|| 122.22 ||

"प्रिय से भी अधिक प्रिय यह होगा कि मैं अपने सुहृदजनों सहित, तुम सब लोगों के साथ ही नगरी पहुँचकर आनन्द प्राप्त करूँ।

श्लोक 23 (yuddha.122.23)

क्षिप्रमारोह सुग्रीव विमानं सह वानरैः। त्वमप्यारोह सामात्यो राक्षसेन्द्र विभीषण॥ 122.23 ॥

kṣipramāroha sugrīva vimānaṃ saha vānaraiḥ| tvamapyāroha sāmātyo rākṣasendra vibhīṣaṇa|| 122.23 ||

हे सुग्रीव, वानरों सहित शीघ्र विमान पर चढ़ो। हे राक्षसेन्द्र विभीषण, तुम भी अपने मन्त्रियों सहित इसी पर आरूढ़ हो जाओ।"

श्लोक 24 (yuddha.122.24)

ततः स पुष्पकं दिव्यं सुग्रीवः सह वानरैः। आरुरोह मुदा युक्तः सामात्यश्च विभीषणः॥ 122.24 ॥

tataḥ sa puṣpakaṃ divyaṃ sugrīvaḥ saha vānaraiḥ| āruroha mudā yuktaḥ sāmātyaśca vibhīṣaṇaḥ|| 122.24 ||

तब वह सुग्रीव वानरों सहित तथा मन्त्रियों सहित विभीषण, हर्षपूर्वक उस दिव्य पुष्पक पर आरूढ़ हुए।

श्लोक 25 (yuddha.122.25)

तेष्वारूढेषु सर्वेषु कौबेरं परमासनम्। राघवेणाभ्यनुज्ञातमुत्पपात विहायसम्॥ 122.25 ॥

teṣvārūḍheṣu sarveṣu kauberaṃ paramāsanam| rāghaveṇābhyanujñātamutpapāta vihāyasam|| 122.25 ||

जब वे सब उस श्रेष्ठ, कुबेर के आसन पर आरूढ़ हो चुके, तब राघव की अनुमति पाकर वह विमान आकाश में उड़ चला।

श्लोक 26 (yuddha.122.26)

खगतेन विमानेन हंसयुक्तेन भास्वता। प्रहृष्टश्च प्रतीतश्च बभौ रामः कुबेरवत्॥ 122.26 ॥

khagatena vimānena haṃsayuktena bhāsvatā| prahṛṣṭaśca pratītaśca babhau rāmaḥ kuberavat|| 122.26 ||

हंसों से युक्त, तेजस्वी और आकाशगामी उस विमान में यात्रा करते हुए, हर्षित और प्रसन्नचित्त राम कुबेर के समान शोभायमान हुए।

श्लोक 27 (yuddha.122.27)

ते सर्वे वानरर्क्षाश्च राक्षसाश्च महाबलाः। यथासुखमसम्बाधं दिव्ये तस्मिन्नुपाविशन्॥ 122.27 ॥

te sarve vānararkṣāśca rākṣasāśca mahābalāḥ| yathāsukhamasambādhaṃ divye tasminnupāviśan|| 122.27 ||

वे सब महाबली वानर, ऋक्ष और राक्षस उस दिव्य विमान में यथासुख और बिना किसी संकीर्णता के बैठ गए।

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