युद्धकाण्ड · सर्ग 13
रावण का रहस्य और आत्मश्लाघा
श्लोक 1 (yuddha.13.1)
रावणं क्रुद्धमाज्ञाय महापार्श्वो महाबलः । मुहूर्तमनुसंचिन्त्य प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ १३.१ ॥
rāvaṇaṃ kruddhamājñāya mahāpārśvo mahābalaḥ | muhūrtamanusaṃcintya prāñjalirvākyamabravīt ||
रावण को क्रुद्ध देखकर महाबली महापार्श्व कुछ क्षण विचार करके हाथ जोड़कर यह वचन बोला।
श्लोक 2 (yuddha.13.2)
यः खल्वपि वनं प्राप्य मृगव्यालनिषेवितम् । न पिबेन्मधु सम्प्राप्य स नरो बालिशो भवेत् ॥ १३.२ ॥
yaḥ khalvapi vanaṃ prāpya mṛgavyālaniṣevitam | na pibenmadhu samprāpya sa naro bāliśo bhavet ||
"जो मनुष्य वन्य पशुओं और सर्पों से भरे वन में पहुँचकर भी, मधु पाकर उसे न पिए, वह निश्चय ही मूर्ख कहलाएगा।"
श्लोक 3 (yuddha.13.3)
ईश्वरस्येश्वरः कोऽस्ति तव शत्रुनिबर्हण । रमस्व सह वैदेह्या शत्रूनाक्रम्य मूर्धसु ॥ १३.३ ॥
īśvarasyeśvaraḥ ko'sti tava śatrunibarhaṇa | ramasva saha vaidehyā śatrūnākramya mūrdhasu ||
"हे शत्रुओं का नाश करने वाले! आप जो सबके स्वामी हैं, आपके ऊपर भला कौन स्वामी हो सकता है? शत्रुओं के सिरों पर पैर रखकर वैदेही के साथ सुखपूर्वक रहिए।"
श्लोक 4 (yuddha.13.4)
बलात् कुक्कुटवृत्तेन प्रवर्तस्व महाबल । आक्रम्याक्रम्य सीतां वै तां भुङ्क्ष्व च रमस्व च ॥ १३.४ ॥
balāt kukkuṭavṛttena pravartasva mahābala | ākramyākramya sītāṃ vai tāṃ bhuṅkṣva ca ramasva ca ||
"हे महाबली! मुर्गे की भाँति बलपूर्वक आचरण कीजिए। सीता पर बार-बार अधिकार जमाकर उसका भोग कीजिए और उसके साथ रमण कीजिए।"
श्लोक 5 (yuddha.13.5)
लब्धकामस्य ते पश्चादागमिष्यति किं भयम् । प्राप्तमप्राप्तकालं वा सर्वं प्रति विधास्यसे ॥ १३.५ ॥
labdhakāmasya te paścādāgamiṣyati kiṃ bhayam | prāptamaprāptakālaṃ vā sarvaṃ prati vidhāsyase ||
"आपकी कामेच्छा पूर्ण हो जाने पर, पीछे से आपको भला क्या भय रहेगा? जो कुछ भी आ पड़े, चाहे समय पर हो या असमय में, आप उस सबका समुचित प्रतिकार कर लेंगे।"
श्लोक 6 (yuddha.13.6)
कुम्भकर्णः सहास्माभिरिन्द्रजिच्च महाबलः । प्रतिषेधयितुं शक्तौ सवज्रमपि वज्रिणम् ॥ १३.६ ॥
kumbhakarṇaḥ sahāsmābhirindrajicca mahābalaḥ | pratiṣedhayituṃ śaktau savajramapi vajriṇam ||
"कुम्भकर्ण और महाबली इन्द्रजित्, हम लोगों के साथ मिलकर, वज्र-सहित उस वज्रधारी इन्द्र को भी रोक देने में समर्थ हैं।"
श्लोक 7 (yuddha.13.7)
उपप्रदानं सान्त्वं वा भेदं वा कुशलैः कृतम् । समतिक्रम्य दण्डेन सिद्धिमर्थेषु रोचये ॥ १३.७ ॥
upapradānaṃ sāntvaṃ vā bhedaṃ vā kuśalaiḥ kṛtam | samatikramya daṇḍena siddhimartheṣu rocaye ||
"मुझे तो दान, साम अथवा भेद जैसी कुशल नीतियों को लांघकर, केवल दण्ड के द्वारा ही कार्यों की सिद्धि करना अच्छा लगता है।"
श्लोक 8 (yuddha.13.8)
इह प्राप्तान् वयं सर्वाञ्छत्रूंस्तव महाबल । वशे शस्त्रप्रतापेन करिष्यामो न संशयः ॥ १३.८ ॥
iha prāptān vayaṃ sarvāñchatrūṃstava mahābala | vaśe śastrapratāpena kariṣyāmo na saṃśayaḥ ||
"हे महाबली! यहाँ आए हुए आपके इन समस्त शत्रुओं को हम अपने शस्त्रों के प्रताप से निःसंदेह वश में कर लेंगे।"
श्लोक 9 (yuddha.13.9)
एवमुक्तस्तदा राजा महापार्श्वेन रावणः । तस्य सम्पूजयन् वाक्यमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १३.९ ॥
evamuktastadā rājā mahāpārśvena rāvaṇaḥ | tasya sampūjayan vākyamidaṃ vacanamabravīt ||
महापार्श्व द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, राजा रावण उसकी बात की सराहना करते हुए यह वचन बोला।
श्लोक 10 (yuddha.13.10)
महापार्श्व निबोध त्वं रहस्यं किंचिदात्मनः । चिरवृत्तं तदाख्यास्ये यदवाप्तं पुरा मया ॥ १३.१० ॥
mahāpārśva nibodha tvaṃ rahasyaṃ kiṃcidātmanaḥ | ciravṛttaṃ tadākhyāsye yadavāptaṃ purā mayā ||
"हे महापार्श्व! मेरा एक रहस्य सुनो। मैं तुम्हें वह पुरानी बात बताता हूँ जो कभी बहुत पहले मेरे साथ घटित हुई थी।"
श्लोक 11 (yuddha.13.11)
पितामहस्य भवनं गच्छन्तीं पुञ्जिकस्थलाम् । चञ्चूर्यमाणामद्राक्षमाकाशेऽग्निशिखामिव ॥ १३.११ ॥
pitāmahasya bhavanaṃ gacchantīṃ puñjikasthalām | cañcūryamāṇāmadrākṣamākāśe'gniśikhāmiva ||
"एक बार मैंने अग्नि की लपट के समान चमकती हुई पुञ्जिकस्थला नामक अप्सरा को ब्रह्माजी के भवन की ओर जाते तथा आकाश में इधर-उधर चंचल गति से विचरते देखा।"
श्लोक 12 (yuddha.13.12)
सा प्रसह्य मया भुक्ता कृता विवसना ततः । स्वयम्भूभवनं प्राप्ता लोलिता नलिनी यथा ॥ १३.१२ ॥
sā prasahya mayā bhuktā kṛtā vivasanā tataḥ | svayambhūbhavanaṃ prāptā lolitā nalinī yathā ||
"मैंने बलपूर्वक उसका भोग किया और उसे वस्त्रहीन कर डाला। इसके पश्चात् वह मसली हुई कमलिनी के समान होकर ब्रह्माजी के भवन में पहुँची।"
श्लोक 13 (yuddha.13.13)
तच्च तस्य तथा मन्ये ज्ञातमासीन्महात्मनः । अथ संकुपितो वेधा मामिदं वाक्यमब्रवीत् ॥ १३.१३ ॥
tacca tasya tathā manye jñātamāsīnmahātmanaḥ | atha saṃkupito vedhā māmidaṃ vākyamabravīt ||
"मुझे लगता है कि यह बात उस महात्मा ब्रह्माजी को ज्ञात हो गई; तब क्रुद्ध होकर विधाता ने मुझसे यह वचन कहा।"
श्लोक 14 (yuddha.13.14)
अद्यप्रभृति यामन्यां बलान्नारीं गमिष्यसि । तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः ॥ १३.१४ ॥
adyaprabhṛti yāmanyāṃ balānnārīṃ gamiṣyasi | tadā te śatadhā mūrdhā phaliṣyati na saṃśayaḥ ||
"'आज से जिस किसी अन्य स्त्री के पास तुम बलपूर्वक जाओगे, उसी क्षण निःसंदेह तुम्हारा सिर सौ टुकड़ों में फट जाएगा।'"
श्लोक 15 (yuddha.13.15)
इत्यहं तस्य शापस्य भीतः प्रसभमेव ताम् । नारोहये बलात् सीतां वैदेहीं शयने शुभे ॥ १३.१५ ॥
ityahaṃ tasya śāpasya bhītaḥ prasabhameva tām | nārohaye balāt sītāṃ vaidehīṃ śayane śubhe ||
"उसके इस शाप से भयभीत होकर ही मैं इस वैदेही सीता को बलपूर्वक अपनी सुन्दर शय्या पर नहीं चढ़ाता।"
श्लोक 16 (yuddha.13.16)
सागरस्येव मे वेगो मारुतस्येव मे गतिः । नैतद् दाशरथिर्वेद ह्यासादयति तेन माम् ॥ १३.१६ ॥
sāgarasyeva me vego mārutasyeva me gatiḥ | naitad dāśarathirveda hyāsādayati tena mām ||
"मेरा वेग सागर के समान है, मेरी गति वायु के समान है; राम इस बात को नहीं जानता, इसीलिए वह मुझसे भिड़ने चला आ रहा है।"
श्लोक 17 (yuddha.13.17)
को हि सिंहमिवासीनं सुप्तं गिरिगुहाशये । क्रुद्धं मृत्युमिवासीनं प्रबोधयितुमिच्छति ॥ १३.१७ ॥
ko hi siṃhamivāsīnaṃ suptaṃ giriguhāśaye | kruddhaṃ mṛtyumivāsīnaṃ prabodhayitumicchati ||
"भला कौन पर्वत की गुफा में सोए हुए सिंह के समान बैठे हुए, अथवा क्रुद्ध मृत्यु के समान बैठे हुए मुझे जगाना चाहेगा?"
श्लोक 18 (yuddha.13.18)
न मत्तो निर्गतान् बाणान् द्विजिह्वान् पन्नगानिव । रामः पश्यति संग्रामे तेन मामभिगच्छति ॥ १३.१८ ॥
na matto nirgatān bāṇān dvijihvān pannagāniva | rāmaḥ paśyati saṃgrāme tena māmabhigacchati ||
"राम ने युद्ध में मुझसे छूटने वाले, दुधारी सर्पों के समान बाणों को अभी तक नहीं देखा है; इसीलिए वह मेरी ओर बढ़ा चला आ रहा है।"
श्लोक 19 (yuddha.13.19)
क्षिप्रं वज्रसमैर्बाणैः शतधा कार्मुकच्युतैः । राममादीपयिष्यामि उल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥ १३.१९ ॥
kṣipraṃ vajrasamairbāṇaiḥ śatadhā kārmukacyutaiḥ | rāmamādīpayiṣyāmi ulkābhiriva kuñjaram ||
"मैं अपने धनुष से छूटे हुए वज्र-समान सैकड़ों बाणों से शीघ्र ही राम को उसी प्रकार जला डालूँगा, जैसे जलती हुई मशालों से किसी हाथी को झुलसाया जाता है।"
श्लोक 20 (yuddha.13.20)
तच्चास्य बलमादास्ये बलेन महता वृतः । उदितः सविता काले नक्षत्राणां प्रभामिव ॥ १३.२० ॥
taccāsya balamādāsye balena mahatā vṛtaḥ | uditaḥ savitā kāle nakṣatrāṇāṃ prabhāmiva ||
"महान् सेना से घिरा हुआ मैं उसके उस बल को उसी प्रकार हर लूँगा जैसे उदित होता हुआ सूर्य प्रातःकाल तारों की आभा को हर लेता है।"
श्लोक 21 (yuddha.13.21)
न वासवेनापि सहस्रचक्षुषा युधास्मि शक्यो वरुणेन वा पुनः । मया त्वियं बाहुबलेन निर्जिता पुरा पुरी वैश्रवणेन पालिता ॥ १३.२१ ॥
na vāsavenāpi sahasracakṣuṣā yudhāsmi śakyo varuṇena vā punaḥ | mayā tviyaṃ bāhubalena nirjitā purā purī vaiśravaṇena pālitā ||
"युद्ध में मुझे न तो सहस्र-नेत्रधारी इन्द्र और न ही वरुण भी जीत सकते हैं। यह नगरी, जो पहले कुबेर द्वारा पालित थी, मैंने अपनी भुजाओं के बल से जीत ली थी।"