युद्धकाण्ड · सर्ग 14
विभीषण का शांति-परामर्श
श्लोक 1 (yuddha.14.1)
निशाचरेन्द्रस्य निशम्य वाक्यं स कुम्भकर्णस्य च गर्जितानि । विभीषणो राक्षसराजमुख्य- मुवाच वाक्यं हितमर्थयुक्तम् ॥ १४.१ ॥
niśācarendrasya niśamya vākyaṃ sa kumbhakarṇasya ca garjitāni | vibhīṣaṇo rākṣasarājamukhya- muvāca vākyaṃ hitamarthayuktam ||
राक्षसराज रावण के वचन और कुम्भकर्ण की गर्जना सुनकर, विभीषण ने राक्षसों के प्रमुख राजा रावण से हितकर और अर्थपूर्ण वचन कहे।
श्लोक 2 (yuddha.14.2)
वृतो हि बाह्वन्तरभोगराशि- श्चिन्ताविषः सुस्मिततीक्ष्णदंष्ट्रः । पञ्चाङ्गुलीपञ्चशिरोऽतिकायः सीतामहाहिस्तव केन राजन् ॥ १४.२ ॥
vṛto hi bāhvantarabhogarāśi- ścintāviṣaḥ susmitatīkṣṇadaṃṣṭraḥ | pañcāṅgulīpañcaśiro'tikāyaḥ sītāmahāhistava kena rājan ||
"हे राजन्! आपकी दोनों भुजाओं के मध्य फणों के समूह जैसे लिपटी हुई, चिन्तारूपी विष से युक्त, जिसकी मुस्कान ही तीक्ष्ण दाँत हैं तथा पाँच अंगुलियाँ ही जिसके पाँच फन हैं—ऐसी विशालकाय महासर्पिणी सीता को आपके गले में किसने लपेट दिया है?"
श्लोक 3 (yuddha.14.3)
यावन्न लङ्कां समभिद्रवन्ति बलीमुखाः पर्वतकूटमात्राः । दंष्ट्रायुधाश्चैव नखायुधाश्च प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ॥ १४.३ ॥
yāvanna laṅkāṃ samabhidravanti balīmukhāḥ parvatakūṭamātrāḥ | daṃṣṭrāyudhāścaiva nakhāyudhāśca pradīyatāṃ dāśarathāya maithilī ||
"जब तक पर्वत-शिखरों जितने विशाल, दाढ़ों और नखों को ही अस्त्र बनाए हुए वे वानर लंका पर टूट न पड़ें, उससे पहले ही मैथिली को राम को लौटा दिया जाए।"
श्लोक 4 (yuddha.14.4)
यावन्न गृह्णन्ति शिरांसि बाणा रामेरिता राक्षसपुंगवानाम् । वज्रोपमा वायुसमानवेगाः प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ॥ १४.४ ॥
yāvanna gṛhṇanti śirāṃsi bāṇā rāmeritā rākṣasapuṃgavānām | vajropamā vāyusamānavegāḥ pradīyatāṃ dāśarathāya maithilī ||
"जब तक राम द्वारा छोड़े गए, वज्र के समान तथा वायु के वेग वाले बाण राक्षस-श्रेष्ठों के सिरों को काट न डालें, उससे पहले ही मैथिली को राम को लौटा दिया जाए।"
श्लोक 5 (yuddha.14.5)
न कुम्भकर्णेन्द्रजितौ च राजं- स्तथा महापार्श्वमहोदरौ वा । निकुम्भकुम्भौ च तथातिकायः स्थातुं समर्था युधि राघवस्य ॥ १४.५ ॥
na kumbhakarṇendrajitau ca rājaṃ- stathā mahāpārśvamahodarau vā | nikumbhakumbhau ca tathātikāyaḥ sthātuṃ samarthā yudhi rāghavasya ||
"हे राजन्! न तो कुम्भकर्ण और इन्द्रजित्, न महापार्श्व और महोदर, और न ही निकुम्भ-कुम्भ अथवा अतिकाय—कोई भी राम के समक्ष युद्ध में टिकने में समर्थ नहीं है।"
श्लोक 6 (yuddha.14.6)
जीवंस्तु रामस्य न मोक्ष्यसे त्वं गुप्तः सवित्राप्यथवा मरुद्भिः । न वासवस्याङ्कगतो न मृत्यो- र्नभो न पातालमनुप्रविष्टः ॥ १४.६ ॥
jīvaṃstu rāmasya na mokṣyase tvaṃ guptaḥ savitrāpyathavā marudbhiḥ | na vāsavasyāṅkagato na mṛtyo- rnabho na pātālamanupraviṣṭaḥ ||
"आप जीवित रहते हुए राम से बच नहीं पाएँगे, चाहे सूर्यदेव अथवा मरुद्गण ही आपकी रक्षा क्यों न करें; चाहे आप इन्द्र की गोद में हों, मृत्यु के पास हों, अथवा आकाश या पाताल में जा घुसें।"
श्लोक 7 (yuddha.14.7)
निशम्य वाक्यं तु विभीषणस्य ततः प्रहस्तो वचनं बभाषे । न नो भयं विद्म न दैवतेभ्यो न दानवेभ्योऽप्यथवा कदाचित् ॥ १४.७ ॥
niśamya vākyaṃ tu vibhīṣaṇasya tataḥ prahasto vacanaṃ babhāṣe | na no bhayaṃ vidma na daivatebhyo na dānavebhyo'pyathavā kadācit ||
विभीषण के वचन सुनकर प्रहस्त ने कहा: "हम न तो देवताओं से और न ही दानवों से कभी कोई भय जानते हैं।"
श्लोक 8 (yuddha.14.8)
न यक्षगन्धर्वमहोरगेभ्यो भयं न संख्ये पतगोरगेभ्यः । कथं नु रामाद् भविता भयं नो नरेन्द्रपुत्रात् समरे कदाचित् ॥ १४.८ ॥
na yakṣagandharvamahoragebhyo bhayaṃ na saṃkhye patagoragebhyaḥ | kathaṃ nu rāmād bhavitā bhayaṃ no narendraputrāt samare kadācit ||
"यक्षों, गन्धर्वों और महानागों से भी हमें युद्ध में कोई भय नहीं, न ही पक्षियों और सर्पों से। तब भला राजपुत्र राम से हमें युद्ध में कभी भय कैसे हो सकता है?"
श्लोक 9 (yuddha.14.9)
प्रहस्तवाक्यं त्वहितं निशम्य विभीषणो राजहितानुकाङ्क्षी । ततो महार्थं वचनं बभाषे धर्मार्थकामेषु निविष्टबुद्धिः ॥ १४.९ ॥
prahastavākyaṃ tvahitaṃ niśamya vibhīṣaṇo rājahitānukāṅkṣī | tato mahārthaṃ vacanaṃ babhāṣe dharmārthakāmeṣu niviṣṭabuddhiḥ ||
प्रहस्त के अहितकर वचन सुनकर, राजा का हित चाहने वाले तथा धर्म-अर्थ-काम में स्थिर बुद्धि रखने वाले विभीषण ने अत्यन्त सारगर्भित वचन कहे।
श्लोक 10 (yuddha.14.10)
प्रहस्त राजा च महोदरश्च त्वं कुम्भकर्णश्च यथार्थजातम् । ब्रवीत रामं प्रति तन्न शक्यं यथा गतिः स्वर्गमधर्मबुद्धेः ॥ १४.१० ॥
prahasta rājā ca mahodaraśca tvaṃ kumbhakarṇaśca yathārthajātam | bravīta rāmaṃ prati tanna śakyaṃ yathā gatiḥ svargamadharmabuddheḥ ||
"हे प्रहस्त! राजा, महोदर, तुम और कुम्भकर्ण—राम के विरुद्ध जो कुछ भी तुम सब कह रहे हो, वह वैसे ही असम्भव है जैसे अधर्मी बुद्धि वाले का स्वर्ग जाना असम्भव है।"
श्लोक 11 (yuddha.14.11)
वधस्तु रामस्य मया त्वया च प्रहस्त सर्वैरपि राक्षसैर्वा । कथं भवेदर्थविशारदस्य महार्णवं तर्तुमिवाप्लवस्य ॥ १४.११ ॥
vadhastu rāmasya mayā tvayā ca prahasta sarvairapi rākṣasairvā | kathaṃ bhavedarthaviśāradasya mahārṇavaṃ tartumivāplavasya ||
"हे प्रहस्त! मेरे द्वारा, तुम्हारे द्वारा, अथवा समस्त राक्षसों द्वारा भी उस समस्त विषयों में निपुण राम का वध कैसे सम्भव हो सकता है? यह वैसे ही असम्भव है जैसे बिना नाव के महासागर को पार करना।"
श्लोक 12 (yuddha.14.12)
धर्मप्रधानस्य महारथस्य इक्ष्वाकुवंशप्रभवस्य राज्ञः । पुरोऽस्य देवाश्च तथाविधस्य कृत्येषु शक्तस्य भवन्ति मूढाः ॥ १४.१२ ॥
dharmapradhānasya mahārathasya ikṣvākuvaṃśaprabhavasya rājñaḥ | puro'sya devāśca tathāvidhasya kṛtyeṣu śaktasya bhavanti mūḍhāḥ ||
"जो राजा धर्म को सर्वोपरि मानने वाला, महारथी, इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न तथा अपने कार्यों को सिद्ध करने में समर्थ है, ऐसे उस राम के सामने तो देवता भी मोहित हो जाते हैं।"
श्लोक 13 (yuddha.14.13)
तीक्ष्णा न तावत् तव कङ्कपत्रा दुरासदा राघवविप्रमुक्ताः । भित्त्वा शरीरं प्रविशन्ति बाणाः प्रहस्त तेनैव विकत्थसे त्वम् ॥ १४.१३ ॥
tīkṣṇā na tāvat tava kaṅkapatrā durāsadā rāghavavipramuktāḥ | bhittvā śarīraṃ praviśanti bāṇāḥ prahasta tenaiva vikatthase tvam ||
"हे प्रहस्त! राघव द्वारा छोड़े गए, बाज के पंखों से युक्त वे तीक्ष्ण और दुर्धर्ष बाण अभी तक तुम्हारे शरीर को भेदकर उसमें प्रविष्ट नहीं हुए हैं; इसीलिए तुम इस प्रकार बढ़-चढ़कर बोल रहे हो।"
श्लोक 14 (yuddha.14.14)
भित्त्वा न तावत् प्रविशन्ति कायं प्राणान्तिकास्तेऽशनितुल्यवेगाः । शिताः शरा राघवविप्रमुक्ताः प्रहस्त तेनैव विकत्थसे त्वम् ॥ १४.१४ ॥
bhittvā na tāvat praviśanti kāyaṃ prāṇāntikāste'śanitulyavegāḥ | śitāḥ śarā rāghavavipramuktāḥ prahasta tenaiva vikatthase tvam ||
"प्राणघातक, वज्र के समान वेगवान् तथा तीक्ष्ण, राघव द्वारा छोड़े गए वे बाण अभी तक तुम्हारे शरीर को भेदकर उसमें प्रविष्ट नहीं हुए हैं; इसीलिए तुम इस प्रकार बढ़-चढ़कर बोल रहे हो।"
श्लोक 15 (yuddha.14.15)
न रावणो नातिबलस्त्रिशीर्षो न कुम्भकर्णस्य सुतो निकुम्भः । न चेन्द्रजिद् दाशरथिं प्रवोढुं त्वं वा रणे शक्रसमं समर्थः ॥ १४.१५ ॥
na rāvaṇo nātibalastriśīrṣo na kumbhakarṇasya suto nikumbhaḥ | na cendrajid dāśarathiṃ pravoḍhuṃ tvaṃ vā raṇe śakrasamaṃ samarthaḥ ||
"न रावण, न महाबली त्रिशिरा, न कुम्भकर्ण का पुत्र निकुम्भ, न इन्द्रजित्, और न ही तुम—इन्द्र के समान पराक्रमी उस दशरथ-पुत्र राम का युद्ध में सामना करने में कोई भी समर्थ नहीं है।"
श्लोक 16 (yuddha.14.16)
देवान्तको वापि नरान्तको वा तथातिकायोऽतिरथो महात्मा । अकम्पनश्चाद्रिसमानसारः स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥ १४.१६ ॥
devāntako vāpi narāntako vā tathātikāyo'tiratho mahātmā | akampanaścādrisamānasāraḥ sthātuṃ na śaktā yudhi rāghavasya ||
"देवान्तक हो या नरान्तक, महान् अतिरथी अतिकाय ही क्यों न हो, अथवा पर्वत के समान दृढ़ अकम्पन ही क्यों न हो—कोई भी राघव के साथ युद्ध में टिक नहीं सकता।"
श्लोक 17 (yuddha.14.17)
अयं च राजा व्यसनाभिभूतो मित्रैरमित्रप्रतिमैर्भवद्भिः । अन्वास्यते राक्षसनाशनार्थे तीक्ष्णः प्रकृत्या ह्यसमीक्षकारी ॥ १४.१७ ॥
ayaṃ ca rājā vyasanābhibhūto mitrairamitrapratimairbhavadbhiḥ | anvāsyate rākṣasanāśanārthe tīkṣṇaḥ prakṛtyā hyasamīkṣakārī ||
"यह राजा दुर्व्यसनों से ग्रस्त है, स्वभाव से ही उग्र और बिना सोचे-विचारे कार्य करने वाला है; और अब आप जैसे मित्र, जो वस्तुतः शत्रु के समान हैं, राक्षस-जाति के विनाश के लिए इसके चारों ओर बैठे हैं।"
श्लोक 18 (yuddha.14.18)
अनन्तभोगेन सहस्रमूर्ध्ना नागेन भीमेन महाबलेन । बलात् परिक्षिप्तमिमं भवन्तो राजानमुत्क्षिप्य विमोचयन्तु ॥ १४.१८ ॥
anantabhogena sahasramūrdhnā nāgena bhīmena mahābalena | balāt parikṣiptamimaṃ bhavanto rājānamutkṣipya vimocayantu ||
"अनन्त कुण्डलियों तथा सहस्र सिरों वाले भयंकर और महाबली नागराज द्वारा बलपूर्वक जकड़े गए इस राजा को आप लोग उठाकर मुक्त कर दें।"
श्लोक 19 (yuddha.14.19)
यावद्धि केशग्रहणात् सुहृद्भिः समेत्य सर्वैः परिपूर्णकामैः । निगृह्य राजा परिरक्षितव्यो भूतैर्यथा भीमबलैर्गृहीतः ॥ १४.१९ ॥
yāvaddhi keśagrahaṇāt suhṛdbhiḥ sametya sarvaiḥ paripūrṇakāmaiḥ | nigṛhya rājā parirakṣitavyo bhūtairyathā bhīmabalairgṛhītaḥ ||
"जैसे किसी भयंकर बलशाली भूत-प्रेत से ग्रस्त व्यक्ति को उसके अपने ही लोग बालों से पकड़कर भी बलपूर्वक बचाते हैं, उसी प्रकार राजा का सच्चा हित चाहने वाले सभी लोगों को एकत्र होकर, आवश्यकता हो तो बाल पकड़कर भी, इस राजा की रक्षा करनी चाहिए।"
श्लोक 20 (yuddha.14.20)
सुवारिणा राघवसागरेण प्रच्छाद्यमानस्तरसा भवद्भिः । युक्तस्त्वयं तारयितुं समेत्य काकुत्स्थपातालमुखे पतन् सः ॥ १४.२० ॥
suvāriṇā rāghavasāgareṇa pracchādyamānastarasā bhavadbhiḥ | yuktastvayaṃ tārayituṃ sametya kākutsthapātālamukhe patan saḥ ||
"उत्तम जल से भरे राघव-रूपी सागर द्वारा वेगपूर्वक डुबोए जाते हुए, तथा राम-रूपी पाताल-मुख में गिरते हुए इस राजा को, आप सबको एकत्र होकर बचाना ही उचित है।"
श्लोक 21 (yuddha.14.21)
इदं पुरस्यास्य सराक्षसस्य राज्ञश्च पथ्यं ससुहृज्जनस्य । सम्यग्घि वाक्यं स्वमतं ब्रवीमि नरेन्द्रपुत्राय ददातु मैथिलीम् ॥ १४.२१ ॥
idaṃ purasyāsya sarākṣasasya rājñaśca pathyaṃ sasuhṛjjanasya | samyagghi vākyaṃ svamataṃ bravīmi narendraputrāya dadātu maithilīm ||
"इस नगर के, इसमें रहने वाले राक्षसों के, राजा के, और उसके सुहृदजनों के हित के लिए ही मैं अपना यह सम्यक् मत प्रकट करता हूँ—राजा राजकुमार राम को मैथिली लौटा दे।"
श्लोक 22 (yuddha.14.22)
परस्य वीर्यं स्वबलं च बुद्ध्वा स्थानं क्षयं चैव तथैव वृद्धिम् । तथा स्वपक्षेऽप्यनुमृश्य बुद्ध्या वदेत् क्षमं स्वामिहितं स मन्त्री ॥ १४.२२ ॥
parasya vīryaṃ svabalaṃ ca buddhvā sthānaṃ kṣayaṃ caiva tathaiva vṛddhim | tathā svapakṣe'pyanumṛśya buddhyā vadet kṣamaṃ svāmihitaṃ sa mantrī ||
"जो शत्रु के बल और अपने बल को जानकर, तथा अपने पक्ष की स्थिरता, क्षय और वृद्धि पर भी बुद्धिपूर्वक विचार करके स्वामी के हित में उचित बात कहता है, वही सच्चा मन्त्री है।"