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युद्धकाण्ड · सर्ग 2

सुग्रीव का सांत्वना-वचन

सर्ग 1सर्ग-सूचीसर्ग 3

श्लोक 1 (yuddha.2.1)

तं तु शोकपरिद्यूनं रामं दशरथात्मजम्। उवाच वचनं श्रीमान् सुग्रीवः शोकनाशनम् ॥ 2.1 ॥

taṃ tu śokaparidyūnaṃ rāmaṃ daśarathātmajam | uvāca vacanaṃ śrīmān sugrīvaḥ śokanāśanam || 2.1 ||

शोक से अत्यंत दुखी उन दशरथनन्दन राम से, श्रीमान सुग्रीव ने यह शोक-नाशक वचन कहा।

श्लोक 2 (yuddha.2.2)

किं त्वया तप्यते वीर यथान्यः प्राकृतस्तथा। मैवं भूस्त्यज संतापं कृतघ्न इव सौहृदम् ॥ 2.2 ॥

kiṃ tvayā tapyate vīra yathānyaḥ prākṛtastathā | maivaṃ bhūstyaja saṃtāpaṃ kṛtaghna iva sauhṛdam || 2.2 ||

हे वीर! तुम एक साधारण मनुष्य के समान क्यों संतप्त होते हो? ऐसा मत करो; इस संताप को त्याग दो, जैसे कोई कृतघ्न मित्रता को त्याग देता है।

श्लोक 3 (yuddha.2.3)

संतापस्य च ते स्थानं नहि पश्यामि राघव। प्रवृत्तावुपलब्धायां ज्ञाते च निलये रिपोः ॥ 2.3 ॥

saṃtāpasya ca te sthānaṃ nahi paśyāmi rāghava | pravṛttāvupalabdhāyāṃ jñāte ca nilaye ripoḥ || 2.3 ||

हे राघव! जब समाचार प्राप्त हो चुका है और शत्रु का निवास-स्थान भी ज्ञात हो चुका है, तब तुम्हारे संताप का कोई कारण मुझे नहीं दिखता।

श्लोक 4 (yuddha.2.4)

मतिमान् शास्त्रवित् प्राज्ञः पण्डितश्चासि राघव। त्यजेमां प्राकृतां बुद्धिं कृतात्मेवार्थदूषिणीम् ॥ 2.4 ॥

matimān śāstravit prājñaḥ paṇḍitaścāsi rāghava | tyajemāṃ prākṛtāṃ buddhiṃ kṛtātmevārthadūṣiṇīm || 2.4 ||

हे राघव! तुम बुद्धिमान, शास्त्रज्ञ, प्रज्ञावान और विद्वान हो; अतः एक आत्मसंयमी पुरुष की भाँति, प्रयोजन को नष्ट करने वाली इस साधारण मनोवृत्ति को त्याग दो।

श्लोक 5 (yuddha.2.5)

समुद्रं लङ्घयित्वा तु महानक्रसमाकुलम्। लङ्कामारोहयिष्यामो हनिष्यामश्च ते रिपुम् ॥ 2.5 ॥

samudraṃ laṅghayitvā tu mahānakrasamākulam | laṅkāmārohayiṣyāmo haniṣyāmaśca te ripum || 2.5 ||

विशाल मगरमच्छों से भरे इस समुद्र को लांघकर, हम लंका पर चढ़ाई करेंगे और तुम्हारे शत्रु का वध करेंगे।

श्लोक 6 (yuddha.2.6)

निरुत्साहस्य दीनस्य शोकपर्याकुलात्मनः। सर्वार्था व्यवसीदन्ति व्यसनं चाधिगच्छति ॥ 2.6 ॥

nirutsāhasya dīnasya śokaparyākulātmanaḥ | sarvārthā vyavasīdanti vyasanaṃ cādhigacchati || 2.6 ||

उत्साहहीन, दीन और शोक से व्याकुल मन वाले पुरुष के सभी प्रयोजन नष्ट हो जाते हैं, और वह विपत्ति में ही पड़ता जाता है।

श्लोक 7 (yuddha.2.7)

इमे शूराः समर्थाश्च सर्वतो हरियूथपाः। त्वत्प्रियार्थं कृतोत्साहाः प्रवेष्टुमपि पावकम्। एषां हर्षेण जानामि तर्कश्चापि दृढो मम ॥ 2.7 ॥

ime śūrāḥ samarthāśca sarvato hariyūthapāḥ | tvatpriyārthaṃ kṛtotsāhāḥ praveṣṭumapi pāvakam | eṣāṃ harṣeṇa jānāmi tarkaścāpi dṛḍho mama || 2.7 ||

ये वानर-सेनापति सब प्रकार से शूरवीर और समर्थ हैं; तुम्हारे प्रिय-कार्य के लिए ये अग्नि में प्रवेश करने को भी उत्साहित हैं। इनके इस हर्ष से, तथा अपने दृढ़ अनुमान से भी, मैं यह जानता हूँ कि हम सफल होंगे।

श्लोक 8 (yuddha.2.8)

विक्रमेण समानेष्ये सीतां हत्वा यथा रिपुम्। रावणं पापकर्माणं तथा त्वं कर्तुमर्हसि ॥ 2.8 ॥

vikrameṇa samāneṣye sītāṃ hatvā yathā ripum | rāvaṇaṃ pāpakarmāṇaṃ tathā tvaṃ kartumarhasi || 2.8 ||

तुम्हें ऐसा ही प्रयत्न करना चाहिए कि पापकर्मी शत्रु रावण का वध करके, मैं पराक्रम से सीता को पुनः प्राप्त कर सकूँ।

श्लोक 9 (yuddha.2.9)

सेतुरत्र यथा बद्ध्येद् यथा पश्येम तां पुरीम्। तस्य राक्षसराजस्य तथा त्वं कुरु राघव ॥ 2.9 ॥

seturatra yathā baddhyed yathā paśyema tāṃ purīm | tasya rākṣasarājasya tathā tvaṃ kuru rāghava || 2.9 ||

हे राघव! ऐसा प्रयत्न करो कि यहाँ सेतु बंधे और हम उस राक्षसराज की नगरी को देख सकें।

श्लोक 10 (yuddha.2.10)

दृष्ट्वा तां हि पुरीं लङ्कां त्रिकूटशिखरे स्थिताम्। हतं च रावणं युद्धे दर्शनादवधारय ॥ 2.10 ॥

dṛṣṭvā tāṃ hi purīṃ laṅkāṃ trikūṭaśikhare sthitām | hataṃ ca rāvaṇaṃ yuddhe darśanādavadhāraya || 2.10 ||

त्रिकूट पर्वत के शिखर पर स्थित उस लंकापुरी को देखते ही, यह निश्चय जान लो कि युद्ध में रावण मारा गया।

श्लोक 11 (yuddha.2.11)

अबद्ध्वा सागरे सेतुं घोरे च वरुणालये। लङ्कां न मर्दितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ 2.11 ॥

abaddhvā sāgare setuṃ ghore ca varuṇālaye | laṅkāṃ na marditum śakyā sendrairapi surāsuraiḥ || 2.11 ||

उस भयंकर सागर, वरुण के आवास में सेतु बाँधे बिना, लंका को इन्द्र सहित देवता और असुर भी नहीं कुचल सकते।

श्लोक 12 (yuddha.2.12)

सेतुबन्धः समुद्रे च यावल्लङ्कासमीपतः। सर्वं तीर्णं च मे सैन्यं जितमित्युपधारय। इमे हि समरे वीरा हरयः कामरूपिणः ॥ 2.12 ॥

setubandhaḥ samudre ca yāvallaṅkāsamīpataḥ | sarvaṃ tīrṇaṃ ca me sainyaṃ jitamityupadhāraya | ime hi samare vīrā harayaḥ kāmarūpiṇaḥ || 2.12 ||

जब समुद्र में लंका के निकट तक सेतु बंध जाएगा और मेरी समस्त सेना पार हो जाएगी, तो जान लो कि विजय हो चुकी, क्योंकि ये वानर-वीर युद्ध में इच्छानुसार रूप धारण करने वाले हैं।

श्लोक 13 (yuddha.2.13)

तदलं विक्लवां बुद्धिं राजन् सर्वार्थनाशिनीम्। पुरुषस्य हि लोकेऽस्मिन् शोकः शौर्यापकर्षणः ॥ 2.13 ॥

tadalaṃ viklavāṃ buddhiṃ rājan sarvārthanāśinīm | puruṣasya hi loke'smin śokaḥ śauryāpakarṣaṇaḥ || 2.13 ||

अतः, हे राजन्! इस सर्वनाशकारी व्याकुल बुद्धि को त्याग दो, क्योंकि इस लोक में शोक पुरुष के शौर्य को क्षीण कर देता है।

श्लोक 14 (yuddha.2.14)

यत् तु कार्यं मनुष्येण शौटीर्यमवलम्ब्यताम्। तदलंकरणायैव कर्तुर्भवति सत्वरम् ॥ 2.14 ॥

yat tu kāryaṃ manuṣyeṇa śauṭīryamavalambyatām | tadalaṃkaraṇāyaiva karturbhavati satvaram || 2.14 ||

मनुष्य को जो भी कार्य करना हो, उसमें साहस और उत्साह का सहारा लेना चाहिए; इससे कर्ता के लिए वह कार्य शीघ्र ही सिद्ध और सुशोभित होता है।

श्लोक 15 (yuddha.2.15)

अस्मिन् काले महाप्राज्ञ सत्त्वमातिष्ठ तेजसा। शूराणां हि मनुष्याणां त्वद्विधानां महात्मनाम्। विनष्टे वा प्रणष्टे वा शोकः सर्वार्थनाशनः ॥ 2.15 ॥

asmin kāle mahāprājña sattvamātiṣṭha tejasā | śūrāṇāṃ hi manuṣyāṇāṃ tvadvidhānāṃ mahātmanām | vinaṣṭe vā praṇaṣṭe vā śokaḥ sarvārthanāśanaḥ || 2.15 ||

हे महाप्राज्ञ! इस समय अपने तेज से अपने साहस को स्थिर रखो, क्योंकि तुम्हारे समान शूरवीर और महात्मा पुरुषों के लिए भी, किसी वस्तु के नष्ट या खो जाने पर शोक करना समस्त प्रयोजनों का नाशक होता है।

श्लोक 16 (yuddha.2.16)

तत्त्वं बुद्धिमतां श्रेष्ठः सर्वशास्त्रार्थकोविदः। मद्विधैः सचिवैः सार्धमरिं जेतुं समर्हसि ॥ 2.16 ॥

tattvaṃ buddhimatāṃ śreṣṭhaḥ sarvaśāstrārthakovidaḥ | madvidhaiḥ sacivaiḥ sārdhamariṃ jetuṃ samarhasi || 2.16 ||

तुम बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हो और समस्त शास्त्रों के अर्थ में निपुण हो; अतः मेरे जैसे मंत्रियों के साथ मिलकर तुम शत्रु को जीतने में पूर्णतः समर्थ हो।

श्लोक 17 (yuddha.2.17)

नहि पश्याम्यहं कंचित् त्रिषु लोकेषु राघव। गृहीतधनुषो यस्ते तिष्ठेदभिमुखो रणे ॥ 2.17 ॥

nahi paśyāmyahaṃ kaṃcit triṣu lokeṣu rāghava | gṛhītadhanuṣo yaste tiṣṭhedabhimukho raṇe || 2.17 ||

हे राघव! मैं तीनों लोकों में ऐसा कोई नहीं देखता, जो धनुष धारण किए हुए तुम्हारे सामने युद्ध में खड़ा हो सके।

श्लोक 18 (yuddha.2.18)

वानरेषु समासक्तं न ते कार्यं विपत्स्यते। अचिराद् द्रक्ष्यसे सीतां तीर्त्वा सागरमक्षयम् ॥ 2.18 ॥

vānareṣu samāsaktaṃ na te kāryaṃ vipatsyate | acirād drakṣyase sītāṃ tīrtvā sāgaramakṣayam || 2.18 ||

तुम्हारा यह कार्य, वानरों को सौंपे जाने पर, विफल नहीं होगा; शीघ्र ही इस अक्षय सागर को पार करके तुम सीता को देखोगे।

श्लोक 19 (yuddha.2.19)

तदलं शोकमालम्ब्य क्रोधमालम्ब भूपते। निश्चेष्टाः क्षत्रिया मन्दाः सर्वे चण्डस्य बिभ्यति ॥ 2.19 ॥

tadalaṃ śokamālambya krodhamālamba bhūpate | niśceṣṭāḥ kṣatriyā mandāḥ sarve caṇḍasya bibhyati || 2.19 ||

अतः, हे भूपते! शोक का सहारा लेना छोड़ो, क्रोध का सहारा लो; क्रियाहीन क्षत्रिय ही दुर्बल माने जाते हैं, जबकि सब लोग उग्र पुरुष से भय खाते हैं।

श्लोक 20 (yuddha.2.20)

लङ्घनार्थं च घोरस्य समुद्रस्य नदीपतेः। सहास्माभिरिहोपेतः सूक्ष्मबुद्धिर्विचारय ॥ 2.20 ॥

laṅghanārthaṃ ca ghorasya samudrasya nadīpateḥ | sahāsmābhirihopetaḥ sūkṣmabuddhirvicāraya || 2.20 ||

हे सूक्ष्मबुद्धि! अब हमारे साथ मिलकर, नदियों के इस भयंकर स्वामी समुद्र को पार करने के उपाय पर विचार करो।

श्लोक 21 (yuddha.2.21)

लङ्घिते तत्र तैः सैन्यैर्जितमित्येव निश्चिनु। सर्वं तीर्णं च मे सैन्यं जितमित्यवधार्यताम् ॥ 2.21 ॥

laṅghite tatra taiḥ sainyairjitamityeva niścinu | sarvaṃ tīrṇaṃ ca me sainyaṃ jitamityavadhāryatām || 2.21 ||

जब वह सागर उस सेना द्वारा लांघ लिया जाएगा, तभी विजय निश्चित समझो; और जब मेरी संपूर्ण सेना पार हो जाएगी, तभी विजय हुई समझनी चाहिए।

श्लोक 22 (yuddha.2.22)

इमे हि हरयः शूराः समरे कामरूपिणः। तानरीन् विधमिष्यन्ति शिलापादपवृष्टिभिः ॥ 2.22 ॥

ime hi harayaḥ śūrāḥ samare kāmarūpiṇaḥ | tānarīn vidhamiṣyanti śilāpādapavṛṣṭibhiḥ || 2.22 ||

ये वीर वानर युद्ध में इच्छानुसार रूप धारण करने वाले हैं; ये पत्थरों और वृक्षों की वर्षा से उन शत्रुओं को उड़ा देंगे।

श्लोक 23 (yuddha.2.23)

कथंचित् परिपश्यामि लङ्घितं वरुणालयम्। हतमित्येव तं मन्ये युद्धे शत्रुनिबर्हण ॥ 2.23 ॥

kathaṃcit paripaśyāmi laṅghitaṃ varuṇālayam | hatamityeva taṃ manye yuddhe śatrunibarhaṇa || 2.23 ||

हे शत्रुनिबर्हण! जिस क्षण मैं किसी भी प्रकार वरुण के इस आवास को लांघा हुआ देखता हूँ, उसी क्षण मैं मान लेता हूँ कि वह युद्ध में मारा गया।

श्लोक 24 (yuddha.2.24)

किमुक्त्वा बहुधा चापि सर्वथा विजयी भवान्। निमित्तानि च पश्यामि मनो मे सम्प्रहृष्यति ॥ 2.24 ॥

kimuktvā bahudhā cāpi sarvathā vijayī bhavān | nimittāni ca paśyāmi mano me samprahṛṣyati || 2.24 ||

बहुत कुछ कहने से क्या लाभ? तुम सब प्रकार से अवश्य विजयी होगे; मुझे शुभ शकुन दिखाई दे रहे हैं और मेरा मन अत्यंत हर्षित हो रहा है।

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