Skip to main content

युद्धकाण्ड · सर्ग 23

लंका-अभियान के अपशकुन

सर्ग 22सर्ग-सूचीसर्ग 24

श्लोक 1 (yuddha.23.1)

निमित्तानि निमित्तज्ञो दृष्ट्वा लक्ष्मणपूर्वजः । सौमित्रिं सम्परिष्वज्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ 23.1 ॥

nimittāni nimittajño dṛṣṭvā lakṣmaṇapūrvajaḥ | saumitriṃ sampariṣvajya idaṃ vacanamabravīt || 23.1 ||

शकुनों के ज्ञाता लक्ष्मण के अग्रज राम ने अपशकुनों को देखकर सौमित्रि को आलिंगन में लेते हुए यह वचन कहा।

श्लोक 2 (yuddha.23.2)

परिगृह्योदकं शीतं वनानि फलवन्ति च । बलौघं संविभज्येमं व्यूह्य तिष्ठेम लक्ष्मण ॥ 23.2 ॥

parigṛhyodakaṃ śītaṃ vanāni phalavanti ca | balaughaṃ saṃvibhajyemaṃ vyūhya tiṣṭhema lakṣmaṇa || 23.2 ||

"हे लक्ष्मण! आओ हम शीतल जल और फलों से युक्त इस वन-प्रदेश को अपने अधिकार में लेकर, इस सेना-समूह को विभाजित कर व्यूह बनाकर खड़े हों।"

श्लोक 3 (yuddha.23.3)

लोकक्षयकरं भीमं भयं पश्याम्युपस्थितम् । प्रबर्हणं प्रवीराणामृक्षवानररक्षसाम् ॥ 23.3 ॥

lokakṣayakaraṃ bhīmaṃ bhayaṃ paśyāmyupasthitam | prabarhaṇaṃ pravīrāṇāmṛkṣavānararakṣasām || 23.3 ||

"मुझे एक भीषण, संसार का नाश करने वाला संकट निकट आता दिख रहा है, जो भालुओं, वानरों और राक्षसों के श्रेष्ठ वीरों का संहार करेगा।"

श्लोक 4 (yuddha.23.4)

वाताश्च कलुषा वान्ति कम्पते च वसुंधरा । पर्वताग्राणि वेपन्ते पतन्ति च महीरुहाः ॥ 23.4 ॥

vātāśca kaluṣā vānti kampate ca vasuṃdharā | parvatāgrāṇi vepante patanti ca mahīruhāḥ || 23.4 ||

"धूलि से मैले वायु बह रहे हैं, पृथ्वी काँप रही है, पर्वत-शिखर हिल रहे हैं और वृक्ष गिर रहे हैं।"

श्लोक 5 (yuddha.23.5)

मेघाः क्रव्यादसंकाशाः परुषाः परुषस्वनाः । क्रूराः क्रूरं प्रवर्षन्ति मिश्रं शोणितबिन्दुभिः ॥ 23.5 ॥

meghāḥ kravyādasaṃkāśāḥ paruṣāḥ paruṣasvanāḥ | krūrāḥ krūraṃ pravarṣanti miśraṃ śoṇitabindubhiḥ || 23.5 ||

"मांसभक्षी हिंस्र पशुओं के समान दिखने वाले, कठोर और कर्कश गर्जना करने वाले बादल क्रूरतापूर्वक रक्त-बिंदुओं से मिश्रित वर्षा कर रहे हैं।"

श्लोक 6 (yuddha.23.6)

रक्तचन्दनसंकाशा संध्या परमदारुणा । ज्वलतः प्रपतत्येतदादित्यादग्निमण्डलम् ॥ 23.6 ॥

raktacandanasaṃkāśā saṃdhyā paramadāruṇā | jvalataḥ prapatatyetadādityādagnimaṇḍalam || 23.6 ||

"लाल चंदन के समान संध्या अत्यंत भयंकर हो गई है, और प्रज्वलित सूर्य से मानो यह अग्नि-मंडल गिर रहा हो।"

श्लोक 7 (yuddha.23.7)

दीना दीनस्वराः क्रूराः सर्वतो मृगपक्षिणः । प्रत्यादित्यं विनर्दन्ति जनयन्तो महद्भयम् ॥ 23.7 ॥

dīnā dīnasvarāḥ krūrāḥ sarvato mṛgapakṣiṇaḥ | pratyādityaṃ vinardanti janayanto mahadbhayam || 23.7 ||

"चारों ओर हिंस्र पशु-पक्षी दीन और करुण स्वर में सूर्य की ओर मुख करके चिल्ला रहे हैं, जिससे महान भय उत्पन्न हो रहा है।"

श्लोक 8 (yuddha.23.8)

रजन्यामप्रकाशस्तु संतापयति चन्द्रमाः । कृष्णरक्तांशुपर्यन्तो लोकक्षय इवोदितः ॥ 23.8 ॥

rajanyāmaprakāśastu saṃtāpayati candramāḥ | kṛṣṇaraktāṃśuparyanto lokakṣaya ivoditaḥ || 23.8 ||

"रात्रि में तेजहीन चंद्रमा, जिसकी परिधि काली-लाल आभा से घिरी है, मन को संतप्त कर रहा है, मानो प्रलयकाल में उदित हुआ हो।"

श्लोक 9 (yuddha.23.9)

ह्रस्वो रूक्षोऽप्रशस्तश्च परिवेषस्तु लोहितः । आदित्ये विमले नीलं लक्ष्म लक्ष्मण दृश्यते ॥ 23.9 ॥

hrasvo rūkṣo'praśastaśca pariveṣastu lohitaḥ | āditye vimale nīlaṃ lakṣma lakṣmaṇa dṛśyate || 23.9 ||

"हे लक्ष्मण! सूर्य के चारों ओर एक छोटा, कर्कश, अशुभ और तांबे जैसा मंडल दिखाई दे रहा है, और निर्मल सूर्य पर एक काला चिह्न दिखाई दे रहा है।"

श्लोक 10 (yuddha.23.10)

रजसा महता चापि नक्षत्राणि हतानि च । युगान्तमिव लोकानां पश्य शंसन्ति लक्ष्मण ॥ 23.10 ॥

rajasā mahatā cāpi nakṣatrāṇi hatāni ca | yugāntamiva lokānāṃ paśya śaṃsanti lakṣmaṇa || 23.10 ||

"देखो हे लक्ष्मण, सघन धूल से आच्छादित नक्षत्र मानो संसार के प्रलय की घोषणा कर रहे हैं।"

श्लोक 11 (yuddha.23.11)

काकाः श्येनास्तथा नीचा गृध्राः परिपतन्ति च । शिवाश्चाप्यशुभान्नादान्नदन्ति सुमहाभयान् ॥ 23.11 ॥

kākāḥ śyenāstathā nīcā gṛdhrāḥ paripatanti ca | śivāścāpyaśubhānnādānnadanti sumahābhayān || 23.11 ||

"कौवे, बाज और गिद्ध नीचे उड़ रहे हैं, तथा सियार भी अत्यंत भयंकर और अशुभ स्वर में हुआँका रहे हैं।"

श्लोक 12 (yuddha.23.12)

शैलैः शूलैश्च खड्गैश्च विमुक्तैः कपिराक्षसैः । भविष्यत्यावृता भूमिर्मांसशोणितकर्दमा ॥ 23.12 ॥

śailaiḥ śūlaiśca khaḍgaiśca vimuktaiḥ kapirākṣasaiḥ | bhaviṣyatyāvṛtā bhūmirmāṃsaśoṇitakardamā || 23.12 ||

"वानरों और राक्षसों द्वारा फेंके गए शिलाखंडों, त्रिशूलों और खड्गों से यह पृथ्वी शीघ्र ही आच्छादित होकर मांस और रक्त के कीचड़ में बदल जाएगी।"

श्लोक 13 (yuddha.23.13)

क्षिप्रमद्यैव दुर्धर्षां पुरीं रावणपालिताम् । अभियाम जवेनैव सर्वैर्हरिभिरावृताः ॥ 23.13 ॥

kṣipramadyaiva durdharṣāṃ purīṃ rāvaṇapālitām | abhiyāma javenaiva sarvairharibhirāvṛtāḥ || 23.13 ||

"आओ, आज ही शीघ्रतापूर्वक, समस्त वानर-सेना से घिरे हुए, हम रावण द्वारा शासित उस दुर्धर्ष नगरी पर आक्रमण करें।"

श्लोक 14 (yuddha.23.14)

इत्येवमुक्त्वा धन्वी स रामः संग्रामधर्षणः । प्रतस्थे पुरतो रामो लङ्कामभिमुखो विभुः ॥ 23.14 ॥

ityevamuktvā dhanvī sa rāmaḥ saṃgrāmadharṣaṇaḥ | pratasthe purato rāmo laṅkāmabhimukho vibhuḥ || 23.14 ||

यह कहकर वे प्रभु राम, जो युद्ध में शत्रुओं का दलन करने वाले थे, धनुष धारण किए हुए सबसे आगे लंका की ओर मुख करके चल पड़े।

श्लोक 15 (yuddha.23.15)

सविभीषणसुग्रीवाः सर्वे ते वानरर्षभाः । प्रतस्थिरे विनर्दन्तो धृतानां द्विषतां वधे ॥ 23.15 ॥

savibhīṣaṇasugrīvāḥ sarve te vānararṣabhāḥ | pratasthire vinardanto dhṛtānāṃ dviṣatāṃ vadhe || 23.15 ||

विभीषण और सुग्रीव सहित वे सभी श्रेष्ठ वानर गर्जना करते हुए, अभिमानी शत्रु के विनाश का संकल्प लेकर आगे बढ़ चले।

श्लोक 16 (yuddha.23.16)

राघवस्य प्रियार्थं तु सुतरां वीर्यशालिनाम् । हरीणां कर्मचेष्टाभिस्तुतोष रघुनन्दनः ॥ 23.16 ॥

rāghavasya priyārthaṃ tu sutarāṃ vīryaśālinām | harīṇāṃ karmaceṣṭābhistutoṣa raghunandanaḥ || 23.16 ||

और रघुनंदन राम उन अत्यंत बलशाली वानरों की चेष्टाओं और कार्यों से, जो राघव को प्रसन्न करने के लिए तत्पर थे, अत्यंत संतुष्ट हुए।

सर्ग 22सर्ग-सूचीसर्ग 24