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युद्धकाण्ड · सर्ग 26

सारण द्वारा वानर सेनापतियों का परिचय

सर्ग 25सर्ग-सूचीसर्ग 27

श्लोक 1 (yuddha.26.1)

तद्वचः सत्यमक्लीबं सारणेनाभिभाषितम् । निशम्य रावणो राजा प्रत्यभाषत सारणम् ॥ ६-२६-१ ॥

tad vacaḥ satyam aklībaṃ sāraṇenābhibhāṣitam | niśamya rāvaṇo rājā pratyabhāṣata sāraṇam || 6-26-1 ||

सारण द्वारा कहे गए उन सत्य और निर्भीक वचनों को सुनकर राजा रावण ने सारण को उत्तर दिया।

श्लोक 2 (yuddha.26.2)

यदि मामभियुञ्जीरन् देवगन्धर्वदानवाः । नैव सीतां प्रदास्यामि सर्वलोकभयादपि ॥ ६-२६-२ ॥

yadi mām abhiyuñjīran devagandharvadānavāḥ | naiva sītāṃ pradāsyāmi sarvalokabhayādapi || 6-26-2 ||

यदि देवता, गन्धर्व और दानव सब मिलकर मुझ पर आक्रमण करें, तो भी मैं सम्पूर्ण संसार के भय से भी सीता को कदापि नहीं दूँगा।

श्लोक 3 (yuddha.26.3)

त्वं तु सौम्य परित्रस्तो हरिभिः पीडितो भृशम् । प्रतिप्रदानमद्यैव सीतायाः साधु मन्यसे ॥ ६-२६-३ ॥

tvaṃ tu saumya paritrasto haribhiḥ pīḍito bhṛśam | pratipradānam adyaiva sītāyāḥ sādhu manyase || 6-26-3 ||

हे सौम्य! तुम तो वानरों से बुरी तरह पीड़ित और भयभीत होकर अभी ही सीता को लौटा देना उचित समझने लगे हो।

श्लोक 4 (yuddha.26.4)

को हि नाम सपत्नो मां समरे जेतुमर्हति । इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः ॥ ६-२६-४ ॥

ko hi nāma sapatno māṃ samare jetum arhati | ity uktvā paruṣaṃ vākyaṃ rāvaṇo rākṣasādhipaḥ || 6-26-4 ||

भला कौन शत्रु समर में मुझे जीत सकता है? राक्षसराज रावण ने ऐसे कठोर वचन कहकर,

श्लोक 5 (yuddha.26.5)

आरुरोह ततः श्रीमान् प्रासादं हिमपाण्डुरम् । बहुतालसमुत्सेधं रावणोऽथ दिदृक्षया ॥ ६-२६-५ ॥

āruroha tataḥ śrīmān prāsādaṃ himapāṇḍuram | bahutālasamutsedhaṃ rāvaṇo'tha didṛkṣayā || 6-26-5 ||

फिर वह श्रीमान् रावण वानर-सेना को देखने की इच्छा से हिम के समान श्वेत और अनेक ताड़ वृक्षों जितने ऊँचे उस राजप्रासाद पर चढ़ गया।

श्लोक 6 (yuddha.26.6)

ताभ्यां चराभ्यां सहितो रावणः क्रोधमूर्च्छितः । पश्यमानः समुद्रं तं पर्वतांश्च वनानि च ॥ ६-२६-६ ॥

tābhyāṃ carābhyāṃ sahito rāvaṇaḥ krodhamūrcchitaḥ | paśyamānaḥ samudraṃ taṃ parvatāṃśca vanāni ca || 6-26-6 ||

क्रोध से व्याकुल रावण उन दोनों गुप्तचरों के साथ उस समुद्र, पर्वतों और वनों को देखता हुआ

श्लोक 7 (yuddha.26.7)

ददर्श पृथिवीदेशं सुसम्पूर्णं प्लवङ्गमैः । तदपारमसह्यं च वानराणां महाबलम् ॥ ६-२६-७ ॥

dadarśa pṛthivīdeśaṃ susampūrṇaṃ plavaṅgamaiḥ | tadapāram asahyaṃ ca vānarāṇāṃ mahābalam || 6-26-7 ||

और उसने वह भूभाग वानरों से पूर्णतः भरा हुआ देखा -- वानरों की वह विशाल सेना अपार और असह्य प्रतीत हो रही थी।

श्लोक 8 (yuddha.26.8)

आलोक्य रावणो राजा परिपप्रच्छ सारणम् । एषां के वानरा मुख्याः के शूराः के महाबलाः ॥ ६-२६-८ ॥

ālokya rāvaṇo rājā paripapraccha sāraṇam | eṣāṃ ke vānarā mukhyāḥ ke śūrāḥ ke mahābalāḥ || 6-26-8 ||

उसे देखकर राजा रावण ने सारण से पूछा, "इनमें कौन-कौन वानर प्रमुख हैं? कौन शूरवीर हैं, कौन महाबली हैं?

श्लोक 9 (yuddha.26.9)

के पूर्वमभिवर्तन्ते महोत्साहाः समन्ततः । केषां शृणोति सुग्रीवः के वा यूथपयूथपाः ॥ ६-२६-९ ॥

ke pūrvam abhivartante mahotsāhāḥ samantataḥ | keṣāṃ śṛṇoti sugrīvaḥ ke vā yūthapayūthapāḥ || 6-26-9 ||

कौन सर्वत्र सबसे आगे बढ़कर अत्यन्त उत्साह से खड़े हैं? सुग्रीव किनकी बात सुनते हैं? और कौन सेनापतियों के भी सेनापति हैं?

श्लोक 10 (yuddha.26.10)

सारण आचक्ष्व मे सर्वं के प्रधानाः प्लवङ्गमाः । सारणो राक्षसेन्द्रस्य वचनं परिपृच्छतः ॥ ६-२६-१० ॥

sāraṇa ācakṣva me sarvaṃ ke pradhānāḥ plavaṅgamāḥ | sāraṇo rākṣasendrasya vacanaṃ paripṛcchataḥ || 6-26-10 ||

हे सारण! मुझे सब बताओ कि कौन-से वानर प्रधान हैं" -- इस प्रकार पूछते हुए राक्षसराज के वचन को सुनकर,

श्लोक 11 (yuddha.26.11)

आबभाषेऽथ मुख्यज्ञो मुख्यांस्तांस्तु वनौकसः । एष योऽभिमुखो लङ्कां नर्दंस्तिष्ठति वानरः ॥ ६-२६-११ ॥

ābabhāṣe'tha mukhyajño mukhyāṃstāṃstu vanaukasaḥ | eṣa yo'bhimukho laṅkāṃ nardaṃstiṣṭhati vānaraḥ || 6-26-11 ||

सारण, जो प्रमुख वानरों को भली-भाँति जानता था, उनके विषय में बताने लगा -- "यह जो वानर लंका की ओर मुख करके गरजता हुआ खड़ा है,

श्लोक 12 (yuddha.26.12)

यूथपानां सहस्राणां शतेन परिवारितः । यस्य घोषेण महता सप्राकारा सतोरणा ॥ ६-२६-१२ ॥

yūthapānāṃ sahasrāṇāṃ śatena parivāritaḥ | yasya ghoṣeṇa mahatā sprākārā satoraṇā || 6-26-12 ||

जो सैकड़ों-हजारों सेनापतियों से घिरा है, जिसकी महागर्जना से प्राकारों और तोरणों सहित

श्लोक 13 (yuddha.26.13)

लङ्का प्रतिहता सर्वा सशैलवनकानना । सर्वशाखामृगेन्द्रस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥ ६-२६-१३ ॥

laṅkā pratihatā sarvā saśailavanakānanā | sarvaśākhāmṛgendrasya sugrīvasya mahātmanaḥ || 6-26-13 ||

समस्त लंका पर्वतों और वन-कानन सहित प्रतिध्वनित हो उठती है -- महात्मा सुग्रीव, समस्त वानरों के स्वामी, की सेना के अग्रभाग में

श्लोक 14 (yuddha.26.14)

बलाग्रे तिष्ठते वीरो नीलो नामैष यूथपः । बाहुं प्रगृह्य यः पद्भ्यां महीं गच्छति वीर्यवान् ॥ ६-२६-१४ ॥

balāgre tiṣṭhate vīro nīlo nāmaiṣa yūthapaḥ | bāhuṃ pragṛhya yaḥ padbhyāṃ mahīṃ gacchati vīryavān || 6-26-14 ||

खड़ा है -- वह वीर सेनापति नील नामक है, जो अपनी भुजा उठाए हुए बलपूर्वक पृथ्वी पर पग रखता चलता है।

श्लोक 15 (yuddha.26.15)

लङ्कामभिमुखः कोपादभीक्ष्णं च विजृम्भते । गिरिशृङ्गप्रतीकाशः पद्मकिंजल्कसंनिभः ॥ ६-२६-१५ ॥

laṅkām abhimukhaḥ kopād abhīkṣṇaṃ ca vijṛmbhate | giriśṛṅgapratīkāśaḥ padmakiṃjalkasaṃnibhaḥ || 6-26-15 ||

लंका की ओर मुख किए हुए वह क्रोध से बार-बार अपने अंगों को फैलाता है; वह पर्वत-शिखर के समान और कमल-केसर के वर्ण जैसा है।

श्लोक 16 (yuddha.26.16)

स्फोटयत्यभिसंरब्धो लाङ्गूलं च पुनः पुनः । यस्य लाङ्गूलशब्देन स्वनन्ति प्रदिशो दश ॥ ६-२६-१६ ॥

sphoṭayaty abhisaṃrabdho lāṅgūlaṃ ca punaḥ punaḥ | yasya lāṅgūlaśabdena svananti pradiśo daśa || 6-26-16 ||

क्रोधावेश में वह बार-बार अपनी पूँछ पटकता है, जिसकी ध्वनि से दसों दिशाएँ गूँज उठती हैं।

श्लोक 17 (yuddha.26.17)

एष वानरराजेन सुग्रीवेणाभिषेचितः । युवराजोऽङ्गदो नाम त्वामाह्वयति संयुगे ॥ ६-२६-१७ ॥

eṣa vānararājena sugrīveṇābhiṣicitaḥ | yuvarājo'ṅgado nāma tvām āhvayati saṃyuge || 6-26-17 ||

वह वानरराज सुग्रीव द्वारा युवराज पद पर अभिषिक्त अंगद है, जो तुम्हें युद्ध के लिए ललकार रहा है।

श्लोक 18 (yuddha.26.18)

वालिनः सदृशः पुत्रः सुग्रीवस्य सदा प्रियः । राघवार्थे पराक्रान्तः शक्रार्थे वरुणो यथा ॥ ६-२६-१८ ॥

vālinaḥ sadṛśaḥ putraḥ sugrīvasya sadā priyaḥ | rāghavārthe parākrāntaḥ śakrārthe varuṇo yathā || 6-26-18 ||

वह वालि के समान पुत्र है और सुग्रीव को सदा प्रिय है; वह रघुनाथ के हित के लिए उसी प्रकार पराक्रम कर रहा है जैसे वरुण इन्द्र के हित के लिए करते हैं।

श्लोक 19 (yuddha.26.19)

एतस्य सा मतिः सर्वा यद्दृष्टा जनकात्मजा । हनूमता वेगवता राघवस्य हितैषिणा ॥ ६-२६-१९ ॥

etasya sā matiḥ sarvā yad dṛṣṭā janakātmajā | hanūmatā vegavatā rāghavasya hitaiṣiṇā || 6-26-19 ||

यह सब उसी की बुद्धि का फल है कि जनकनन्दिनी सीता को रघुनाथ के हितैषी वेगवान् हनुमान् ने खोज निकाला।

श्लोक 20 (yuddha.26.20)

बहूनि वानरेन्द्राणामेष यूथानि वीर्यवान् । परिगृह्याभियाति त्वां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ॥ ६-२६-२० ॥

bahūni vānarendrāṇām eṣa yūthāni vīryavān | parigṛhyābhiyāti tvāṃ svenānīkena marditum || 6-26-20 ||

यह पराक्रमी अंगद अनेक वानर-यूथों को साथ लेकर अपनी सेना से तुम्हें रौंद डालने के लिए बढ़ रहा है।

श्लोक 21 (yuddha.26.21)

अनुवालिसुतस्यापि बलेन महता वृतः । वीरस्तिष्ठति संग्रामे सेतुहेतुरयं नलः ॥ ६-२६-२१ ॥

anuvālisutasyāpi balena mahatā vṛtaḥ | vīras tiṣṭhati saṃgrāme setuhetur ayaṃ nalaḥ || 6-26-21 ||

वालिपुत्र अंगद के पीछे, विशाल सेना से घिरा हुआ, युद्ध के लिए खड़ा है यह वीर नल, जिसने सेतु का निर्माण किया।

श्लोक 22 (yuddha.26.22)

ये तु विष्टभ्य गात्राणि क्ष्वेडयन्ति नदन्ति च । उत्थाय च विजृम्भन्ते क्रोधेन हरिपुङ्गवाः ॥ ६-२६-२२ ॥

ye tu viṣṭabhya gātrāṇi kṣveḍayanti nadanti ca | utthāya ca vijṛmbhante krodhena haripuṅgavāḥ || 6-26-22 ||

जो अपने अंगों को तानकर सिंहनाद करते और गरजते हैं, और जो उठकर क्रोध से अपने अंग फैलाते हैं -- वे उत्तम वानर,

श्लोक 23 (yuddha.26.23)

एते दुष्प्रसहा घोराश्चण्डाश्चण्डपराक्रमाः । अष्टौ शतसहस्राणि दशकोटिशतानि च ॥ ६-२६-२३ ॥

ete duṣprasahā ghorāś caṇḍāś caṇḍaparākramāḥ | aṣṭau śatasahasrāṇi daśakoṭiśatāni ca || 6-26-23 ||

ये असह्य, भयंकर, प्रचण्ड और प्रचण्ड पराक्रमी वानर आठ लाख और दस सौ करोड़ की संख्या में हैं।

श्लोक 24 (yuddha.26.24)

य एनमनुगच्छन्ति वीराश्चन्दनवासिनः । एष आशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ॥ ६-२६-२४ ॥

ya enam anugacchanti vīrāś candanavāsinaḥ | eṣa āśaṃsate laṅkāṃ svenānīkena marditum || 6-26-24 ||

ये वीर वानर, जो चन्दन-वनों के निवासी हैं, उसी नील के अनुगामी हैं -- वह अपनी सेना से लंका को रौंद डालने की आशा रखता है।

श्लोक 25 (yuddha.26.25)

श्वेतो रजतसंकाशश्चपलो भीमविक्रमः । बुद्धिमान् वानरः शूरस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ ६-२६-२५ ॥

śveto rajatasaṃkāśaś capalo bhīmavikramaḥ | buddhimān vānaraḥ śūras triṣu lokeṣu viśrutaḥ || 6-26-25 ||

श्वेत नामक वानर, जो चाँदी के समान श्वेत वर्ण, चंचल, भयंकर पराक्रमी, बुद्धिमान् और शूरवीर है, तीनों लोकों में विख्यात है।

श्लोक 26 (yuddha.26.26)

तूर्णं सुग्रीवमागम्य पुनर्गच्छति वानरः । विभजन् वानरीं सेनामनीकानि प्रहर्षयन् ॥ ६-२६-२६ ॥

tūrṇaṃ sugrīvam āgamya punar gacchati vānaraḥ | vibhajan vānarīṃ senām anīkāni praharṣayan || 6-26-26 ||

वह वानर सुग्रीव के पास शीघ्रता से आकर पुनः लौट जाता है, वानर-सेना को विभाजित करता और सैनिकों को उत्साहित करता हुआ।

श्लोक 27 (yuddha.26.27)

यः पुरा गोमतीतीरे रम्यं पर्येति पर्वतम् । नाम्ना संरोचनो नाम नानानगयुतो गिरिः ॥ ६-२६-२७ ॥

yaḥ purā gomatītīre ramyaṃ paryeti parvatam | nāmnā saṃrocano nāma nānānagayuto giriḥ || 6-26-27 ||

वह पहले गोमती नदी के तट पर स्थित संरोचन नामक सुरम्य पर्वत, जो अनेक वृक्षों से युक्त है, पर विचरण करता था।

श्लोक 28 (yuddha.26.28)

तत्र राज्यं प्रशास्त्येष कुमुदो नाम यूथपः । योऽसौ शतसहस्राणि सहर्षं परिकर्षति ॥ ६-२६-२८ ॥

tatra rājyaṃ praśāsty eṣa kumudo nāma yūthapaḥ | yo'sau śatasahasrāṇi saharṣaṃ parikarṣati || 6-26-28 ||

वहाँ राज्य करने वाला यह सेनापति कुमुद नामक है, जो हर्षपूर्वक लाखों वानरों को साथ लेकर चलता है।

श्लोक 29 (yuddha.26.29)

यस्य वाला बहुव्यामा दीर्घलाङ्गूलमाश्रिताः । ताम्राः पीताः सिताः श्वेताः प्रकीर्णा घोरदर्शनाः ॥ ६-२६-२९ ॥

yasya vālā bahuvyāmā dīrghalāṅgūlam āśritāḥ | tāmrāḥ pītāḥ sitāḥ śvetāḥ prakīrṇā ghoradarśanāḥ || 6-26-29 ||

जिसकी लंबी पूँछ पर अनेक हाथ लंबे, ताम्रवर्ण, पीत, धूसर और श्वेत बाल बिखरे हुए हैं, जो देखने में भयंकर लगते हैं,

श्लोक 30 (yuddha.26.30)

अदीनो वानरश्चण्डः संग्राममभिकाङ्क्षति । एषोऽप्याशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ॥ ६-२६-३० ॥

adīno vānaraś caṇḍaḥ saṃgrāmam abhikāṅkṣati | eṣo'py āśaṃsate laṅkāṃ svenānīkena marditum || 6-26-30 ||

वह निर्भीक और उग्र वानर युद्ध की कामना करता है; वह भी अपनी सेना से लंका को रौंद डालने की आशा रखता है।

श्लोक 31 (yuddha.26.31)

यस्त्वेष सिंहसंकाशः कपिलो दीर्घकेसरः । निभृतः प्रेक्षते लङ्कां दिधक्षन्निव चक्षुषा ॥ ६-२६-३१ ॥

yas tv eṣa siṃhasaṃkāśaḥ kapilo dīrghakesaraḥ | nibhṛtaḥ prekṣate laṅkāṃ didhakṣanniva cakṣuṣā || 6-26-31 ||

और यह जो सिंह के समान, भूरे वर्ण और दीर्घ केशों वाला वानर स्थिर होकर लंका को देख रहा है, मानो अपने नेत्रों से उसे भस्म कर देना चाहता हो,

श्लोक 32 (yuddha.26.32)

विन्ध्यं कृष्णगिरिं सह्यं पर्वतं च सुदर्शनम् । राजन् सततमध्यास्ते रम्भो नामैष यूथपः ॥ ६-२६-३२ ॥

vindhyaṃ kṛṣṇagiriṃ sahyaṃ parvataṃ ca sudarśanam | rājan satatam adhyāste rambho nāmaiṣa yūthapaḥ || 6-26-32 ||

हे राजन्! वह सदा विन्ध्य, कृष्णगिरि, सह्य और सुदर्शन पर्वतों पर निवास करता है -- यह सेनापति रम्भ नामक है।

श्लोक 33 (yuddha.26.33)

शतं शतसहस्राणां त्रिंशच्च हरियूथपाः । यं यान्तं वानरा घोराश्चण्डाश्चण्डपराक्रमाः ॥ ६-२६-३३ ॥

śataṃ śatasahasrāṇāṃ triṃśac ca hariyūthapāḥ | yaṃ yāntaṃ vānarā ghorāś caṇḍāś caṇḍaparākramāḥ || 6-26-33 ||

तीस करोड़ वानर-सेनापति उसके साथ हैं, जिस चलते हुए रम्भ के पीछे भयंकर, उग्र और प्रचण्ड पराक्रमी वानर,

श्लोक 34 (yuddha.26.34)

परिवार्यानुगच्छन्ति लङ्कां मर्दितुमोजसा । यस्तु कर्णौ विवृणुते जृम्भते च पुनः पुनः ॥ ६-२६-३४ ॥

parivāryānugacchanti laṅkāṃ marditum ojasā | yas tu karṇau vivṛṇute jṛmbhate ca punaḥ punaḥ || 6-26-34 ||

उसे घेरे हुए चलते हैं, अपने बल से लंका को रौंदने के लिए। और जो बार-बार अपने कान फड़फड़ाता और जृम्भा लेता है,

श्लोक 35 (yuddha.26.35)

न च संविजते मृत्योर्न च यूथाद्विधावति । प्रकम्पते च रोषेण तिर्यक्च पुनरीक्षते ॥ ६-२६-३५ ॥

na ca saṃvijate mṛtyor na ca yūthād vidhāvati | prakampate ca roṣeṇa tiryak ca punarīkṣate || 6-26-35 ||

मृत्यु से भी भयभीत नहीं होता, न ही अपने यूथ से भागता है; क्रोध से काँपता है और बार-बार तिरछी दृष्टि से देखता है,

श्लोक 36 (yuddha.26.36)

पश्यँल्लाङ्गूलमपि च क्ष्वेडत्येष महाबलः । महाबलो वीतभयो रम्यं साल्वेयपर्वतम् ॥ ६-२६-३६ ॥

paśyaṁl lāṅgūlam api ca kṣveḍaty eṣa mahābalaḥ | mahābalo vītabhayo ramyaṃ sālveyaparvatam || 6-26-36 ||

और अपनी पूँछ देखते हुए सिंहनाद करता है -- यह महाबली, निर्भय वानर सुरम्य साल्वेय पर्वत पर

श्लोक 37 (yuddha.26.37)

राजन् सततमध्यास्ते शरभो नाम यूथपः । एतस्य बलिनः सर्वे विहारा नाम यूथपाः ॥ ६-२६-३७ ॥

rājan satatam adhyāste śarabho nāma yūthapaḥ | etasya balinaḥ sarve vihārā nāma yūthapāḥ || 6-26-37 ||

सदा निवास करता है -- यह सेनापति शरभ नामक है। इसके सभी बलवान सेनापति विहार नामक हैं।

श्लोक 38 (yuddha.26.38)

राजन् शतसहस्राणि चत्वारिंशत्तथैव च । यस्तु मेघ इवाकाशं महानावृत्य तिष्ठति ॥ ६-२६-३८ ॥

rājan śatasahasrāṇi catvāriṃśat tathaiva ca | yas tu megha ivākāśaṃ mahān āvṛtya tiṣṭhati || 6-26-38 ||

हे राजन्! वे संख्या में एक लाख चालीस हजार हैं। और जो विशाल मेघ के समान आकाश को ढककर खड़ा है,

श्लोक 39 (yuddha.26.39)

मध्ये वानरवीराणां सुराणामिव वासवः । भेरीणामिव संनादो यस्यैष श्रूयते महान् ॥ ६-२६-३९ ॥

madhye vānaravīrāṇāṃ surāṇām iva vāsavaḥ | bherīṇām iva saṃnādo yasyaiṣa śrūyate mahān || 6-26-39 ||

वानर-वीरों के बीच वैसे ही खड़ा है जैसे देवताओं के बीच इन्द्र, जिसकी विशाल गर्जना नगाड़ों की ध्वनि के समान सुनाई देती है,

श्लोक 40 (yuddha.26.40)

घोरः शाखामृगेन्द्राणां संग्राममभिकाङ्क्षताम् । एष पर्वतमध्यास्ते पारियात्रमनुत्तमम् ॥ ६-२६-४० ॥

ghoraḥ śākhāmṛgendrāṇāṃ saṃgrāmam abhikāṅkṣatām | eṣa parvatam adhyāste pāriyātram anuttamam || 6-26-40 ||

जो युद्ध की कामना करने वाले वानरश्रेष्ठों में भयंकर है -- यह अनुपम पारियात्र पर्वत पर निवास करता है,

श्लोक 41 (yuddha.26.41)

युद्धे दुष्प्रसहो नित्यं पनसो नाम यूथपः । एनं शतसहस्राणां शतार्धं पर्युपासते ॥ ६-२६-४१ ॥

yuddhe duṣprasaho nityaṃ panaso nāma yūthapaḥ | enaṃ śatasahasrāṇāṃ śatārdhaṃ paryupāsate || 6-26-41 ||

यह सेनापति पनस नामक है, जो युद्ध में सदा अजेय है। इसकी सेवा पचास लाख वानर करते हैं,

श्लोक 42 (yuddha.26.42)

यूथपा यूथपश्रेष्ठं येषां यूथानि भागशः । यस्तु भीमां प्रवल्गन्तीं चमूं तिष्ठति शोभयन् ॥ ६-२६-४२ ॥

yūthapā yūthapaśreṣṭhaṃ yeṣāṃ yūthāni bhāgaśaḥ | yas tu bhīmāṃ pravalgantīṃ camūṃ tiṣṭhati śobhayan || 6-26-42 ||

सेनापति अपने-अपने यूथों सहित इस श्रेष्ठ सेनापति की सेवा में हैं। और जो अपनी भयंकर, उछलती हुई सेना को सुशोभित करता हुआ खड़ा है,

श्लोक 43 (yuddha.26.43)

स्थितां तीरे समुद्रस्य द्वितीय इव सागरः । एष दर्दुरसंकाशो विनतो नाम यूथपः ॥ ६-२६-४३ ॥

sthitāṃ tīre samudrasya dvitīya iva sāgaraḥ | eṣa dardurasaṃkāśo vinato nāma yūthapaḥ || 6-26-43 ||

सागर के तट पर खड़ा हुआ मानो एक दूसरा सागर हो -- यह दर्दुर पर्वत के समान विशाल सेनापति विनत नामक है,

श्लोक 44 (yuddha.26.44)

पिबंश्चरति यो वेणां नदीनामुत्तमां नदीम् । षष्टिः शतसहस्राणि बलमस्य प्लवङ्गमाः ॥ ६-२६-४४ ॥

pibaṃś carati yo veṇāṃ nadīnām uttamāṃ nadīm | ṣaṣṭiḥ śatasahasrāṇi balam asya plavaṅgamāḥ || 6-26-44 ||

जो नदियों में श्रेष्ठ वेणा नदी का जल पीता हुआ विचरण करता है; इसकी सेना साठ लाख वानरों की है।

श्लोक 45 (yuddha.26.45)

त्वामाह्वयति युद्धाय क्रथनो नाम यूथपः । विक्रान्ता बलवन्तश्च यथा यूथानि भागशः ॥ ६-२६-४५ ॥

tvām āhvayati yuddhāya krathano nāma yūthapaḥ | vikrāntā balavantaś ca yathā yūthāni bhāgaśaḥ || 6-26-45 ||

क्रथन नामक सेनापति तुम्हें युद्ध के लिए ललकार रहा है, अपने पराक्रमी और बलवान् यूथों को विभाग करके साथ लिए हुए।

श्लोक 46 (yuddha.26.46)

यस्तु गैरिकवर्णाभं वपुः पुष्यति वानरः । अवमत्य सदा सर्वान्वानरान् बलदर्पितः ॥ ६-२६-४६ ॥

yas tu gairikavarṇābhaṃ vapuḥ puṣyati vānaraḥ | avamatya sadā sarvān vānarān baladarpitaḥ || 6-26-46 ||

और जो वानर गेरू के रंग जैसी काया धारण करता है, अपने बल के गर्व में सदा सब वानरों की उपेक्षा करता है,

श्लोक 47 (yuddha.26.47)

गवयो नाम तेजस्वी त्वां क्रोधादभिवर्तते । एनं शतसहस्राणि सप्ततिः पर्युपासते । एष आशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ॥ ६-२६-४७ ॥

gavayo nāma tejasvī tvāṃ krodhād abhivartate | enaṃ śatasahasrāṇi saptatiḥ paryupāsate | eṣa āśaṃsate laṅkāṃ svenānīkena marditum || 6-26-47 ||

यह तेजस्वी वानर गवय नामक है, जो क्रोध में तुम्हारे सामने आ रहा है। सत्तर लाख वानर उसकी सेवा में रहते हैं, और वह अपनी सेना से लंका को रौंद डालने की आशा रखता है।

श्लोक 48 (yuddha.26.48)

एते दुष्प्रसहा घोरा बलिनः कामरूपिणः । यूथपा यूथपश्रेष्ठा येषां संख्या न विद्यते ॥ ६-२६-४८ ॥

ete duṣprasahā ghorā balinaḥ kāmarūpiṇaḥ | yūthapā yūthapaśreṣṭhā yeṣāṃ saṃkhyā na vidyate || 6-26-48 ||

ये सब असह्य, भयंकर, बलवान् और इच्छानुसार रूप बदलने वाले सेनापति और सेनापतिश्रेष्ठ हैं, जिनकी गिनती नहीं की जा सकती।"

सर्ग 25सर्ग-सूचीसर्ग 27