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युद्धकाण्ड · सर्ग 43

वानर-राक्षस द्वन्द्व-युद्ध

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श्लोक 1 (yuddha.43.1)

युध्यतां तु ततस्तेषां वानराणां महात्मनाम्। रक्षसां सम्बभूवाथ बलरोषः सुदारुणः ॥ 43.1 ॥

yudhyatāṃ tu tatasteṣāṃ vānarāṇāṃ mahātmanām| rakṣasāṃ sambabhūvātha balaroṣaḥ sudāruṇaḥ || 43.1 ||

तत्पश्चात् युद्धरत उन महान् वानरों के साथ राक्षसों का अत्यन्त भयंकर बल-कोप भड़क उठा।

श्लोक 2 (yuddha.43.2)

ते हयैः काञ्चनापीडैर्गजैश्चाग्निशिखोपमैः। रथैश्चादित्यसंकाशैः कवचैश्च मनोरमैः ॥ 43.2 ॥

te hayaiḥ kāñcanāpīḍairgajaiścāgniśikhopamaiḥ| rathaiścādityasaṃkāśaiḥ kavacaiśca manoramaiḥ || 43.2 ||

स्वर्ण-आभूषित घोड़ों, अग्नि-शिखा के समान हाथियों, सूर्य-सम रथों और मनोहर कवचों से युक्त होकर —

श्लोक 3 (yuddha.43.3)

निर्ययू राक्षसा वीरा नादयन्तो दिशो दश। राक्षसा भीमकर्माणो रावणस्य जयैषिणः ॥ 43.3 ॥

niryayū rākṣasā vīrā nādayanto diśo daśa| rākṣasā bhīmakarmāṇo rāvaṇasya jayaiṣiṇaḥ || 43.3 ||

— रावण की विजय चाहने वाले, भीषण कर्म करने वाले वीर राक्षस दसों दिशाओं में गर्जना करते हुए निकल पड़े।

श्लोक 4 (yuddha.43.4)

वानराणामपि चमूर्बृहती जयमिच्छताम्। अभ्यधावत तां सेनां रक्षसां घोरकर्मणाम् ॥ 43.4 ॥

vānarāṇāmapi camūrbṛhatī jayamicchatām| abhyadhāvata tāṃ senāṃ rakṣasāṃ ghorakarmaṇām || 43.4 ||

विजय की कामना करने वाली वानरों की विशाल सेना भी उस घोर-कर्मी राक्षस-सेना की ओर दौड़ पड़ी।

श्लोक 5 (yuddha.43.5)

एतस्मिन्नन्तरे तेषामन्योन्यमभिधावताम्। रक्षसां वानराणां च द्वन्द्वयुद्धमवर्तत ॥ 43.5 ॥

etasminnantare teṣāmanyonyamabhidhāvatām| rakṣasāṃ vānarāṇāṃ ca dvandvayuddhamavartata || 43.5 ||

इसी बीच परस्पर एक-दूसरे की ओर दौड़ते हुए राक्षसों और वानरों के मध्य द्वन्द्व-युद्ध आरम्भ हो गया।

श्लोक 6 (yuddha.43.6)

अङ्गदेनेन्द्रजित्सार्धं वालिपुत्रेण राक्षसः। अयुध्यत महातेजास्त्र्यम्बकेण यथान्धकः ॥ 43.6 ॥

aṅgadenendrajitsārdhaṃ vāliputreṇa rākṣasaḥ| ayudhyata mahātejāstryambakeṇa yathāndhakaḥ || 43.6 ||

वालि-पुत्र अंगद महातेजस्वी इन्द्रजित् के साथ ऐसे युद्ध करने लगा जैसे पहले अन्धक त्र्यम्बक (शिव) के साथ युद्ध करता था।

श्लोक 7 (yuddha.43.7)

प्रजङ्घेन च सम्पातिर्नित्यं दुर्धर्षणो रणे। जम्बुमालिनमारब्धो हनूमानपि वानरः ॥ 43.7 ॥

prajaṅghena ca sampātirnityaṃ durdharṣaṇo raṇe| jambumālinamārabdho hanūmānapi vānaraḥ || 43.7 ||

सम्पाति युद्ध में सदा दुर्जेय रहने वाले प्रजंघ के साथ भिड़ गया; वानर हनुमान भी जम्बुमाली से जूझ पड़ा।

श्लोक 8 (yuddha.43.8)

संगतस्तु महाक्रोधो राक्षसो रावणानुजः। समरे तीक्ष्णवेगेन शत्रुघ्नेन विभीषणः ॥ 43.8 ॥

saṃgatastu mahākrodho rākṣaso rāvaṇānujaḥ| samare tīkṣṇavegena śatrughnena vibhīṣaṇaḥ || 43.8 ||

रावण के अनुज महाक्रोधी राक्षस विभीषण, तीव्रवेगी शत्रुघ्न नामक राक्षस के साथ युद्ध में भिड़ गया।

श्लोक 9 (yuddha.43.9)

तपनेन गजः सार्धं राक्षसेन महाबलः। निकुम्भेन महातेजा नीलोऽपि समयुध्यत ॥ 43.9 ॥

tapanena gajaḥ sārdhaṃ rākṣasena mahābalaḥ| nikumbhena mahātejā nīlo'pi samayudhyata || 43.9 ||

महाबली गज तपन नामक राक्षस के साथ युद्ध करने लगा; तेजस्वी नील भी निकुम्भ के साथ युद्धरत हो गया।

श्लोक 10 (yuddha.43.10)

वानरेन्द्रस्तु सुग्रीवः प्रघसेन सुसंगतः। संगतः समरे श्रीमान् विरूपाक्षेण लक्ष्मणः ॥ 43.10 ॥

vānarendrastu sugrīvaḥ praghasena susaṃgataḥ| saṃgataḥ samare śrīmān virūpākṣeṇa lakṣmaṇaḥ || 43.10 ||

वानरराज सुग्रीव प्रघस से अच्छी तरह भिड़ गया; श्रीमान लक्ष्मण विरूपाक्ष के साथ युद्ध में संलग्न हो गया।

श्लोक 11 (yuddha.43.11)

अग्निकेतुः सुदुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः। सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च रामेण सह संगताः ॥ 43.11 ॥

agniketuḥ sudurdharṣo raśmiketuśca rākṣasaḥ| suptaghno yajñakopaśca rāmeṇa saha saṃgatāḥ || 43.11 ||

दुर्जेय अग्निकेतु, रश्मिकेतु राक्षस, सुप्तघ्न और यज्ञकोप — ये सब राम के साथ एक साथ भिड़ गए।

श्लोक 12 (yuddha.43.12)

वज्रमुष्टिश्च मैन्देन द्विविदेनाशनिप्रभः। राक्षसाभ्यां सुघोराभ्यां कपिमुख्यौ समागतौ ॥ 43.12 ॥

vajramuṣṭiśca maindena dvividenāśaniprabhaḥ| rākṣasābhyāṃ sughorābhyāṃ kapimukhyau samāgatau || 43.12 ||

वज्रमुष्टि मैन्द से और अशनिप्रभ द्विविद से भिड़ गया — वे दोनों घोर राक्षस उन दोनों श्रेष्ठ वानरों के साथ आमने-सामने आ गए।

श्लोक 13 (yuddha.43.13)

वीरः प्रतपनो घोरो राक्षसो रणदुर्धरः। समरे तीक्ष्णवेगेन नलेन समयुध्यत ॥ 43.13 ॥

vīraḥ pratapano ghoro rākṣaso raṇadurdharaḥ| samare tīkṣṇavegena nalena samayudhyata || 43.13 ||

युद्ध में असह्य, भीषण वीर प्रतपन राक्षस तीव्रवेगी नल के साथ युद्ध करने लगा।

श्लोक 14 (yuddha.43.14)

धर्मस्य पुत्रो बलवान् सुषेण इति विश्रुतः। स विद्युन्मालिना सार्धमयुध्यत महाकपिः ॥ 43.14 ॥

dharmasya putro balavān suṣeṇa iti viśrutaḥ| sa vidyunmālinā sārdhamayudhyata mahākapiḥ || 43.14 ||

धर्म का बलवान पुत्र, सुषेण नाम से विख्यात, उस महाकपि ने विद्युन्माली के साथ युद्ध किया।

श्लोक 15 (yuddha.43.15)

वानराश्चापरे घोरा राक्षसैरपरैः सह। द्वन्द्वं समीयुः सहसा युद्ध्वा च बहुभिः सह ॥ 43.15 ॥

vānarāścāpare ghorā rākṣasairaparaiḥ saha| dvandvaṃ samīyuḥ sahasā yuddhvā ca bahubhiḥ saha || 43.15 ||

अन्य भयंकर वानर भी अन्य राक्षसों के साथ सहसा द्वन्द्व में उलझ गए, और बहुतों से एक साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 16 (yuddha.43.16)

तत्रासीत् सुमहद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम्। रक्षसां वानराणां च वीराणां जयमिच्छताम् ॥ 43.16 ॥

tatrāsīt sumahad yuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam| rakṣasāṃ vānarāṇāṃ ca vīrāṇāṃ jayamicchatām || 43.16 ||

वहाँ विजय की कामना करने वाले राक्षसों और वानर-वीरों के बीच अत्यन्त भीषण, रोमांचकारी महायुद्ध छिड़ गया।

श्लोक 17 (yuddha.43.17)

हरिराक्षसदेहेभ्यः प्रभूताः केशशाद्वलाः। शरीरसंघाटवहाः प्रसुस्रुः शोणतापगाः ॥ 43.17 ॥

harirākṣasadehebhyaḥ prabhūtāḥ keśaśādvalāḥ| śarīrasaṃghāṭavahāḥ prasusruḥ śoṇatāpagāḥ || 43.17 ||

वानरों और राक्षसों के शरीरों से बहुत-से केश-युक्त, शरीर-खण्डों को बहाती हुई रक्त की धाराएँ बहने लगीं।

श्लोक 18 (yuddha.43.18)

आजघानेन्द्रजित् क्रुद्धो वज्रेणेव शतक्रतुः। अङ्गदं गदया वीरं शत्रुसैन्यविदारणम् ॥ 43.18 ॥

ājaghānendrajit kruddho vajreṇeva śatakratuḥ| aṅgadaṃ gadayā vīraṃ śatrusainyavidāraṇam || 43.18 ||

क्रुद्ध इन्द्रजित् ने वीर अंगद को, जो शत्रु-सेना का विदारण करने वाला था, गदा से वैसे ही प्रहार किया जैसे शतक्रतु (इन्द्र) वज्र से करता है।

श्लोक 19 (yuddha.43.19)

तस्य काञ्चनचित्राङ्गं रथं साश्वं ससारथिम्। जघान गदया श्रीमानङ्गदो वेगवान् हरिः ॥ 43.19 ॥

tasya kāñcanacitrāṅgaṃ rathaṃ sāśvaṃ sasārathim| jaghāna gadayā śrīmānaṅgado vegavān hariḥ || 43.19 ||

किन्तु वेगवान श्रीमान वानर अंगद ने उसके स्वर्ण-चित्रित रथ को, घोड़ों और सारथि सहित, गदा से चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 20 (yuddha.43.20)

सम्पातिस्तु प्रजङ्घेन त्रिभिर्बाणैः समाहतः। निजघानाश्वकर्णेन प्रजङ्घं रणमूर्धनि ॥ 43.20 ॥

sampātistu prajaṅghena tribhirbāṇaiḥ samāhataḥ| nijaghānāśvakarṇena prajaṅghaṃ raṇamūrdhani || 43.20 ||

प्रजंघ के तीन बाणों से बींधा गया सम्पाति ने रणभूमि के मध्य अश्वकर्ण बाण से प्रजंघ को मार डाला।

श्लोक 21 (yuddha.43.21)

जम्बुमाली रथस्थस्तु रथशक्त्या महाबलः। बिभेद समरे क्रुद्धो हनूमन्तं स्तनान्तरे ॥ 43.21 ॥

jambumālī rathasthastu rathaśaktyā mahābalaḥ| bibheda samare kruddho hanūmantaṃ stanāntare || 43.21 ||

रथ पर बैठा महाबली जम्बुमाली क्रोधित होकर युद्ध में रथ की शक्ति (भाले) से हनुमान की छाती बींध गया।

श्लोक 22 (yuddha.43.22)

तस्य तं रथमास्थाय हनूमान् मारुतात्मजः। प्रममाथ तलेनाशु सह तेनैव रक्षसा ॥ 43.22 ॥

tasya taṃ rathamāsthāya hanūmān mārutātmajaḥ| pramamātha talenāśu saha tenaiva rakṣasā || 43.22 ||

तब मारुतिनन्दन हनुमान उसी रथ पर चढ़कर एक ही झटके में उस राक्षस को अपनी हथेली के प्रहार से कुचल गए।

श्लोक 23 (yuddha.43.23)

नदन् प्रतपनो घोरो नलं सोऽभ्यनुधावत। नलः प्रतपनस्याशु पातयामास चक्षुषी ॥ 43.23 ॥

nadan pratapano ghoro nalaṃ so'bhyanudhāvata| nalaḥ pratapanasyāśu pātayāmāsa cakṣuṣī || 43.23 ||

गरजता हुआ भयंकर प्रतपन नल की ओर दौड़ पड़ा; नल ने शीघ्र ही प्रतपन की दोनों आँखें फोड़ डालीं।

श्लोक 24 (yuddha.43.24)

भिन्नगात्रः शरैस्तीक्ष्णैः क्षिप्रहस्तेन रक्षसा। ग्रसन्तमिव सैन्यानि प्रघसं वानराधिपः ॥ 43.24 ॥

bhinnagātraḥ śaraistīkṣṇaiḥ kṣiprahastena rakṣasā| grasantamiva sainyāni praghasaṃ vānarādhipaḥ || 43.24 ||

क्षिप्रहस्त उस राक्षस के तीक्ष्ण बाणों से सर्वांग घायल, सेनाओं को मानो निगल जाने वाला वानराधिप —

श्लोक 25 (yuddha.43.25)

सुग्रीवः सप्तपर्णेन निजघान जवेन च। प्रपीड्य शरवर्षेण राक्षसं भीमदर्शनम् ॥ 43.25 ॥

sugrīvaḥ saptaparṇena nijaghāna javena ca| prapīḍya śaravarṣeṇa rākṣasaṃ bhīmadarśanam || 43.25 ||

— सुग्रीव ने सप्तपर्ण-वृक्ष से वेगपूर्वक प्रघस को, बाणों की वर्षा से पीड़ित करके भयंकर उस राक्षस को मार डाला।

श्लोक 26 (yuddha.43.26)

निजघान विरूपाक्षं शरेणैकेन लक्ष्मणः। अग्निकेतुश्च दुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः ॥ 43.26 ॥

nijaghāna virūpākṣaṃ śareṇaikena lakṣmaṇaḥ| agniketuśca durdharṣo raśmiketuśca rākṣasaḥ || 43.26 ||

लक्ष्मण ने एक ही बाण से विरूपाक्ष को मार डाला। दुर्जेय अग्निकेतु और राक्षस रश्मिकेतु —

श्लोक 27 (yuddha.43.27)

सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च रामं निर्बिभिदुः शरैः। तेषां चतुर्णां रामस्तु शिरांसि समरे शरैः ॥ 43.27 ॥

suptaghno yajñakopaśca rāmaṃ nirbibhiduḥ śaraiḥ| teṣāṃ caturṇāṃ rāmastu śirāṃsi samare śaraiḥ || 43.27 ||

— सुप्तघ्न और यज्ञकोप ने बाणों से राम को बींध डाला; परन्तु रणभूमि में क्रुद्ध राम ने उन चारों के सिर —

श्लोक 28 (yuddha.43.28)

क्रुद्धश्चतुर्भिश्चिच्छेद घोरैरग्निशिखोपमैः। वज्रमुष्टिस्तु मैन्देन मुष्टिना निहतो रणे ॥ 43.28 ॥

kruddhaścaturbhiściccheda ghorairagniśikhopamaiḥ| vajramuṣṭistu maindena muṣṭinā nihato raṇe || 43.28 ||

— अग्नि-शिखा के समान भयंकर चार बाणों से एक साथ काट डाले। वज्रमुष्टि, मैन्द के मुक्के से युद्ध में मारा जाकर —

श्लोक 29 (yuddha.43.29)

पपात सरथः साश्वः पुराट्ट इव भूतले। निकुम्भस्तु रणे नीलं नीलाञ्जनचयप्रभम् ॥ 43.29 ॥

papāta sarathaḥ sāśvaḥ purāṭṭa iva bhūtale| nikumbhastu raṇe nīlaṃ nīlāñjanacayaprabham || 43.29 ||

— रथ, घोड़ों सहित प्राचीन टूटे हुए दुर्ग के समान भूमि पर गिर पड़ा। निकुम्भ ने रणभूमि में काजल की राशि के समान श्याम नील को —

श्लोक 30 (yuddha.43.30)

निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः करैर्मेघमिवांशुमान्। पुनः शरशतेनाथ क्षिप्रहस्तो निशाचरः ॥ 43.30 ॥

nirbibheda śaraistīkṣṇaiḥ karairmeghamivāṃśumān| punaḥ śaraśatenātha kṣiprahasto niśācaraḥ || 43.30 ||

— तीक्ष्ण बाणों से वैसे ही बींधा जैसे किरणें मेघ को बींधती हैं। तत्पश्चात् क्षिप्रहस्त निशाचर ने पुनः सैकड़ों बाणों से —

श्लोक 31 (yuddha.43.31)

बिभेद समरे नीलं निकुम्भः प्रजहास च। तस्यैव रथचक्रेण नीलो विष्णुरिवाहवे ॥ 43.31 ॥

bibheda samare nīlaṃ nikumbhaḥ prajahāsa ca| tasyaiva rathacakreṇa nīlo viṣṇurivāhave || 43.31 ||

— रणभूमि में नील को बींध डाला, और निकुम्भ ठठाकर हँस पड़ा। किन्तु उसी के रथ-चक्र से नील ने, युद्ध में विष्णु के समान —

श्लोक 32 (yuddha.43.32)

शिरश्चिच्छेद समरे निकुम्भस्य च सारथेः। वज्राशनिसमस्पर्शो द्विविदोऽप्यशनिप्रभम् ॥ 43.32 ॥

śiraściccheda samare nikumbhasya ca sāratheḥ| vajrāśanisamasparśo dvivido'pyaśaniprabham || 43.32 ||

— रणभूमि में निकुम्भ और उसके सारथि दोनों के सिर काट डाले। वज्र और अशनि के समान स्पर्श वाला द्विविद ने अशनिप्रभ को —

श्लोक 33 (yuddha.43.33)

जघान गिरिशृङ्गेण मिषतां सर्वरक्षसाम्। द्विविदं वानरेन्द्रं तु द्रुमयोधिनमाहवे ॥ 43.33 ॥

jaghāna giriśṛṅgeṇa miṣatāṃ sarvarakṣasām| dvividaṃ vānarendraṃ tu drumayodhinamāhave || 43.33 ||

— समस्त राक्षसों के देखते-देखते पर्वत-शिखर से मारा। युद्ध में वृक्षों से लड़ने वाले उस वानरराज द्विविद को —

श्लोक 34 (yuddha.43.34)

शरैरशनिसंकाशैः स विव्याधाशनिप्रभः। स शरैरभिविद्धाङ्गो द्विविदः क्रोधर्मूच्छितः ॥ 43.34 ॥

śarairaśanisaṃkāśaiḥ sa vivyādhāśaniprabhaḥ| sa śarairabhividdhāṅgo dvividaḥ krodharmūcchitaḥ || 43.34 ||

— अशनिप्रभ ने बिजली के समान बाणों से बींध डाला; सर्वांग घायल द्विविद, क्रोध से मूर्च्छित होकर —

श्लोक 35 (yuddha.43.35)

सालेन सरथं साश्वं निजघानाशनिप्रभम्। विद्युन्माली रथस्थस्तु शरैः काञ्चनभूषणैः ॥ 43.35 ॥

sālena sarathaṃ sāśvaṃ nijaghānāśaniprabham| vidyunmālī rathasthastu śaraiḥ kāñcanabhūṣaṇaiḥ || 43.35 ||

— शाल-वृक्ष से अशनिप्रभ को रथ और घोड़ों सहित मार डाला। रथ पर बैठा विद्युन्माली ने स्वर्ण-भूषित बाणों से —

श्लोक 36 (yuddha.43.36)

सुषेणं ताडयामास ननाद च मुहुर्मुहुः। तं रथस्थमथो दृष्ट्वा सुषेणो वानरोत्तमः ॥ 43.36 ॥

suṣeṇaṃ tāḍayāmāsa nanāda ca muhurmuhuḥ| taṃ rathasthamatho dṛṣṭvā suṣeṇo vānarottamaḥ || 43.36 ||

— सुषेण को बार-बार गरजते हुए घायल किया। रथ पर बैठे उसे देखकर वानर-श्रेष्ठ सुषेण ने —

श्लोक 37 (yuddha.43.37)

गिरिशृङ्गेण महता रथमाशु न्यपातयत्। लाघवेन तु संयुक्तो विद्युन्माली निशाचरः ॥ 43.37 ॥

giriśṛṅgeṇa mahatā rathamāśu nyapātayat| lāghavena tu saṃyukto vidyunmālī niśācaraḥ || 43.37 ||

— एक विशाल पर्वत-शिखर से उसके रथ को शीघ्र ही गिरा दिया। निपुण, फुर्तीला निशाचर विद्युन्माली —

श्लोक 38 (yuddha.43.38)

अपक्रम्य रथात् तूर्णं गदापाणिः क्षितौ स्थितः। ततः क्रोधसमाविष्टः सुषेणो हरिपुङ्गवः ॥ 43.38 ॥

apakramya rathāt tūrṇaṃ gadāpāṇiḥ kṣitau sthitaḥ| tataḥ krodhasamāviṣṭaḥ suṣeṇo haripuṅgavaḥ || 43.38 ||

— तुरन्त रथ से कूदकर गदा हाथ में लिए भूमि पर आ खड़ा हुआ। तब क्रोध से आविष्ट वानर-श्रेष्ठ सुषेण —

श्लोक 39 (yuddha.43.39)

शिलां सुमहतीं गृह्य निशाचरमभिद्रवत्। तमापतन्तं गदया विद्युन्माली निशाचरः ॥ 43.39 ॥

śilāṃ sumahatīṃ gṛhya niśācaramabhidravat| tamāpatantaṃ gadayā vidyunmālī niśācaraḥ || 43.39 ||

— एक विशाल शिला उठाकर उस निशाचर की ओर दौड़ पड़ा। उस पर झपटते हुए उसे विद्युन्माली निशाचर ने —

श्लोक 40 (yuddha.43.40)

वक्षस्यभिजघानाशु सुषेणं हरिपुङ्गवम्। गदाप्रहारं तं घोरमचिन्त्य प्लवगोत्तमः ॥ 43.40 ॥

vakṣasyabhijaghānāśu suṣeṇaṃ haripuṅgavam| gadāprahāraṃ taṃ ghoramacintya plavagottamaḥ || 43.40 ||

— शीघ्र ही गदा से वानर-श्रेष्ठ सुषेण की छाती पर प्रहार किया। उस भीषण गदा-प्रहार की परवाह न करते हुए वह श्रेष्ठ वानर —

श्लोक 41 (yuddha.43.41)

तां तूष्णीं पातयामास तस्योरसि महामृधे। शिलाप्रहाराभिहतो विद्युन्माली निशाचरः ॥ 43.41 ॥

tāṃ tūṣṇīṃ pātayāmāsa tasyorasi mahāmṛdhe| śilāprahārābhihato vidyunmālī niśācaraḥ || 43.41 ||

— उस शिला को चुपचाप उसके वक्ष पर, उस महासमर में, गिरा दिया। उस शिला के प्रहार से आहत विद्युन्माली निशाचर —

श्लोक 42 (yuddha.43.42)

निष्पिष्टहृदयो भूमौ गतासुर्निपपात ह। एवं तैर्वानरैः शूरैः शूरास्ते रजनीचराः ॥ 43.42 ॥

niṣpiṣṭahṛdayo bhūmau gatāsurnipapāta ha| evaṃ tairvānaraiḥ śūraiḥ śūrāste rajanīcarāḥ || 43.42 ||

— हृदय चूर-चूर होकर भूमि पर प्राणहीन होकर गिर पड़ा। इस प्रकार उन वीर वानरों के हाथों वे वीर निशाचर —

श्लोक 43 (yuddha.43.43)

द्वन्द्वे विमथितास्तत्र दैत्या इव दिवौकसैः। भल्लैश्चान्यैर्गदाभिश्च शक्तितोमरसायकैः ॥ 43.43 ॥

dvandve vimathitāstatra daityā iva divaukasaiḥ| bhallaiścānyairgadābhiśca śaktitomarasāyakaiḥ || 43.43 ||

— द्वन्द्व-युद्ध में वैसे ही परास्त हो गए जैसे देवताओं द्वारा दैत्य पराजित हुए थे। अन्य भल्लों, खड्गों, गदाओं, शक्तियों, तोमरों और पट्टिशों से —

श्लोक 44 (yuddha.43.44)

अपविद्धैश्चापि रथैस्तथा सांग्रामिकैर्हयैः। निहतैः कुञ्जरैर्मत्तैस्तथा वानरराक्षसैः ॥ 43.44 ॥

apaviddhaiścāpi rathaistathā sāṃgrāmikairhayaiḥ| nihataiḥ kuñjarairmattaistathā vānararākṣasaiḥ || 43.44 ||

— टूटे-फूटे रथों, युद्ध में मारे गए घोड़ों, मतवाले मारे गए हाथियों तथा वानरों-राक्षसों के साथ —

श्लोक 45 (yuddha.43.45)

चक्राक्षयुगदण्डैश्च भग्नैर्धरणिसंश्रितैः। बभूवायोधनं घोरं गोमायुगणसेवितम् ॥ 43.45 ॥

cakrākṣayugadaṇḍaiśca bhagnairdharaṇisaṃśritaiḥ| babhūvāyodhanaṃ ghoraṃ gomāyugaṇasevitam || 43.45 ||

— टूटे हुए चक्रों, धुरों, जुओं और दण्डों से भरा, गीदड़ों के झुण्ड से घिरा हुआ वह युद्धक्षेत्र भयंकर बन गया।

श्लोक 46 (yuddha.43.46)

कबन्धानि समुत्पेतुर्दिक्षु वानररक्षसाम्। विमर्दे तुमुले तस्मिन् देवासुररणोपमे। निहन्यमाना हरिपुङ्गवैस्तदा निशाचराः शोणितगन्धमूर्च्छिताः। पुनः सुयुद्धं तरसा समाश्रिता दिवाकरस्यास्तमयाभिकाङ्क्षिणः ॥ 43.46 ॥

kabandhāni samutpeturdikṣu vānararakṣasām| vimarde tumule tasmin devāsuraraṇopame| nihanyamānā haripuṅgavaistadā niśācarāḥ śoṇitagandhamūrcchitāḥ| punaḥ suyuddhaṃ tarasā samāśritā divākarasyāstamayābhikāṅkṣiṇaḥ || 43.46 ||

देवासुर-संग्राम जैसे उस घमासान में वानरों और राक्षसों के धड़ दसों दिशाओं में उछल पड़े; वानर-वीरों से मारे गए, रक्त की गन्ध से मोहित निशाचर सूर्यास्त की कामना करते हुए पुनः वेगपूर्वक युद्ध में जुट गए।

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