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युद्धकाण्ड · सर्ग 6

रावण की मन्त्रणा-सभा

सर्ग 5सर्ग-सूचीसर्ग 7

श्लोक 1 (yuddha.6.1)

लङ्कायां तु कृतं कर्म घोरं दृष्ट्वा भयावहम् । राक्षसेन्द्रो हनुमता शक्रेणेव महात्मना । अब्रवीद् राक्षसान् सर्वान् ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः ॥ 6.1 ॥

laṅkāyāṃ tu kṛtaṃ karma ghoraṃ dṛṣṭvā bhayāvaham | rākṣasendro hanumatā śakreṇeva mahātmanā | abravīd rākṣasān sarvān hriyā kiṃcidavāṅmukhaḥ || 6.1 ||

हनुमान द्वारा — मानो इन्द्र के समान महात्मा द्वारा — लंका में किए गए उस भयंकर और घोर कृत्य को देखकर, राक्षसराज रावण ने कुछ लज्जा से नीचा मुख किए हुए समस्त राक्षसों से कहा।

श्लोक 2 (yuddha.6.2)

धर्षिता च प्रविष्टा च लङ्का दुष्प्रसहा पुरी । तेन वानरमात्रेण दृष्टा सीता च जानकी ॥ 6.2 ॥

dharṣitā ca praviṣṭā ca laṅkā duṣprasahā purī | tena vānaramātreṇa dṛṣṭā sītā ca jānakī || 6.2 ||

उस साधारण-से वानर के द्वारा ही दुर्दम्य नगरी लंका को विदीर्ण करके उसमें प्रवेश कर लिया गया, और जानकी सीता को भी देख लिया गया।

श्लोक 3 (yuddha.6.3)

प्रासादो धर्षितश्चैत्यः प्रवरा राक्षसा हताः । आविला च पुरी लङ्का सर्वा हनुमता कृता ॥ 6.3 ॥

prāsādo dharṣitaścaityaḥ pravarā rākṣasā hatāḥ | āvilā ca purī laṅkā sarvā hanumatā kṛtā || 6.3 ||

उसका मन्दिर-प्रासाद तोड़ा गया, श्रेष्ठ राक्षस मारे गए, और हनुमान ने सम्पूर्ण लंकापुरी को अस्त-व्यस्त कर डाला।

श्लोक 4 (yuddha.6.4)

किं करिष्यामि भद्रं वः किं वो युक्तमनन्तरम् । उच्यतां नः समर्थं यत् कृतं च सुकृतं भवेत् ॥ 6.4 ॥

kiṃ kariṣyāmi bhadraṃ vaḥ kiṃ vo yuktamanantaram | ucyatāṃ naḥ samarthaṃ yat kṛtaṃ ca sukṛtaṃ bhavet || 6.4 ||

तुम्हारा कल्याण हो! मैं क्या करूँ? अब आगे क्या करना उचित है? हमें वह बताओ जो समर्थ हो और जिसे करने पर वह सुकृत्य सिद्ध हो।

श्लोक 5 (yuddha.6.5)

मन्त्रमूलं च विजयं प्रवदन्ति मनस्विनः । तस्माद् वै रोचये मन्त्रं रामं प्रति महाबलाः ॥ 6.5 ॥

mantramūlaṃ ca vijayaṃ pravadanti manasvinaḥ | tasmād vai rocaye mantraṃ rāmaṃ prati mahābalāḥ || 6.5 ||

बुद्धिमान लोग कहते हैं कि विजय का मूल सुविचार ही है। इसलिए हे महाबलियो, मैं राम के विषय में मन्त्रणा करना चाहता हूँ।

श्लोक 6 (yuddha.6.6)

त्रिविधाः पुरुषा लोके उत्तमाधममध्यमाः । तेषां तु समवेतानां गुणदोषौ वदाम्यहम् ॥ 6.6 ॥

trividhāḥ puruṣā loke uttamādhamamadhyamāḥ | teṣāṃ tu samavetānāṃ guṇadoṣau vadāmyaham || 6.6 ||

संसार में तीन प्रकार के पुरुष होते हैं — उत्तम, मध्यम और अधम। मैं उन सबके गुण और दोष तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 7 (yuddha.6.7)

मन्त्रस्त्रिभिर्हि संयुक्तः समर्थैर्मन्त्रनिर्णये । मित्रैर्वापि समानार्थैर्बान्धवैरपि वाधिकैः ॥ 6.7 ॥

mantrastribhirhi saṃyuktaḥ samarthairmantranirṇaye | mitrairvāpi samānārthairbāndhavairapi vādhikaiḥ || 6.7 ||

जो मन्त्रणा के निर्णय में समर्थ मन्त्रियों से युक्त होकर, अथवा समान उद्देश्य वाले मित्रों से, अथवा और भी सम्बन्धियों से मिलकर विचार करता है,

श्लोक 8 (yuddha.6.8)

सहितो मन्त्रयित्वा यः कर्मारम्भान् प्रवर्तयेत् । दैवे च कुरुते यत्नं तमाहुः पुरुषोत्तमम् ॥ 6.8 ॥

sahito mantrayitvā yaḥ karmārambhān pravartayet | daive ca kurute yatnaṃ tamāhuḥ puruṣottamam || 6.8 ||

और उनके साथ मन्त्रणा करके जो कार्यों का आरम्भ करता है, तथा दैव के विषय में भी प्रयत्न करता है, उसे ही पुरुषों में श्रेष्ठ कहा जाता है।

श्लोक 9 (yuddha.6.9)

एकोऽर्थं विमृशेदेको धर्मे प्रकुरुते मनः । एकः कार्याणि कुरुते तमाहुर्मध्यमं नरम् ॥ 6.9 ॥

eko'rthaṃ vimṛśedeko dharme prakurute manaḥ | ekaḥ kāryāṇi kurute tamāhurmadhyamaṃ naram || 6.9 ||

जो अकेला ही किसी विषय पर विचार करता है, अकेला ही धर्म में मन लगाता है, और अकेला ही कार्यों को करता है, उसे मध्यम पुरुष कहा जाता है।

श्लोक 10 (yuddha.6.10)

गुणदोषौ न निश्चित्य त्यक्त्वा दैवव्यपाश्रयम् । करिष्यामीति यः कार्यमुपेक्षेत् स नराधमः ॥ 6.10 ॥

guṇadoṣau na niścitya tyaktvā daivavyapāśrayam | kariṣyāmīti yaḥ kāryamupekṣet sa narādhamaḥ || 6.10 ||

जो बिना गुण-दोष निश्चित किए, भाग्य का सहारा छोड़कर, 'मैं करूँगा' ऐसा कहकर कार्य की उपेक्षा कर देता है, वह अधम पुरुष है।

श्लोक 11 (yuddha.6.11)

यथेमे पुरुषा नित्यमुत्तमाधममध्यमाः । एवं मन्त्रोऽपि विज्ञेय उत्तमाधममध्यमः ॥ 6.11 ॥

yatheme puruṣā nityamuttamādhamamadhyamāḥ | evaṃ mantro'pi vijñeya uttamādhamamadhyamaḥ || 6.11 ||

जैसे ये पुरुष सदैव उत्तम, अधम और मध्यम — इन तीन प्रकार के होते हैं, वैसे ही मन्त्रणा को भी उत्तम, अधम अथवा मध्यम समझना चाहिए।

श्लोक 12 (yuddha.6.12)

ऐकमत्यमुपागम्य शास्त्रदृष्टेन चक्षुषा । मन्त्रिणो यत्र निरतास्तमाहुर्मन्त्रमुत्तमम् ॥ 6.12 ॥

aikamatyamupāgamya śāstradṛṣṭena cakṣuṣā | mantriṇo yatra niratāstamāhurmantramuttamam || 6.12 ||

जहाँ मन्त्रीगण शास्त्र-दृष्टि से देखकर एकमत होकर संतुष्ट रहते हैं, उस मन्त्रणा को उत्तम कहा जाता है।

श्लोक 13 (yuddha.6.13)

बह्वीरपि मतीर्गत्वा मन्त्रिणामर्थनिर्णयः । पुनर्यत्रैकतां प्राप्तः स मन्त्रो मध्यमः स्मृतः ॥ 6.13 ॥

bahvīrapi matīrgatvā mantriṇāmarthanirṇayaḥ | punaryatraikatāṃ prāptaḥ sa mantro madhyamaḥ smṛtaḥ || 6.13 ||

जहाँ बहुत-सी भिन्न-भिन्न रायों से गुजरने के बाद अन्ततः मन्त्रियों का निर्णय पुनः एकता को प्राप्त होता है, वह मन्त्रणा मध्यम कही गई है।

श्लोक 14 (yuddha.6.14)

अन्योन्यमतिमास्थाय यत्र सम्प्रतिभाष्यते । न चैकमत्ये श्रेयोऽस्ति मन्त्रः सोऽधम उच्यते ॥ 6.14 ॥

anyonyamatimāsthāya yatra sampratibhāṣyate | na caikamatye śreyo'sti mantraḥ so'dhama ucyate || 6.14 ||

जहाँ एक-दूसरे के भिन्न मत पर अड़े रहकर वाद-विवाद होता रहता है और एकमत होने पर भी कोई लाभ नहीं होता, वह मन्त्रणा अधम कही जाती है।

श्लोक 15 (yuddha.6.15)

तस्मात् सुमन्त्रितं साधु भवन्तो मतिसत्तमाः । कार्यं सम्प्रतिपद्यन्तमेतत् कृत्यं मतं मम ॥ 6.15 ॥

tasmāt sumantritaṃ sādhu bhavanto matisattamāḥ | kāryaṃ sampratipadyantametat kṛtyaṃ mataṃ mama || 6.15 ||

इसलिए हे उत्तम बुद्धिवालो, तुम सब भलीभाँति विचार करके उचित कार्य पर पहुँचो; मेरे विचार से यही करने योग्य है।

श्लोक 16 (yuddha.6.16)

वानराणां हि धीराणां सहस्रैः परिवारितः । रामोऽभ्येति पुरीं लङ्कामस्माकमुपरोधकः ॥ 6.16 ॥

vānarāṇāṃ hi dhīrāṇāṃ sahasraiḥ parivāritaḥ | rāmo'bhyeti purīṃ laṅkāmasmākamuparodhakaḥ || 6.16 ||

हजारों वीर वानरों से घिरा हुआ राम हमारी इस लंकापुरी को घेरने के लिए आ रहा है।

श्लोक 17 (yuddha.6.17)

तरिष्यति च सुव्यक्तं राघवः सागरं सुखम् । तरसा युक्तरूपेण सानुजः सबलानुगः ॥ 6.17 ॥

tariṣyati ca suvyaktaṃ rāghavaḥ sāgaraṃ sukham | tarasā yuktarūpeṇa sānujaḥ sabalānugaḥ || 6.17 ||

अपने अनुज और सेना सहित राघव, अपने उपयुक्त वेग से युक्त होकर, निश्चय ही सागर को सुखपूर्वक पार कर लेगा।

श्लोक 18 (yuddha.6.18)

समुद्रमुच्छोषयति वीर्येणान्यत्करोति वा ॥ 6.18 ॥

samudramucchoṣayati vīryeṇānyatkaroti vā || 6.18 ||

वह अपने पराक्रम से समुद्र को भी सुखा सकता है, अथवा और भी कुछ कर सकता है।

श्लोक 19 (yuddha.6.19)

तस्मिन्नेवंविधे कार्ये विरुद्धे वानरैः सह । हितं पुरे च सैन्ये च सर्वं सम्मन्त्र्यतां मम ॥ 6.19 ॥

tasminnevaṃvidhe kārye viruddhe vānaraiḥ saha | hitaṃ pure ca sainye ca sarvaṃ sammantryatāṃ mama || 6.19 ||

अब जब वानरों के साथ इस प्रकार का विरोध-कार्य आरम्भ हो चुका है, तो नगर और सेना दोनों के लिए जो कुछ हितकर हो, वह सब मुझे बताया जाए।

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