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युद्धकाण्ड · सर्ग 63

कुम्भकर्ण का उपदेश और प्रतिज्ञा

सर्ग 62सर्ग-सूचीसर्ग 64

श्लोक 1 (yuddha.63.1)

तस्य राक्षसराजस्य निशम्य परिदेवितम्। कुम्भकर्णो बभाषेदं वचनं प्रजहास च ॥ 63.1 ॥

tasya rākṣasarājasya niśamya paridevitam| kumbhakarṇo babhāṣedaṃ vacanaṃ prajahāsa ca || 63.1 ||

राक्षसराज के उस विलाप को सुनकर कुम्भकर्ण ज़ोर से हँस पड़ा और यह वचन बोला --

श्लोक 2 (yuddha.63.2)

दृष्टो दोषो हि योऽस्माभिः पुरा मन्त्रविनिर्णये। हितेष्वनभियुक्तेन सोऽयमासादितस्त्वया ॥ 63.2 ॥

dṛṣṭo doṣo hi yo'smābhiḥ purā mantravinirṇaye| hiteṣvanabhiyuktena so'yamāsāditastvayā || 63.2 ||

-- 'जिस दोष को हमने पहले ही मंत्रणा के समय देख लिया था, हितकर बातों की उपेक्षा करने के कारण आज वही तुम पर आ पड़ा है।'

श्लोक 3 (yuddha.63.3)

शीघ्रं खल्वभ्युपेतं त्वां फलं पापस्य कर्मणः। निरयेष्वेव पतनं यथा दुष्कृतकर्मणः ॥ 63.3 ॥

śīghraṃ khalvabhyupetaṃ tvāṃ phalaṃ pāpasya karmaṇaḥ| nirayeṣveva patanaṃ yathā duṣkṛtakarmaṇaḥ || 63.3 ||

-- 'तुम्हें पापकर्म का फल शीघ्र ही मिल गया, ठीक वैसे ही जैसे दुष्कर्मी को नरक में पतन प्राप्त होता है।'

श्लोक 4 (yuddha.63.4)

प्रथमं वै महाराज कृत्यमेतदचिन्तितम्। केवलं वीर्यदर्पेण नानुबन्धो विचारितः ॥ 63.4 ॥

prathamaṃ vai mahārāja kṛtyametadacintitam| kevalaṃ vīryadarpeṇa nānubandho vicāritaḥ || 63.4 ||

-- 'हे महाराज, यह कार्य आरम्भ में ही बिना विचारे किया गया था -- केवल बल के अहंकार में इसके परिणाम पर विचार नहीं किया गया।'

श्लोक 5 (yuddha.63.5)

यः पश्चात्पूर्वकार्याणि कुर्यादैश्वर्यमास्थितः। पूर्वं चोत्तरकार्याणि न स वेद नयानयौ ॥ 63.5 ॥

yaḥ paścātpūrvakāryāṇi kuryādaiśvaryamāsthitaḥ| pūrvaṃ cottarakāryāṇi na sa veda nayānayau || 63.5 ||

-- 'जो ऐश्वर्य के मद में पहले किए जाने योग्य कार्य को बाद में करता है और बाद में किए जाने योग्य कार्य को पहले, वह नीति और अनीति का भेद नहीं जानता।'

श्लोक 6 (yuddha.63.6)

देशकालविहीनानि कर्माणि विपरीतवत्। क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥ 63.6 ॥

deśakālavihīnāni karmāṇi viparītavat| kriyamāṇāni duṣyanti havīṃṣyaprayateṣviva || 63.6 ||

-- 'देश-काल से रहित होकर विपरीत ढंग से किए गए कार्य दूषित हो जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे अशुद्ध पुरुष द्वारा दी गई आहुतियाँ दूषित हो जाती हैं।'

श्लोक 7 (yuddha.63.7)

त्रयाणां पञ्चधा योगं कर्मणां यः प्रपद्यते। सचिवैः समयं कृत्वा स सम्यग् वर्तते पथि ॥ 63.7 ॥

trayāṇāṃ pañcadhā yogaṃ karmaṇāṃ yaḥ prapadyate| sacivaiḥ samayaṃ kṛtvā sa samyag vartate pathi || 63.7 ||

-- 'जो तीनों उपायों के पाँच प्रकार के प्रयोग को अपनाता है और मंत्रियों के साथ सहमति बनाकर चलता है, वही सम्यक् मार्ग पर चलता है।'

श्लोक 8 (yuddha.63.8)

यथागमं च यो राजा समयं च चिकीर्षति। बुध्यते सचिवैर्बुद्ध्या सुहृदश्चानुपश्यति ॥ 63.8 ॥

yathāgamaṃ ca yo rājā samayaṃ ca cikīrṣati| budhyate sacivairbuddhyā suhṛdaścānupaśyati || 63.8 ||

-- 'जो राजा शास्त्रोक्त विधि के अनुसार समय की पहचान करना चाहता है, मंत्रियों की बुद्धि से समझता है और मित्रों की राय पर भी दृष्टि रखता है --'

श्लोक 9 (yuddha.63.9)

धर्ममर्थं हि कामं वा सर्वान् वा रक्षसां पते। भजेत पुरुषः काले त्रीणि द्वन्द्वानि वा पुनः ॥ 63.9 ॥

dharmamarthaṃ hi kāmaṃ vā sarvān vā rakṣasāṃ pate| bhajeta puruṣaḥ kāle trīṇi dvandvāni vā punaḥ || 63.9 ||

-- 'हे राक्षसपते, मनुष्य को धर्म, अर्थ अथवा काम को, अथवा तीनों को, अथवा इनके युग्मों को भी उचित समय पर ही अपनाना चाहिए।'

श्लोक 10 (yuddha.63.10)

त्रिषु चैतेषु यच्छ्रेष्ठं श्रुत्वा तन्नावबुध्यते। राजा वा राजमात्रो वा व्यर्थं तस्य बहुश्रुतम् ॥ 63.10 ॥

triṣu caiteṣu yacchreṣṭhaṃ śrutvā tannāvabudhyate| rājā vā rājamātro vā vyarthaṃ tasya bahuśrutam || 63.10 ||

-- 'इन तीनों में जो श्रेष्ठ है उसे सुनकर भी जो राजा अथवा राजा-मात्र (नाममात्र का राजा) उसे नहीं समझ पाता, उसका बहुश्रुत होना व्यर्थ है।'

श्लोक 11 (yuddha.63.11)

उपप्रदानं सान्त्वं च भेदं काले च विक्रमम्। योगं च रक्षसां श्रेष्ठ तावुभौ च नयानयौ ॥ 63.11 ॥

upapradānaṃ sāntvaṃ ca bhedaṃ kāle ca vikramam| yogaṃ ca rakṣasāṃ śreṣṭha tāvubhau ca nayānayau || 63.11 ||

-- 'दान, साम, भेद और समयोचित पराक्रम, तथा इनका संयोग भी, हे राक्षसश्रेष्ठ -- ये ही नीति और अनीति दोनों के आधार हैं।'

श्लोक 12 (yuddha.63.12)

काले धर्मार्थकामान् यः सम्मन्त्र्य सचिवैः सह। निषेवेतात्मवाँल्लोके न स व्यसनमाप्नुयात् ॥ 63.12 ॥

kāle dharmārthakāmān yaḥ sammantrya sacivaiḥ saha| niṣevetātmavā~lloke na sa vyasanamāpnuyāt || 63.12 ||

-- 'जो आत्मसंयमी पुरुष मंत्रियों के साथ परामर्श करके उचित समय पर धर्म, अर्थ और काम का सेवन करता है, वह संसार में संकट में नहीं पड़ता।'

श्लोक 13 (yuddha.63.13)

हितानुबन्धमालोक्य कुर्यात् कार्यमिहात्मनः। राजा सहार्थतत्त्वज्ञैः सचिवैर्बुद्धिजीविभिः ॥ 63.13 ॥

hitānubandhamālokya kuryāt kāryamihātmanaḥ| rājā sahārthatattvajñaiḥ sacivairbuddhijīvibhiḥ || 63.13 ||

-- 'राजा को चाहिए कि वह हित के परिणाम पर विचार करके ही अपना कोई कार्य करे, वह भी अर्थतत्त्व के ज्ञाता तथा बुद्धिजीवी मंत्रियों के साथ मिलकर।'

श्लोक 14 (yuddha.63.14)

अनभिज्ञाय शास्त्रार्थान् पुरुषाः पशुबुद्धयः। प्रागल्भ्याद् वक्तुमिच्छन्ति मन्त्रिष्वभ्यन्तरीकृताः ॥ 63.14 ॥

anabhijñāya śāstrārthān puruṣāḥ paśubuddhayaḥ| prāgalbhyād vaktumicchanti mantriṣvabhyantarīkṛtāḥ || 63.14 ||

-- 'शास्त्रों के अर्थ से अनभिज्ञ, पशु-तुल्य बुद्धि वाले पुरुष, जब मंत्रिमंडल में सम्मिलित हो जाते हैं, तो केवल ढिठाई से बोलना चाहते हैं।'

श्लोक 15 (yuddha.63.15)

अशास्त्रविदुषां तेषां कार्यं नाभिहितं वचः। अर्थशास्त्रानभिज्ञानां विपुलां श्रियमिच्छताम् ॥ 63.15 ॥

aśāstraviduṣāṃ teṣāṃ kāryaṃ nābhihitaṃ vacaḥ| arthaśāstrānabhijñānāṃ vipulāṃ śriyamicchatām || 63.15 ||

-- 'शास्त्र से अनजान, अर्थशास्त्र से अपरिचित किन्तु विपुल ऐश्वर्य चाहने वाले ऐसे लोगों का कहा हुआ वचन किसी कार्य का नहीं होता।'

श्लोक 16 (yuddha.63.16)

अहितं च हिताकारं धार्ष्ट्याज्जल्पन्ति ये नराः। अवश्यं मन्त्रबाह्यास्ते कर्तव्याः कृत्यदूषकाः ॥ 63.16 ॥

ahitaṃ ca hitākāraṃ dhārṣṭyājjalpanti ye narāḥ| avaśyaṃ mantrabāhyāste kartavyāḥ kṛtyadūṣakāḥ || 63.16 ||

-- 'जो लोग ढिठाई से अहितकर बात को हितकर रूप में कहते हैं, वे कार्य को दूषित करने वाले होते हैं और उन्हें अवश्य ही मंत्रणा से बाहर रखना चाहिए।'

श्लोक 17 (yuddha.63.17)

विनाशयन्तो भर्तारं सहिताः शत्रुभिर्बुधैः। विपरीतानि कृत्यानि कारयन्तीह मन्त्रिणः ॥ 63.17 ॥

vināśayanto bhartāraṃ sahitāḥ śatrubhirbudhaiḥ| viparītāni kṛtyāni kārayantīha mantriṇaḥ || 63.17 ||

-- 'ऐसे मंत्री, चतुर शत्रुओं से मिलकर, अपने स्वामी का ही विनाश करते हुए उससे विपरीत कार्य करवाते हैं।'

श्लोक 18 (yuddha.63.18)

तान् भर्ता मित्रसंकाशानमित्रान् मन्त्रनिर्णये। व्यवहारेण जानीयात् सचिवानुपसंहितान् ॥ 63.18 ॥

tān bhartā mitrasaṃkāśānamitrān mantranirṇaye| vyavahāreṇa jānīyāt sacivānupasaṃhitān || 63.18 ||

-- 'स्वामी को चाहिए कि मंत्रणा के निर्णय में अपने व्यवहार से ही उन मित्र-जैसे किन्तु वास्तव में शत्रु मंत्रियों को पहचान ले, जो उसके निकट एकत्र हैं।'

श्लोक 19 (yuddha.63.19)

चपलस्येह कृत्यानि सहसानुप्रधावतः। छिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजाः ॥ 63.19 ॥

capalasyeha kṛtyāni sahasānupradhāvataḥ| chidramanye prapadyante krauñcasya khamiva dvijāḥ || 63.19 ||

-- 'चपल स्वभाव वाले और उतावली में कार्य करने वाले पुरुष का छिद्र (कमज़ोर पक्ष) दूसरे लोग वैसे ही ढूँढ़ लेते हैं जैसे पक्षी क्रौंच पर्वत के छिद्र को ढूँढ़ लेते हैं।'

श्लोक 20 (yuddha.63.20)

यो हि शत्रुमवज्ञाय आत्मानं नाभिरक्षति। अवाप्नोति हि सोऽनर्थान् स्थानाच्च व्यवरोप्यते ॥ 63.20 ॥

yo hi śatrumavajñāya ātmānaṃ nābhirakṣati| avāpnoti hi so'narthān sthānācca vyavaropyate || 63.20 ||

-- 'जो शत्रु का तिरस्कार कर अपनी रक्षा नहीं करता, वह अनर्थों को प्राप्त होता है और अपने स्थान से भी उखाड़ फेंका जाता है।'

श्लोक 21 (yuddha.63.21)

यदुक्तमिह ते पूर्वं प्रियया मेऽनुजेन च। तदेव नो हितं वाक्यं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ 63.21 ॥

yaduktamiha te pūrvaṃ priyayā me'nujena ca| tadeva no hitaṃ vākyaṃ yathecchasi tathā kuru || 63.21 ||

-- 'यहाँ पहले जो मेरे प्रिय अनुज ने तुमसे कहा था, वही हमारे हित की बात थी। अब जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो।'

श्लोक 22 (yuddha.63.22)

तत् तु श्रुत्वा दशग्रीवः कुम्भकर्णस्य भाषितम्। भ्रुकुटिं चैव संचक्रे क्रुद्धश्चैनमभाषत ॥ 63.22 ॥

tat tu śrutvā daśagrīvaḥ kumbhakarṇasya bhāṣitam| bhrukuṭiṃ caiva saṃcakre kruddhaścainamabhāṣata || 63.22 ||

कुम्भकर्ण के इस कथन को सुनकर दशग्रीव रावण ने भौंहें चढ़ा लीं और क्रुद्ध होकर उससे यह कहा --

श्लोक 23 (yuddha.63.23)

मान्यो गुरुरिवाचार्यः किं मां त्वमनुशाससे। किमेवं वाक्श्रमं कृत्वा यद् युक्तं तद् विधीयताम् ॥ 63.23 ॥

mānyo gururivācāryaḥ kiṃ māṃ tvamanuśāsase| kimevaṃ vākśramaṃ kṛtvā yad yuktaṃ tad vidhīyatām || 63.23 ||

-- 'तुम मुझे इस प्रकार क्यों उपदेश दे रहे हो, मानो कोई पूजनीय गुरु या आचार्य हो? इस प्रकार वाणी का श्रम क्यों करते हो? जो उचित हो वह किया जाए।'

श्लोक 24 (yuddha.63.24)

विभ्रमाच्चित्तमोहाद् वा बलवीर्याश्रयेण वा। नाभिपन्नमिदानीं यद् व्यर्था तस्य पुनः कथा ॥ 63.24 ॥

vibhramāccittamohād vā balavīryāśrayeṇa vā| nābhipannamidānīṃ yad vyarthā tasya punaḥ kathā || 63.24 ||

-- 'भ्रमवश, चित्त के मोह से अथवा बल-पराक्रम के भरोसे जो कार्य पहले नहीं किया गया, अब उसकी पुनः चर्चा करना व्यर्थ है।'

श्लोक 25 (yuddha.63.25)

अस्मिन् काले तु यद् युक्तं तदिदानीं विचिन्त्यताम्। गतं तु नानुशोचन्ति गतं तु गतमेव हि ॥ 63.25 ॥

asmin kāle tu yad yuktaṃ tadidānīṃ vicintyatām| gataṃ tu nānuśocanti gataṃ tu gatameva hi || 63.25 ||

-- 'इस समय जो उचित हो, अब केवल उसी पर विचार किया जाए। बीती हुई बात का शोक नहीं किया जाता, क्योंकि जो बीत गया सो बीत गया।'

श्लोक 26 (yuddha.63.26)

ममापनयजं दोषं विक्रमेण समीकुरु। यदि खल्वस्ति मे स्नेहो विक्रमं वाधिगच्छसि ॥ 63.26 ॥

mamāpanayajaṃ doṣaṃ vikrameṇa samīkuru| yadi khalvasti me sneho vikramaṃ vādhigacchasi || 63.26 ||

-- 'मेरी कुनीति से उत्पन्न दोष को अपने पराक्रम से दूर करो; यदि सचमुच तुम्हें मुझसे स्नेह है, तो अपना पराक्रम दिखाओ।'

श्लोक 27 (yuddha.63.27)

यदि कार्यं ममैतत्ते हृदि कार्यतमं मतम्। स सुहृद् यो विपन्नार्थं दीनमभ्युपपद्यते ॥ 63.27 ॥

yadi kāryaṃ mamaitatte hṛdi kāryatamaṃ matam| sa suhṛd yo vipannārthaṃ dīnamabhyupapadyate || 63.27 ||

-- 'यदि मेरा यह कार्य तुम्हारे हृदय में सबसे अधिक करणीय प्रतीत होता है -- क्योंकि सच्चा मित्र वही है जो संकट में पड़े दीन जन की सहायता करता है।'

श्लोक 28 (yuddha.63.28)

स बन्धुर्योऽपनीतेषु साहाय्यायोपकल्पते। तमथैवं ब्रुवाणं स वचनं धीरदारुणम् ॥ 63.28 ॥

sa bandhuryo'panīteṣu sāhāyyāyopakalpate| tamathaivaṃ bruvāṇaṃ sa vacanaṃ dhīradāruṇam || 63.28 ||

-- 'वही बन्धु है जो विपत्ति में पड़े हुए की सहायता के लिए तत्पर होता है।' इस प्रकार गम्भीर और कठोर वचन कहते हुए रावण को --

श्लोक 29 (yuddha.63.29)

रुष्टोऽयमिति विज्ञाय शनैः श्लक्ष्णमुवाच ह। अतीव हि समालक्ष्य भ्रातरं क्षुभितेन्द्रियम् ॥ 63.29 ॥

ruṣṭo'yamiti vijñāya śanaiḥ ślakṣṇamuvāca ha| atīva hi samālakṣya bhrātaraṃ kṣubhitendriyam || 63.29 ||

-- उसे अत्यन्त क्रुद्ध जानकर और अपने भाई की इन्द्रियों को अत्यधिक क्षुब्ध देखकर कुम्भकर्ण ने धीरे से कोमल वाणी में कहा --

श्लोक 30 (yuddha.63.30)

कुम्भकर्णः शनैर्वाक्यं बभाषे परिसान्त्वयन्। शृणु राजन्नवहितो मम वाक्यमरिंदम ॥ 63.30 ॥

kumbhakarṇaḥ śanairvākyaṃ babhāṣe parisāntvayan| śṛṇu rājannavahito mama vākyamariṃdama || 63.30 ||

कुम्भकर्ण ने सान्त्वना देते हुए धीरे से कहा -- 'हे शत्रुदमन राजन्, मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो।'

श्लोक 31 (yuddha.63.31)

अलं राक्षसराजेन्द्र संतापमुपपद्य ते। रोषं च सम्परित्यज्य स्वस्थो भवितुमर्हसि ॥ 63.31 ॥

alaṃ rākṣasarājendra saṃtāpamupapadya te| roṣaṃ ca samparityajya svastho bhavitumarhasi || 63.31 ||

-- 'हे राक्षसराजेन्द्र, अब संताप में पड़ना बस करो। क्रोध का त्याग कर तुम्हें स्वस्थचित्त हो जाना चाहिए।'

श्लोक 32 (yuddha.63.32)

नैतन्मनसि कर्तव्यं मयि जीवति पार्थिव। तमहं नाशयिष्यामि यत् कृते परितप्यते ॥ 63.32 ॥

naitanmanasi kartavyaṃ mayi jīvati pārthiva| tamahaṃ nāśayiṣyāmi yat kṛte paritapyate || 63.32 ||

-- 'हे राजन्, जब तक मैं जीवित हूँ, यह चिन्ता तुम्हारे मन में नहीं रहनी चाहिए। जिसके कारण तुम व्यथित हो, उसे मैं नष्ट कर दूँगा।'

श्लोक 33 (yuddha.63.33)

अवश्यं तु हितं वाच्यं सर्वावस्थं मया तव। बन्धुभावादभिहितं भ्रातृस्नेहाच्च पार्थिव ॥ 63.33 ॥

avaśyaṃ tu hitaṃ vācyaṃ sarvāvasthaṃ mayā tava| bandhubhāvādabhihitaṃ bhrātṛsnehācca pārthiva || 63.33 ||

-- 'किन्तु हे राजन्, मुझे तो हर अवस्था में तुम्हारा हित कहना ही था; यह बन्धु-भाव और भ्रातृ-स्नेह के कारण ही कहा गया था।'

श्लोक 34 (yuddha.63.34)

सदृशं यच्च कालेऽस्मिन् कर्तुं स्नेहेन बन्धुना। शत्रूणां कदनं पश्य क्रियमाणं मया रणे ॥ 63.34 ॥

sadṛśaṃ yacca kāle'smin kartuṃ snehena bandhunā| śatrūṇāṃ kadanaṃ paśya kriyamāṇaṃ mayā raṇe || 63.34 ||

-- 'इस समय स्नेहशील बन्धु को जो करना उचित है, वह करूँगा -- अब देखो, युद्ध में शत्रुओं का संहार मेरे द्वारा किया जाता है।'

श्लोक 35 (yuddha.63.35)

अद्य पश्य महाबाहो मया समरमूर्धनि। हते रामे सह भ्रात्रा द्रवन्तीं हरिवाहिनीम् ॥ 63.35 ॥

adya paśya mahābāho mayā samaramūrdhani| hate rāme saha bhrātrā dravantīṃ harivāhinīm || 63.35 ||

-- 'हे महाबाहु, आज देखो -- समर के मोर्चे पर मेरे द्वारा राम को उसके भाई सहित मार डाले जाने पर वानर-सेना भागती हुई दिखाई देगी।'

श्लोक 36 (yuddha.63.36)

अद्य रामस्य तद् दृष्ट्वा मयाऽऽनीतं रणाच्छिरः। सुखी भव महाबाहो सीता भवतु दुःखिता ॥ 63.36 ॥

adya rāmasya tad dṛṣṭvā mayā''nītaṃ raṇācchiraḥ| sukhī bhava mahābāho sītā bhavatu duḥkhitā || 63.36 ||

-- 'आज युद्धभूमि से मेरे द्वारा लाया गया राम का वह सिर देखकर तुम सुखी हो जाओ, हे महाबाहु, और अब सीता दुःखी हो।'

श्लोक 37 (yuddha.63.37)

अद्य रामस्य पश्यन्तु निधनं सुमहत् प्रियम्। लङ्कायां राक्षसाः सर्वे ये ते निहतबान्धवाः ॥ 63.37 ॥

adya rāmasya paśyantu nidhanaṃ sumahat priyam| laṅkāyāṃ rākṣasāḥ sarve ye te nihatabāndhavāḥ || 63.37 ||

-- 'आज लंका के वे सभी राक्षस, जिनके बन्धु मारे जा चुके हैं, राम के उस अत्यन्त प्रिय वध को देखें।'

श्लोक 38 (yuddha.63.38)

अद्य शोकपरीतानां स्वबन्धुवधशोचिनाम्। शत्रोर्युधि विनाशेन करोम्यश्रुप्रमार्जनम् ॥ 63.38 ॥

adya śokaparītānāṃ svabandhuvadhaśocinām| śatroryudhi vināśena karomyaśrupramārjanam || 63.38 ||

-- 'आज शत्रु का युद्ध में विनाश करके मैं उन शोकमग्न लोगों के आँसू पोंछ दूँगा, जो अपने बन्धुओं की मृत्यु पर विलाप कर रहे हैं।'

श्लोक 39 (yuddha.63.39)

अद्य पर्वतसंकाशं ससूर्यमिव तोयदम्। विकीर्णं पश्य समरे सुग्रीवं प्लवगेश्वरम् ॥ 63.39 ॥

adya parvatasaṃkāśaṃ sasūryamiva toyadam| vikīrṇaṃ paśya samare sugrīvaṃ plavageśvaram || 63.39 ||

-- 'आज युद्ध में सूर्य से युक्त मेघ के समान पर्वताकार वानरराज सुग्रीव को छिन्न-भिन्न होते देखो।'

श्लोक 40 (yuddha.63.40)

कथं च राक्षसैरेभिर्मया च परिसान्त्वितः। जिघांसुभिर्दाशरथिं व्यथसे त्वं सदानघ ॥ 63.40 ॥

kathaṃ ca rākṣasairebhirmayā ca parisāntvitaḥ| jighāṃsubhirdāśarathiṃ vyathase tvaṃ sadānagha || 63.40 ||

-- 'हे निष्पाप, जब ये राक्षस और मैं दशरथ-पुत्र का वध करने को उद्यत हैं और तुम्हें आश्वासन दे चुके हैं, तब भी तुम क्यों व्याकुल रहते हो?'

श्लोक 41 (yuddha.63.41)

मां निहत्य किल त्वां हि निहनिष्यति राघवः। नाहमात्मनि संतापं गच्छेयं राक्षसाधिप ॥ 63.41 ॥

māṃ nihatya kila tvāṃ hi nihaniṣyati rāghavaḥ| nāhamātmani saṃtāpaṃ gaccheyaṃ rākṣasādhipa || 63.41 ||

-- 'हे राक्षसाधिप, मुझे मारकर ही राघव तुम्हें मार सकेगा; मैं अपने ऊपर ऐसा संताप नहीं आने दूँगा।'

श्लोक 42 (yuddha.63.42)

कामं त्विदानीमपि मां व्यादिश त्वं परंतप। न परः प्रेक्षणीयस्ते युद्धायातुलविक्रम ॥ 63.42 ॥

kāmaṃ tvidānīmapi māṃ vyādiśa tvaṃ paraṃtapa| na paraḥ prekṣaṇīyaste yuddhāyātulavikrama || 63.42 ||

-- 'हे परंतप, अभी भी मुझे आज्ञा दो; हे अतुलपराक्रमी, युद्ध के लिए तुम्हें किसी दूसरे की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है।'

श्लोक 43 (yuddha.63.43)

अहमुत्सादयिष्यामि शत्रूंस्तव महाबलान्। यदि शक्रो यदि यमो यदि पावकमारुतौ ॥ 63.43 ॥

ahamutsādayiṣyāmi śatrūṃstava mahābalān| yadi śakro yadi yamo yadi pāvakamārutau || 63.43 ||

-- 'मैं तुम्हारे महाबली शत्रुओं का समूल नाश कर दूँगा -- चाहे वह इन्द्र हो, चाहे यम हो, चाहे अग्नि और वायु ही क्यों न हों --'

श्लोक 44 (yuddha.63.44)

तानहं योधयिष्यामि कुबेरवरुणावपि। गिरिमात्रशरीरस्य शितशूलधरस्य मे ॥ 63.44 ॥

tānahaṃ yodhayiṣyāmi kuberavaruṇāvapi| girimātraśarīrasya śitaśūladharasya me || 63.44 ||

-- '-- मैं उन सबसे युद्ध करूँगा, कुबेर और वरुण से भी। पर्वत के समान विशाल शरीर वाले और तीक्ष्ण शूल धारण करने वाले मुझसे --'

श्लोक 45 (yuddha.63.45)

नर्दतस्तीक्ष्णदंष्ट्रस्य बिभीयाद् वै पुरंदरः। अथ वा त्यक्तशस्त्रस्य मृद्नतस्तरसा रिपून् ॥ 63.45 ॥

nardatastīkṣṇadaṃṣṭrasya bibhīyād vai puraṃdaraḥ| atha vā tyaktaśastrasya mṛdnatastarasā ripūn || 63.45 ||

-- '-- गर्जना करते और तीक्ष्ण दाढ़ों वाले मुझसे तो स्वयं इन्द्र भी भयभीत हो जाएगा -- अथवा शस्त्र त्यागकर भी वेगपूर्वक शत्रुओं को कुचल डालने वाले मुझसे भी।'

श्लोक 46 (yuddha.63.46)

न मे प्रतिमुखः कश्चित् स्थातुं शक्तो जिजीविषुः। नैव शक्त्या न गदया नासिना निशितैः शरैः ॥ 63.46 ॥

na me pratimukhaḥ kaścit sthātuṃ śakto jijīviṣuḥ| naiva śaktyā na gadayā nāsinā niśitaiḥ śaraiḥ || 63.46 ||

-- 'जीने की इच्छा रखने वाला कोई भी मेरे सामने खड़ा नहीं रह सकता -- न शक्ति से, न गदा से, न तलवार से, न तीक्ष्ण बाणों से।'

श्लोक 47 (yuddha.63.47)

हस्ताभ्यामेव संरभ्य हनिष्यामि सवज्रिणम्। यदि मे मुष्टिवेगं स राघवोऽद्य सहिष्यति ॥ 63.47 ॥

hastābhyāmeva saṃrabhya haniṣyāmi savajriṇam| yadi me muṣṭivegaṃ sa rāghavo'dya sahiṣyati || 63.47 ||

-- 'मैं केवल अपने दोनों हाथों से ही वज्रधारी इन्द्र तक को पकड़कर मार डालूँगा -- यदि वह राघव आज मेरी मुष्टि के वेग को सह सके तो।'

श्लोक 48 (yuddha.63.48)

ततः पास्यन्ति बाणौघा रुधिरं राघवस्य मे। चिन्तया तप्यसे राजन् किमर्थं मयि तिष्ठति ॥ 63.48 ॥

tataḥ pāsyanti bāṇaughā rudhiraṃ rāghavasya me| cintayā tapyase rājan kimarthaṃ mayi tiṣṭhati || 63.48 ||

-- 'तब उसी के बाण-समूह राघव के अपने रक्त को पिएँगे। हे राजन्, मेरे रहते हुए तुम चिन्ता से क्यों संतप्त होते हो?'

श्लोक 49 (yuddha.63.49)

सोऽहं शत्रुविनाशाय तव निर्यातुमुद्यतः। मुञ्च रामाद् भयं घोरं निहनिष्यामि संयुगे ॥ 63.49 ॥

so'haṃ śatruvināśāya tava niryātumudyataḥ| muñca rāmād bhayaṃ ghoraṃ nihaniṣyāmi saṃyuge || 63.49 ||

-- 'यही मैं तुम्हारे शत्रु के विनाश के लिए प्रस्थान करने को तैयार हूँ -- राम से उत्पन्न इस भीषण भय को त्याग दो; मैं उसे युद्ध में मार डालूँगा।'

श्लोक 50 (yuddha.63.50)

राघवं लक्ष्मणं चैव सुग्रीवं च महाबलम्। हनूमन्तं च रक्षोघ्नं येन लङ्का प्रदीपिता ॥ 63.50 ॥

rāghavaṃ lakṣmaṇaṃ caiva sugrīvaṃ ca mahābalam| hanūmantaṃ ca rakṣoghnaṃ yena laṅkā pradīpitā || 63.50 ||

-- 'राघव, लक्ष्मण, महाबली सुग्रीव, और राक्षसों का संहारक वह हनुमान, जिसने लंका को जला डाला था --'

श्लोक 51 (yuddha.63.51)

हरींश्च भक्षयिष्यामि संयुगे समुपस्थिते। असाधारणमिच्छामि तव दातुं महद् यशः ॥ 63.51 ॥

harīṃśca bhakṣayiṣyāmi saṃyuge samupasthite| asādhāraṇamicchāmi tava dātuṃ mahad yaśaḥ || 63.51 ||

-- '-- और वानरों को भी युद्ध छिड़ते ही मैं खा जाऊँगा। मैं तुम्हें एक असाधारण महान् यश प्रदान करना चाहता हूँ।'

श्लोक 52 (yuddha.63.52)

यदि चेन्द्राद् भयं राजन् यदि चापि स्वयंभुवः। ततोऽहं नाशयिष्यामि नैशं तम इवांशुमान् ॥ 63.52 ॥

yadi cendrād bhayaṃ rājan yadi cāpi svayaṃbhuvaḥ| tato'haṃ nāśayiṣyāmi naiśaṃ tama ivāṃśumān || 63.52 ||

-- 'हे राजन्, यदि तुम्हें इन्द्र से भय हो या स्वयं ब्रह्मा से भी, तो मैं उसे भी उसी प्रकार नष्ट कर दूँगा जैसे सूर्य रात्रि के अंधकार को नष्ट करता है।'

श्लोक 53 (yuddha.63.53)

अपि देवाः शयिष्यन्ते मयि क्रुद्धे महीतले। यमं च शमयिष्यामि भक्षयिष्यामि पावकम् ॥ 63.53 ॥

api devāḥ śayiṣyante mayi kruddhe mahītale| yamaṃ ca śamayiṣyāmi bhakṣayiṣyāmi pāvakam || 63.53 ||

-- 'मेरे क्रुद्ध होने पर तो देवगण भी पृथ्वी पर लोट जाएँगे; मैं यमराज को भी शान्त कर दूँगा और अग्नि को भी निगल जाऊँगा।'

श्लोक 54 (yuddha.63.54)

आदित्यं पातयिष्यामि सनक्षत्रं महीतले। शतक्रतुं वधिष्यामि पास्यामि वरुणालयम् ॥ 63.54 ॥

ādityaṃ pātayiṣyāmi sanakṣatraṃ mahītale| śatakratuṃ vadhiṣyāmi pāsyāmi varuṇālayam || 63.54 ||

-- 'मैं नक्षत्रों सहित सूर्य को भी पृथ्वी पर गिरा दूँगा; शतक्रतु इन्द्र का वध करूँगा और वरुण के आलय को पी जाऊँगा।'

श्लोक 55 (yuddha.63.55)

पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम्। दीर्घकालं प्रसुप्तस्य कुम्भकर्णस्य विक्रमम् ॥ 63.55 ॥

parvatāṃścūrṇayiṣyāmi dārayiṣyāmi medinīm| dīrghakālaṃ prasuptasya kumbhakarṇasya vikramam || 63.55 ||

-- 'मैं पर्वतों को चूर्ण-चूर्ण कर दूँगा और पृथ्वी को विदीर्ण कर दूँगा -- दीर्घकाल तक सोए हुए कुम्भकर्ण का यह पराक्रम अब देख लो।'

श्लोक 56 (yuddha.63.56)

अद्य पश्यन्तु भूतानि भक्ष्यमाणानि सर्वशः। न त्विदं त्रिदिवं सर्वमाहारो मम पूर्यते ॥ 63.56 ॥

adya paśyantu bhūtāni bhakṣyamāṇāni sarvaśaḥ| na tvidaṃ tridivaṃ sarvamāhāro mama pūryate || 63.56 ||

-- 'आज समस्त प्राणी सब ओर से भक्षण होते हुए देखें -- फिर भी यह सारा त्रिलोक भी मेरे आहार को पूर्ण नहीं कर सकता।'

श्लोक 57 (yuddha.63.57)

वधेन ते दाशरथेः सुखावहं। सुखं समाहर्तुमहं व्रजामि। निहत्य रामं सह लक्ष्मणेन। खादामि सर्वान् हरियूथमुख्यान् ॥ 63.57 ॥

vadhena te dāśaratheḥ sukhāvahaṃ| sukhaṃ samāhartumahaṃ vrajāmi| nihatya rāmaṃ saha lakṣmaṇena| khādāmi sarvān hariyūthamukhyān || 63.57 ||

-- 'मैं तुम्हें दशरथ-पुत्र के वध से होने वाला सुख देने के लिए ही जा रहा हूँ; राम को लक्ष्मण सहित मारकर मैं वानर-सेना के सभी प्रमुख नायकों को खा जाऊँगा।'

श्लोक 58 (yuddha.63.58)

रमस्व राजन् पिब चाद्य वारुणीं। कुरुष्व कृत्यानि विनीय दुःखम्। मयाद्य रामे गमिते यमक्षयं। चिराय सीता वशगा भविष्यति ॥ 63.58 ॥

ramasva rājan piba cādya vāruṇīṃ| kuruṣva kṛtyāni vinīya duḥkham| mayādya rāme gamite yamakṣayaṃ| cirāya sītā vaśagā bhaviṣyati || 63.58 ||

-- 'हे राजन्, आज आनन्द करो और मदिरा का पान करो; दुःख त्यागकर अपने कार्यों में लगो। आज जब मैं राम को यमलोक भेज दूँगा, तब सीता चिरकाल से तुम्हारे अधीन हो जाएगी।'

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