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युद्धकाण्ड · सर्ग 64

महोदर की छलपूर्ण नीति

सर्ग 63सर्ग-सूचीसर्ग 65

श्लोक 1 (yuddha.64.1)

तदुक्तमतिकायस्य बलिनो बाहुशालिनः। कुम्भकर्णस्य वचनं श्रुत्वोवाच महोदरः ॥ 64.1 ॥

taduktamatikāyasya balino bāhuśālinaḥ| kumbhakarṇasya vacanaṃ śrutvovāca mahodaraḥ || 64.1 ||

विशालकाय, बलवान और भुजबली कुम्भकर्ण के उस वचन को सुनकर महोदर ने यह कहा --

श्लोक 2 (yuddha.64.2)

कुम्भकर्ण कुले जातो धृष्टः प्राकृतदर्शनः। अवलिप्तो न शक्नोषि कृत्यं सर्वत्र वेदितुम् ॥ 64.2 ॥

kumbhakarṇa kule jāto dhṛṣṭaḥ prākṛtadarśanaḥ| avalipto na śaknoṣi kṛtyaṃ sarvatra veditum || 64.2 ||

-- 'हे कुम्भकर्ण, कुलीन वंश में जन्म लेकर भी तुम धृष्ट, सामान्य दृष्टि वाले और अहंकार से भरे हो -- तुम हर स्थिति में करणीय कार्य को नहीं पहचान सकते।'

श्लोक 3 (yuddha.64.3)

नहि राजा न जानीते कुम्भकर्ण नयानयौ। त्वं तु कैशोरकाद् धृष्टः केवलं वक्तुमिच्छसि ॥ 64.3 ॥

nahi rājā na jānīte kumbhakarṇa nayānayau| tvaṃ tu kaiśorakād dhṛṣṭaḥ kevalaṃ vaktumicchasi || 64.3 ||

-- 'हे कुम्भकर्ण, ऐसा नहीं कि राजा नीति और अनीति को नहीं जानते। तुम तो बचपन से ही धृष्ट हो और केवल बोलना चाहते हो।'

श्लोक 4 (yuddha.64.4)

स्थानं वृद्धिं च हानिं च देशकालविधानवित्। आत्मनश्च परेषां च बुध्यते राक्षसर्षभः ॥ 64.4 ॥

sthānaṃ vṛddhiṃ ca hāniṃ ca deśakālavidhānavit| ātmanaśca pareṣāṃ ca budhyate rākṣasarṣabhaḥ || 64.4 ||

-- 'देश-काल की विधि का ज्ञाता यह राक्षसश्रेष्ठ अपनी और दूसरों की स्थिति, वृद्धि और हानि को भली-भाँति समझता है।'

श्लोक 5 (yuddha.64.5)

यत् त्वशक्यं बलवता वक्तुं प्राकृतबुद्धिना। अनुपासितवृद्धेन कः कुर्यात् तादृशं बुधः ॥ 64.5 ॥

yat tvaśakyaṃ balavatā vaktuṃ prākṛtabuddhinā| anupāsitavṛddhena kaḥ kuryāt tādṛśaṃ budhaḥ || 64.5 ||

-- 'जिसे साधारण बुद्धि वाला और वृद्धों की सेवा न करने वाला बलवान पुरुष भी कहने में असमर्थ है, ऐसा कार्य कौन बुद्धिमान करेगा?'

श्लोक 6 (yuddha.64.6)

यांस्तु धर्मार्थकामांस्त्वं ब्रवीषि पृथगाश्रयान्। अवबोद्धुं स्वभावेन नहि लक्षणमस्ति तान् ॥ 64.6 ॥

yāṃstu dharmārthakāmāṃstvaṃ bravīṣi pṛthagāśrayān| avaboddhuṃ svabhāvena nahi lakṣaṇamasti tān || 64.6 ||

-- 'तुम जिन धर्म, अर्थ और काम को अलग-अलग आश्रय वाला बताते हो, उन्हें स्वभाव से पहचानने का कोई निश्चित लक्षण नहीं है।'

श्लोक 7 (yuddha.64.7)

कर्म चैव हि सर्वेषां कारणानां प्रयोजनम्। श्रेयः पापीयसां चात्र फलं भवति कर्मणाम् ॥ 64.7 ॥

karma caiva hi sarveṣāṃ kāraṇānāṃ prayojanam| śreyaḥ pāpīyasāṃ cātra phalaṃ bhavati karmaṇām || 64.7 ||

-- 'सम्पूर्ण कारणों का प्रयोजन तो कर्म ही है, और यहाँ कर्मों का फल ही शुभ अथवा पापमय होता है।'

श्लोक 8 (yuddha.64.8)

निःश्रेयसफलावेव धर्मार्थावितरावपि। अधर्मानर्थयोः प्राप्तं फलं च प्रत्यवायिकम् ॥ 64.8 ॥

niḥśreyasaphalāveva dharmārthāvitarāvapi| adharmānarthayoḥ prāptaṃ phalaṃ ca pratyavāyikam || 64.8 ||

-- 'धर्म और अर्थ ही परम कल्याणकारी फल देने वाले हैं, जबकि अधर्म और अनर्थ से प्राप्त फल तो अहितकर ही होता है।'

श्लोक 9 (yuddha.64.9)

ऐहलौकिकपारक्यं कर्म पुंभिर्निषेव्यते। कर्माण्यपि तु कल्याणि लभते काममास्थितः ॥ 64.9 ॥

aihalaukikapārakyaṃ karma puṃbhirniṣevyate| karmāṇyapi tu kalyāṇi labhate kāmamāsthitaḥ || 64.9 ||

-- 'मनुष्य इस लोक और परलोक दोनों के लिए कर्म करते हैं; परन्तु शुभ फल तो उन्हीं शुभ कर्मों से मिलता है, जिन्हें उचित इच्छा के साथ किया जाए।'

श्लोक 10 (yuddha.64.10)

तत्र क्लृप्तमिदं राज्ञा हृदि कार्यं मतं च नः। शत्रौ हि साहसं यत् तत् किमिवात्रापनीयते ॥ 64.10 ॥

tatra klṛptamidaṃ rājñā hṛdi kāryaṃ mataṃ ca naḥ| śatrau hi sāhasaṃ yat tat kimivātrāpanīyate || 64.10 ||

-- 'इस विषय में राजा ने जो मन में निश्चय किया है और हमने भी जो उचित माना है -- शत्रु के विरुद्ध साहस दिखाने में भला दोष ही क्या है?'

श्लोक 11 (yuddha.64.11)

एकस्यैवाभियाने तु हेतुर्यः प्राहृतस्त्वया। तत्राप्यनुपपन्नं ते वक्ष्यामि यदसाधु च ॥ 64.11 ॥

ekasyaivābhiyāne tu heturyaḥ prāhṛtastvayā| tatrāpyanupapannaṃ te vakṣyāmi yadasādhu ca || 64.11 ||

-- 'किन्तु अकेले जाने के लिए तुमने जो कारण बताया है, उसमें जो असंगत और अनुचित है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ।'

श्लोक 12 (yuddha.64.12)

येन पूर्वं जनस्थाने बहवोऽतिबला हताः। राक्षसा राघवं तं त्वं कथमेको जयिष्यसि ॥ 64.12 ॥

yena pūrvaṃ janasthāne bahavo'tibalā hatāḥ| rākṣasā rāghavaṃ taṃ tvaṃ kathameko jayiṣyasi || 64.12 ||

-- 'जिसने पहले जनस्थान में इतने महाबली राक्षसों का वध कर डाला था, उसी राघव को तुम अकेले कैसे जीत सकोगे?'

श्लोक 13 (yuddha.64.13)

ये पूर्वं निर्जितास्तेन जनस्थाने महौजसः। राक्षसांस्तान् पुरे सर्वान् भीतानद्य न पश्यसि ॥ 64.13 ॥

ye pūrvaṃ nirjitāstena janasthāne mahaujasaḥ| rākṣasāṃstān pure sarvān bhītānadya na paśyasi || 64.13 ||

-- 'क्या तुम आज भी इस नगर में जनस्थान में उसके द्वारा पराजित किए गए उन महातेजस्वी राक्षसों को भयभीत नहीं देखते?'

श्लोक 14 (yuddha.64.14)

तं सिंहमिव संक्रुद्धं रामं दशरथात्मजम्। सर्पं सुप्तमहो बुद्ध्वा प्रबोधयितुमिच्छसि ॥ 64.14 ॥

taṃ siṃhamiva saṃkruddhaṃ rāmaṃ daśarathātmajam| sarpaṃ suptamaho bud‍dhvā prabodhayitumicchasi || 64.14 ||

-- 'सिंह के समान क्रुद्ध उस दशरथ-पुत्र राम को, मानो सोए हुए सर्प को जानबूझकर जगाना ही चाहते हो!'

श्लोक 15 (yuddha.64.15)

ज्वलन्तं तेजसा नित्यं क्रोधेन च दुरासदम्। कस्तं मृत्युमिवासह्यमासादयितुमर्हति ॥ 64.15 ॥

jvalantaṃ tejasā nityaṃ krodhena ca durāsadam| kastaṃ mṛtyumivāsahyamāsādayitumarhati || 64.15 ||

-- 'जो सदा तेज से प्रज्वलित है, क्रोध से दुर्धर्ष है और मृत्यु के समान असह्य है, उसके निकट जाने का साहस भला किसे है?'

श्लोक 16 (yuddha.64.16)

संशयस्थमिदं सर्वं शत्रोः प्रतिसमासने। एकस्य गमनं तात नहि मे रोचते भृशम् ॥ 64.16 ॥

saṃśayasthamidaṃ sarvaṃ śatroḥ pratisamāsane| ekasya gamanaṃ tāta nahi me rocate bhṛśam || 64.16 ||

-- 'शत्रु के सम्मुख जाने पर यह सब कुछ संदिग्ध ही रहता है; हे तात, तुम्हारा अकेला जाना मुझे रत्ती भर भी उचित नहीं लगता।'

श्लोक 17 (yuddha.64.17)

हीनार्थस्तु समृद्धार्थं को रिपुं प्राकृतं यथा। निश्चितं जीवितत्यागे वशमानेतुमिच्छति ॥ 64.17 ॥

hīnārthastu samṛddhārthaṃ ko ripuṃ prākṛtaṃ yathā| niścitaṃ jīvitatyāge vaśamānetumicchati || 64.17 ||

-- 'साधन-हीन पुरुष, प्राण त्यागने का निश्चय किए बिना, समृद्ध शत्रु को साधारण जन के समान अपने वश में लाने की इच्छा कैसे कर सकता है?'

श्लोक 18 (yuddha.64.18)

यस्य नास्ति मनुष्येषु सदृशो राक्षसोत्तम। कथमाशंससे योद्धुं तुल्येनेन्द्रविवस्वतोः ॥ 64.18 ॥

yasya nāsti manuṣyeṣu sadṛśo rākṣasottama| kathamāśaṃsase yoddhuṃ tulyenendravivasvatoḥ || 64.18 ||

-- 'हे राक्षसश्रेष्ठ, जिसका मनुष्यों में कोई सानी नहीं और जो इन्द्र तथा सूर्य के समान है, उससे समान होकर लड़ने की आशा तुम कैसे करते हो?'

श्लोक 19 (yuddha.64.19)

एवमुक्त्वा तु संरब्धं कुम्भकर्णं महोदरः। उवाच रक्षसां मध्ये रावणं लोकरावणम् ॥ 64.19 ॥

evamuktvā tu saṃrabdhaṃ kumbhakarṇaṃ mahodaraḥ| uvāca rakṣasāṃ madhye rāvaṇaṃ lokarāvaṇam || 64.19 ||

इस प्रकार क्रुद्ध कुम्भकर्ण से कह चुकने के बाद महोदर ने राक्षसों के बीच लोक-भयंकर रावण से यह कहा --

श्लोक 20 (yuddha.64.20)

लब्ध्वा पुरस्ताद् वैदेहीं किमर्थं त्वं विलम्बसे। यदीच्छसि तदा सीता वशगा ते भविष्यति ॥ 64.20 ॥

labdhvā purastād vaidehīṃ kimarthaṃ tvaṃ vilambase| yadīcchasi tadā sītā vaśagā te bhaviṣyati || 64.20 ||

-- 'वैदेही को पहले ही प्राप्त कर चुकने पर भी तुम विलम्ब क्यों कर रहे हो? यदि तुम चाहो, तो सीता तुम्हारे वश में हो सकती है।'

श्लोक 21 (yuddha.64.21)

दृष्टः कश्चिदुपायो मे सीतोपस्थानकारकः। रुचितश्चेत् स्वया बुद्ध्या राक्षसेन्द्र ततः शृणु ॥ 64.21 ॥

dṛṣṭaḥ kaścidupāyo me sītopasthānakārakaḥ| rucitaścet svayā buddhyā rākṣasendra tataḥ śṛṇu || 64.21 ||

-- 'मुझे सीता को तुम्हारे समीप लाने वाला एक उपाय सूझा है -- यदि तुम्हारी अपनी बुद्धि को यह रुचिकर लगे, हे राक्षसेन्द्र, तो सुनो।'

श्लोक 22 (yuddha.64.22)

अहं द्विजिह्वः संह्रादी कुम्भकर्णो वितर्दनः। पञ्च रामवधायैते निर्यान्तीत्यवघोषय ॥ 64.22 ॥

ahaṃ dvijihvaḥ saṃhrādī kumbhakarṇo vitardanaḥ| pañca rāmavadhāyaite niryāntītyavaghoṣaya || 64.22 ||

-- 'यह घोषणा करा दो कि मैं, द्विजिह्व, संह्रादी, कुम्भकर्ण और वितर्दन -- ये पाँचों राम के वध के लिए निकल रहे हैं।'

श्लोक 23 (yuddha.64.23)

ततो गत्वा वयं युद्धं दास्यामस्तस्य यत्नतः। जेष्यामो यदि ते शत्रून् नोपायैः कार्यमस्ति नः ॥ 64.23 ॥

tato gatvā vayaṃ yuddhaṃ dāsyāmastasya yatnataḥ| jeṣyāmo yadi te śatrūn nopāyaiḥ kāryamasti naḥ || 64.23 ||

-- 'फिर हम जाकर पूरे प्रयत्न से उससे युद्ध करेंगे। यदि हम तुम्हारे शत्रुओं को जीत लें, तो फिर हमें किसी उपाय की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।'

श्लोक 24 (yuddha.64.24)

अथ जीवति नः शत्रुर्वयं च कृतसंयुगाः। ततः समभिपत्स्यामो मनसा यत् समीक्षितम् ॥ 64.24 ॥

atha jīvati naḥ śatrurvayaṃ ca kṛtasaṃyugāḥ| tataḥ samabhipatsyāmo manasā yat samīkṣitam || 64.24 ||

-- 'यदि युद्ध कर चुकने पर भी हमारा शत्रु जीवित रहे, तो फिर हम मन में सोचे हुए उस उपाय को कार्यान्वित करेंगे।'

श्लोक 25 (yuddha.64.25)

वयं युद्धादिहैष्यामो रुधिरेण समुक्षिताः। विदार्य स्वतनुं बाणै रामनामाङ्कितैः शरैः ॥ 64.25 ॥

vayaṃ yuddhādihaiṣyāmo rudhireṇa samukṣitāḥ| vidārya svatanuṃ bāṇai rāmanāmāṅkitaiḥ śaraiḥ || 64.25 ||

-- 'हम युद्ध से लौटकर यहाँ रक्त से लथपथ आएँगे, अपने ही शरीर को राम के नाम से अंकित बाणों से बींध कर।'

श्लोक 26 (yuddha.64.26)

भक्षितो राघवोऽस्माभिर्लक्ष्मणश्चेति वादिनः। ततः पादौ ग्रहीष्यामस्त्वं नः कामं प्रपूरय ॥ 64.26 ॥

bhakṣito rāghavo'smābhirlakṣmaṇaśceti vādinaḥ| tataḥ pādau grahīṣyāmastvaṃ naḥ kāmaṃ prapūraya || 64.26 ||

-- 'यह कहते हुए कि हमने राघव को खा लिया और लक्ष्मण को भी -- फिर हम तुम्हारे चरण पकड़ेंगे; तुम हमारी इच्छा पूर्ण कर देना।'

श्लोक 27 (yuddha.64.27)

ततोऽवघोषय पुरे गजस्कन्धेन पार्थिव। हतो रामः सह भ्रात्रा ससैन्य इति सर्वतः ॥ 64.27 ॥

tato'vaghoṣaya pure gajaskandhena pārthiva| hato rāmaḥ saha bhrātrā sasainya iti sarvataḥ || 64.27 ||

-- 'फिर, हे राजन्, हाथी की पीठ पर बैठकर नगर में सब ओर यह उद्घोषणा करा दो कि राम अपने भाई और सेना सहित मारा गया!'

श्लोक 28 (yuddha.64.28)

प्रीतो नाम ततो भूत्वा भृत्यानां त्वमरिंदम। भोगांश्च परिवारांश्च कामान् वसु च दापय ॥ 64.28 ॥

prīto nāma tato bhūtvā bhṛtyānāṃ tvamariṃdama| bhogāṃśca parivārāṃśca kāmān vasu ca dāpaya || 64.28 ||

-- 'फिर, हे अरिंदम, प्रसन्नता का बहाना करके अपने सेवकों को भोग, परिवार, इच्छित वस्तुएँ और धन प्रदान करो।'

श्लोक 29 (yuddha.64.29)

ततो माल्यानि वासांसि वीराणामनुलेपनम्। पेयं च बहु योधेभ्यः स्वयं च मुदितः पिब ॥ 64.29 ॥

tato mālyāni vāsāṃsi vīrāṇāmanulepanam| peyaṃ ca bahu yodhebhyaḥ svayaṃ ca muditaḥ piba || 64.29 ||

-- 'फिर वीरों को माला, वस्त्र और अंगराग दो, तथा योद्धाओं को प्रचुर पेय पदार्थ दो, और स्वयं भी आनन्दपूर्वक पान करो।'

श्लोक 30 (yuddha.64.30)

ततोऽस्मिन् बहुलीभूते कौलीने सर्वतो गते। भक्षितः ससुहृद् रामो राक्षसैरिति विश्रुते ॥ 64.30 ॥

tato'smin bahulībhūte kaulīne sarvato gate| bhakṣitaḥ sasuhṛd rāmo rākṣasairiti viśrute || 64.30 ||

-- 'फिर जब यह खबर चारों ओर फैल जाए और यह लोकवाद सब जगह सुना जाने लगे कि राम अपने सुहृदों सहित राक्षसों द्वारा खा लिया गया है --'

श्लोक 31 (yuddha.64.31)

प्रविश्याश्वास्य चापि त्वं सीतां रहसि सान्त्वयन्। धनधान्यैश्च कामैश्च रत्नैश्चैनां प्रलोभय ॥ 64.31 ॥

praviśyāśvāsya cāpi tvaṃ sītāṃ rahasi sāntvayan| dhanadhānyaiśca kāmaiśca ratnaiścaināṃ pralobhaya || 64.31 ||

-- '-- तब तुम भीतर जाकर सीता के पास जाओ, उसे आश्वासन दो, एकान्त में मधुर वचन बोलकर उसे धन, धान्य, इच्छित वस्तुओं और रत्नों का लोभ दिखाओ।'

श्लोक 32 (yuddha.64.32)

अनयोपधया राजन् भूयः शोकानुबन्धया। अकामा त्वद्वशं सीता नष्टनाथा गमिष्यति ॥ 64.32 ॥

anayopadhayā rājan bhūyaḥ śokānubandhayā| akāmā tvadvaśaṃ sītā naṣṭanāthā gamiṣyati || 64.32 ||

-- 'हे राजन्, शोक से भरे इस छल के द्वारा, अपने स्वामी को नष्ट हुआ मानकर सीता अनिच्छा से भी तुम्हारे वश में आ जाएगी।'

श्लोक 33 (yuddha.64.33)

रमणीयं हि भर्तारं विनष्टमधिगम्य सा। नैराश्यात् स्त्रीलघुत्वाच्च त्वद्वशं प्रतिपत्स्यते ॥ 64.33 ॥

ramaṇīyaṃ hi bhartāraṃ vinaṣṭamadhigamya sā| nairāśyāt strīlaghutvācca tvadvaśaṃ pratipatsyate || 64.33 ||

-- 'अपने प्रिय पति को नष्ट हुआ जानकर वह निराशा और स्त्रीसुलभ चंचलता के कारण तुम्हारे अधीन हो जाएगी।'

श्लोक 34 (yuddha.64.34)

सा पुरा सुखसंवृद्धा सुखार्हा दुःखकर्शिता। त्वय्यधीनं सुखं ज्ञात्वा सर्वथैव गमिष्यति ॥ 64.34 ॥

sā purā sukhasaṃvṛddhā sukhārhā duḥkhakarśitā| tvayyadhīnaṃ sukhaṃ jñātvā sarvathaiva gamiṣyati || 64.34 ||

-- 'सुख में पली और सुख की अधिकारिणी वह अब दुःख से क्षीण हो चुकी है; जब उसे ज्ञात होगा कि सुख तुम्हारे ही अधीन है, तो वह सर्वथा तुम्हें प्राप्त हो जाएगी।'

श्लोक 35 (yuddha.64.35)

एतत् सुनीतं मम दर्शनेन। रामं हि दृष्ट्वैव भवेदनर्थः। इहैव ते सेत्स्यति मोत्सुको भू-। र्महानयुद्धेन सुखस्य लाभः ॥ 64.35 ॥

etat sunītaṃ mama darśanena| rāmaṃ hi dṛṣṭvaiva bhavedanarthaḥ| ihaiva te setsyati motsuko bhū-| rmahānayuddhena sukhasya lābhaḥ || 64.35 ||

-- 'मेरी दृष्टि में यही सुनीति है। राम को देखते ही तो केवल अनर्थ ही होगा; यहीं बैठे-बैठे तुम्हारा प्रयोजन सिद्ध हो जाएगा -- उतावले मत बनो -- युद्ध के बिना भी महान सुख की प्राप्ति सम्भव है।'

श्लोक 36 (yuddha.64.36)

अनष्टसैन्यो ह्यनवाप्तसंशयो। रिपुं त्वयुद्धेन जयञ्जनाधिपः। यशश्च पुण्यं च महान्महीपते। श्रियं च कीर्तिं च चिरं समश्नुते ॥ 64.36 ॥

anaṣṭasainyo hyanavāptasaṃśayo| ripuṃ tvayuddhena jayañjanādhipaḥ| yaśaśca puṇyaṃ ca mahānmahīpate| śriyaṃ ca kīrtiṃ ca ciraṃ samaśnute || 64.36 ||

-- 'जो राजा अपनी सेना को बिना गँवाए और बिना किसी जोखिम के, युद्ध के बिना ही शत्रु पर विजय पा लेता है, वह महान भूपति दीर्घकाल तक यश, पुण्य, श्री और कीर्ति का उपभोग करता है।'

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