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युद्धकाण्ड · सर्ग 65

कुम्भकर्ण का रणक्षेत्र में प्रवेश

सर्ग 64सर्ग-सूचीसर्ग 66

श्लोक 1 (yuddha.65.1)

स तथोक्तस्तु निर्भर्त्स्य कुम्भकर्णो महोदरम्। अब्रवीद् राक्षसश्रेष्ठं भ्रातरं रावणं ततः ॥ 65.1 ॥

sa tathoktastu nirbhartsya kumbhakarṇo mahodaram| abravīd rākṣasaśreṣṭhaṃ bhrātaraṃ rāvaṇaṃ tataḥ || 65.1 ||

इस प्रकार कहे जाने पर कुम्भकर्ण ने महोदर को फटकारा और फिर राक्षसश्रेष्ठ अपने भाई रावण से यह कहा --

श्लोक 2 (yuddha.65.2)

सोऽहं तव भयं घोरं वधात् तस्य दुरात्मनः। रामस्याद्य प्रमार्जामि निर्वैरो हि सुखी भव ॥ 65.2 ॥

so'haṃ tava bhayaṃ ghoraṃ vadhāt tasya durātmanaḥ| rāmasyādya pramārjāmi nirvairo hi sukhī bhava || 65.2 ||

-- 'मैं आज उस दुरात्मा राम का वध करके तुम्हारे इस भीषण भय को मिटा दूँगा -- शत्रुता से मुक्त होकर सुखी हो जाओ।'

श्लोक 3 (yuddha.65.3)

गर्जन्ति न वृथा शूरा निर्जला इव तोयदाः। पश्य सम्पद्यमानं तु गर्जितं युधि कर्मणा ॥ 65.3 ॥

garjanti na vṛthā śūrā nirjalā iva toyadāḥ| paśya sampadyamānaṃ tu garjitaṃ yudhi karmaṇā || 65.3 ||

-- 'शूरवीर बिना वर्षा वाले मेघों की तरह व्यर्थ नहीं गरजते; देखो, यह गर्जन युद्ध में कर्म द्वारा किस प्रकार सत्य सिद्ध होता है।'

श्लोक 4 (yuddha.65.4)

न मर्षयन्ति चात्मानं सम्भावयितुमात्मना। अदर्शयित्वा शूरास्तु कर्म कुर्वन्ति दुष्करम् ॥ 65.4 ॥

na marṣayanti cātmānaṃ sambhāvayitumātmanā| adarśayitvā śūrāstu karma kurvanti duṣkaram || 65.4 ||

-- 'सच्चे शूर स्वयं अपनी प्रशंसा किए जाने को सहन नहीं करते; बिना कुछ दिखाए ही वे दुष्कर कार्य को सम्पन्न कर देते हैं।'

श्लोक 5 (yuddha.65.5)

विक्लवानां ह्यबुद्धीनां राज्ञां पण्डितमानिनाम्। रोचते त्वद्वचो नित्यं कथ्यमानं महोदर ॥ 65.5 ॥

viklavānāṃ hyabuddhīnāṃ rājñāṃ paṇḍitamāninām| rocate tvadvaco nityaṃ kathyamānaṃ mahodara || 65.5 ||

-- 'हे महोदर, तुम्हारे वचन तो सदा उन्हीं भयभीत, बुद्धिहीन और अपने को पण्डित मानने वाले राजाओं को भाते हैं।'

श्लोक 6 (yuddha.65.6)

युद्धे कापुरुषैर्नित्यं भवद्भिः प्रियवादिभिः। राजानमनुगच्छद्भिः सर्वं कृत्यं विनाशितम् ॥ 65.6 ॥

yuddhe kāpuruṣairnityaṃ bhavadbhiḥ priyavādibhiḥ| rājānamanugacchadbhiḥ sarvaṃ kṛtyaṃ vināśitam || 65.6 ||

-- 'युद्ध में सदा प्रियवादी बने रहने वाले तुम जैसे कायर पुरुषों ने, जो सदा राजा के अनुगामी बने रहते हैं, सारे उचित कार्य को नष्ट कर दिया है।'

श्लोक 7 (yuddha.65.7)

राजशेषा कृता लङ्का क्षीणः कोशो बलं हतम्। राजानमिममासाद्य सुहृच्चिह्नममित्रकम् ॥ 65.7 ॥

rājaśeṣā kṛtā laṅkā kṣīṇaḥ kośo balaṃ hatam| rājānamimamāsādya suhṛccihnamamitrakam || 65.7 ||

-- 'लंका अब केवल राजा भर रह गई है, कोष क्षीण हो गया है, सेना नष्ट हो चुकी है -- इस राजा को तुम जैसे मित्र-चिह्नधारी शत्रु ही मिले हैं।'

श्लोक 8 (yuddha.65.8)

एष निर्याम्यहं युद्धमुद्यतः शत्रुनिर्जये। दुर्नयं भवतामद्य समीकर्तुं महाहवे ॥ 65.8 ॥

eṣa niryāmyahaṃ yuddhamudyataḥ śatrunirjaye| durnayaṃ bhavatāmadya samīkartuṃ mahāhave || 65.8 ||

-- 'यह मैं युद्ध के लिए निकल रहा हूँ, शत्रु के विनाश के लिए उद्यत होकर, आज महासमर में तुम जैसों की कुनीति को सुधारने के लिए।'

श्लोक 9 (yuddha.65.9)

एवमुक्तवतो वाक्यं कुम्भकर्णस्य धीमतः। प्रत्युवाच ततो वाक्यं प्रहसन् राक्षसाधिपः ॥ 65.9 ॥

evamuktavato vākyaṃ kumbhakarṇasya dhīmataḥ| pratyuvāca tato vākyaṃ prahasan rākṣasādhipaḥ || 65.9 ||

बुद्धिमान कुम्भकर्ण के इस प्रकार कहने पर राक्षसराज ने हँसते हुए यह उत्तर दिया --

श्लोक 10 (yuddha.65.10)

महोदरोऽयं रामात् तु परित्रस्तो न संशयः। न हि रोचयते तात युद्धं युद्धविशारद ॥ 65.10 ॥

mahodaro'yaṃ rāmāt tu paritrasto na saṃśayaḥ| na hi rocayate tāta yuddhaṃ yuddhaviśārada || 65.10 ||

-- 'निःसन्देह यह महोदर राम से डरा हुआ है -- इसीलिए, हे तात, युद्धकुशल होते हुए भी यह युद्ध को पसन्द नहीं करता।'

श्लोक 11 (yuddha.65.11)

कश्चिन्मे त्वत्समो नास्ति सौहृदेन बलेन च। गच्छ शत्रुवधाय त्वं कुम्भकर्ण जयाय च ॥ 65.11 ॥

kaścinme tvatsamo nāsti sauhṛdena balena ca| gaccha śatruvadhāya tvaṃ kumbhakarṇa jayāya ca || 65.11 ||

-- 'स्नेह और बल में तुम्हारे समान मेरा कोई नहीं है -- हे कुम्भकर्ण, तुम शत्रु के वध और विजय के लिए जाओ।'

श्लोक 12 (yuddha.65.12)

शयानः शत्रुनाशार्थं भवान् सम्बोधितो मया। अयं हि कालः सुमहान् राक्षसानामरिंदम ॥ 65.12 ॥

śayānaḥ śatrunāśārthaṃ bhavān sambodhito mayā| ayaṃ hi kālaḥ sumahān rākṣasānāmariṃdama || 65.12 ||

-- 'मैंने तुम्हें शत्रु के नाश के लिए ही सोते से जगाया है; हे अरिंदम, राक्षसों के लिए यही वह महान् अवसर है।'

श्लोक 13 (yuddha.65.13)

संगच्छ शूलमादाय पाशहस्त इवान्तकः। वानरान् राजपुत्रौ च भक्षयादित्यतेजसौ ॥ 65.13 ॥

saṃgaccha śūlamādāya pāśahasta ivāntakaḥ| vānarān rājaputrau ca bhakṣayādityatejasau || 65.13 ||

-- 'शूल हाथ में लेकर, हाथ में पाश लिए काल के समान जाओ, और सूर्य के समान तेजस्वी उन दोनों राजकुमारों तथा वानरों को खा जाओ।'

श्लोक 14 (yuddha.65.14)

समालोक्य तु ते रूपं विद्रविष्यन्ति वानराः। रामलक्ष्मणयोश्चापि हृदये प्रस्फुटिष्यतः ॥ 65.14 ॥

samālokya tu te rūpaṃ vidraviṣyanti vānarāḥ| rāmalakṣmaṇayoścāpi hṛdaye prasphuṭiṣyataḥ || 65.14 ||

-- 'तुम्हारा रूप देखते ही वानर भाग खड़े होंगे, और राम-लक्ष्मण के हृदय भी भय से मानो फट जाएँगे।'

श्लोक 15 (yuddha.65.15)

एवमुक्त्वा महातेजाः कुम्भकर्णं महाबलम्। पुनर्जातमिवात्मानं मेने राक्षसपुङ्गवः ॥ 65.15 ॥

evamuktvā mahātejāḥ kumbhakarṇaṃ mahābalam| punarjātamivātmānaṃ mene rākṣasapuṅgavaḥ || 65.15 ||

महाबली कुम्भकर्ण से इस प्रकार कहकर वह तेजस्वी राक्षसश्रेष्ठ रावण मानो स्वयं को पुनर्जन्म पाया हुआ मानने लगा।

श्लोक 16 (yuddha.65.16)

कुम्भकर्णबलाभिज्ञो जानंस्तस्य पराक्रमम्। बभूव मुदितो राजा शशाङ्क इव निर्मलः ॥ 65.16 ॥

kumbhakarṇabalābhijño jānaṃstasya parākramam| babhūva mudito rājā śaśāṅka iva nirmalaḥ || 65.16 ||

कुम्भकर्ण के बल से भली-भाँति परिचित और उसके पराक्रम को जानने वाला वह राजा निर्मल चन्द्रमा के समान हर्षित हो उठा।

श्लोक 17 (yuddha.65.17)

इत्येवमुक्तः संहृष्टो निर्जगाम महाबलः। राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा योद्धुमुद्युक्तवांस्तदा ॥ 65.17 ॥

ityevamuktaḥ saṃhṛṣṭo nirjagāma mahābalaḥ| rājñastu vacanaṃ śrutvā yoddhumudyuktavāṃstadā || 65.17 ||

इस प्रकार आदेश पाकर वह महाबली अत्यन्त हर्षित हुआ और राजा के वचन सुनकर युद्ध के लिए उद्यत होकर निकल पड़ा।

श्लोक 18 (yuddha.65.18)

आददे निशितं शूलं वेगाच्छत्रुनिबर्हणः। सर्वं कालायसं दीप्तं तप्तकाञ्चनभूषणम् ॥ 65.18 ॥

ādade niśitaṃ śūlaṃ vegācchatrunibarhaṇaḥ| sarvaṃ kālāyasaṃ dīptaṃ taptakāñcanabhūṣaṇam || 65.18 ||

उस शत्रुसंहारक ने वेगपूर्वक अपना तीक्ष्ण शूल उठा लिया, जो सम्पूर्ण रूप से दीप्त काले लोहे का बना था और तपाए हुए स्वर्ण से अलंकृत था।

श्लोक 19 (yuddha.65.19)

इन्द्राशनिसमप्रख्यं वज्रप्रतिमगौरवम्। देवदानवगन्धर्वयक्षपन्नगसूदनम् ॥ 65.19 ॥

indrāśanisamaprakhyaṃ vajrapratimagauravam| devadānavagandharvayakṣapannagasūdanam || 65.19 ||

वह इन्द्र की अशनि के समान प्रकाशमान था, वज्र के समान गुरुत्वयुक्त था, और देवों, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों तथा नागों का संहारक था।

श्लोक 20 (yuddha.65.20)

रक्तमाल्यमहादामं स्वतश्चोद्गतपावकम्। आदाय विपुलं शूलं शत्रुशोणितरञ्जितम् ॥ 65.20 ॥

raktamālyamahādāmaṃ svataścoda‍gatapāvakam| ādāya vipulaṃ śūlaṃ śatruśoṇitarañjitam || 65.20 ||

लाल पुष्पों की बड़ी माला से सुसज्जित, स्वयं ही अग्नि उगलते हुए, शत्रु के रक्त से रंजित उस विशाल शूल को लेकर --

श्लोक 21 (yuddha.65.21)

कुम्भकर्णो महातेजा रावणं वाक्यमब्रवीत्। गमिष्याम्यहमेकाकी तिष्ठत्विह बलं मम ॥ 65.21 ॥

kumbhakarṇo mahātejā rāvaṇaṃ vākyamabravīt| gamiṣyāmyahamekākī tiṣṭhatviha balaṃ mama || 65.21 ||

-- महातेजस्वी कुम्भकर्ण ने रावण से यह कहा -- 'मैं अकेला ही जाऊँगा; मेरी सेना यहीं रहे।'

श्लोक 22 (yuddha.65.22)

अद्य तान् क्षुधितः क्रुद्धो भक्षयिष्यामि वानरान्। कुम्भकर्णवचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ 65.22 ॥

adya tān kṣudhitaḥ kruddho bhakṣayiṣyāmi vānarān| kumbhakarṇavacaḥ śrutvā rāvaṇo vākyamabravīt || 65.22 ||

-- 'आज भूखा और क्रुद्ध होकर मैं उन वानरों को खा जाऊँगा।' कुम्भकर्ण के इस वचन को सुनकर रावण ने कहा --

श्लोक 23 (yuddha.65.23)

सैन्यैः परिवृतो गच्छ शूलमुद्गरपाणिभिः। वानरा हि महात्मानः शूराः सुव्यवसायिनः ॥ 65.23 ॥

sainyaiḥ parivṛto gaccha śūlamuda‍garapāṇibhiḥ| vānarā hi mahātmānaḥ śūrāḥ suvyavasāyinaḥ || 65.23 ||

-- 'शूल और मुद्गर हाथों में लिए अपनी सेना से घिरकर जाओ -- क्योंकि वानर महात्मा, शूरवीर और दृढ़-संकल्प वाले होते हैं।'

श्लोक 24 (yuddha.65.24)

एकाकिनं प्रमत्तं वा नयेयुर्दशनैः क्षयम्। तस्मात् परमदुर्धर्षः सैन्यैः परिवृतो व्रज। रक्षसामहितं सर्वं शत्रुपक्षं निषूदय ॥ 65.24 ॥

ekākinaṃ pramattaṃ vā nayeyurdaśanaiḥ kṣayam| tasmāt paramadurdharṣaḥ sainyaiḥ parivṛto vraja| rakṣasāmahitaṃ sarvaṃ śatrupakṣaṃ niṣūdaya || 65.24 ||

-- 'अकेले या असावधान रहने पर वे तुम्हें अपने दाँतों से भी नष्ट कर सकते हैं -- अतः हे परम दुर्धर्ष, सेना से घिरकर ही जाओ, और राक्षसों के लिए अहितकारी उस सम्पूर्ण शत्रुपक्ष का संहार करो।'

श्लोक 25 (yuddha.65.25)

अथासनात् समुत्पत्य स्रजं मणिकृतान्तराम्। आबबन्ध महातेजाः कुम्भकर्णस्य रावणः ॥ 65.25 ॥

athāsanāt samutpatya srajaṃ maṇikṛtāntarām| ābabandha mahātejāḥ kumbhakarṇasya rāvaṇaḥ || 65.25 ||

तब आसन से उठकर महातेजस्वी रावण ने स्वयं कुम्भकर्ण को मणियों से गुँथी हुई माला पहनाई।

श्लोक 26 (yuddha.65.26)

अङ्गदान्यङ्गुलीवेष्टान् वराण्याभरणानि च। हारं च शशिसंकाशमाबबन्ध महात्मनः ॥ 65.26 ॥

aṅgadānyaṅgulīveṣṭān varāṇyābharaṇāni ca| hāraṃ ca śaśisaṃkāśamābabandha mahātmanaḥ || 65.26 ||

उस महात्मा को उसने अंगद, अंगुलियों की मुद्रिकाएँ, उत्तम आभूषण और चन्द्रमा के समान कान्तिमान हार भी पहनाए।

श्लोक 27 (yuddha.65.27)

दिव्यानि च सुगन्धीनि माल्यदामानि रावणः। गात्रेषु सज्जयामास श्रोत्रयोश्चास्य कुण्डले ॥ 65.27 ॥

divyāni ca sugandhīni mālyadāmāni rāvaṇaḥ| gātreṣu sajjayāmāsa śrotrayoścāsya kuṇḍale || 65.27 ||

रावण ने उसके अंगों पर दिव्य और सुगन्धित पुष्पमालाएँ तथा उसके कानों में कुण्डल भी पहना दिए।

श्लोक 28 (yuddha.65.28)

काञ्चनाङ्गदकेयूरनिष्काभरणभूषितः। कुम्भकर्णो बृहत्कर्णः सुहुतोऽग्निरिवाबभौ ॥ 65.28 ॥

kāñcanāṅgadakeyūraniṣkābharaṇabhūṣitaḥ| kumbhakarṇo bṛhatkarṇaḥ suhuto'gnirivābabhau || 65.28 ||

स्वर्ण के अंगद, केयूर और निष्क आभूषणों से सुशोभित वह विशाल कर्ण वाला कुम्भकर्ण भली-भाँति हवन की गई अग्नि के समान देदीप्यमान हो उठा।

श्लोक 29 (yuddha.65.29)

श्रोणीसूत्रेण महता मेचकेन व्यराजत। अमृतोत्पादने नद्धो भुजङ्गेनेव मन्दरः ॥ 65.29 ॥

śroṇīsūtreṇa mahatā mecakena vyarājata| amṛtotpādane naddho bhujaṅgeneva mandaraḥ || 65.29 ||

वह कमर में बँधी हुई विशाल श्याम मेखला से वैसे ही सुशोभित हुआ जैसे अमृत-मन्थन के समय सर्प से लिपटा हुआ मन्दराचल।

श्लोक 30 (yuddha.65.30)

स काञ्चनं भारसहं निवातं। विद्युत्प्रभं दीप्तमिवात्मभासा। आबध्यमानः कवचं रराज। संध्याभ्रसंवीत इवाद्रिराजः ॥ 65.30 ॥

sa kāñcanaṃ bhārasahaṃ nivātaṃ| vidyutprabhaṃ dīptamivātmabhāsā| ābadhyamānaḥ kavacaṃ rarāja| saṃdhyābhrasaṃvīta ivādrirājaḥ || 65.30 ||

स्वर्णिम, भारी और अभेद्य, बिजली की भाँति चमकते हुए और अपनी ही आभा से दीप्त कवच को धारण करते हुए वह ऐसा सुशोभित हुआ मानो संध्या के मेघों में लिपटा पर्वतराज हो।

श्लोक 31 (yuddha.65.31)

सर्वाभरणसर्वाङ्गः शूलपाणिः स राक्षसः। त्रिविक्रमकृतोत्साहो नारायण इवाबभौ ॥ 65.31 ॥

sarvābharaṇasarvāṅgaḥ śūlapāṇiḥ sa rākṣasaḥ| trivikramakṛtotsāho nārāyaṇa ivābabhau || 65.31 ||

सर्वांगों में सभी आभूषणों से सुसज्जित और हाथ में शूल लिए वह राक्षस मानो त्रिविक्रम के लिए उद्यत नारायण के समान सुशोभित हुआ।

श्लोक 32 (yuddha.65.32)

भ्रातरं सम्परिष्वज्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्। प्रणम्य शिरसा तस्मै प्रतस्थे स महाबलः ॥ 65.32 ॥

bhrātaraṃ sampariṣvajya kṛtvā cāpi pradakṣiṇam| praṇamya śirasā tasmai pratasthe sa mahābalaḥ || 65.32 ||

अपने भाई का आलिंगन कर, उसकी परिक्रमा कर और सिर झुककर प्रणाम करके वह महाबली प्रस्थान कर गया।

श्लोक 33 (yuddha.65.33)

तमाशीर्भिः प्रशस्ताभिः प्रेषयामास रावणः। शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैः सैन्यैश्चापि वरायुधैः ॥ 65.33 ॥

tamāśīrbhiḥ praśastābhiḥ preṣayāmāsa rāvaṇaḥ| śaṅkhadundubhinirghoṣaiḥ sainyaiścāpi varāyudhaiḥ || 65.33 ||

रावण ने शुभ आशीर्वादों के साथ, शंख और दुन्दुभियों की गर्जना तथा उत्तम आयुधों से सज्जित सेना के साथ उसे विदा किया।

श्लोक 34 (yuddha.65.34)

तं गजैश्च तुरंगैश्च स्यन्दनैश्चाम्बुदस्वनैः। अनुजग्मुर्महात्मानो रथिनो रथिनां वरम् ॥ 65.34 ॥

taṃ gajaiśca turaṃgaiśca syandanaiścāmbudasvanaiḥ| anujagmurmahātmāno rathino rathināṃ varam || 65.34 ||

हाथियों, घोड़ों और मेघ-गर्जन के समान गूँजते रथों के साथ महान् रथी उस रथियों में श्रेष्ठ कुम्भकर्ण के पीछे-पीछे चले।

श्लोक 35 (yuddha.65.35)

सर्पैरुष्ट्रैः खरैश्चैव सिंहद्विपमृगद्विजैः। अनुजग्मुश्च तं घोरं कुम्भकर्णं महाबलम् ॥ 65.35 ॥

sarpairuṣṭraiḥ kharaiścaiva siṃhadvipamṛgadvijaiḥ| anujagmuśca taṃ ghoraṃ kumbhakarṇaṃ mahābalam || 65.35 ||

सर्प, ऊँट और गधे, तथा सिंह, हाथी, मृग और पक्षी भी उस भयंकर महाबली कुम्भकर्ण के पीछे-पीछे चले।

श्लोक 36 (yuddha.65.36)

स पुष्पवर्षैरवकीर्यमाणो। धृतातपत्रः शितशूलपाणिः। मदोत्कटः शोणितगन्धमत्तो। विनिर्ययौ दानवदेवशत्रुः ॥ 65.36 ॥

sa puṣpavarṣairavakīryamāṇo| dhṛtātapatraḥ śitaśūlapāṇiḥ| madotkaṭaḥ śoṇitagandhamatto| viniryayau dānavadevaśatruḥ || 65.36 ||

पुष्पों की वर्षा से आच्छादित, ऊपर छत्र लिए, हाथ में तीक्ष्ण शूल धारण किए, मद से उन्मत्त और रक्त की गन्ध से ही मतवाला वह देव-दानवों का शत्रु कुम्भकर्ण निकल पड़ा।

श्लोक 37 (yuddha.65.37)

पदातयश्च बहवो महानादा महाबलाः। अन्वयू राक्षसा भीमा भीमाक्षाः शस्त्रपाणयः ॥ 65.37 ॥

padātayaśca bahavo mahānādā mahābalāḥ| anvayū rākṣasā bhīmā bhīmākṣāḥ śastrapāṇayaḥ || 65.37 ||

अनेक महाबली पैदल सैनिक, भयंकर गर्जना करते और भयानक आँखों वाले राक्षस, शस्त्र हाथों में लिए उसके पीछे-पीछे चले।

श्लोक 38 (yuddha.65.38)

रक्ताक्षाः सुबहुव्यामा नीलाञ्जनचयोपमाः। शूलानुद्यम्य खड्गांश्च निशितांश्च परश्वधान् ॥ 65.38 ॥

raktākṣāḥ subahuvyāmā nīlāñjanacayopamāḥ| śūlānudyamya khaḍgāṃśca niśitāṃśca paraśvadhān || 65.38 ||

लाल आँखों वाले, विशालकाय और नीले काजल के ढेर के समान श्याम वर्ण वाले वे राक्षस शूल, तलवारें और तीक्ष्ण फरसे उठाए हुए थे।

श्लोक 39 (yuddha.65.39)

भिन्दिपालांश्च परिघान् गदाश्च मुसलानि च। तालस्कन्धांश्च विपुलान् क्षेपणीयान् दुरासदान् ॥ 65.39 ॥

bhindipālāṃśca parighān gadāśca musalāni ca| tālaskandhāṃśca vipulān kṣepaṇīyān durāsadān || 65.39 ||

-- भिन्दिपाल, परिघ, गदाएँ, मूसल और विशाल तालवृक्षों के तने भी लिए हुए थे, जो दुर्धर्ष प्रक्षेपास्त्र थे।

श्लोक 40 (yuddha.65.40)

अथान्यद्वपुरादाय दारुणं घोरदर्शनम्। निष्पपात महातेजाः कुम्भकर्णो महाबलः ॥ 65.40 ॥

athānyadvapurādāya dāruṇaṃ ghoradarśanam| niṣpapāta mahātejāḥ kumbhakarṇo mahābalaḥ || 65.40 ||

फिर एक और विकराल और भयानक दिखने वाला रूप धारण करके महातेजस्वी और महाबली कुम्भकर्ण आगे बढ़ चला।

श्लोक 41 (yuddha.65.41)

धनुःशतपरीणाहः स षट्शतसमुच्छ्रितः। रौद्रः शकटचक्राक्षो महापर्वतसंनिभः ॥ 65.41 ॥

dhanuḥśataparīṇāhaḥ sa ṣaṭśatasamucchritaḥ| raudraḥ śakaṭacakrākṣo mahāparvatasaṃnibhaḥ || 65.41 ||

सौ धनुष के बराबर घेरे वाला और छह सौ धनुष के बराबर ऊँचा वह भयंकर, गाड़ी के पहिये जैसी आँखों वाला कुम्भकर्ण किसी विशाल पर्वत के समान प्रतीत होता था।

श्लोक 42 (yuddha.65.42)

संनिपत्य च रक्षांसि दग्धशैलोपमो महान्। कुम्भकर्णो महावक्त्रः प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥ 65.42 ॥

saṃnipatya ca rakṣāṃsi dagdhaśailopamo mahān| kumbhakarṇo mahāvaktraḥ prahasannidamabravīt || 65.42 ||

जले हुए पर्वत के समान वह विशालकाय और विशाल मुख वाला कुम्भकर्ण राक्षसों को अपने चारों ओर एकत्र करके हँसते हुए यह बोला --

श्लोक 43 (yuddha.65.43)

अद्य वानरमुख्यानां तानि यूथानि भागशः। निर्दहिष्यामि संक्रुद्धः पतङ्गानिव पावकः ॥ 65.43 ॥

adya vānaramukhyānāṃ tāni yūthāni bhāgaśaḥ| nirdahiṣyāmi saṃkruddhaḥ pataṅgāniva pāvakaḥ || 65.43 ||

-- 'आज मैं क्रुद्ध होकर मुख्य वानरों के उन झुंडों को दल-के-दल उसी प्रकार भस्म कर दूँगा जैसे अग्नि पतंगों को जला डालती है।'

श्लोक 44 (yuddha.65.44)

नापराध्यन्ति मे कामं वानरा वनचारिणः। जातिरस्मद्विधानां सा पुरोद्यानविभूषणम् ॥ 65.44 ॥

nāparādhyanti me kāmaṃ vānarā vanacāriṇaḥ| jātirasmadvidhānāṃ sā purodyānavibhūṣaṇam || 65.44 ||

-- 'वन-विचरण करने वाले ये वानर सचमुच मेरा कोई अपराध नहीं करते; किन्तु हम जैसों के लिए तो इनकी जाति उपवनों की शोभा बढ़ाने वाला भोज्य-पदार्थ मात्र है।'

श्लोक 45 (yuddha.65.45)

पुररोधस्य मूलं तु राघवः सहलक्ष्मणः। हते तस्मिन् हतं सर्वं तं वधिष्यामि संयुगे ॥ 65.45 ॥

purarodhasya mūlaṃ tu rāghavaḥ sahalakṣmaṇaḥ| hate tasmin hataṃ sarvaṃ taṃ vadhiṣyāmi saṃyuge || 65.45 ||

-- 'किन्तु इस नगर-घेराबन्दी का मूल तो लक्ष्मण सहित राघव ही है; उसके मारे जाने पर सब कुछ मारा गया समझो -- उसी को मैं युद्ध में मारूँगा।'

श्लोक 46 (yuddha.65.46)

एवं तस्य ब्रुवाणस्य कुम्भकर्णस्य राक्षसाः। नादं चक्रुर्महाघोरं कम्पयन्त इवार्णवम् ॥ 65.46 ॥

evaṃ tasya bruvāṇasya kumbhakarṇasya rākṣasāḥ| nādaṃ cakrurmahāghoraṃ kampayanta ivārṇavam || 65.46 ||

कुम्भकर्ण के इस प्रकार कहने पर राक्षसों ने ऐसी भीषण गर्जना की, मानो समुद्र को भी कँपा दिया हो।

श्लोक 47 (yuddha.65.47)

तस्य निष्पततस्तूर्णं कुम्भकर्णस्य धीमतः। बभूवुर्घोररूपाणि निमित्तानि समन्ततः ॥ 65.47 ॥

tasya niṣpatatastūrṇaṃ kumbhakarṇasya dhīmataḥ| babhūvurghorarūpāṇi nimittāni samantataḥ || 65.47 ||

जब बुद्धिमान कुम्भकर्ण वेगपूर्वक आगे बढ़ा, तब चारों ओर भयंकर अपशकुन प्रकट होने लगे।

श्लोक 48 (yuddha.65.48)

उल्काशनियुता मेघा बभूवुर्गर्दभारुणाः। ससागरवना चैव वसुधा समकम्पत ॥ 65.48 ॥

ulkāśaniyutā meghā babhūvurgardabhāruṇāḥ| sasāgaravanā caiva vasudhā samakampata || 65.48 ||

उल्काओं और वज्रों से युक्त मेघ गधे के समान अरुण वर्ण के हो गए, और सागर तथा वनों सहित समस्त पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 49 (yuddha.65.49)

घोररूपाः शिवा नेदुः सज्वालकवलैर्मुखैः। मण्डलान्यपसव्यानि बबन्धुश्च विहंगमाः ॥ 65.49 ॥

ghorarūpāḥ śivā neduḥ sajvālakavalairmukhaiḥ| maṇḍalānyapasavyāni babandhuśca vihaṃgamāḥ || 65.49 ||

भयंकर रूप वाली सियारिनें ज्वाला उगलते मुखों से चीखने लगीं, और पक्षी अपशकुन-सूचक उलटी दिशा में मंडलाकार उड़ने लगे।

श्लोक 50 (yuddha.65.50)

निष्पपात च गृध्रोऽस्य शूले वै पथि गच्छतः। प्रास्फुरन्नयनं चास्य सव्यो बाहुरकम्पत ॥ 65.50 ॥

niṣpapāta ca gṛdhro'sya śūle vai pathi gacchataḥ| prāsphurannayanaṃ cāsya savyo bāhurakampata || 65.50 ||

मार्ग में जाते हुए उसके शूल पर एक गृद्ध आ बैठा; उसकी आँख फड़कने लगी और बायाँ बाहु काँपने लगा।

श्लोक 51 (yuddha.65.51)

निष्पपात तदा चोल्का ज्वलन्ती भीमनिःस्वना। आदित्यो निष्प्रभश्चासीन्न वाति च सुखोऽनिलः ॥ 65.51 ॥

niṣpapāta tadā colkā jvalantī bhīmaniḥsvanā| ādityo niṣprabhaścāsīnna vāti ca sukho'nilaḥ || 65.51 ||

उसी समय एक भयंकर गर्जना करती हुई प्रज्वलित उल्का गिरी; सूर्य निस्तेज हो गया और वायु भी सुखद रूप से नहीं बही।

श्लोक 52 (yuddha.65.52)

अचिन्तयन् महोत्पातानुदितान् रोमहर्षणान्। निर्ययौ कुम्भकर्णस्तु कृतान्तबलचोदितः ॥ 65.52 ॥

acintayan mahotpātānuditān romaharṣaṇān| niryayau kumbhakarṇastu kṛtāntabalacoditaḥ || 65.52 ||

इन घटित हो रहे रोमांचकारी महान अपशकुनों की परवाह न करते हुए, मानो काल की शक्ति से प्रेरित होकर कुम्भकर्ण आगे बढ़ता ही गया।

श्लोक 53 (yuddha.65.53)

स लङ्घयित्वा प्राकारं पद्भ्यां पर्वतसंनिभः। ददर्शाभ्रघनप्रख्यं वानरानीकमद्भुतम् ॥ 65.53 ॥

sa laṅghayitvā prākāraṃ pada‍bhyāṃ parvatasaṃnibhaḥ| dadarśābhraghanaprakhyaṃ vānarānīkamadbhutam || 65.53 ||

पर्वत के समान वह अपने पैरों से प्राचीर लाँघकर बादलों के घने समूह के समान उस अद्भुत वानर-सेना को देखने लगा।

श्लोक 54 (yuddha.65.54)

ते दृष्ट्वा राक्षसश्रेष्ठं वानराः पर्वतोपमम्। वायुनुन्ना इव घना ययुः सर्वा दिशस्तदा ॥ 65.54 ॥

te dṛṣṭvā rākṣasaśreṣṭhaṃ vānarāḥ parvatopamam| vāyununnā iva ghanā yayuḥ sarvā diśastadā || 65.54 ||

पर्वत के समान उस राक्षसश्रेष्ठ को देखकर वानर उस समय पवन से उड़ाए गए मेघों के समान सभी दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 55 (yuddha.65.55)

तद् वानरानीकमतिप्रचण्डं। दिशो द्रवद्भिन्नमिवाभ्रजालम्। स कुम्भकर्णः समवेक्ष्य हर्षा-। न्ननाद भूयो घनवद्घनाभः ॥ 65.55 ॥

tad vānarānīkamatipracaṇḍaṃ| diśo dravadbhinnamivābhrajālam| sa kumbhakarṇaḥ samavekṣya harṣā-| nnanāda bhūyo ghanavadghanābhaḥ || 65.55 ||

उस अत्यन्त प्रचण्ड वानर-सेना को छिन्न-भिन्न होकर दिशाओं में बिखरे बादलों की भाँति भागते हुए देखकर मेघ के समान श्याम कुम्भकर्ण हर्ष से पुनः गरज उठा।

श्लोक 56 (yuddha.65.56)

ते तस्य घोरं निनदं निशम्य। यथा निनादं दिवि वारिदस्य। पेतुर्धरण्यां बहवः प्लवङ्गा। निकृत्तमूला इव शालवृक्षाः ॥ 65.56 ॥

te tasya ghoraṃ ninadaṃ niśamya| yathā ninādaṃ divi vāridasya| peturdharaṇyāṃ bahavaḥ plavaṅgā| nikṛttamūlā iva śālavṛkṣāḥ || 65.56 ||

आकाश में गरजते मेघ के समान उसकी उस भयंकर गर्जना को सुनकर अनेक वानर पृथ्वी पर उसी प्रकार गिर पड़े जैसे जड़ से कटे हुए शाल वृक्ष।

श्लोक 57 (yuddha.65.57)

विपुलपरिघवान् स कुम्भकर्णो। रिपुनिधनाय विनिःसृतो महात्मा। कपिगणभयमाददत् सुभीमं। प्रभुरिव किंकरदण्डवान् युगान्ते ॥ 65.57 ॥

vipulaparighavān sa kumbhakarṇo| ripunidhanāya viniḥsṛto mahātmā| kapigaṇabhayamādadat subhīmaṃ| prabhuriva kiṃkaradaṇḍavān yugānte || 65.57 ||

विशाल परिघ धारण किए हुए वह महाकाय कुम्भकर्ण, शत्रु के विनाश के लिए निकलकर, प्रलयकाल में दण्ड धारण किए हुए किसी प्रभु के समान वानर-समूह में अत्यन्त भीषण भय उत्पन्न करने लगा।

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