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युद्धकाण्ड · सर्ग 8

राक्षस सेनापतियों की डींग

सर्ग 7सर्ग-सूचीसर्ग 9

श्लोक 1 (yuddha.8.1)

ततो नीलाम्बुदप्रख्यः प्रहस्तो नाम राक्षसः । अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं शूरः सेनापतिस्तदा ॥ 8.1 ॥

tato nīlāmbudaprakhyaḥ prahasto nāma rākṣasaḥ | abravīt prāñjalirvākyaṃ śūraḥ senāpatistadā || 8.1 ||

तब नीले मेघ के समान वर्ण वाला, शूरवीर सेनापति प्रहस्त नामक राक्षस हाथ जोड़कर यह वचन बोला।

श्लोक 2 (yuddha.8.2)

देवदानवगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः । सर्वे धर्षयितुं शक्याः किं पुनर्मानवौ रणे ॥ 8.2 ॥

devadānavagandharvāḥ piśācapatagoragāḥ | sarve dharṣayituṃ śakyāḥ kiṃ punarmānavau raṇe || 8.2 ||

देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग — इन सबको युद्ध में परास्त किया जा सकता है, फिर दो साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या!

श्लोक 3 (yuddha.8.3)

सर्वे प्रमत्ता विश्वस्ता वञ्चिताः स्म हनूमता । नहि मे जीवतो गच्छेज्जीवन् स वनगोचरः ॥ 8.3 ॥

sarve pramattā viśvastā vañcitāḥ sma hanūmatā | nahi me jīvato gacchejjīvan sa vanagocaraḥ || 8.3 ||

हम सब असावधान और विश्वस्त होने के कारण ही हनुमान द्वारा छले गए; अन्यथा जब तक मैं जीवित हूँ, वह वनवासी वानर जीवित जाकर नहीं बच सकता था।

श्लोक 4 (yuddha.8.4)

सर्वां सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् । करोम्यवानरां भूमिमाज्ञापयतु मां भवान् ॥ 8.4 ॥

sarvāṃ sāgaraparyantāṃ saśailavanakānanām | karomyavānarāṃ bhūmimājñāpayatu māṃ bhavān || 8.4 ||

मैं समुद्र-पर्यन्त पर्वतों, वनों और काननों सहित समस्त पृथ्वी को वानर-रहित कर दूँगा — आप मुझे आज्ञा दें।

श्लोक 5 (yuddha.8.5)

रक्षां चैव विधास्यामि वानराद् रजनीचर । नागमिष्यति ते दुःखं किंचिदात्मापराधजम् ॥ 8.5 ॥

rakṣāṃ caiva vidhāsyāmi vānarād rajanīcara | nāgamiṣyati te duḥkhaṃ kiṃcidātmāparādhajam || 8.5 ||

हे निशाचरेश्वर, मैं वानरों से आपकी रक्षा का प्रबन्ध भी कर दूँगा; आपके अपने अपराध से उत्पन्न होने वाला दुःख भी आप तक तनिक नहीं पहुँचेगा।

श्लोक 6 (yuddha.8.6)

अब्रवीत् तु सुसंक्रुद्धो दुर्मुखो नाम राक्षसः । इदं न क्षमणीयं हि सर्वेषां नः प्रधर्षणम् ॥ 8.6 ॥

abravīt tu susaṃkruddho durmukho nāma rākṣasaḥ | idaṃ na kṣamaṇīyaṃ hi sarveṣāṃ naḥ pradharṣaṇam || 8.6 ||

तब अत्यन्त क्रुद्ध हुआ दुर्मुख नामक राक्षस बोला — हम सब पर हुआ यह आक्रमण वास्तव में क्षमा करने योग्य नहीं है।

श्लोक 7 (yuddha.8.7)

अयं परिभवो भूयः पुरस्यान्तःपुरस्य च । श्रीमतो राक्षसेन्द्रस्य वानरेण प्रधर्षणम् ॥ 8.7 ॥

ayaṃ paribhavo bhūyaḥ purasyāntaḥpurasya ca | śrīmato rākṣasendrasya vānareṇa pradharṣaṇam || 8.7 ||

यह नगर का और अन्तःपुर का घोर अपमान है — एक वानर द्वारा श्रीमान् राक्षसराज पर किया गया यह आक्रमण अत्यन्त गम्भीर है।

श्लोक 8 (yuddha.8.8)

अस्मिन् मुहूर्ते गत्वैको निवर्तिष्यामि वानरान् । प्रविष्टान् सागरं भीममम्बरं वा रसातलम् ॥ 8.8 ॥

asmin muhūrte gatvaiko nivartiṣyāmi vānarān | praviṣṭān sāgaraṃ bhīmamambaraṃ vā rasātalam || 8.8 ||

मैं अभी इसी क्षण अकेला जाकर उन वानरों को समाप्त कर दूँगा, चाहे वे भयंकर सागर में घुस जाएँ, चाहे आकाश में या रसातल में।

श्लोक 9 (yuddha.8.9)

ततोऽब्रवीत् सुसंक्रुद्धो वज्रदंष्ट्रो महाबलः । प्रगृह्य परिघं घोरं मांसशोणितरूषितम् ॥ 8.9 ॥

tato'bravīt susaṃkruddho vajradaṃṣṭro mahābalaḥ | pragṛhya parighaṃ ghoraṃ māṃsaśoṇitarūṣitam || 8.9 ||

तब अत्यन्त क्रुद्ध हुआ महाबली वज्रदंष्ट्र, मांस और रक्त से सने हुए एक भयंकर परिघ को उठाकर बोला।

श्लोक 10 (yuddha.8.10)

किं नो हनूमता कार्यं कृपणेन तपस्विना । रामे तिष्ठति दुर्धर्षे सुग्रीवेऽपि सलक्ष्मणे ॥ 8.10 ॥

kiṃ no hanūmatā kāryaṃ kṛpaṇena tapasvinā | rāme tiṣṭhati durdharṣe sugrīve'pi salakṣmaṇe || 8.10 ||

जब दुर्जेय राम, लक्ष्मण सहित, तथा सुग्रीव विद्यमान हैं, तब उस दीन-हीन तपस्वी हनुमान से हमें क्या प्रयोजन?

श्लोक 11 (yuddha.8.11)

अद्य रामं ससुग्रीवं परिघेण सलक्ष्मणम् । आगमिष्यामि हत्वैको विक्षोभ्य हरिवाहिनीम् ॥ 8.11 ॥

adya rāmaṃ sasugrīvaṃ parigheṇa salakṣmaṇam | āgamiṣyāmi hatvaiko vikṣobhya harivāhinīm || 8.11 ||

आज मैं अकेला ही इस परिघ से राम को, सुग्रीव सहित तथा लक्ष्मण सहित, मारकर और वानर-सेना को तितर-बितर करके लौट आऊँगा।

श्लोक 12 (yuddha.8.12)

इदं ममापरं वाक्यं शृणु राजन् यदिच्छसि । उपायकुशलो ह्येव जयेच्छत्रूनतन्द्रितः ॥ 8.12 ॥

idaṃ mamāparaṃ vākyaṃ śṛṇu rājan yadicchasi | upāyakuśalo hyeva jayecchatrūnatandritaḥ || 8.12 ||

हे राजन्, यदि आप चाहें तो मेरी एक और बात सुनें — उपाय में कुशल और सावधान पुरुष ही शत्रुओं को जीत सकता है।

श्लोक 13 (yuddha.8.13)

कामरूपधराः शूराः सुभीमा भीमदर्शनाः । राक्षसा वा सहस्राणि राक्षसाधिप निश्चिताः ॥ 8.13 ॥

kāmarūpadharāḥ śūrāḥ subhīmā bhīmadarśanāḥ | rākṣasā vā sahasrāṇi rākṣasādhipa niścitāḥ || 8.13 ||

हे राक्षसाधिप, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, शूरवीर, अत्यन्त भयंकर, भयानक-दर्शन तथा दृढ़-निश्चयी हजारों राक्षस —

श्लोक 14 (yuddha.8.14)

काकुत्स्थमुपसंगम्य बिभ्रतो मानुषं वपुः । सर्वे ह्यसम्भ्रमा भूत्वा ब्रुवन्तु रघुसत्तमम् ॥ 8.14 ॥

kākutsthamupasaṃgamya bibhrato mānuṣaṃ vapuḥ | sarve hyasambhramā bhūtvā bruvantu raghusattamam || 8.14 ||

मनुष्य का रूप धारण करके, निःसंकोच होकर, रघुश्रेष्ठ राम के पास जाकर उनसे यह कहें,

श्लोक 15 (yuddha.8.15)

प्रेषिता भरतेनैव भ्रात्रा तव यवीयसा । स हि सेनां समुत्थाप्य क्षिप्रमेवोपयास्यति ॥ 8.15 ॥

preṣitā bharatenaiva bhrātrā tava yavīyasā | sa hi senāṃ samutthāpya kṣipramevopayāsyati || 8.15 ||

'हमें आपके छोटे भाई भरत ने ही भेजा है; वे शीघ्र ही अपनी सेना जुटाकर यहाँ आ पहुँचेंगे।'

श्लोक 16 (yuddha.8.16)

ततो वयमितस्तूर्णं शूलशक्तिगदाधराः । चापबाणासिहस्ताश्च त्वरितास्तत्र यामहे ॥ 8.16 ॥

tato vayamitastūrṇaṃ śūlaśaktigadādharāḥ | cāpabāṇāsihastāśca tvaritāstatra yāmahe || 8.16 ||

उसके बाद हम शूल, शक्ति और गदा लिए, धनुष-बाण तथा तलवार हाथ में लिए, यहाँ से शीघ्र ही वहाँ चल पड़ें,

श्लोक 17 (yuddha.8.17)

आकाशे गणशः स्थित्वा हत्वा तां हरिवाहिनीम् । अश्मशस्त्रमहावृष्ट्या प्रापयाम यमक्षयम् ॥ 8.17 ॥

ākāśe gaṇaśaḥ sthitvā hatvā tāṃ harivāhinīm | aśmaśastramahāvṛṣṭyā prāpayāma yamakṣayam || 8.17 ||

और आकाश में समूह बनाकर खड़े होकर, पत्थरों और अस्त्रों की भारी वर्षा से उस वानर-सेना को मारकर, उसे यमलोक पहुँचा दें।

श्लोक 18 (yuddha.8.18)

एवं चेदुपसर्पेतामनयं रामलक्ष्मणौ । अवश्यमपनीतेन जहतामेव जीवितम् ॥ 8.18 ॥

evaṃ cedupasarpetāmanayaṃ rāmalakṣmaṇau | avaśyamapanītena jahatāmeva jīvitam || 8.18 ||

यदि इस प्रकार राम और लक्ष्मण इस छल में फँसकर पास आ जाएँ, तो इस उपाय से भरमाए हुए वे निश्चय ही अपने प्राण त्याग देंगे।

श्लोक 19 (yuddha.8.19)

कौम्भकर्णिस्ततो वीरो निकुम्भो नाम वीर्यवान् । अब्रवीत् परमक्रुद्धो रावणं लोकरावणम् ॥ 8.19 ॥

kaumbhakarṇistato vīro nikumbho nāma vīryavān | abravīt paramakruddho rāvaṇaṃ lokarāvaṇam || 8.19 ||

इसके बाद कुम्भकर्ण का पराक्रमी पुत्र, वीर निकुम्भ, अत्यन्त क्रुद्ध होकर संसार को रुलाने वाले रावण से बोला।

श्लोक 20 (yuddha.8.20)

सर्वे भवन्तस्तिष्ठन्तु महाराजेन संगताः । अहमेको हनिष्यामि राघवं सहलक्ष्मणम् ॥ 8.20 ॥

sarve bhavantastiṣṭhantu mahārājena saṃgatāḥ | ahameko haniṣyāmi rāghavaṃ sahalakṣmaṇam || 8.20 ||

आप सब महाराज के साथ यहीं ठहरें; मैं अकेला ही लक्ष्मण सहित राघव को मार डालूँगा,

श्लोक 21 (yuddha.8.21)

सुग्रीवं सहनूमन्तं सर्वांश्चैवात्र वानरान् । ततो वज्रहनुर्नाम राक्षसः पर्वतोपमः ॥ 8.21 ॥

sugrīvaṃ sahanūmantaṃ sarvāṃścaivātra vānarān | tato vajrahanurnāma rākṣasaḥ parvatopamaḥ || 8.21 ||

सुग्रीव को, हनुमान सहित, और यहाँ के समस्त वानरों को भी। इसके बाद पर्वत के समान विशालकाय वज्रहनु नामक राक्षस —

श्लोक 22 (yuddha.8.22)

क्रुद्धः परिलिहन् सृक्कां जिह्वया वाक्यमब्रवीत् । स्वैरं कुर्वन्तु कार्याणि भवन्तो विगतज्वराः ॥ 8.22 ॥

kruddhaḥ parilihan sṛkkāṃ jihvayā vākyamabravīt | svairaṃ kurvantu kāryāṇi bhavanto vigatajvarāḥ || 8.22 ||

क्रोधित होकर अपनी जीभ से अपने होंठों के कोनों को चाटते हुए बोला — 'आप सब निश्चिन्त होकर अपने-अपने कार्य स्वतन्त्रतापूर्वक करें,'

श्लोक 23 (yuddha.8.23)

एकोऽहं भक्षयिष्यामि तां सर्वां हरिवाहिनीम् । स्वस्थाः क्रीडन्तु निश्चिन्ताः पिबन्तु मधु वारुणीम् ॥ 8.23 ॥

eko'haṃ bhakṣayiṣyāmi tāṃ sarvāṃ harivāhinīm | svasthāḥ krīḍantu niścintāḥ pibantu madhu vāruṇīm || 8.23 ||

'निश्चिन्त होकर आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करें और वारुणी मदिरा का पान करें — मैं अकेला ही उस समूची वानर-सेना को खा जाऊँगा।'

श्लोक 24 (yuddha.8.24)

अहमेको वधिष्यामि सुग्रीवं सहलक्ष्मणम् । साङ्गदं च हनूमन्तं सर्वांश्चैवात्र वानरान् ॥ 8.24 ॥

ahameko vadhiṣyāmi sugrīvaṃ sahalakṣmaṇam | sāṅgadaṃ ca hanūmantaṃ sarvāṃścaivātra vānarān || 8.24 ||

मैं अकेला ही लक्ष्मण सहित सुग्रीव को, अंगद सहित हनुमान को, और यहाँ के समस्त वानरों को मार डालूँगा।

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