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युद्धकाण्ड · सर्ग 87

इन्द्रजित् को विभीषण की फटकार

सर्ग 86सर्ग-सूचीसर्ग 88

श्लोक 1 (yuddha.87.1)

एवमुक्त्वा तु सौमित्रिं जातहर्षो विभीषणः। धनुष्पाणिं तमादाय त्वरमाणो जगाम सः ॥ 87.1 ॥

evamuktvā tu saumitriṃ jātaharṣo vibhīṣaṇaḥ| dhanuṣpāṇiṃ tamādāya tvaramāṇo jagāma saḥ || 87.1 ||

लक्ष्मण से इस प्रकार कहकर हर्षित हुए विभीषण धनुष हाथ में लिए हुए लक्ष्मण को साथ लेकर शीघ्रता से आगे बढ़े।

श्लोक 2 (yuddha.87.2)

अविदूरं ततो गत्वा प्रविश्य तु महद् वनम्। अदर्शयत तत्कर्म लक्ष्मणाय विभीषणः ॥ 87.2 ॥

avidūraṃ tato gatvā praviśya tu mahad vanam| adarśayata tatkarma lakṣmaṇāya vibhīṣaṇaḥ || 87.2 ||

वहाँ से कुछ ही दूर जाकर और एक विशाल वन में प्रवेश करके विभीषण ने लक्ष्मण को वह स्थान दिखाया, जहाँ इन्द्रजित् अपना यज्ञ-कर्म कर रहा था।

श्लोक 3 (yuddha.87.3)

नीलजीमूतसंकाशं न्यग्रोधं भीमदर्शनम्। तेजस्वी रावणभ्राता लक्ष्मणाय न्यवेदयत् ॥ 87.3 ॥

nīlajīmūtasaṃkāśaṃ nyagrodhaṃ bhīmadarśanam| tejasvī rāvaṇabhrātā lakṣmaṇāya nyavedayat || 87.3 ||

तेजस्वी रावण-भ्राता विभीषण ने लक्ष्मण को नीले बादल के समान श्याम और भयंकर दिखने वाला वह वटवृक्ष दिखाया।

श्लोक 4 (yuddha.87.4)

इहोपहारं भूतानां बलवान् रावणात्मजः। उपहृत्य ततः पश्चात् संग्राममभिवर्तते ॥ 87.4 ॥

ihopahāraṃ bhūtānāṃ balavān rāvaṇātmajaḥ| upahṛtya tataḥ paścāt saṃgrāmamabhivartate || 87.4 ||

"यहाँ पर बलवान इन्द्रजित् भूतों को बलि अर्पित करता है, और उसके पश्चात् ही वह युद्ध की ओर प्रवृत्त होता है।"

श्लोक 5 (yuddha.87.5)

अदृश्यः सर्वभूतानां ततो भवति राक्षसः। निहन्ति समरे शत्रून् बध्नाति च शरोत्तमैः ॥ 87.5 ॥

adṛśyaḥ sarvabhūtānāṃ tato bhavati rākṣasaḥ| nihanti samare śatrūn badhnāti ca śarottamaiḥ || 87.5 ||

"उसके बाद यह राक्षस समस्त प्राणियों के लिए अदृश्य हो जाता है; युद्ध में शत्रुओं का वध करता है और अपने उत्तम बाणों से उन्हें बाँध भी देता है।"

श्लोक 6 (yuddha.87.6)

तमप्रविष्टं न्यग्रोधं बलिनं रावणात्मजम्। विध्वंसय शरैर्दीप्तैः सरथं साश्वसारथिम् ॥ 87.6 ॥

tamapraviṣṭaṃ nyagrodhaṃ balinaṃ rāvaṇātmajam| vidhvaṃsaya śarairdīptaiḥ sarathaṃ sāśvasārathim || 87.6 ||

"अतः उस बलवान इन्द्रजित् को उसके रथ, घोड़ों और सारथि सहित, वटवृक्ष तक पहुँचने से पहले ही अपने प्रज्वलित बाणों से नष्ट कर दो।"

श्लोक 7 (yuddha.87.7)

तथेत्युक्त्वा महातेजाः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः। बभूवावस्थितस्तत्र चित्रं विस्फारयन् धनुः ॥ 87.7 ॥

tathetyuktvā mahātejāḥ saumitrirmitranandanaḥ| babhūvāvasthitastatra citraṃ visphārayan dhanuḥ || 87.7 ||

"ऐसा ही होगा" कहकर मित्रों को आनन्दित करने वाले महातेजस्वी लक्ष्मण अपना अद्भुत धनुष खींचकर वहीं डट गए।

श्लोक 8 (yuddha.87.8)

स रथेनाग्निवर्णेन बलवान् रावणात्मजः। इन्द्रजित् कवची खड्गी सध्वजः प्रत्यदृश्यत ॥ 87.8 ॥

sa rathenāgnivarṇena balavān rāvaṇātmajaḥ| indrajit kavacī khaḍgī sadhvajaḥ pratyadṛśyata || 87.8 ||

तभी वह बलवान रावणपुत्र इन्द्रजित् कवच धारण किए, खड्ग बाँधे और ध्वजा फहराते हुए अग्नि के समान वर्ण वाले अपने रथ पर दिखाई पड़ा।

श्लोक 9 (yuddha.87.9)

तमुवाच महातेजाः पौलस्त्यमपराजितम्। समाह्वये त्वां समरे सम्यग् युद्धं प्रयच्छ मे ॥ 87.9 ॥

tamuvāca mahātejāḥ paulastyamaparājitam| samāhvaye tvāṃ samare samyag yuddhaṃ prayaccha me || 87.9 ||

महातेजस्वी लक्ष्मण ने अब तक अपराजित रहे उस पुलस्त्य-वंशज इन्द्रजित् से कहा, "मैं तुम्हें युद्ध के लिए ललकारता हूँ, मुझसे न्यायपूर्वक युद्ध करो।"

श्लोक 10 (yuddha.87.10)

एवमुक्तो महातेजा मनस्वी रावणात्मजः। अब्रवीत् परुषं वाक्यं तत्र दृष्ट्वा विभीषणम् ॥ 87.10 ॥

evamukto mahātejā manasvī rāvaṇātmajaḥ| abravīt paruṣaṃ vākyaṃ tatra dṛṣṭvā vibhīṣaṇam || 87.10 ||

इस प्रकार कहे जाने पर महातेजस्वी और अभिमानी रावणपुत्र इन्द्रजित् ने वहाँ विभीषण को देखकर उनसे कठोर वचन कहे।

श्लोक 11 (yuddha.87.11)

इह त्वं जातसंवृद्धः साक्षात् भ्राता पितुर्मम। कथं द्रुह्यसि पुत्रस्य पितृव्यो मम राक्षस ॥ 87.11 ॥

iha tvaṃ jātasaṃvṛddhaḥ sākṣāt bhrātā piturmama| kathaṃ druhyasi putrasya pitṛvyo mama rākṣasa || 87.11 ||

"हे राक्षस! तुम यहीं जन्मे और पले-बढ़े हो, साक्षात् मेरे पिता के सगे भाई हो। मेरे पितृव्य होकर तुम पुत्र के प्रति ऐसा द्रोह कैसे कर सकते हो?"

श्लोक 12 (yuddha.87.12)

न ज्ञातित्वं न सौहार्दं न जातिस्तव दुर्मते। प्रमाणं न च सौदर्यं न धर्मो धर्मदूषण ॥ 87.12 ॥

na jñātitvaṃ na sauhārdaṃ na jātistava durmate| pramāṇaṃ na ca saudaryaṃ na dharmo dharmadūṣaṇa || 87.12 ||

"हे दुर्बुद्धि! हे धर्म को कलंकित करने वाले! न तुम्हें ज्ञातित्व का मान है, न मित्रता का, न कुल का, न भ्रातृत्व का और न धर्म का ही।"

श्लोक 13 (yuddha.87.13)

शोच्यस्त्वमसि दुर्बुद्धे निन्दनीयश्च साधुभिः। यस्त्वं स्वजनमुत्सृज्य परभृत्यत्वमागतः ॥ 87.13 ॥

śocyastvamasi durbuddhe nindanīyaśca sādhubhiḥ| yastvaṃ svajanamutsṛjya parabhṛtyatvamāgataḥ || 87.13 ||

"हे दुर्बुद्धि! तुम शोचनीय हो और सज्जनों द्वारा निन्दा के पात्र हो, क्योंकि तुमने अपने ही स्वजनों को त्यागकर पराए की सेवा स्वीकार कर ली है।"

श्लोक 14 (yuddha.87.14)

नैतच्छिथिलया बुद्ध्या त्वं वेत्सि महदन्तरम्। क्व च स्वजनसंवासः क्व च नीच पराश्रयः ॥ 87.14 ॥

naitacchithilayā buddhyā tvaṃ vetsi mahadantaram| kva ca svajanasaṃvāsaḥ kva ca nīca parāśrayaḥ || 87.14 ||

"अपनी शिथिल बुद्धि के कारण तुम इस बड़े अन्तर को नहीं समझ पाते कि अपने स्वजनों के साथ रहना कहाँ, और किसी नीच परजन की शरण लेना कहाँ!"

श्लोक 15 (yuddha.87.15)

गुणवान् वा परजनः स्वजनो निर्गुणोऽपि वा। निर्गुणः स्वजनः श्रेयान् यः परः पर एव सः ॥ 87.15 ॥

guṇavān vā parajanaḥ svajano nirguṇo'pi vā| nirguṇaḥ svajanaḥ śreyān yaḥ paraḥ para eva saḥ || 87.15 ||

"चाहे पराया गुणवान हो और स्वजन निर्गुण ही क्यों न हो, तथापि निर्गुण स्वजन ही श्रेयस्कर है; क्योंकि जो पराया है वह पराया ही रहता है।"

श्लोक 16 (yuddha.87.16)

यः स्वपक्षं परित्यज्य परपक्षं निषेवते। स स्वपक्षे क्षयं याते पश्चात् तैरेव हन्यते ॥ 87.16 ॥

yaḥ svapakṣaṃ parityajya parapakṣaṃ niṣevate| sa svapakṣe kṣayaṃ yāte paścāt taireva hanyate || 87.16 ||

"जो अपने पक्ष को त्यागकर पराए पक्ष की सेवा करता है, वह अपने पक्ष के नष्ट हो जाने पर अन्ततः उन्हीं के हाथों मारा जाता है।"

श्लोक 17 (yuddha.87.17)

निरनुक्रोशता चेयं यादृशी ते निशाचर। स्वजनेन त्वया शक्यं पौरुषं रावणानुज ॥ 87.17 ॥

niranukrośatā ceyaṃ yādṛśī te niśācara| svajanena tvayā śakyaṃ pauruṣaṃ rāvaṇānuja || 87.17 ||

"हे निशाचर! तुमने जैसी निर्दयता दिखाई है, हे रावणानुज! ऐसा पौरुष अपने ही स्वजन के द्वारा ही सम्भव है।"

श्लोक 18 (yuddha.87.18)

इत्युक्तो भ्रातृपुत्रेण प्रत्युवाच विभीषणः। अजानन्निव मच्छीलं किं राक्षस विकत्थसे ॥ 87.18 ॥

ityukto bhrātṛputreṇa pratyuvāca vibhīṣaṇaḥ| ajānanniva macchīlaṃ kiṃ rākṣasa vikatthase || 87.18 ||

अपने भतीजे इन्द्रजित् के इन वचनों को सुनकर विभीषण ने उत्तर दिया, "हे राक्षस! मानो मेरा स्वभाव जानते ही न हो, इस प्रकार क्यों बकवास कर रहे हो?"

श्लोक 19 (yuddha.87.19)

राक्षसेन्द्रसुतासाधो पारुष्यं त्यज गौरवात्। कुले यद्यप्यहं जातो रक्षसां क्रूरकर्मणाम्। गुणो यः प्रथमो नॄणां तन्मे शीलमराक्षसम् ॥ 87.19 ॥

rākṣasendrasutāsādho pāruṣyaṃ tyaja gauravāt| kule yadyapyahaṃ jāto rakṣasāṃ krūrakarmaṇām| guṇo yaḥ prathamo nṝṇāṃ tanme śīlamarākṣasam || 87.19 ||

"हे राक्षसराज-पुत्र दुष्ट! कम-से-कम गुरुजनों के सम्मान में यह कठोरता त्याग दो। मैं भले ही क्रूरकर्मा राक्षसों के कुल में जन्मा हूँ, किन्तु मनुष्यों का जो प्रथम गुण है, वही मेरा स्वभाव है, और वह राक्षसोचित नहीं है।"

श्लोक 20 (yuddha.87.20)

न रमे दारुणेनाहं न चाधर्मेण वै रमे। भ्रात्रा विषमशीलोऽपि कथं भ्राता निरस्यते ॥ 87.20 ॥

na rame dāruṇenāhaṃ na cādharmeṇa vai rame| bhrātrā viṣamaśīlo'pi kathaṃ bhrātā nirasyate || 87.20 ||

"मैं क्रूरता में रमता नहीं और न ही अधर्म में। भाई का स्वभाव भिन्न होने पर भी, भला भाई को भाई कैसे त्याग सकता है?"

श्लोक 21 (yuddha.87.21)

धर्मात् प्रच्युतशीलं हि पुरुषं पापनिश्चयम्। त्यक्त्वा सुखमवाप्नोति हस्तादाशीविषं यथा ॥ 87.21 ॥

dharmāt pracyutaśīlaṃ hi puruṣaṃ pāpaniścayam| tyaktvā sukhamavāpnoti hastādāśīviṣaṃ yathā || 87.21 ||

"धर्म से च्युत आचरण वाले, पाप-निश्चयी पुरुष को त्यागकर मनुष्य वैसे ही सुख पाता है, जैसे हाथ से विषैले सर्प को झटक देने पर मिलता है।"

श्लोक 22 (yuddha.87.22)

परस्वहरणे युक्तं परदाराभिमर्शकम्। त्याज्यमाहुर्दुरात्मानं वेश्म प्रज्वलितं यथा ॥ 87.22 ॥

parasvaharaṇe yuktaṃ paradārābhimarśakam| tyājyamāhurdurātmānaṃ veśma prajvalitaṃ yathā || 87.22 ||

"पराए धन को हड़पने वाले और दूसरे की स्त्री को छूने वाले दुरात्मा को, विद्वान लोग वैसे ही त्याज्य बताते हैं जैसे जलते हुए घर को त्याग दिया जाता है।"

श्लोक 23 (yuddha.87.23)

परस्वानां च हरणं परदाराभिमर्शनम्। सुहृदामतिशङ्का च त्रयो दोषाः क्षयावहाः ॥ 87.23 ॥

parasvānāṃ ca haraṇaṃ paradārābhimarśanam| suhṛdāmatiśaṅkā ca trayo doṣāḥ kṣayāvahāḥ || 87.23 ||

"दूसरे के धन का हरण, दूसरे की पत्नी का स्पर्श और अपने मित्रों पर अत्यधिक सन्देह, ये तीन दोष विनाश लाने वाले हैं।"

श्लोक 24 (yuddha.87.24)

महर्षीणां वधो घोरः सर्वदेवैश्च विग्रहः। अभिमानश्च रोषश्च वैरित्वं प्रतिकूलता ॥ 87.24 ॥

maharṣīṇāṃ vadho ghoraḥ sarvadevaiśca vigrahaḥ| abhimānaśca roṣaśca vairitvaṃ pratikūlatā || 87.24 ||

महर्षियों का भयानक वध, समस्त देवताओं से विरोध, अभिमान, क्रोध, शत्रुता और प्रतिकूलता,

श्लोक 25 (yuddha.87.25)

एते दोषा मम भ्रातुर्जीवितैश्वर्यनाशनाः। गुणान् प्रच्छादयामासुः पर्वतानिव तोयदाः ॥ 87.25 ॥

ete doṣā mama bhrāturjīvitaiśvaryanāśanāḥ| guṇān pracchādayāmāsuḥ parvatāniva toyadāḥ || 87.25 ||

जीवन और ऐश्वर्य दोनों का नाश करने वाले इन दोषों ने मेरे बड़े भाई रावण के गुणों को वैसे ही ढक दिया है, जैसे बादल पर्वतों को ढक लेते हैं।

श्लोक 26 (yuddha.87.26)

दोषैरेतैः परित्यक्तो मया भ्राता पिता तव। नेयमस्ति पुरी लङ्का न च त्वं न च ते पिता ॥ 87.26 ॥

doṣairetaiḥ parityakto mayā bhrātā pitā tava| neyamasti purī laṅkā na ca tvaṃ na ca te pitā || 87.26 ||

"इन्हीं दोषों के कारण मैंने अपने भाई, तुम्हारे पिता का परित्याग किया। अब न यह लंकापुरी बचेगी, न तुम बचोगे और न तुम्हारे पिता ही।"

श्लोक 27 (yuddha.87.27)

अतिमानश्च बालश्च दुर्विनीतश्च राक्षस। बद्धस्त्वं कालपाशेन ब्रूहि मां यद् यदिच्छसि ॥ 87.27 ॥

atimānaśca bālaśca durvinītaśca rākṣasa| baddhastvaṃ kālapāśena brūhi māṃ yad yadicchasi || 87.27 ||

"हे राक्षस! तुम अत्यंत अभिमानी, बालक और अविनीत हो, और अब काल के पाश में बँध चुके हो, तुम्हें जो कहना हो, कह लो।"

श्लोक 28 (yuddha.87.28)

अद्येह व्यसनं प्राप्तं यन्मां परुषमुक्तवान्। प्रवेष्टुं न त्वया शक्यं न्यग्रोधं राक्षसाधम ॥ 87.28 ॥

adyeha vyasanaṃ prāptaṃ yanmāṃ paruṣamuktavān| praveṣṭuṃ na tvayā śakyaṃ nyagrodhaṃ rākṣasādhama || 87.28 ||

"हे राक्षसाधम! आज तुमने मुझसे कठोर वचन कहकर यहीं संकट मोल ले लिया है, अब तुम उस वटवृक्ष तक पहुँच ही नहीं सकोगे।"

श्लोक 29 (yuddha.87.29)

धर्षयित्वा च काकुत्स्थं न शक्यं जीवितुं त्वया। युध्यस्व नरदेवेन लक्ष्मणेन रणे सह। हतस्त्वं देवताकार्यं करिष्यसि यमक्षयम् ॥ 87.29 ॥

dharṣayitvā ca kākutsthaṃ na śakyaṃ jīvituṃ tvayā| yudhyasva naradevena lakṣmaṇena raṇe saha| hatastvaṃ devatākāryaṃ kariṣyasi yamakṣayam || 87.29 ||

"काकुत्स्थ-कुल के इस वीर पर आक्रमण करने के बाद तुम जीवित नहीं रह सकते। मनुष्यों में देवता के समान इस लक्ष्मण से रणभूमि में युद्ध करो, मारे जाने पर तुम यमलोक में जाकर देवताओं का कार्य सिद्ध करोगे।"

श्लोक 30 (yuddha.87.30)

निदर्शयस्वात्मबलं समुद्यतं कुरुष्व सर्वायुधसायकव्ययम्। न लक्ष्मणस्यैत्य हि बाणगोचरं त्वमद्य जीवन् सबलो गमिष्यसि ॥ 87.30 ॥

nidarśayasvātmabalaṃ samudyataṃ kuruṣva sarvāyudhasāyakavyayam| na lakṣmaṇasyaitya hi bāṇagocaraṃ tvamadya jīvan sabalo gamiṣyasi || 87.30 ||

"अपनी सम्पूर्ण शक्ति प्रदर्शित करो, अपने सभी शस्त्र और बाण चला डालो। क्योंकि लक्ष्मण के बाणों की मार में आकर तुम आज अपनी सेना सहित जीवित नहीं लौट सकोगे।"

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