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युद्धकाण्ड · सर्ग 88

लक्ष्मण-इन्द्रजित् का महाधनुर्युद्ध

सर्ग 87सर्ग-सूचीसर्ग 89

श्लोक 1 (yuddha.88.1)

विभीषणवचः श्रुत्वा रावणिः क्रोधमूर्च्छितः। अब्रवीत् परुषं वाक्यं क्रोधेनाभ्युत्पपात च ॥ 88.1 ॥

vibhīṣaṇavacaḥ śrutvā rāvaṇiḥ krodhamūrcchitaḥ| abravīt paruṣaṃ vākyaṃ krodhenābhyutpapāta ca || 88.1 ||

विभीषण के वचन सुनकर क्रोध से उन्मत्त इन्द्रजित् ने कठोर वचन कहे और क्रोधवश उछल पड़ा।

श्लोक 2 (yuddha.88.2)

उद्यतायुधनिस्त्रिंशो रथे सुसमलंकृते। कालाश्वयुक्ते महति स्थितः कालान्तकोपमः ॥ 88.2 ॥

udyatāyudhanistriṃśo rathe susamalaṃkṛte| kālāśvayukte mahati sthitaḥ kālāntakopamaḥ || 88.2 ||

अपने सुसज्जित विशाल रथ पर, जो काले घोड़ों से जुता हुआ था, खड्ग और शस्त्र उठाए हुए वह प्रलयकाल के यम के समान खड़ा था,

श्लोक 3 (yuddha.88.3)

महाप्रमाणमुद्यम्य विपुलं वेगवद् दृढम्। धनुर्भीमबलो भीमं शरांश्चामित्रनाशनान् ॥ 88.3 ॥

mahāpramāṇamudyamya vipulaṃ vegavad dṛḍham| dhanurbhīmabalo bhīmaṃ śarāṃścāmitranāśanān || 88.3 ||

और महाबली इन्द्रजित् ने अपना विशाल, भयंकर, वेगवान् और दृढ़ धनुष तथा शत्रुनाशक भयानक बाणों को उठाया।

श्लोक 4 (yuddha.88.4)

तं ददर्श महेष्वासो रथस्थः समलंकृतः। अलंकृतममित्रघ्नो रावणस्यात्मजो बली ॥ 88.4 ॥

taṃ dadarśa maheṣvāso rathasthaḥ samalaṃkṛtaḥ| alaṃkṛtamamitraghno rāvaṇasyātmajo balī || 88.4 ||

उस विशाल धनुर्धारी, अपने अलंकृत रथ पर बैठे बलवान रावणपुत्र और शत्रुहन्ता इन्द्रजित् ने अलंकृत लक्ष्मण को देखा।

श्लोक 5 (yuddha.88.5)

हनूमत्पृष्ठमारूढमुदयस्थरविप्रभम्। उवाचैनं सुसंरब्धः सौमित्रिं सविभीषणम् ॥ 88.5 ॥

hanūmatpṛṣṭhamārūḍhamudayastharaviprabham| uvācainaṃ susaṃrabdhaḥ saumitriṃ savibhīṣaṇam || 88.5 ||

उदयाचल पर उगते सूर्य के समान तेजस्वी और हनुमान की पीठ पर आरूढ़ लक्ष्मण से तथा उनके साथ खड़े विभीषण से क्रोधित होकर उसने कहा:

श्लोक 6 (yuddha.88.6)

तांश्च वानरशार्दूलान् पश्यध्वं मे पराक्रमम्। अद्य मत्कार्मुकोत्सृष्टं शरवर्षं दुरासदम् ॥ 88.6 ॥

tāṃśca vānaraśārdūlān paśyadhvaṃ me parākramam| adya matkārmukotsṛṣṭaṃ śaravarṣaṃ durāsadam || 88.6 ||

"तुम और वे वानरश्रेष्ठ, मेरा पराक्रम देखो! आज मेरे धनुष से छूटी हुई असह्य बाण-वृष्टि को तुम सहन करोगे।"

श्लोक 7 (yuddha.88.7)

मुक्तवर्षमिवाकाशे धारयिष्यथ संयुगे। अद्य वो मामका बाणा महाकार्मुकनिःसृताः। विधमिष्यन्ति गात्राणि तूलराशिमिवानलः ॥ 88.7 ॥

muktavarṣamivākāśe dhārayiṣyatha saṃyuge| adya vo māmakā bāṇā mahākārmukaniḥsṛtāḥ| vidhamiṣyanti gātrāṇi tūlarāśimivānalaḥ || 88.7 ||

"इस युद्ध में तुम उसे वैसे ही सहोगे जैसे आकाश से बरसती वर्षा को सहा जाता है। आज मेरे विशाल धनुष से छूटे बाण तुम्हारे शरीरों को वैसे ही भस्म कर देंगे, जैसे अग्नि रुई के ढेर को जला देती है।"

श्लोक 8 (yuddha.88.8)

तीक्ष्णसायकनिर्भिन्नान् शूलशक्त्यृष्टितोमरैः। अद्य वो गमयिष्यामि सर्वानेव यमक्षयम् ॥ 88.8 ॥

tīkṣṇasāyakanirbhinnān śūlaśaktyṛṣṭitomaraiḥ| adya vo gamayiṣyāmi sarvāneva yamakṣayam || 88.8 ||

"आज मैं अपने तीक्ष्ण बाणों तथा शूल, शक्ति, ऋष्टि और तोमरों से बींधकर तुम सबको यमलोक भेज दूँगा।"

श्लोक 9 (yuddha.88.9)

सृजतः शरवर्षाणि क्षिप्रहस्तस्य संयुगे। जीमूतस्येव नदतः कः स्थास्यति ममाग्रतः ॥ 88.9 ॥

sṛjataḥ śaravarṣāṇi kṣiprahastasya saṃyuge| jīmūtasyeva nadataḥ kaḥ sthāsyati mamāgrataḥ || 88.9 ||

"जब मैं युद्ध में शीघ्रगामी हाथों से बाणों की वर्षा करूँगा और मेघ के समान गरजूँगा, तब मेरे सामने कौन ठहर सकेगा?"

श्लोक 10 (yuddha.88.10)

रात्रियुद्धे तदा पूर्वं वज्राशनिसमैः शरैः। शायितौ तौ मया भूयो विसंज्ञौ सपुरःसरौ ॥ 88.10 ॥

rātriyuddhe tadā pūrvaṃ vajrāśanisamaiḥ śaraiḥ| śāyitau tau mayā bhūyo visaṃjñau sapuraḥsarau || 88.10 ||

"पहले उस रात्रि-युद्ध में वज्र के समान मेरे बाणों से तुम दोनों अपने प्रमुख अनुचरों सहित मूर्च्छित होकर धराशायी हो गए थे।"

श्लोक 11 (yuddha.88.11)

स्मृतिर्न तेऽस्ति वा मन्ये व्यक्तं यातो यमक्षयम्। आशीविषसमं क्रुद्धं यन्मां योद्धुमुपस्थितः ॥ 88.11 ॥

smṛtirna te'sti vā manye vyaktaṃ yāto yamakṣayam| āśīviṣasamaṃ kruddhaṃ yanmāṃ yoddhumupasthitaḥ || 88.11 ||

"या तो तुम्हें उसकी स्मृति नहीं है, या मुझे लगता है कि तुम स्पष्ट रूप से यमलोक जाने का निश्चय कर चुके हो, क्योंकि विषैले सर्प के समान क्रुद्ध मुझसे युद्ध करने तुम आ खड़े हुए हो।"

श्लोक 12 (yuddha.88.12)

तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्य गर्जितं राघवस्तदा। अभीतवदनः क्रुद्धो रावणिं वाक्यमब्रवीत् ॥ 88.12 ॥

tacchrutvā rākṣasendrasya garjitaṃ rāghavastadā| abhītavadanaḥ kruddho rāvaṇiṃ vākyamabravīt || 88.12 ||

इन्द्रजित् की उस गर्जना को सुनकर लक्ष्मण ने निर्भय मुख से क्रुद्ध होकर उससे यह वचन कहा।

श्लोक 13 (yuddha.88.13)

उक्तश्च दुर्गमः पारः कार्याणां राक्षस त्वया। कार्याणां कर्मणा पारं यो गच्छति स बुद्धिमान् ॥ 88.13 ॥

uktaśca durgamaḥ pāraḥ kāryāṇāṃ rākṣasa tvayā| kāryāṇāṃ karmaṇā pāraṃ yo gacchati sa buddhimān || 88.13 ||

"हे राक्षस! तुमने कठिन कार्यों की सिद्धि की बात कही है। किन्तु बुद्धिमान् तो वही है जो अपने कर्म से कार्यों को अन्त तक पहुँचाता है।"

श्लोक 14 (yuddha.88.14)

स त्वमर्थस्य हीनार्थो दुरवापस्य केनचित्। वाचा व्याहृत्य जानीषे कृतार्थोऽस्मीति दुर्मते ॥ 88.14 ॥

sa tvamarthasya hīnārtho duravāpasya kenacit| vācā vyāhṛtya jānīṣe kṛtārtho'smīti durmate || 88.14 ||

"हे दुर्बुद्धि! जिस लक्ष्य को पाना किसी के लिए भी कठिन है, उसे प्राप्त करने की सामर्थ्य से रहित होकर भी तुम केवल वचन बोलकर अपने को कृतार्थ मान बैठे हो।"

श्लोक 15 (yuddha.88.15)

अन्तर्धानगतेनाजौ यत्त्वया चरितस्तदा। तस्कराचरितो मार्गो नैष वीरनिषेवितः ॥ 88.15 ॥

antardhānagatenājau yattvayā caritastadā| taskarācarito mārgo naiṣa vīraniṣevitaḥ || 88.15 ||

"उस दिन युद्ध में अदृश्य होकर तुमने जो मार्ग अपनाया था, वह चोरों का मार्ग है, वीरों का मार्ग नहीं।"

श्लोक 16 (yuddha.88.16)

यथा बाणपथं प्राप्य स्थितोऽस्मि तव राक्षस। दर्शयस्वाद्य तत्तेजो वाचा त्वं किं विकत्थसे ॥ 88.16 ॥

yathā bāṇapathaṃ prāpya sthito'smi tava rākṣasa| darśayasvādya tattejo vācā tvaṃ kiṃ vikatthase || 88.16 ||

"हे राक्षस! देखो, अब मैं तुम्हारे बाणों की मार में आकर खड़ा हूँ। आज वह पराक्रम दिखाओ, वाणी से डींग क्यों मारते हो?"

श्लोक 17 (yuddha.88.17)

एवमुक्तो धनुर्भीमं परामृश्य महाबलः। ससर्ज निशितान् बाणानिन्द्रजित् समितिंजयः ॥ 88.17 ॥

evamukto dhanurbhīmaṃ parāmṛśya mahābalaḥ| sasarja niśitān bāṇānindrajit samitiṃjayaḥ || 88.17 ||

इस प्रकार कहे जाने पर युद्ध में सदा विजयी रहने वाले महाबली इन्द्रजित् ने अपना भयंकर धनुष उठाकर तीक्ष्ण बाण छोड़े।

श्लोक 18 (yuddha.88.18)

तेन सृष्टा महावेगाः शराः सर्पविषोपमाः। सम्प्राप्य लक्ष्मणं पेतुः श्वसन्त इव पन्नगाः ॥ 88.18 ॥

tena sṛṣṭā mahāvegāḥ śarāḥ sarpaviṣopamāḥ| samprāpya lakṣmaṇaṃ petuḥ śvasanta iva pannagāḥ || 88.18 ||

उसके द्वारा छोड़े गए वे अत्यंत वेगवान और सर्प के विष के समान घातक बाण लक्ष्मण तक पहुँचकर फुफकारते हुए सर्पों के समान गिरे।

श्लोक 19 (yuddha.88.19)

शरैरतिमहावेगैर्वेगवान् रावणात्मजः। सौमित्रिमिन्द्रजिद् युद्धे विव्याध शुभलक्षणम् ॥ 88.19 ॥

śarairatimahāvegairvegavān rāvaṇātmajaḥ| saumitrimindrajid yuddhe vivyādha śubhalakṣaṇam || 88.19 ||

अत्यंत वेगवान बाणों से वेगशाली रावणपुत्र इन्द्रजित् ने युद्ध में शुभ लक्षणों वाले लक्ष्मण को बींध डाला।

श्लोक 20 (yuddha.88.20)

स शरैरतिविद्धाङ्गो रुधिरेण समुक्षितः। शुशुभे लक्ष्मणः श्रीमान् विधूम इव पावकः ॥ 88.20 ॥

sa śarairatividdhāṅgo rudhireṇa samukṣitaḥ| śuśubhe lakṣmaṇaḥ śrīmān vidhūma iva pāvakaḥ || 88.20 ||

बाणों से बुरी तरह बिंधे हुए और रक्त से नहाए शरीर वाले श्रीमान् लक्ष्मण धूमरहित अग्नि के समान शोभायमान हो रहे थे।

श्लोक 21 (yuddha.88.21)

इन्द्रजित् त्वात्मनः कर्म प्रसमीक्ष्याभिगम्य च। विनद्य सुमहानादमिदं वचनमब्रवीत् ॥ 88.21 ॥

indrajit tvātmanaḥ karma prasamīkṣyābhigamya ca| vinadya sumahānādamidaṃ vacanamabravīt || 88.21 ||

इन्द्रजित् अपने इस कार्य को देखकर और समीप आकर, महान गर्जना करते हुए यह वचन बोला:

श्लोक 22 (yuddha.88.22)

पत्रिणः शितधारास्ते शरा मत्कार्मुकच्युताः। आदास्यन्तेऽद्य सौमित्रे जीवितं जीवितान्तकाः ॥ 88.22 ॥

patriṇaḥ śitadhārāste śarā matkārmukacyutāḥ| ādāsyante'dya saumitre jīvitaṃ jīvitāntakāḥ || 88.22 ||

"हे सौमित्रे! मेरे धनुष से छूटे ये पंखयुक्त, तीक्ष्ण-धार वाले और प्राणान्तकारी बाण अब तुम्हारे प्राण हर लेंगे।"

श्लोक 23 (yuddha.88.23)

अद्य गोमायुसङ्घाश्च श्येनसङ्घाश्च लक्ष्मण। गृध्राश्च निपतन्तु त्वां गतासुं निहतं मया ॥ 88.23 ॥

adya gomāyusaṅghāśca śyenasaṅghāśca lakṣmaṇa| gṛdhrāśca nipatantu tvāṃ gatāsuṃ nihataṃ mayā || 88.23 ||

"हे लक्ष्मण! आज मेरे हाथों मारे जाने पर तुम्हारे निष्प्राण शरीर पर सियारों के झुंड, बाजों के झुंड और गिद्ध टूट पड़ें।"

श्लोक 24 (yuddha.88.24)

क्षत्रबन्धुं सदानार्यं रामः परमदुर्मतिः। भक्तं भ्रातरमद्यैव त्वां द्रक्ष्यति हतं मया ॥ 88.24 ॥

kṣatrabandhuṃ sadānāryaṃ rāmaḥ paramadurmatiḥ| bhaktaṃ bhrātaramadyaiva tvāṃ drakṣyati hataṃ mayā || 88.24 ||

"वह परम मूर्ख राम आज ही अपने उस भक्त भाई को, जो नाममात्र का क्षत्रिय और सदा नीच है, मेरे हाथों मारा हुआ देखेगा।"

श्लोक 25 (yuddha.88.25)

विस्रस्तकवचं भूमौ व्यपविद्धशरासनम्। हृतोत्तमाङ्गं सौमित्रे त्वामद्य निहतं मया ॥ 88.25 ॥

visrastakavacaṃ bhūmau vyapaviddhaśarāsanam| hṛtottamāṅgaṃ saumitre tvāmadya nihataṃ mayā || 88.25 ||

"हे सौमित्रे! आज मेरे हाथों मारे जाने पर तुम्हारा कवच भूमि पर बिखरा होगा, धनुष दूर फेंका होगा, और तुम्हारा सिर कटा होगा,"

श्लोक 26 (yuddha.88.26)

इति ब्रुवाणं संक्रुद्धः परुषं रावणात्मजम्। हेतुमद् वाक्यमर्थज्ञो लक्ष्मणः प्रत्युवाच ह ॥ 88.26 ॥

iti bruvāṇaṃ saṃkruddhaḥ paruṣaṃ rāvaṇātmajam| hetumad vākyamarthajño lakṣmaṇaḥ pratyuvāca ha || 88.26 ||

इस प्रकार कठोर वचन बोलते हुए क्रुद्ध रावणपुत्र को, अर्थ के मर्मज्ञ लक्ष्मण ने युक्तिपूर्ण वचनों से यह उत्तर दिया:

श्लोक 27 (yuddha.88.27)

वाग्बलं त्यज दुर्बुद्धे क्रूरकर्मन् हि राक्षस। अथ कस्माद् वदस्येतत् सम्पादय सुकर्मणा ॥ 88.27 ॥

vāgbalaṃ tyaja durbuddhe krūrakarman hi rākṣasa| atha kasmād vadasyetat sampādaya sukarmaṇā || 88.27 ||

"हे दुर्बुद्धि क्रूरकर्मा राक्षस! वाणी के इस बल को त्याग दो। फिर यह सब क्यों कह रहे हो? इसे अच्छे कर्म से सिद्ध करके दिखाओ।"

श्लोक 28 (yuddha.88.28)

अकृत्वा कत्थसे कर्म किमर्थमिह राक्षस। कुरु तत् कर्म येनाहं श्रद्धेयं तव कत्थनम् ॥ 88.28 ॥

akṛtvā katthase karma kimarthamiha rākṣasa| kuru tat karma yenāhaṃ śraddheyaṃ tava katthanam || 88.28 ||

"हे राक्षस! बिना कर्म किए यहाँ डींग क्यों मारते हो? वह कर्म करके दिखाओ, जिससे मुझे तुम्हारी डींग पर विश्वास हो।"

श्लोक 29 (yuddha.88.29)

अनुक्त्वा परुषं वाक्यं किंचिदप्यनवक्षिपन्। अविकत्थन् वधिष्यामि त्वां पश्य पुरुषादन ॥ 88.29 ॥

anuktvā paruṣaṃ vākyaṃ kiṃcidapyanavakṣipan| avikatthan vadhiṣyāmi tvāṃ paśya puruṣādana || 88.29 ||

"हे नरभक्षक! न कोई कठोर वचन कहकर, न कोई निन्दा करके, न कोई डींग मारकर, देखो, मैं तुम्हारा वध कर दूँगा।"

श्लोक 30 (yuddha.88.30)

इत्युक्त्वा पञ्च नाराचानाकर्णापूरितान् शरान्। विजघान महावेगाल्लक्ष्मणो राक्षसोरसि ॥ 88.30 ॥

ityuktvā pañca nārācānākarṇāpūritān śarān| vijaghāna mahāvegāllakṣmaṇo rākṣasorasi || 88.30 ||

ऐसा कहकर लक्ष्मण ने कान तक खींचे हुए पाँच नाराच बाण अत्यंत वेग से उस राक्षस की छाती में घुसा दिए।

श्लोक 31 (yuddha.88.31)

सुपत्रवाजिता बाणा ज्वलिता इव पन्नगाः। नैर्ऋतोरस्यभासन्त सवितू रश्मयो यथा ॥ 88.31 ॥

supatravājitā bāṇā jvalitā iva pannagāḥ| nairṛtorasyabhāsanta savitū raśmayo yathā || 88.31 ||

सुन्दर पंखों वाले वे बाण जलते हुए सर्पों के समान उस राक्षस की छाती पर सूर्य की किरणों की भाँति चमक रहे थे।

श्लोक 32 (yuddha.88.32)

स शरैराहतस्तेन सरोषो रावणात्मजः। सुप्रयुक्तैस्त्रिभिर्बाणैः प्रतिविव्याध लक्ष्मणम् ॥ 88.32 ॥

sa śarairāhatastena saroṣo rāvaṇātmajaḥ| suprayuktaistribhirbāṇaiḥ prativivyādha lakṣmaṇam || 88.32 ||

उन बाणों से आहत क्रुद्ध रावणपुत्र ने प्रत्युत्तर में तीन सुनियोजित बाणों से लक्ष्मण को बींध दिया।

श्लोक 33 (yuddha.88.33)

स बभूव महाभीमो नरराक्षससिंहयोः। विमर्दस्तुमुलो युद्धे परस्परजयैषिणोः ॥ 88.33 ॥

sa babhūva mahābhīmo nararākṣasasiṃhayoḥ| vimardastumulo yuddhe parasparajayaiṣiṇoḥ || 88.33 ||

उन दोनों नरसिंह और राक्षससिंह के बीच, जो एक-दूसरे पर विजय पाना चाहते थे, वह युद्ध अत्यंत भीषण और घमासान हो उठा।

श्लोक 34 (yuddha.88.34)

विक्रान्तौ बलसम्पन्नावुभौ विक्रमशालिनौ। उभौ परमदुर्जेयावतुल्यबलतेजसौ ॥ 88.34 ॥

vikrāntau balasampannāvubhau vikramaśālinau| ubhau paramadurjeyāvatulyabalatejasau || 88.34 ||

दोनों ही पराक्रमी थे, दोनों बलसम्पन्न थे, दोनों पराक्रम से सुशोभित थे; दोनों ही अत्यंत दुर्जेय और अतुलनीय बल-तेज वाले थे।

श्लोक 35 (yuddha.88.35)

युयुधाते तदा वीरौ ग्रहाविव नभोगतौ। बलवृत्राविव हि तौ युधि वै दुष्प्रधर्षणौ ॥ 88.35 ॥

yuyudhāte tadā vīrau grahāviva nabhogatau| balavṛtrāviva hi tau yudhi vai duṣpradharṣaṇau || 88.35 ||

युद्ध में दुर्धर्ष वे दोनों वीर उस समय आकाश में विचरते दो ग्रहों के समान, तथा इन्द्र और वृत्रासुर के समान युद्ध कर रहे थे।

श्लोक 36 (yuddha.88.36)

युयुधाते महात्मानौ तदा केसरिणाविव। बहूनवसृजन्तौ हि मार्गणौघानवस्थितौ। नरराक्षसमुख्यौ तौ प्रहृष्टावभ्ययुध्यताम् ॥ 88.36 ॥

yuyudhāte mahātmānau tadā kesariṇāviva| bahūnavasṛjantau hi mārgaṇaughānavasthitau| nararākṣasamukhyau tau prahṛṣṭāvabhyayudhyatām || 88.36 ||

वे दोनों महात्मा उस समय दो सिंहों के समान युद्ध कर रहे थे, अनेक बाणों की झड़ी लगाते हुए डटे हुए थे; वे नर-श्रेष्ठ और राक्षस-श्रेष्ठ हर्षित होकर युद्ध करते रहे।

श्लोक 37 (yuddha.88.37)

ततः शरान् दाशरथिः संधायामित्रकर्षणः। ससर्ज राक्षसेन्द्राय क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ॥ 88.37 ॥

tataḥ śarān dāśarathiḥ saṃdhāyāmitrakarṣaṇaḥ| sasarja rākṣasendrāya kruddhaḥ sarpa iva śvasan || 88.37 ||

तब शत्रुओं को पीड़ा देने वाले लक्ष्मण ने धनुष पर बाण चढ़ाकर, क्रुद्ध सर्प के समान फुफकारते हुए, राक्षसराज इन्द्रजित् पर उन्हें छोड़ दिया।

श्लोक 38 (yuddha.88.38)

तस्य ज्यातलनिर्घोषं स श्रुत्वा राक्षसाधिपः। विवर्णवदनो भूत्वा लक्ष्मणं समुदैक्षत ॥ 88.38 ॥

tasya jyātalanirghoṣaṃ sa śrutvā rākṣasādhipaḥ| vivarṇavadano bhūtvā lakṣmaṇaṃ samudaikṣata || 88.38 ||

लक्ष्मण की प्रत्यंचा और हथेली की उस गर्जना को सुनकर राक्षसराज इन्द्रजित् का मुख फीका पड़ गया और वह लक्ष्मण को देखता रह गया।

श्लोक 39 (yuddha.88.39)

विवर्णवदनं दृष्ट्वा राक्षसं रावणात्मजम्। सौमित्रिं युद्धसंयुक्तं प्रत्युवाच विभीषणः ॥ 88.39 ॥

vivarṇavadanaṃ dṛṣṭvā rākṣasaṃ rāvaṇātmajam| saumitriṃ yuddhasaṃyuktaṃ pratyuvāca vibhīṣaṇaḥ || 88.39 ||

रावणपुत्र इन्द्रजित् के मुख को फीका पड़ा देखकर विभीषण ने युद्धरत लक्ष्मण से कहा:

श्लोक 40 (yuddha.88.40)

निमित्तान्युपपश्यामि यान्यस्मिन् रावणात्मजे। त्वर तेन महाबाहो भग्न एष न संशयः ॥ 88.40 ॥

nimittānyupapaśyāmi yānyasmin rāvaṇātmaje| tvara tena mahābāho bhagna eṣa na saṃśayaḥ || 88.40 ||

"हे महाबाहो! इन्द्रजित् में जो लक्षण मुझे दिखाई दे रहे हैं, उनसे स्पष्ट है कि यह टूट चुका है, इसमें कोई सन्देह नहीं। शीघ्रता करो।"

श्लोक 41 (yuddha.88.41)

ततः संधाय सौमित्रिः शरानाशीविषोपमान्। मुमोच विशिखांस्तस्मिन् सर्पानिव विषोल्बणान् ॥ 88.41 ॥

tataḥ saṃdhāya saumitriḥ śarānāśīviṣopamān| mumoca viśikhāṃstasmin sarpāniva viṣolbaṇān || 88.41 ||

तब लक्ष्मण ने विषैले सर्पों के समान बाणों को धनुष पर चढ़ाकर, विष से भरे सर्पों के समान उन तीक्ष्ण बाणों को उस पर छोड़ दिया।

श्लोक 42 (yuddha.88.42)

शक्राशनिसमस्पर्शैर्लक्ष्मणेनाहतः शरैः। मुहूर्तमभवन्मूढः सर्वसंक्षुभितेन्द्रियः ॥ 88.42 ॥

śakrāśanisamasparśairlakṣmaṇenāhataḥ śaraiḥ| muhūrtamabhavanmūḍhaḥ sarvasaṃkṣubhitendriyaḥ || 88.42 ||

इन्द्र के वज्र के समान स्पर्श वाले उन बाणों से आहत होकर इन्द्रजित् की सभी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो गईं और वह क्षणभर के लिए मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 43 (yuddha.88.43)

उपलभ्य मुहूर्तेन संज्ञां प्रत्यागतेन्द्रियः। ददर्शावस्थितं वीरमाजौ दशरथात्मजम्। सोऽभिचक्राम सौमित्रिं रोषात् संरक्तलोचनः ॥ 88.43 ॥

upalabhya muhūrtena saṃjñāṃ pratyāgatendriyaḥ| dadarśāvasthitaṃ vīramājau daśarathātmajam| so'bhicakrāma saumitriṃ roṣāt saṃraktalocanaḥ || 88.43 ||

क्षणभर में चेतना और इन्द्रियाँ पुनः प्राप्त कर उसने युद्धभूमि में डटे हुए वीर दशरथपुत्र लक्ष्मण को देखा; और क्रोध से लाल नेत्र किए वह लक्ष्मण की ओर बढ़ा।

श्लोक 44 (yuddha.88.44)

अब्रवीच्चैनमासाद्य पुनः स परुषं वचः। किं न स्मरसि तद् युद्धे प्रथमे मत्पराक्रमम्। निबद्धस्त्वं सह भ्रात्रा यदा युधि विचेष्टसे ॥ 88.44 ॥

abravīccainamāsādya punaḥ sa paruṣaṃ vacaḥ| kiṃ na smarasi tad yuddhe prathame matparākramam| nibaddhastvaṃ saha bhrātrā yadā yudhi viceṣṭase || 88.44 ||

समीप पहुँचकर उसने फिर कठोर वचन कहे, "क्या तुम्हें उस पहले युद्ध में दिखाया गया मेरा पराक्रम याद नहीं, जब तुम अपने भाई सहित बँधकर रणभूमि में तड़प रहे थे?"

श्लोक 45 (yuddha.88.45)

युवां खलु महायुद्धे वज्राशनिसमैः शरैः। शायितौ प्रथमं भूमौ विसंज्ञौ सपुरःसरौ ॥ 88.45 ॥

yuvāṃ khalu mahāyuddhe vajrāśanisamaiḥ śaraiḥ| śāyitau prathamaṃ bhūmau visaṃjñau sapuraḥsarau || 88.45 ||

"उस महायुद्ध में तुम दोनों अपने प्रमुख अनुचरों सहित इन्द्र के वज्र के समान मेरे बाणों से पहले ही मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े थे।"

श्लोक 46 (yuddha.88.46)

स्मृतिर्वा नास्ति ते मन्ये व्यक्तं वा यमसादनम्। गन्तुमिच्छसि यन्मां त्वमाधर्षयितुमिच्छसि ॥ 88.46 ॥

smṛtirvā nāsti te manye vyaktaṃ vā yamasādanam| gantumicchasi yanmāṃ tvamādharṣayitumicchasi || 88.46 ||

"मुझे लगता है, या तो तुम्हें उसकी स्मृति नहीं है, या फिर तुम स्पष्ट रूप से यमलोक जाना चाहते हो, तभी मुझ पर आक्रमण करने की इच्छा रखते हो।"

श्लोक 47 (yuddha.88.47)

यदि ते प्रथमे युद्धे न दृष्टो मत्पराक्रमः। अद्य त्वां दर्शयिष्यामि तिष्ठेदानीं व्यवस्थितः ॥ 88.47 ॥

yadi te prathame yuddhe na dṛṣṭo matparākramaḥ| adya tvāṃ darśayiṣyāmi tiṣṭhedānīṃ vyavasthitaḥ || 88.47 ||

"यदि पहले युद्ध में तुमने मेरा पराक्रम नहीं देखा था, तो आज मैं तुम्हें दिखा दूँगा, अभी दृढ़तापूर्वक खड़े रहो।"

श्लोक 48 (yuddha.88.48)

इत्युक्त्वा सप्तभिर्बाणैरभिविव्याध लक्ष्मणम्। दशभिस्तु हनूमन्तं तीक्ष्णधारैः शरोत्तमैः ॥ 88.48 ॥

ityuktvā saptabhirbāṇairabhivivyādha lakṣmaṇam| daśabhistu hanūmantaṃ tīkṣṇadhāraiḥ śarottamaiḥ || 88.48 ||

ऐसा कहकर उसने सात बाणों से लक्ष्मण को और तीक्ष्ण धार वाले दस उत्तम बाणों से हनुमान को बींध दिया।

श्लोक 49 (yuddha.88.49)

ततः शरशतेनैव सुप्रयुक्तेन वीर्यवान्। क्रोधाद् द्विगुणसंरब्धो निर्बिभेद विभीषणम् ॥ 88.49 ॥

tataḥ śaraśatenaiva suprayuktena vīryavān| krodhād dviguṇasaṃrabdho nirbibheda vibhīṣaṇam || 88.49 ||

तब उस पराक्रमी इन्द्रजित् ने दुगुने क्रोध से भरकर सौ सुनियोजित बाणों से विभीषण को बींध डाला।

श्लोक 50 (yuddha.88.50)

तद् दृष्ट्वेन्द्रजिता कर्म कृतं रामानुजस्तदा। अचिन्तयित्वा प्रहसन्नैतत् किंचिदिति ब्रुवन् ॥ 88.50 ॥

tad dṛṣṭvendrajitā karma kṛtaṃ rāmānujastadā| acintayitvā prahasannaitat kiṃciditi bruvan || 88.50 ||

इन्द्रजित् के इस कार्य को देखकर रामानुज लक्ष्मण ने उसकी कोई परवाह न करते हुए हँसकर कहा, "यह कुछ भी नहीं है,"

श्लोक 51 (yuddha.88.51)

मुमोच च शरान् घोरान् संगृह्य नरपुंगवः। अभीतवदनः क्रुद्धो रावणिं लक्ष्मणो युधि ॥ 88.51 ॥

mumoca ca śarān ghorān saṃgṛhya narapuṃgavaḥ| abhītavadanaḥ kruddho rāvaṇiṃ lakṣmaṇo yudhi || 88.51 ||

और नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ने निर्भय मुख से किन्तु क्रोध से भरकर भयंकर बाण उठाए और युद्ध में उन्हें इन्द्रजित् पर छोड़ दिया।

श्लोक 52 (yuddha.88.52)

नैवं रणगताः शूराः प्रहरन्ति निशाचर। लघवश्चाल्पवीर्याश्च शरा हीमे सुखास्तव ॥ 88.52 ॥

naivaṃ raṇagatāḥ śūrāḥ praharanti niśācara| laghavaścālpavīryāśca śarā hīme sukhāstava || 88.52 ||

"हे निशाचर! युद्ध में जाने वाले शूरवीर इस प्रकार प्रहार नहीं करते। तुम्हारे ये बाण हल्के, अल्पशक्ति वाले और वस्तुतः सुखद ही हैं।"

श्लोक 53 (yuddha.88.53)

नैवं शूरास्तु युध्यन्ते समरे युद्धकाङ्क्षिणः। इत्येवं तं ब्रुवन् धन्वी शरैरभिववर्ष ह ॥ 88.53 ॥

naivaṃ śūrāstu yudhyante samare yuddhakāṅkṣiṇaḥ| ityevaṃ taṃ bruvan dhanvī śarairabhivavarṣa ha || 88.53 ||

"जो शूरवीर युद्ध में विजय की कामना करते हैं, वे इस प्रकार युद्ध नहीं करते।" ऐसा कहकर धनुर्धर लक्ष्मण ने उस पर बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 54 (yuddha.88.54)

तस्य बाणैः सुविध्वस्तं कवचं काञ्चनं महत्। व्यशीर्यत रथोपस्थे ताराजालमिवाम्बरात् ॥ 88.54 ॥

tasya bāṇaiḥ suvidhvastaṃ kavacaṃ kāñcanaṃ mahat| vyaśīryata rathopasthe tārājālamivāmbarāt || 88.54 ||

उसके उन बाणों से चूर-चूर होकर वह विशाल स्वर्ण-कवच रथ के भीतर ऐसे बिखर गया, मानो आकाश से तारों का जाल गिर पड़ा हो।

श्लोक 55 (yuddha.88.55)

विधूतवर्मा नाराचैर्बभूव स कृतव्रणः। इन्द्रजित् समरे वीरः प्रत्यूषे भानुमानिव ॥ 88.55 ॥

vidhūtavarmā nārācairbabhūva sa kṛtavraṇaḥ| indrajit samare vīraḥ pratyūṣe bhānumāniva || 88.55 ||

उन नाराच बाणों से कवच उधड़ा हुआ और शरीर घायल हुआ वीर इन्द्रजित् युद्ध में प्रातःकालीन सूर्य के समान शोभित हो रहा था।

श्लोक 56 (yuddha.88.56)

ततः शरसहस्रेण संक्रुद्धो रावणात्मजः। बिभेद समरे वीरो लक्ष्मणं भीमविक्रमः ॥ 88.56 ॥

tataḥ śarasahasreṇa saṃkruddho rāvaṇātmajaḥ| bibheda samare vīro lakṣmaṇaṃ bhīmavikramaḥ || 88.56 ||

तब भीषण पराक्रमी वीर रावणपुत्र इन्द्रजित् ने अत्यंत क्रुद्ध होकर युद्ध में हजार बाणों से लक्ष्मण को बींध डाला।

श्लोक 57 (yuddha.88.57)

व्यशीर्यत महद्दिव्यं कवचं लक्ष्मणस्य तु। कृतप्रतिकृतान्योन्यं बभूवतुररिंदमौ ॥ 88.57 ॥

vyaśīryata mahaddivyaṃ kavacaṃ lakṣmaṇasya tu| kṛtapratikṛtānyonyaṃ babhūvaturariṃdamau || 88.57 ||

लक्ष्मण का वह महान दिव्य कवच भी टूट गया; और शत्रुओं का दमन करने वाले वे दोनों वीर एक-दूसरे पर प्रहार-प्रतिप्रहार करने लगे।

श्लोक 58 (yuddha.88.58)

अभीक्ष्णं निःश्वसन्तौ तौ युध्येतां तुमुलं युधि। शरसंकृत्तसर्वाङ्गौ सर्वतो रुधिरोक्षितौ ॥ 88.58 ॥

abhīkṣṇaṃ niḥśvasantau tau yudhyetāṃ tumulaṃ yudhi| śarasaṃkṛttasarvāṅgau sarvato rudhirokṣitau || 88.58 ||

बार-बार लम्बी साँसें लेते हुए, बाणों से पूरी तरह छिन्न-भिन्न अंगों वाले और सब ओर से रक्त से नहाए हुए वे दोनों घोर युद्ध करते रहे।

श्लोक 59 (yuddha.88.59)

सुदीर्घकालं तौ वीरावन्योन्यं निशितैः शरैः। ततक्षतुर्महात्मानौ रणकर्मविशारदौ। बभूवतुश्चात्मजये यत्तौ भीमपराक्रमौ ॥ 88.59 ॥

sudīrghakālaṃ tau vīrāvanyonyaṃ niśitaiḥ śaraiḥ| tatakṣaturmahātmānau raṇakarmaviśāradau| babhūvatuścātmajaye yattau bhīmaparākramau || 88.59 ||

अत्यंत दीर्घ काल तक युद्ध-कर्म में निपुण वे दोनों महात्मा वीर तीक्ष्ण बाणों से एक-दूसरे को क्षत-विक्षत करते रहे; वे भीषण पराक्रमी वीर अपनी-अपनी विजय के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहे।

श्लोक 60 (yuddha.88.60)

तौ शरौघैस्तथाकीर्णौ निकृत्तकवचध्वजौ। सृजन्तौ रुधिरं चोष्णं जलं प्रस्रवणाविव ॥ 88.60 ॥

tau śaraughaistathākīrṇau nikṛttakavacadhvajau| sṛjantau rudhiraṃ coṣṇaṃ jalaṃ prasravaṇāviva || 88.60 ||

बाणों की राशि से इस प्रकार आच्छादित, कवच और ध्वजा कटी हुई, वे दोनों वैसे ही गरम रक्त बहा रहे थे, जैसे दो झरने उष्ण जल बहाते हैं।

श्लोक 61 (yuddha.88.61)

शरवर्षं ततो घोरं मुञ्चतोर्भीमनिःस्वनम्। सासारयोरिवाकाशे नीलयोः कालमेघयोः ॥ 88.61 ॥

śaravarṣaṃ tato ghoraṃ muñcatorbhīmaniḥsvanam| sāsārayorivākāśe nīlayoḥ kālameghayoḥ || 88.61 ||

भयंकर गर्जना के साथ घोर बाण-वर्षा करते हुए वे दोनों आकाश में बरसते हुए दो नीले कालमेघों के समान प्रतीत हो रहे थे।

श्लोक 62 (yuddha.88.62)

तयोरथ महान् कालो व्यतीयाद् युध्यमानयोः। न च तौ युद्धवैमुख्यं क्लमं चाप्युपजग्मतुः ॥ 88.62 ॥

tayoratha mahān kālo vyatīyād yudhyamānayoḥ| na ca tau yuddhavaimukhyaṃ klamaṃ cāpyupajagmatuḥ || 88.62 ||

इस प्रकार युद्ध करते हुए उन दोनों का बहुत समय बीत गया; फिर भी न तो उन्होंने युद्ध से मुख मोड़ा और न ही थकान का अनुभव किया।

श्लोक 63 (yuddha.88.63)

अस्त्राण्यस्त्रविदां श्रेष्ठौ दर्शयन्तौ पुनः पुनः। शरानुच्चावचाकारानन्तरिक्षे बबन्धतुः ॥ 88.63 ॥

astrāṇyastravidāṃ śreṣṭhau darśayantau punaḥ punaḥ| śarānuccāvacākārānantarikṣe babandhatuḥ || 88.63 ||

अस्त्रविद्या में निपुण उन दोनों श्रेष्ठ योद्धाओं ने बार-बार अपने अस्त्र दिखाते हुए आकाश में छोटे-बड़े आकार के बाणों का जाल-सा बुन दिया।

श्लोक 64 (yuddha.88.64)

व्यपेतदोषमस्यन्तौ लघु चित्रं च सुष्ठु च। उभौ तु तुमुलं घोरं चक्रतुर्नरराक्षसौ ॥ 88.64 ॥

vyapetadoṣamasyantau laghu citraṃ ca suṣṭhu ca| ubhau tu tumulaṃ ghoraṃ cakraturnararākṣasau || 88.64 ||

दोष-रहित, शीघ्र, अद्भुत और सुन्दर ढंग से बाण चलाते हुए वह नर और वह राक्षस दोनों घोर और भीषण युद्ध करने लगे।

श्लोक 65 (yuddha.88.65)

तयोः पृथक् पृथग् भीमः शुश्रुवे तलनिस्वनः। स कम्पं जनयामास निर्घात इव दारुणः ॥ 88.65 ॥

tayoḥ pṛthak pṛthag bhīmaḥ śuśruve talanisvanaḥ| sa kampaṃ janayāmāsa nirghāta iva dāruṇaḥ || 88.65 ||

उन दोनों की भयंकर ताल-ध्वनि बार-बार, एक-एक करके सुनाई पड़ती थी, और वह भीषण वज्रपात के समान सबको कंपा देती थी।

श्लोक 66 (yuddha.88.66)

तयोः स भ्राजते शब्दस्तथा समरमत्तयोः। सुघोरयोर्निष्टनतोर्गगने मेघयोरिव ॥ 88.66 ॥

tayoḥ sa bhrājate śabdastathā samaramattayoḥ| sughorayorniṣṭanatorgagane meghayoriva || 88.66 ||

युद्ध के नशे में डूबे उन दोनों की वह ध्वनि आकाश में गरजते दो भीषण मेघों की गर्जना के समान गूँज रही थी।

श्लोक 67 (yuddha.88.67)

सुवर्णपुंखैर्नाराचैर्बलवन्तौ कृतव्रणौ। प्रसुस्रुवाते रुधिरं कीर्तिमन्तौ जये धृतौ ॥ 88.67 ॥

suvarṇapuṃkhairnārācairbalavantau kṛtavraṇau| prasusruvāte rudhiraṃ kīrtimantau jaye dhṛtau || 88.67 ||

स्वर्ण-पुंखी नाराचों से घायल हुए बलवान और यशस्वी, विजय के लिए दृढ़ संकल्प वे दोनों वीर रक्त बहाने लगे।

श्लोक 68 (yuddha.88.68)

ते गात्रयोर्निपतिता रुक्मपुंखाः शरा युधि। असृग्दिग्धा विनिष्पेतुर्विविशुर्धरणीतलम् ॥ 88.68 ॥

te gātrayornipatitā rukmapuṃkhāḥ śarā yudhi| asṛgdigdhā viniṣpeturviviśurdharaṇītalam || 88.68 ||

उन दोनों के शरीर से गिरकर वे स्वर्ण-पुंखी बाण, रक्त से सने हुए, युद्धभूमि में छूटकर भूमि में धँस जाते थे।

श्लोक 69 (yuddha.88.69)

अन्ये सुनिशितैः शस्त्रैराकाशे संजघट्टिरे। बभञ्जुश्चिच्छिदुश्चैव तयोर्बाणाः सहस्रशः ॥ 88.69 ॥

anye suniśitaiḥ śastrairākāśe saṃjaghaṭṭire| babhañjuścicchiduścaiva tayorbāṇāḥ sahasraśaḥ || 88.69 ||

उन दोनों के हजारों अन्य तीक्ष्ण बाण आकाश में परस्पर टकराते हुए एक-दूसरे को तोड़ते और काटते रहे।

श्लोक 70 (yuddha.88.70)

स बभूव रणो घोरस्तयोर्बाणमयश्चयः। अग्निभ्यामिव दीप्ताभ्यां सत्रे कुशमयश्चयः ॥ 88.70 ॥

sa babhūva raṇo ghorastayorbāṇamayaścayaḥ| agnibhyāmiva dīptābhyāṃ satre kuśamayaścayaḥ || 88.70 ||

उन दोनों के बाणों का वह भयंकर ढेर युद्ध में ऐसा दिखाई देता था, मानो यज्ञ में दो प्रज्वलित अग्नियों के बीच कुशा का ढेर लगा हो।

श्लोक 71 (yuddha.88.71)

तयोः कृतव्रणौ देहौ शुशुभाते महात्मनोः। सुपुष्पाविव निष्पत्रौ वने किंशुकशाल्मली ॥ 88.71 ॥

tayoḥ kṛtavraṇau dehau śuśubhāte mahātmanoḥ| supuṣpāviva niṣpatrau vane kiṃśukaśālmalī || 88.71 ||

उन दोनों महात्माओं के घायल शरीर वन में पत्रहीन किन्तु पूर्ण पुष्पित किंशुक और शाल्मली वृक्षों के समान शोभायमान हो रहे थे।

श्लोक 72 (yuddha.88.72)

चक्रतुस्तुमुलं घोरं संनिपातं मुहुर्मुहुः। इन्द्रजिल्लक्ष्मणश्चैव परस्परजयैषिणौ ॥ 88.72 ॥

cakratustumulaṃ ghoraṃ saṃnipātaṃ muhurmuhuḥ| indrajillakṣmaṇaścaiva parasparajayaiṣiṇau || 88.72 ||

एक-दूसरे पर विजय चाहने वाले इन्द्रजित् और लक्ष्मण बार-बार घोर और भीषण संघर्ष करते रहे।

श्लोक 73 (yuddha.88.73)

लक्ष्मणो रावणिं युद्धे रावणिश्चापि लक्ष्मणम्। अन्योन्यं तावभिघ्नन्तौ न श्रमं प्रतिपद्यताम् ॥ 88.73 ॥

lakṣmaṇo rāvaṇiṃ yuddhe rāvaṇiścāpi lakṣmaṇam| anyonyaṃ tāvabhighnantau na śramaṃ pratipadyatām || 88.73 ||

युद्ध में लक्ष्मण इन्द्रजित् पर और इन्द्रजित् लक्ष्मण पर प्रहार करता रहा; इस प्रकार एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए भी उन्हें थकान का अनुभव नहीं हुआ।

श्लोक 74 (yuddha.88.74)

बाणजालैः शरीरस्थैरवगाढैस्तरस्विनौ। शुशुभाते महावीर्यौ प्ररूढाविव पर्वतौ ॥ 88.74 ॥

bāṇajālaiḥ śarīrasthairavagāḍhaistarasvinau| śuśubhāte mahāvīryau prarūḍhāviva parvatau || 88.74 ||

अपने शरीरों में गहरे धँसे बाणों के जाल के साथ वे दोनों वेगवान और महापराक्रमी वीर वैसे ही शोभायमान हो रहे थे, जैसे वनस्पति से आच्छादित दो पर्वत।

श्लोक 75 (yuddha.88.75)

तयो रुधिरसिक्तानि संवृतानि शरैर्भृशम्। बभ्राजुः सर्वगात्राणि ज्वलन्त इव पावकाः ॥ 88.75 ॥

tayo rudhirasiktāni saṃvṛtāni śarairbhṛśam| babhrājuḥ sarvagātrāṇi jvalanta iva pāvakāḥ || 88.75 ||

रक्त से सिंचित और बाणों से घनी तरह ढके उन दोनों के सभी अंग प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रहे थे।

श्लोक 76 (yuddha.88.76)

तयोरथ महान् कालो व्यतीयाद् युध्यमानयोः। न च तौ युद्धवैमुख्यं श्रमं चाप्यभिजग्मतुः ॥ 88.76 ॥

tayoratha mahān kālo vyatīyād yudhyamānayoḥ| na ca tau yuddhavaimukhyaṃ śramaṃ cāpyabhijagmatuḥ || 88.76 ||

इस प्रकार युद्ध करते हुए उन दोनों का बहुत समय व्यतीत हो गया; फिर भी न वे युद्ध से विमुख हुए और न थकान को प्राप्त हुए।

श्लोक 77 (yuddha.88.77)

अथ समरपरिश्रमं निहन्तुं समरमुखेष्वजितस्य लक्ष्मणस्य। प्रियहितमुपपादयन् महात्मा समरमुपेत्य विभीषणोऽवतस्थे ॥ 88.77 ॥

atha samarapariśramaṃ nihantuṃ samaramukheṣvajitasya lakṣmaṇasya| priyahitamupapādayan mahātmā samaramupetya vibhīṣaṇo'vatasthe || 88.77 ||

तब युद्ध के किसी भी मोर्चे पर कभी पराजित न होने वाले लक्ष्मण की रणश्रान्ति दूर करने के लिए महात्मा विभीषण रणभूमि में आकर खड़े हो गए और उन्हें प्रिय एवं हितकर वचन कहने लगे।

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