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युद्धकाण्ड · सर्ग 89

विभीषण का उत्साहवर्धन और इन्द्रजित् के रथ का विनाश

सर्ग 88सर्ग-सूचीसर्ग 90

श्लोक 1 (yuddha.89.1)

युध्यमानौ ततो दृष्ट्वा प्रसक्तौ नरराक्षसौ। प्रभिन्नाविव मातङ्गौ परस्परजयैषिणौ ॥ 89.1 ॥

yudhyamānau tato dṛṣṭvā prasaktau nararākṣasau| prabhinnāviva mātaṅgau parasparajayaiṣiṇau || 89.1 ||

तब उस नर और राक्षस को, एक-दूसरे पर विजय पाने की इच्छा से, मस्त हाथियों के समान संलग्न होकर युद्ध करते देखकर,

श्लोक 2 (yuddha.89.2)

तयोर्युद्धं द्रष्टुकामो वरचापधरो बली। शूरः स रावणभ्राता तस्थौ संग्राममूर्धनि ॥ 89.2 ॥

tayoryuddhaṃ draṣṭukāmo varacāpadharo balī| śūraḥ sa rāvaṇabhrātā tasthau saṃgrāmamūrdhani || 89.2 ||

वह बलवान और वीर रावण-भ्राता विभीषण उत्तम धनुष धारण किए हुए उनका युद्ध देखने की इच्छा से रणभूमि के अग्रभाग में जा खड़ा हुआ।

श्लोक 3 (yuddha.89.3)

ततो विस्फारयामास महद् धनुरवस्थितः। उत्ससर्ज च तीक्ष्णाग्रान् राक्षसेषु महाशरान् ॥ 89.3 ॥

tato visphārayāmāsa mahad dhanuravasthitaḥ| utsasarja ca tīkṣṇāgrān rākṣaseṣu mahāśarān || 89.3 ||

वहाँ खड़े होकर उसने अपने विशाल धनुष को पूरा खींचा और राक्षसों पर तीक्ष्णाग्र महाबाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 4 (yuddha.89.4)

ते शराः शिखिसंस्पर्शा निपतन्तः समाहिताः। राक्षसान् द्रावयामासुर्वज्राणीव महागिरीन् ॥ 89.4 ॥

te śarāḥ śikhisaṃsparśā nipatantaḥ samāhitāḥ| rākṣasān drāvayāmāsurvajrāṇīva mahāgirīn || 89.4 ||

अग्नि के समान स्पर्श वाले वे बाण ठीक निशाने पर गिरते हुए राक्षसों को वैसे ही विदीर्ण कर रहे थे, जैसे वज्र विशाल पर्वतों को चीर देता है।

श्लोक 5 (yuddha.89.5)

विभीषणस्यानुचरास्तेऽपि शूलासिपट्टिशैः। चिच्छिदुः समरे वीरान् राक्षसान् राक्षसोत्तमाः ॥ 89.5 ॥

vibhīṣaṇasyānucarāste'pi śūlāsipaṭṭiśaiḥ| cicchiduḥ samare vīrān rākṣasān rākṣasottamāḥ || 89.5 ||

विभीषण के अनुचर, वे श्रेष्ठ राक्षस भी युद्ध में शूल, खड्ग और पट्टिश से वीर राक्षसों को छिन्न-भिन्न करने लगे।

श्लोक 6 (yuddha.89.6)

राक्षसैस्तैः परिवृतः स तदा तु विभीषणः। बभौ मध्ये प्रधृष्टानां कलभानामिव द्विपः ॥ 89.6 ॥

rākṣasaistaiḥ parivṛtaḥ sa tadā tu vibhīṣaṇaḥ| babhau madhye pradhṛṣṭānāṃ kalabhānāmiva dvipaḥ || 89.6 ||

उन राक्षसों से घिरे हुए विभीषण उस समय उद्दंड मतवाले हाथी के बच्चों के बीच खड़े किसी वयस्क गजराज के समान शोभित हो रहे थे।

श्लोक 7 (yuddha.89.7)

ततः संचोदमानो वै हरीन् रक्षोवधप्रियान्। उवाच वचनं काले कालज्ञो रक्षसां वरः ॥ 89.7 ॥

tataḥ saṃcodamāno vai harīn rakṣovadhapriyān| uvāca vacanaṃ kāle kālajño rakṣasāṃ varaḥ || 89.7 ||

तब समय के ज्ञाता उन राक्षस-श्रेष्ठ विभीषण ने राक्षस-वध में रुचि रखने वाले वानरों को प्रेरित करते हुए उपयुक्त अवसर पर यह वचन कहा।

श्लोक 8 (yuddha.89.8)

एकोऽयं राक्षसेन्द्रस्य परायणमवस्थितः। एतच्छेषं बलं तस्य किं तिष्ठत हरीश्वराः ॥ 89.8 ॥

eko'yaṃ rākṣasendrasya parāyaṇamavasthitaḥ| etaccheṣaṃ balaṃ tasya kiṃ tiṣṭhata harīśvarāḥ || 89.8 ||

"हे वानरराजो! रावण का यही अंतिम सहारा यहाँ खड़ा है; उसकी सेना का बस यही शेष बचा है। तुम निष्क्रिय क्यों खड़े हो?"

श्लोक 9 (yuddha.89.9)

अस्मिंश्च निहते पापे राक्षसे रणमूर्धनि। रावणं वर्जयित्वा तु शेषमस्य बलं हतम् ॥ 89.9 ॥

asmiṃśca nihate pāpe rākṣase raṇamūrdhani| rāvaṇaṃ varjayitvā tu śeṣamasya balaṃ hatam || 89.9 ||

"रणभूमि में इस पापी राक्षस के मारे जाते ही रावण को छोड़कर उसकी शेष सारी सेना नष्ट हुई ही समझो।"

श्लोक 10 (yuddha.89.10)

प्रहस्तो निहतो वीरो निकुम्भश्च महाबलः। कुम्भकर्णश्च कुम्भश्च धूम्राक्षश्च निशाचरः ॥ 89.10 ॥

prahasto nihato vīro nikumbhaśca mahābalaḥ| kumbhakarṇaśca kumbhaśca dhūmrākṣaśca niśācaraḥ || 89.10 ||

"वीर प्रहस्त मारा जा चुका है, महाबली निकुम्भ, कुम्भकर्ण, कुम्भ और राक्षस धूम्राक्ष भी मारे जा चुके हैं,"

श्लोक 11 (yuddha.89.11)

जम्बुमाली महामाली तीक्ष्णवेगोऽशनिप्रभः। सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च वज्रदंष्ट्रश्च राक्षसः ॥ 89.11 ॥

jambumālī mahāmālī tīkṣṇavego'śaniprabhaḥ| suptaghno yajñakopaśca vajradaṃṣṭraśca rākṣasaḥ || 89.11 ||

"जम्बुमाली, महामाली, अत्यंत वेगवान अशनिप्रभ, सुप्तघ्न, यज्ञकोप और राक्षस वज्रदंष्ट्र,"

श्लोक 12 (yuddha.89.12)

संह्रादी विकटोऽरिघ्नस्तपनो मन्द एव च। प्रघासः प्रघसश्चैव प्रजङ्घो जङ्घ एव च ॥ 89.12 ॥

saṃhrādī vikaṭo'righnastapano manda eva ca| praghāsaḥ praghasaścaiva prajaṅgho jaṅgha eva ca || 89.12 ||

"संह्रादी, शत्रुनाशक विकट, तपन और मन्द, प्रघास और प्रघस, प्रजंघ और जंघ,"

श्लोक 13 (yuddha.89.13)

अग्निकेतुश्च दुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च वीर्यवान्। विद्युज्जिह्वो द्विजिह्वश्च सूर्यशत्रुश्च राक्षसः ॥ 89.13 ॥

agniketuśca durdharṣo raśmiketuśca vīryavān| vidyujjihvo dvijihvaśca sūryaśatruśca rākṣasaḥ || 89.13 ||

"दुर्धर्ष अग्निकेतु, पराक्रमी रश्मिकेतु, विद्युज्जिह्व, द्विजिह्व और राक्षस सूर्यशत्रु,"

श्लोक 14 (yuddha.89.14)

अकम्पनः सुपार्श्वश्च चक्रमाली च राक्षसः। कम्पनः सत्त्ववन्तौ तौ देवान्तकनरान्तकौ ॥ 89.14 ॥

akampanaḥ supārśvaśca cakramālī ca rākṣasaḥ| kampanaḥ sattvavantau tau devāntakanarāntakau || 89.14 ||

"अकम्पन, सुपार्श्व, राक्षस चक्रमाली, कम्पन और वे दोनों बलशाली देवान्तक और नरान्तक, ये सब मारे जा चुके हैं।"

श्लोक 15 (yuddha.89.15)

एतान् निहत्यातिबलान् बहून् राक्षससत्तमान्। बाहुभ्यां सागरं तीर्त्वा लङ्घ्यतां गोष्पदं लघु ॥ 89.15 ॥

etān nihatyātibalān bahūn rākṣasasattamān| bāhubhyāṃ sāgaraṃ tīrtvā laṅ‍ghyatāṃ goṣpadaṃ laghu || 89.15 ||

"इन अनेक अत्यंत बलशाली और श्रेष्ठ राक्षसों का वध करके तथा भुजाओं से समुद्र तक पार करके, अब इस छोटे से गोखुर को पार करना क्या कठिन है।"

श्लोक 16 (yuddha.89.16)

एतावदेव शेषं वो जेतव्यमिति वानराः। हताः सर्वे समागम्य राक्षसा बलदर्पिताः ॥ 89.16 ॥

etāvadeva śeṣaṃ vo jetavyamiti vānarāḥ| hatāḥ sarve samāgamya rākṣasā baladarpitāḥ || 89.16 ||

"हे वानरो! तुम्हारे लिए बस इतना ही शेष रह गया है; बल के अभिमानी शेष सभी राक्षस, जो यहाँ एकत्र हुए थे, मारे जा चुके हैं।"

श्लोक 17 (yuddha.89.17)

अयुक्तं निधनं कर्तुं पुत्रस्य जनितुर्मम। घृणामपास्य रामार्थे निहन्यां भ्रातुरात्मजम् ॥ 89.17 ॥

ayuktaṃ nidhanaṃ kartuṃ putrasya janiturmama| ghṛṇāmapāsya rāmārthe nihanyāṃ bhrāturātmajam || 89.17 ||

"पिता के समान होकर भी अपने भतीजे का वध करना मेरे लिए उचित नहीं है; फिर भी राम के लिए स्नेह त्यागकर मैं अपने भाई के पुत्र का वध कर डालूँ।"

श्लोक 18 (yuddha.89.18)

हन्तुकामस्य मे बाष्पं चक्षुश्चैव निरुध्यति। तमेवैष महाबाहुर्लक्ष्मणः शमयिष्यति ॥ 89.18 ॥

hantukāmasya me bāṣpaṃ cakṣuścaiva nirudhyati| tamevaiṣa mahābāhurlakṣmaṇaḥ śamayiṣyati || 89.18 ||

"उसे मारने की इच्छा करते हुए भी मेरी आँखें आँसुओं से भर आती हैं और रुक जाती हैं। इसे तो यह महाबाहु लक्ष्मण ही समाप्त करेगा।"

श्लोक 19 (yuddha.89.19)

वानरा घ्नत सम्भूय भृत्यानस्य समीपगान्। इति तेनातियशसा राक्षसेनाभिचोदिताः ॥ 89.19 ॥

vānarā ghnata sambhūya bhṛtyānasya samīpagān| iti tenātiyaśasā rākṣasenābhicoditāḥ || 89.19 ||

"हे वानरो! तुम सब मिलकर इसके निकट खड़े उसके सेवकों का वध करो।" उस परम यशस्वी राक्षस विभीषण के इस प्रकार प्रेरित करने पर,

श्लोक 20 (yuddha.89.20)

वानरेन्द्रा जहृषिरे लाङ्गूलानि च विव्यधुः। ततस्तु कपिशार्दूलाः क्ष्वेडन्तश्च पुनः पुनः। मुमुचुर्विविधान् नादान् मेघान् दृष्ट्वेव बर्हिणः ॥ 89.20 ॥

vānarendrā jahṛṣire lāṅgūlāni ca vivyadhuḥ| tatastu kapiśārdūlāḥ kṣveḍantaśca punaḥ punaḥ| mumucurvividhān nādān meghān dṛṣṭveva barhiṇaḥ || 89.20 ||

वानरराज हर्षित हो उठे और अपनी पूँछें फटकारने लगे; तत्पश्चात वे वानरश्रेष्ठ बार-बार गरजते हुए ऐसे विविध स्वरों में बोल उठे, मानो मेघों को देखकर मयूर बोल रहे हों।

श्लोक 21 (yuddha.89.21)

जाम्बवानपि तैः सर्वैः स्वयूथ्यैरभिसंवृतः। तेऽश्मभिस्ताडयामासुर्नखैर्दन्तैश्च राक्षसान् ॥ 89.21 ॥

jāmbavānapi taiḥ sarvaiḥ svayūthyairabhisaṃvṛtaḥ| te'śmabhistāḍayāmāsurnakhairdantaiśca rākṣasān || 89.21 ||

जाम्बवान भी अपने सभी साथियों से घिरे हुए, राक्षसों पर पत्थरों, नखों और दाँतों से प्रहार करने लगे।

श्लोक 22 (yuddha.89.22)

निघ्नन्तमृक्षाधिपतिं राक्षसास्ते महाबलाः। परिवव्रुर्भयं त्यक्त्वा तमनेकविधायुधाः ॥ 89.22 ॥

nighnantamṛkṣādhipatiṃ rākṣasāste mahābalāḥ| parivavrurbhayaṃ tyaktvā tamanekavidhāyudhāḥ || 89.22 ||

अपना भय त्यागकर अनेक प्रकार के शस्त्र धारण किए उन बलशाली राक्षसों ने संहार करते हुए भालुओं के स्वामी जाम्बवान को घेर लिया।

श्लोक 23 (yuddha.89.23)

शरैः परशुभिस्तीक्ष्णैः पट्टिशैर्यष्टितोमरैः। जाम्बवन्तं मृधे जघ्नुर्निघ्नन्तं राक्षसीं चमूम् ॥ 89.23 ॥

śaraiḥ paraśubhistīkṣṇaiḥ paṭṭiśairyaṣṭitomaraiḥ| jāmbavantaṃ mṛdhe jaghnurnighnantaṃ rākṣasīṃ camūm || 89.23 ||

बाणों, तीक्ष्ण फरसों, पट्टिशों, यष्टियों और तोमरों से उन्होंने राक्षस-सेना का संहार करते हुए जाम्बवान पर युद्ध में प्रहार किया।

श्लोक 24 (yuddha.89.24)

स सम्प्रहारस्तुमुलः संजज्ञे कपिरक्षसाम्। देवासुराणां क्रुद्धानां यथा भीमो महास्वनः ॥ 89.24 ॥

sa samprahārastumulaḥ saṃjajñe kapirakṣasām| devāsurāṇāṃ kruddhānāṃ yathā bhīmo mahāsvanaḥ || 89.24 ||

वानरों और राक्षसों के बीच वह घमासान संग्राम अत्यंत भीषण गर्जना के साथ ऐसे हो रहा था, मानो क्रुद्ध देवों और असुरों का युद्ध हो।

श्लोक 25 (yuddha.89.25)

हनूमानपि संक्रुद्धः सालमुत्पाट्य पर्वतात्। स लक्ष्मणं स्वयं पृष्ठादवरोप्य महामनाः ॥ 89.25 ॥

hanūmānapi saṃkruddhaḥ sālamutpāṭya parvatāt| sa lakṣmaṇaṃ svayaṃ pṛṣṭhādavaropya mahāmanāḥ || 89.25 ||

क्रोध से भरे महामना हनुमान ने भी लक्ष्मण को अपनी पीठ से धीरे से उतारकर, पर्वत से एक साल वृक्ष उखाड़ लिया,

श्लोक 26 (yuddha.89.26)

रक्षसां कदनं चक्रे दुरासादः सहस्रशः। स दत्त्वा तुमुलं युद्धं पितृव्यस्येन्द्रजिद् बली ॥ 89.26 ॥

rakṣasāṃ kadanaṃ cakre durāsādaḥ sahasraśaḥ| sa dattvā tumulaṃ yuddhaṃ pitṛvyasyendrajid balī || 89.26 ||

और स्वयं हजारों राक्षसों का ऐसा संहार किया कि कोई उनके निकट भी न आ सका। और बलवान इन्द्रजित् अपने चाचा विभीषण से घमासान युद्ध करके पुनः लक्ष्मण की ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 27 (yuddha.89.27)

लक्ष्मणं परवीरघ्नः पुनरेवाभ्यधावत। तौ प्रयुद्धौ तदा वीरौ मृधे लक्ष्मणराक्षसौ ॥ 89.27 ॥

lakṣmaṇaṃ paravīraghnaḥ punarevābhyadhāvata| tau prayuddhau tadā vīrau mṛdhe lakṣmaṇarākṣasau || 89.27 ||

वीर शत्रुओं का संहारक इन्द्रजित् फिर लक्ष्मण की ओर झपटा; और तब वे दोनों वीर, लक्ष्मण और राक्षस इन्द्रजित्, पुनः युद्धभूमि में भिड़ गए।

श्लोक 28 (yuddha.89.28)

शरौघानभिवर्षन्तौ जघ्नतुस्तौ परस्परम्। अभीक्ष्णमन्तर्दधतुः शरजालैर्महाबलौ ॥ 89.28 ॥

śaraughānabhivarṣantau jaghnatustau parasparam| abhīkṣṇamantardadhatuḥ śarajālairmahābalau || 89.28 ||

बाणों की झड़ी लगाते हुए वे दोनों एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे; वे दोनों महाबली बाणों के जाल से बार-बार एक-दूसरे को ढक देते थे,

श्लोक 29 (yuddha.89.29)

चन्द्रादित्याविवोष्णान्ते यथा मेघैस्तरस्विनौ। नह्यादानं न संधानं धनुषो वा परिग्रहः ॥ 89.29 ॥

candrādityāvivoṣṇānte yathā meghaistarasvinau| nahyādānaṃ na saṃdhānaṃ dhanuṣo vā parigrahaḥ || 89.29 ||

जैसे ग्रीष्म ऋतु के अंत में सूर्य और चन्द्रमा बादलों से ढक जाते हैं। उनके हाथों की फुर्ती ऐसी थी कि न तो धनुष का पकड़ना,

श्लोक 30 (yuddha.89.30)

न विप्रमोक्षो बाणानां न विकर्षो न विग्रहः। न मुष्टिप्रतिसंधानं न लक्ष्यप्रतिपादनम् ॥ 89.30 ॥

na vipramokṣo bāṇānāṃ na vikarṣo na vigrahaḥ| na muṣṭipratisaṃdhānaṃ na lakṣyapratipādanam || 89.30 ||

न बाणों का निकालना, न प्रत्यंचा पर चढ़ाना, न छोड़ना, न खींचना, न मुट्ठी जमाना और न लक्ष्य साधना ही दिखाई पड़ता था,

श्लोक 31 (yuddha.89.31)

अदृश्यत तयोस्तत्र युध्यतोः पाणिलाघवात्। चापवेगप्रयुक्तैश्च बाणजालैः समन्ततः ॥ 89.31 ॥

adṛśyata tayostatra yudhyatoḥ pāṇilāghavāt| cāpavegaprayuktaiśca bāṇajālaiḥ samantataḥ || 89.31 ||

इतनी शीघ्रता से उनके हाथ चल रहे थे; और उनके धनुषों के वेग से छूटे बाणों के जाल से चारों ओर आकाश आच्छादित हो गया।

श्लोक 32 (yuddha.89.32)

अन्तरिक्षेऽभिसम्पन्ने न रूपाणि चकाशिरे। लक्ष्मणो रावणिं प्राप्य रावणिश्चापि लक्ष्मणम् ॥ 89.32 ॥

antarikṣe'bhisampanne na rūpāṇi cakāśire| lakṣmaṇo rāvaṇiṃ prāpya rāvaṇiścāpi lakṣmaṇam || 89.32 ||

इस प्रकार आच्छादित आकाश में कोई भी वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती थी। लक्ष्मण इन्द्रजित् पर और इन्द्रजित् भी लक्ष्मण पर टूट पड़ा,

श्लोक 33 (yuddha.89.33)

अव्यवस्था भवत्युग्रा ताभ्यामन्योन्यविग्रहे। ताभ्यामुभाभ्यां तरसा प्रसृष्टैर्विशिखैः शितैः ॥ 89.33 ॥

avyavasthā bhavatyugrā tābhyāmanyonyavigrahe| tābhyāmubhābhyāṃ tarasā prasṛṣṭairviśikhaiḥ śitaiḥ || 89.33 ||

उन दोनों के परस्पर संघर्ष में यह जान पाना घोर कठिन हो गया कि कौन विजयी होगा। उन दोनों के द्वारा वेगपूर्वक छोड़े गए तीक्ष्ण बाणों से,

श्लोक 34 (yuddha.89.34)

निरन्तरमिवाकाशं बभूव तमसा वृतम्। तैः पतद्भिश्च बहुभिस्तयोः शरशतैः शितैः ॥ 89.34 ॥

nirantaramivākāśaṃ babhūva tamasā vṛtam| taiḥ patadbhiśca bahubhistayoḥ śaraśataiḥ śitaiḥ || 89.34 ||

आकाश मानो निरंतर अन्धकार से ढक गया। और उनके सैकड़ों तीक्ष्ण बाणों के समूहों के गिरने से,

श्लोक 35 (yuddha.89.35)

दिशश्च प्रदिशश्चैव बभूवुः शरसंकुलाः। तमसा पिहितं सर्वमासीत् प्रतिभयं महत् ॥ 89.35 ॥

diśaśca pradiśaścaiva babhūvuḥ śarasaṃkulāḥ| tamasā pihitaṃ sarvamāsīt pratibhayaṃ mahat || 89.35 ||

दिशाएँ और उपदिशाएँ बाणों से भर गईं। सब कुछ अन्धकार से ढक गया और चारों ओर महान भय व्याप्त हो गया।

श्लोक 36 (yuddha.89.36)

अस्तं गते सहस्रांशौ संवृते तमसा च वै। रुधिरौघा महानद्यः प्रावर्तन्त सहस्रशः ॥ 89.36 ॥

astaṃ gate sahasrāṃśau saṃvṛte tamasā ca vai| rudhiraughā mahānadyaḥ prāvartanta sahasraśaḥ || 89.36 ||

मानो सहस्र-रश्मि सूर्य अस्त हो गया हो और चारों ओर अन्धकार छा गया हो, इस प्रकार रक्त की सहस्रों महानदियाँ बह चलीं।

श्लोक 37 (yuddha.89.37)

क्रव्यादा दारुणा वाग्भिश्चिक्षिपुर्भीमनिःस्वनान्। न तदानीं ववौ वायुर्न च जज्वाल पावकः ॥ 89.37 ॥

kravyādā dāruṇā vāgbhiścikṣipurbhīmaniḥsvanān| na tadānīṃ vavau vāyurna ca jajvāla pāvakaḥ || 89.37 ||

भयंकर मांसभक्षी प्राणी घोर, भीषण चीत्कार करने लगे; उस समय न तो वायु बही और न ही अग्नि प्रज्वलित हुई।

श्लोक 38 (yuddha.89.38)

स्वस्त्यस्तु लोकेभ्य इति जजल्पुस्ते महर्षयः। सम्पेतुश्चात्र संतप्ता गन्धर्वाः सह चारणैः ॥ 89.38 ॥

svastyastu lokebhya iti jajalpuste maharṣayaḥ| sampetuścātra saṃtaptā gandharvāḥ saha cāraṇaiḥ || 89.38 ||

महर्षियों ने कहा, "सम्पूर्ण लोकों का कल्याण हो!" और व्यथित गंधर्व चारणों के साथ वहाँ एकत्रित हो गए।

श्लोक 39 (yuddha.89.39)

अथ राक्षससिंहस्य कृष्णान् कनकभूषणान्। शरैश्चतुर्भिः सौमित्रिर्विव्याध चतुरो हयान् ॥ 89.39 ॥

atha rākṣasasiṃhasya kṛṣṇān kanakabhūṣaṇān| śaraiścaturbhiḥ saumitrirvivyādha caturo hayān || 89.39 ||

तब लक्ष्मण ने चार बाणों से उस राक्षस-सिंह इन्द्रजित् के स्वर्ण-आभूषणों से सुसज्जित चारों काले घोड़ों को बींध दिया।

श्लोक 40 (yuddha.89.40)

ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च। सम्पूर्णायतमुक्तेन सुपत्रेण सुवर्चसा ॥ 89.40 ॥

tato'pareṇa bhallena pītena niśitena ca| sampūrṇāyatamuktena supatreṇa suvarcasā || 89.40 ||

तब एक और भल्ल बाण से, जो पीतवर्ण और तीक्ष्ण था, पूरा खींचकर छोड़ा गया, सुन्दर पंखों वाला और अत्यंत तेजस्वी था,

श्लोक 41 (yuddha.89.41)

महेन्द्राशनिकल्पेन सूतस्य विचरिष्यतः। स तेन बाणाशनिना तलशब्दानुनादिना ॥ 89.41 ॥

mahendrāśanikalpena sūtasya vicariṣyataḥ| sa tena bāṇāśaninā talaśabdānunādinā || 89.41 ||

इन्द्र के वज्र के समान और हथेली की ताल-ध्वनि से गूँजता हुआ, उस फुर्तीले हाथ वाले श्रीमान् लक्ष्मण ने

श्लोक 42 (yuddha.89.42)

लाघवाद् राघवः श्रीमान् शिरः कायादपाहरत्। स यन्तरि महातेजा हते मन्दोदरीसुतः ॥ 89.42 ॥

lāghavād rāghavaḥ śrīmān śiraḥ kāyādapāharat| sa yantari mahātejā hate mandodarīsutaḥ || 89.42 ||

घूमते हुए सारथि का सिर धड़ से अलग कर दिया। सारथि के मारे जाने पर महातेजस्वी मन्दोदरी-पुत्र इन्द्रजित् ने

श्लोक 43 (yuddha.89.43)

स्वयं सारथ्यमकरोत् पुनश्च धनुरस्पृशत्। तदद्भुतमभूत् तत्र सारथ्यं पश्यतां युधि ॥ 89.43 ॥

svayaṃ sārathyamakarot punaśca dhanuraspṛśat| tadadbhutamabhūt tatra sārathyaṃ paśyatāṃ yudhi || 89.43 ||

स्वयं सारथी का कार्य सम्भाला और साथ ही अपना धनुष भी नहीं छोड़ा, युद्ध में यह देखने वालों के लिए अद्भुत दृश्य था।

श्लोक 44 (yuddha.89.44)

हयेषु व्यग्रहस्तं तं विव्याध निशितैः शरैः। धनुष्यथ पुनर्व्यग्रं हयेषु मुमुचे शरान् ॥ 89.44 ॥

hayeṣu vyagrahastaṃ taṃ vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ| dhanuṣyatha punarvyagraṃ hayeṣu mumuce śarān || 89.44 ||

जब उसके हाथ घोड़ों में व्यस्त होते, तब लक्ष्मण उसे तीक्ष्ण बाणों से बींध देते; और जब वह पुनः धनुष में व्यस्त होता, तब लक्ष्मण घोड़ों पर बाण छोड़ देते।

श्लोक 45 (yuddha.89.45)

छिद्रेषु तेषु बाणौघैर्विचरन्तमभीतवत्। अर्दयामास समरे सौमित्रिः शीघ्रकृत्तमः ॥ 89.45 ॥

chidreṣu teṣu bāṇaughairvicarantamabhītavat| ardayāmāsa samare saumitriḥ śīghrakṛttamaḥ || 89.45 ||

उन-उन अवसरों पर अत्यंत फुर्तीले लक्ष्मण उस निर्भय होकर विचरते इन्द्रजित् को बाणों की झड़ी से पीड़ित करते रहे।

श्लोक 46 (yuddha.89.46)

निहतं सारथिं दृष्ट्वा समरे रावणात्मजः। प्रजहौ समरोद्धर्षं विषण्णः स बभूव ह ॥ 89.46 ॥

nihataṃ sārathiṃ dṛṣṭvā samare rāvaṇātmajaḥ| prajahau samaroddharṣaṃ viṣaṇṇaḥ sa babhūva ha || 89.46 ||

युद्ध में अपने सारथि को मारा गया देखकर रावणपुत्र इन्द्रजित् का युद्धोत्साह जाता रहा और वह विषाद में डूब गया।

श्लोक 47 (yuddha.89.47)

विषण्णवदनं दृष्ट्वा राक्षसं हरियूथपाः। ततः परमसंहृष्टा लक्ष्मणं चाभ्यपूजयन् ॥ 89.47 ॥

viṣaṇṇavadanaṃ dṛṣṭvā rākṣasaṃ hariyūthapāḥ| tataḥ paramasaṃhṛṣṭā lakṣmaṇaṃ cābhyapūjayan || 89.47 ||

उस राक्षस के मुख को उदास देखकर वानरराज अत्यंत प्रसन्न हो उठे और लक्ष्मण की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 48 (yuddha.89.48)

ततः प्रमाथी रभसः शरभो गन्धमादनः। अमृष्यमाणाश्चत्वारश्चक्रुर्वेगं हरीश्वराः ॥ 89.48 ॥

tataḥ pramāthī rabhasaḥ śarabho gandhamādanaḥ| amṛṣyamāṇāścatvāraścakrurvegaṃ harīśvarāḥ || 89.48 ||

तब प्रमाथी, रभस, शरभ और गन्धमादन, ये चार वानरराज अपने को रोक न पाकर वेगपूर्वक आगे बढ़े।

श्लोक 49 (yuddha.89.49)

ते चास्य हयमुख्येषु तूर्णमुत्पत्य वानराः। चतुर्षु सुमहावीर्या निपेतुर्भीमविक्रमाः ॥ 89.49 ॥

te cāsya hayamukhyeṣu tūrṇamutpatya vānarāḥ| caturṣu sumahāvīryā nipeturbhīmavikramāḥ || 89.49 ||

अत्यंत पराक्रमी और भीमविक्रमी वे चारों वानर शीघ्रता से कूदकर उसके चारों उत्तम घोड़ों पर जा गिरे।

श्लोक 50 (yuddha.89.50)

तेषामधिष्ठितानां तैर्वानरैः पर्वतोपमैः। मुखेभ्यो रुधिरं व्यक्तं हयानां समवर्तत ॥ 89.50 ॥

teṣāmadhiṣṭhitānāṃ tairvānaraiḥ parvatopamaiḥ| mukhebhyo rudhiraṃ vyaktaṃ hayānāṃ samavartata || 89.50 ||

पर्वत के समान विशालकाय उन वानरों के भार तले दबे हुए उन घोड़ों के मुँह से स्पष्ट रूप से रक्त बहने लगा।

श्लोक 51 (yuddha.89.51)

ते हया मथिता भग्ना व्यसवो धरणीं गताः। ते निहत्य हयांस्तस्य प्रमथ्य च महारथम्। पुनरुत्पत्य वेगेन तस्थुर्लक्ष्मणपार्श्वतः ॥ 89.51 ॥

te hayā mathitā bhagnā vyasavo dharaṇīṃ gatāḥ| te nihatya hayāṃstasya pramathya ca mahāratham| punarutpatya vegena tasthurlakṣmaṇapārśvataḥ || 89.51 ||

वे घोड़े कुचले और टूटे हुए प्राणहीन होकर भूमि पर गिर पड़े; उसके घोड़ों को मारकर और उसके विशाल रथ को चूर-चूर करके वे वानर वेगपूर्वक कूदकर पुनः लक्ष्मण के पास आ खड़े हुए।

श्लोक 52 (yuddha.89.52)

स हताश्वादवप्लुत्य रथान्मथितसारथिः। शरवर्षेण सौमित्रिमभ्यधावत रावणिः ॥ 89.52 ॥

sa hatāśvādavaplutya rathānmathitasārathiḥ| śaravarṣeṇa saumitrimabhyadhāvata rāvaṇiḥ || 89.52 ||

तब अपना सारथि कुचला हुआ और घोड़े मरे हुए पाकर इन्द्रजित् रथ से कूद पड़ा और बाणों की वर्षा करता हुआ लक्ष्मण की ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 53 (yuddha.89.53)

ततो महेन्द्रप्रतिमः स लक्ष्मणः पदातिनं तं निहतैर्हयोत्तमैः। सृजन्तमाजौ निशितान् शरोत्तमान् भृशं तदा बाणगणैर्व्यदारयत् ॥ 89.53 ॥

tato mahendrapratimaḥ sa lakṣmaṇaḥ padātinaṃ taṃ nihatairhayottamaiḥ| sṛjantamājau niśitān śarottamān bhṛśaṃ tadā bāṇagaṇairvyadārayat || 89.53 ||

तब इन्द्र के समान तेजस्वी लक्ष्मण ने, उत्तम घोड़ों के मारे जाने से पैदल हुए और युद्ध में तीक्ष्ण उत्तम बाण छोड़ते हुए उस इन्द्रजित् को, बाणों के समूहों से अत्यंत क्षत-विक्षत कर डाला।

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