युद्धकाण्ड · सर्ग 90
इन्द्रजित् का वध
श्लोक 1 (yuddha.90.1)
स हताश्वो महातेजा भूमौ तिष्ठन् निशाचरः। इन्द्रजित् परमक्रुद्धः सम्प्रजज्वाल तेजसा ॥ 90.1 ॥
sa hatāśvo mahātejā bhūmau tiṣṭhan niśācaraḥ| indrajit paramakruddhaḥ samprajajvāla tejasā || 90.1 ||
अपने घोड़ों के मारे जाने पर भूमि पर खड़ा वह महातेजस्वी निशाचर इन्द्रजित् अत्यंत क्रुद्ध होकर तेज से प्रज्वलित हो उठा।
श्लोक 2 (yuddha.90.2)
तौ धन्विनौ जिघांसन्तावन्योन्यमिषुभिर्भृशम्। विजयेनाभिनिष्क्रान्तौ वने गजवृषाविव ॥ 90.2 ॥
tau dhanvinau jighāṃsantāvanyonyamiṣubhirbhṛśam| vijayenābhiniṣkrāntau vane gajavṛṣāviva || 90.2 ||
धनुर्धारी वे दोनों वीर एक-दूसरे को बाणों से मार डालने की तीव्र इच्छा से, विजय के लिए निकले हुए दो श्रेष्ठ हाथियों के समान वन में विचरण कर रहे थे।
श्लोक 3 (yuddha.90.3)
निबर्हयन्तश्चान्योन्यं ते राक्षसवनौकसः। भर्तारं न जहुर्युद्धे सम्पतन्तस्ततस्ततः ॥ 90.3 ॥
nibarhayantaścānyonyaṃ te rākṣasavanaukasaḥ| bhartāraṃ na jahuryuddhe sampatantastatastataḥ || 90.3 ||
चारों ओर से एक-दूसरे पर टूट पड़ते हुए वे राक्षस और वनवासी वानर एक-दूसरे का संहार करते रहे, फिर भी युद्ध में किसी ने अपने स्वामी का साथ नहीं छोड़ा।
श्लोक 4 (yuddha.90.4)
ततस्तान् राक्षसान् सर्वान् हर्षयन् रावणात्मजः। स्तुन्वानो हर्षमाणश्च इदं वचनमब्रवीत् ॥ 90.4 ॥
tatastān rākṣasān sarvān harṣayan rāvaṇātmajaḥ| stunvāno harṣamāṇaśca idaṃ vacanamabravīt || 90.4 ||
तब रावणपुत्र इन्द्रजित् उन सभी राक्षसों का उत्साहवर्धन करते हुए, स्वयं भी हर्षित होकर और उनकी प्रशंसा करते हुए यह वचन बोला:
श्लोक 5 (yuddha.90.5)
तमसा बहुलेनेमाः संसक्ताः सर्वतो दिशः। नेह विज्ञायते स्वो वा परो वा राक्षसोत्तमाः ॥ 90.5 ॥
tamasā bahulenemāḥ saṃsaktāḥ sarvato diśaḥ| neha vijñāyate svo vā paro vā rākṣasottamāḥ || 90.5 ||
"हे राक्षसश्रेष्ठो! ये दिशाएँ चारों ओर से घने अन्धकार से आच्छादित हैं; यहाँ यह पहचानना असम्भव है कि कौन अपना है और कौन पराया।"
श्लोक 6 (yuddha.90.6)
धृष्टं भवन्तो युध्यन्तु हरीणां मोहनाय वै। अहं तु रथमास्थाय आगमिष्यामि संयुगे ॥ 90.6 ॥
dhṛṣṭaṃ bhavanto yudhyantu harīṇāṃ mohanāya vai| ahaṃ tu rathamāsthāya āgamiṣyāmi saṃyuge || 90.6 ||
"तुम सब वानरों को भ्रमित करने के लिए साहसपूर्वक युद्ध करते रहो; मैं तो दूसरे रथ पर सवार होकर पुनः इस युद्ध में लौट आऊँगा।"
श्लोक 7 (yuddha.90.7)
तथा भवन्तः कुर्वन्तु यथेमे हि वनौकसः। न युध्येयुर्महात्मानः प्रविष्टे नगरं मयि ॥ 90.7 ॥
tathā bhavantaḥ kurvantu yatheme hi vanaukasaḥ| na yudhyeyurmahātmānaḥ praviṣṭe nagaraṃ mayi || 90.7 ||
"ऐसा उपाय करो कि जब मैं नगर में प्रवेश कर जाऊँ, तब तक ये वनवासी वानर युद्ध न कर सकें।"
श्लोक 8 (yuddha.90.8)
इत्युक्त्वा रावणसुतो वञ्चयित्वा वनौकसः। प्रविवेश पुरीं लङ्कां रथहेतोरमित्रहा ॥ 90.8 ॥
ityuktvā rāvaṇasuto vañcayitvā vanaukasaḥ| praviveśa purīṃ laṅkāṃ rathahetoramitrahā || 90.8 ||
ऐसा कहकर वह शत्रुनाशक रावणपुत्र वनवासी वानरों को छलकर रथ लाने के लिए लंकापुरी में प्रविष्ट हो गया।
श्लोक 9 (yuddha.90.9)
स रथं भूषयित्वाथ रुचिरं हेमभूषितम्। प्रासासिशरसंयुक्तं युक्तं परमवाजिभिः ॥ 90.9 ॥
sa rathaṃ bhūṣayitvātha ruciraṃ hemabhūṣitam| prāsāsiśarasaṃyuktaṃ yuktaṃ paramavājibhiḥ || 90.9 ||
वहाँ उसने स्वर्णभूषित एक सुन्दर रथ तैयार करवाया, जो भाले, तलवार और बाणों से सुसज्जित तथा उत्तम अश्वों से युक्त था,
श्लोक 10 (yuddha.90.10)
अधिष्ठितं हयज्ञेन सूतेनाप्तोपदेशिना। आरुरोह महातेजा रावणिः समितिंजयः ॥ 90.10 ॥
adhiṣṭhitaṃ hayajñena sūtenāptopadeśinā| āruroha mahātejā rāvaṇiḥ samitiṃjayaḥ || 90.10 ||
जिसे घोड़ों का ज्ञाता और विश्वसनीय परामर्श देने वाला सारथी हाँक रहा था; और युद्ध में सदा विजयी होने वाला वह महातेजस्वी इन्द्रजित् उस पर सवार हो गया।
श्लोक 11 (yuddha.90.11)
स राक्षसगणैर्मुख्यैर्वृतो मन्दोदरीसुतः। निर्ययौ नगराद् वीरः कृतान्तबलचोदितः ॥ 90.11 ॥
sa rākṣasagaṇairmukhyairvṛto mandodarīsutaḥ| niryayau nagarād vīraḥ kṛtāntabalacoditaḥ || 90.11 ||
मन्दोदरी-पुत्र वह वीर इन्द्रजित् प्रमुख राक्षसों की सेना से घिरा हुआ, काल की शक्ति से प्रेरित होकर नगर से बाहर निकल पड़ा।
श्लोक 12 (yuddha.90.12)
सोऽभिनिष्क्रम्य नगरादिन्द्रजित् परमौजसा। अभ्ययाज्जवनैरश्वैर्लक्ष्मणं सविभीषणम् ॥ 90.12 ॥
so'bhiniṣkramya nagarādindrajit paramaujasā| abhyayājjavanairaśvairlakṣmaṇaṃ savibhīṣaṇam || 90.12 ||
नगर से निकलकर इन्द्रजित् अपने अत्यंत वेगवान घोड़ों से लक्ष्मण और विभीषण की ओर पूरी शक्ति से बढ़ चला।
श्लोक 13 (yuddha.90.13)
ततो रथस्थमालोक्य सौमित्री रावणात्मजम्। वानराश्च महावीर्या राक्षसश्च विभीषणः ॥ 90.13 ॥
tato rathasthamālokya saumitrī rāvaṇātmajam| vānarāśca mahāvīryā rākṣasaśca vibhīṣaṇaḥ || 90.13 ||
तब रावणपुत्र इन्द्रजित् को पुनः रथ पर बैठे देखकर लक्ष्मण, महापराक्रमी वानर और राक्षस विभीषण,
श्लोक 14 (yuddha.90.14)
विस्मयं परमं जग्मुर्लाघवात् तस्य धीमतः। रावणिश्चापि संक्रुद्धो रणे वानरयूथपान् ॥ 90.14 ॥
vismayaṃ paramaṃ jagmurlāghavāt tasya dhīmataḥ| rāvaṇiścāpi saṃkruddho raṇe vānarayūthapān || 90.14 ||
उस बुद्धिमान इन्द्रजित् की फुर्ती देखकर अत्यंत विस्मित रह गए। और वह क्रुद्ध रावणपुत्र युद्ध में वानरराजों को,
श्लोक 15 (yuddha.90.15)
पातयामास बाणौघैः शतशोऽथ सहस्रशः। स मण्डलीकृतधनू रावणिः समितिंजयः ॥ 90.15 ॥
pātayāmāsa bāṇaughaiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ| sa maṇḍalīkṛtadhanū rāvaṇiḥ samitiṃjayaḥ || 90.15 ||
सैकड़ों और हजारों की संख्या में बाणों के समूहों से गिराने लगा। अपने धनुष को मण्डलाकार बनाकर युद्ध में सदा विजयी वह इन्द्रजित्,
श्लोक 16 (yuddha.90.16)
हरीनभ्यहनत् क्रुद्धः परं लाघवमास्थितः। ते वध्यमाना हरयो नाराचैर्भीमविक्रमाः ॥ 90.16 ॥
harīnabhyahanat kruddhaḥ paraṃ lāghavamāsthitaḥ| te vadhyamānā harayo nārācairbhīmavikramāḥ || 90.16 ||
अत्यंत फुर्ती दिखाते हुए क्रोध से वानरों पर टूट पड़ा। उन नाराच बाणों से मारे जाते हुए भीमपराक्रमी वानर,
श्लोक 17 (yuddha.90.17)
सौमित्रिं शरणं प्राप्ताः प्रजापतिमिव प्रजाः। ततः समरकोपेन ज्वलितो रघुनन्दनः। चिच्छेद कार्मुकं तस्य दर्शयन् पाणिलाघवम् ॥ 90.17 ॥
saumitriṃ śaraṇaṃ prāptāḥ prajāpatimiva prajāḥ| tataḥ samarakopena jvalito raghunandanaḥ| ciccheda kārmukaṃ tasya darśayan pāṇilāghavam || 90.17 ||
प्रजापति की शरण में जाती प्रजा के समान लक्ष्मण की शरण में जा पहुँचे। तब युद्ध के क्रोध से प्रज्वलित लक्ष्मण ने अपने हाथों की फुर्ती दिखाते हुए इन्द्रजित् के धनुष को काट डाला।
श्लोक 18 (yuddha.90.18)
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय सज्यं चक्रे त्वरन्निव। तदप्यस्य त्रिभिर्बाणैर्लक्ष्मणो निरकृन्तत ॥ 90.18 ॥
so'nyatkārmukamādāya sajyaṃ cakre tvaranniva| tadapyasya tribhirbāṇairlakṣmaṇo nirakṛntata || 90.18 ||
उसने शीघ्रता से दूसरा धनुष उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई; परन्तु लक्ष्मण ने उसे भी तीन बाणों से काट डाला।
श्लोक 19 (yuddha.90.19)
अथैनं छिन्नधन्वानमाशीविषविषोपमैः। विव्याधोरसि सौमित्री रावणिं पञ्चभिः शरैः ॥ 90.19 ॥
athainaṃ chinnadhanvānamāśīviṣaviṣopamaiḥ| vivyādhorasi saumitrī rāvaṇiṃ pañcabhiḥ śaraiḥ || 90.19 ||
तब धनुषरहित हुए उस इन्द्रजित् की छाती को लक्ष्मण ने विषैले सर्पों के समान पाँच बाणों से बींध डाला।
श्लोक 20 (yuddha.90.20)
ते तस्य कायं निर्भिद्य महाकार्मुकनिःसृताः। निपेतुर्धरणीं बाणा रक्ता इव महोरगाः ॥ 90.20 ॥
te tasya kāyaṃ nirbhidya mahākārmukaniḥsṛtāḥ| nipeturdharaṇīṃ bāṇā raktā iva mahoragāḥ || 90.20 ||
उस विशाल धनुष से छूटे वे बाण उसके शरीर को भेदते हुए रक्तरंजित महासर्पों के समान भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 21 (yuddha.90.21)
स च्छिन्नधन्वा रुधिरं वमन् वक्त्रेण रावणिः। जग्राह कार्मुकश्रेष्ठं दृढज्यं बलवत्तरम् ॥ 90.21 ॥
sa cchinnadhanvā rudhiraṃ vaman vaktreṇa rāvaṇiḥ| jagrāha kārmukaśreṣṭhaṃ dṛḍhajyaṃ balavattaram || 90.21 ||
धनुषरहित हुआ इन्द्रजित् मुख से रक्त वमन करते हुए एक और उत्तम, दृढ़ प्रत्यंचा वाला और अधिक बलशाली धनुष उठा लाया।
श्लोक 22 (yuddha.90.22)
स लक्ष्मणं समुद्दिश्य परं लाघवमास्थितः। ववर्ष शरवर्षाणि वर्षाणीव पुरंदरः ॥ 90.22 ॥
sa lakṣmaṇaṃ samuddiśya paraṃ lāghavamāsthitaḥ| vavarṣa śaravarṣāṇi varṣāṇīva puraṃdaraḥ || 90.22 ||
लक्ष्मण को लक्ष्य बनाकर अत्यंत फुर्ती दिखाते हुए उसने इन्द्र के समान बाणों की वर्षा कर दी, जैसे इन्द्र वर्षा बरसाता है।
श्लोक 23 (yuddha.90.23)
मुक्तमिन्द्रजिता तत्तु शरवर्षमरिंदमः। आवारयदसम्भ्रान्तो लक्ष्मणः सुदुरासदम् ॥ 90.23 ॥
muktamindrajitā tattu śaravarṣamariṃdamaḥ| āvārayadasambhrānto lakṣmaṇaḥ sudurāsadam || 90.23 ||
इन्द्रजित् द्वारा छोड़ी गई उस असह्य बाण-वर्षा को शत्रुदमन लक्ष्मण ने अविचलित होकर रोक दिया।
श्लोक 24 (yuddha.90.24)
संदर्शयामास तदा रावणिं रघुनन्दनः। असम्भ्रान्तो महातेजास्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ 90.24 ॥
saṃdarśayāmāsa tadā rāvaṇiṃ raghunandanaḥ| asambhrānto mahātejāstadadbhutamivābhavat || 90.24 ||
तब अविचलित और महातेजस्वी लक्ष्मण ने इन्द्रजित् को अपना पराक्रम दिखलाया, वह दृश्य सचमुच अद्भुत था।
श्लोक 25 (yuddha.90.25)
ततस्तान् राक्षसान् सर्वांस्त्रिभिरेकैकमाहवे। अविध्यत् परमक्रुद्धः शीघ्रास्त्रं सम्प्रदर्शयन्। राक्षसेन्द्रसुतं चापि बाणौघैः समताडयत् ॥ 90.25 ॥
tatastān rākṣasān sarvāṃstribhirekaikamāhave| avidhyat paramakruddhaḥ śīghrāstraṃ sampradarśayan| rākṣasendrasutaṃ cāpi bāṇaughaiḥ samatāḍayat || 90.25 ||
तब अत्यंत क्रुद्ध होकर और अपनी अस्त्र-निपुणता दिखाते हुए लक्ष्मण ने युद्ध में उन सभी राक्षसों में से हर एक को तीन-तीन बाणों से बींध डाला, और राक्षसराज-पुत्र इन्द्रजित् को भी बाणों के समूहों से आहत किया।
श्लोक 26 (yuddha.90.26)
सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुघातिना। असक्तं प्रेषयामास लक्ष्मणाय बहून् शरान् ॥ 90.26 ॥
so'tividdho balavatā śatruṇā śatrughātinā| asaktaṃ preṣayāmāsa lakṣmaṇāya bahūn śarān || 90.26 ||
उस बलवान शत्रुघाती शत्रु के हाथों गहरे घायल होकर इन्द्रजित् ने लक्ष्मण पर निरंतर अनेक बाण छोड़े।
श्लोक 27 (yuddha.90.27)
तानप्राप्तान् शितैर्बाणैश्चिच्छेद परवीरहा। सारथेरस्य च रणे रथिनो रथसत्तमः ॥ 90.27 ॥
tānaprāptān śitairbāṇaiściccheda paravīrahā| sāratherasya ca raṇe rathino rathasattamaḥ || 90.27 ||
वीर शत्रुओं के संहारक लक्ष्मण ने उन बाणों के पहुँचने से पहले ही अपने तीक्ष्ण बाणों से उन्हें काट डाला; और रथियों में श्रेष्ठ लक्ष्मण ने युद्ध में रथी इन्द्रजित् के उस सारथि के सिर को,
श्लोक 28 (yuddha.90.28)
शिरो जहार धर्मात्मा भल्लेनानतपर्वणा। असूतास्ते हयास्तत्र रथमूहुरविक्लवाः ॥ 90.28 ॥
śiro jahāra dharmātmā bhallenānataparvaṇā| asūtāste hayāstatra rathamūhuraviklavāḥ || 90.28 ||
धर्मात्मा लक्ष्मण ने घुमावदार पर्व वाले भल्ल बाण से उड़ा दिया। सारथिरहित हुए वे घोड़े वहाँ अविचलित होकर भी रथ को खींचते रहे,
श्लोक 29 (yuddha.90.29)
मण्डलान्यभिधावन्ति तदद्भुतमिवाभवत्। अमर्षवशमापन्नः सौमित्रिर्दृढविक्रमः ॥ 90.29 ॥
maṇḍalānyabhidhāvanti tadadbhutamivābhavat| amarṣavaśamāpannaḥ saumitrirdṛḍhavikramaḥ || 90.29 ||
मण्डलाकार दौड़ते हुए, यह दृश्य सचमुच अद्भुत था। तब क्रोध के वशीभूत हुए दृढ़ पराक्रमी लक्ष्मण ने
श्लोक 30 (yuddha.90.30)
प्रत्यविध्यद्धयांस्तस्य शरैर्वित्रासयन् रणे। अमर्षमाणस्तत्कर्म रावणस्य सुतो रणे ॥ 90.30 ॥
pratyavidhyaddhayāṃstasya śarairvitrāsayan raṇe| amarṣamāṇastatkarma rāvaṇasya suto raṇe || 90.30 ||
उसके घोड़ों को भी युद्ध में बाणों से भयभीत करते हुए बींध दिया; और अपने इस कार्य को सहन न कर पाया रावणपुत्र इन्द्रजित्
श्लोक 31 (yuddha.90.31)
विव्याध दशभिर्बाणैः सौमित्रिं तममर्षणम्। ते तस्य वज्रप्रतिमाः शराः सर्पविषोपमाः। विलयं जग्मुरागत्य कवचं काञ्चनप्रभम् ॥ 90.31 ॥
vivyādha daśabhirbāṇaiḥ saumitriṃ tamamarṣaṇam| te tasya vajrapratimāḥ śarāḥ sarpaviṣopamāḥ| vilayaṃ jagmurāgatya kavacaṃ kāñcanaprabham || 90.31 ||
क्रुद्ध लक्ष्मण को दस बाणों से बींध दिया। किन्तु वज्र के समान और सर्प-विष के समान घातक उसके वे बाण लक्ष्मण के स्वर्ण-आभायुक्त कवच तक पहुँचकर व्यर्थ नष्ट हो गए।
श्लोक 32 (yuddha.90.32)
अभेद्यकवचं मत्वा लक्ष्मणं रावणात्मजः। ललाटे लक्ष्मणं बाणैः सुपुङ्खैस्त्रिभिरिन्द्रजित् ॥ 90.32 ॥
abhedyakavacaṃ matvā lakṣmaṇaṃ rāvaṇātmajaḥ| lalāṭe lakṣmaṇaṃ bāṇaiḥ supuṅkhaistribhirindrajit || 90.32 ||
लक्ष्मण के कवच को अभेद्य जानकर रावणपुत्र इन्द्रजित् ने लक्ष्मण के ललाट पर सुन्दर पंखों वाले तीन बाण,
श्लोक 33 (yuddha.90.33)
अविध्यत् परमक्रुद्धः शीघ्रमस्त्रं प्रदर्शयन्। तैः पृषत्कैर्ललाटस्थैः शुशुभे रघुनन्दनः ॥ 90.33 ॥
avidhyat paramakruddhaḥ śīghramastraṃ pradarśayan| taiḥ pṛṣatkairlalāṭasthaiḥ śuśubhe raghunandanaḥ || 90.33 ||
अत्यंत क्रुद्ध होकर और अस्त्र-प्रयोग की शीघ्रता दिखाते हुए चला दिए। ललाट में गड़े उन बाणों के साथ लक्ष्मण और भी शोभायमान हो उठे,
श्लोक 34 (yuddha.90.34)
रणाग्रे समरश्लाघी त्रिशृङ्ग इव पर्वतः। स तथाप्यर्दितो बाणै राक्षसेन तदा मृधे ॥ 90.34 ॥
raṇāgre samaraślāghī triśṛṅga iva parvataḥ| sa tathāpyardito bāṇai rākṣasena tadā mṛdhe || 90.34 ||
युद्ध के अग्रभाग में युद्ध-प्रेमी लक्ष्मण त्रिशिखर पर्वत के समान दिखाई देने लगे। इस प्रकार उस राक्षस के बाणों से पीड़ित होने पर भी,
श्लोक 35 (yuddha.90.35)
तमाशु प्रतिविव्याध लक्ष्मणः पञ्चभिः शरैः। विकृष्येन्द्रजितो युद्धे वदने शुभकुण्डले ॥ 90.35 ॥
tamāśu prativivyādha lakṣmaṇaḥ pañcabhiḥ śaraiḥ| vikṛṣyendrajito yuddhe vadane śubhakuṇḍale || 90.35 ||
लक्ष्मण ने तुरन्त धनुष खींचकर पाँच बाणों से इन्द्रजित् के सुन्दर कुण्डलों से सुशोभित मुख पर प्रत्युत्तर में प्रहार किया।
श्लोक 36 (yuddha.90.36)
लक्ष्मणेन्द्रजितौ वीरौ महाबलशरासनौ। अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ विशिखैर्भीमविक्रमौ ॥ 90.36 ॥
lakṣmaṇendrajitau vīrau mahābalaśarāsanau| anyonyaṃ jaghnaturvīrau viśikhairbhīmavikramau || 90.36 ||
महाबली और शक्तिशाली धनुष वाले वे दोनों वीर, भीमपराक्रमी लक्ष्मण और इन्द्रजित्, तीक्ष्ण बाणों से एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे।
श्लोक 37 (yuddha.90.37)
ततः शोणितदिग्धाङ्गौ लक्ष्मणेन्द्रजितावुभौ। रणे तौ रेजतुर्वीरौ पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ 90.37 ॥
tataḥ śoṇitadigdhāṅgau lakṣmaṇendrajitāvubhau| raṇe tau rejaturvīrau puṣpitāviva kiṃśukau || 90.37 ||
तब रक्त से रंगे हुए शरीर वाले लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनों ही युद्ध में पुष्पित किंशुक वृक्षों के समान शोभायमान हो रहे थे।
श्लोक 38 (yuddha.90.38)
तौ परस्परमभ्येत्य सर्वगात्रेषु धन्विनौ। घोरैर्विव्यधतुर्बाणैः कृतभावावुभौ जये ॥ 90.38 ॥
tau parasparamabhyetya sarvagātreṣu dhanvinau| ghorairvivyadhaturbāṇaiḥ kṛtabhāvāvubhau jaye || 90.38 ||
विजय के लिए दृढ़संकल्प वे दोनों धनुर्धर एक-दूसरे के समीप जाकर भयंकर बाणों से एक-दूसरे के सभी अंगों को बींधने लगे।
श्लोक 39 (yuddha.90.39)
ततः समरकोपेन संयुतो रावणात्मजः। विभीषणं त्रिभिर्बाणैर्विव्याध वदने शुभे ॥ 90.39 ॥
tataḥ samarakopena saṃyuto rāvaṇātmajaḥ| vibhīṣaṇaṃ tribhirbāṇairvivyādha vadane śubhe || 90.39 ||
तब युद्ध के क्रोध से भरे हुए रावणपुत्र इन्द्रजित् ने विभीषण के सुन्दर मुख पर तीन बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 40 (yuddha.90.40)
अयोमुखैस्त्रिभिर्विद्ध्वा राक्षसेन्द्रं विभीषणम्। एकैकेनाभिविव्याध तान् सर्वान् हरियूथपान् ॥ 90.40 ॥
ayomukhaistribhirviddhvā rākṣasendraṃ vibhīṣaṇam| ekaikenābhivivyādha tān sarvān hariyūthapān || 90.40 ||
तीन लौह-मुख बाणों से राक्षसराज विभीषण को बींधकर उसने समस्त वानरराजों में से हर एक को एक-एक बाण से बींध डाला।
श्लोक 41 (yuddha.90.41)
तस्मै दृढतरं क्रुद्धो जघान गदया हयान्। विभीषणो महातेजा रावणेः स दुरात्मनः ॥ 90.41 ॥
tasmai dṛḍhataraṃ kruddho jaghāna gadayā hayān| vibhīṣaṇo mahātejā rāvaṇeḥ sa durātmanaḥ || 90.41 ||
उस पर अत्यंत क्रुद्ध होकर महातेजस्वी विभीषण ने उस दुरात्मा इन्द्रजित् के घोड़ों को अपनी गदा से मार डाला।
श्लोक 42 (yuddha.90.42)
स हताश्वादवप्लुत्य रथान्निहतसारथेः। अथ शक्तिं महातेजाः पितृव्याय मुमोच ह ॥ 90.42 ॥
sa hatāśvādavaplutya rathānnihatasāratheḥ| atha śaktiṃ mahātejāḥ pitṛvyāya mumoca ha || 90.42 ||
अपने मारे गए सारथि और घोड़ों वाले रथ से कूद पड़कर उस महातेजस्वी इन्द्रजित् ने अपने चाचा विभीषण पर शक्ति चला दी।
श्लोक 43 (yuddha.90.43)
तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य सुमित्रानन्दवर्धनः। चिच्छेद निशितैर्बाणैर्दशधापातयद् भुवि ॥ 90.43 ॥
tāmāpatantīṃ samprekṣya sumitrānandavardhanaḥ| ciccheda niśitairbāṇairdaśadhāpātayad bhuvi || 90.43 ||
उस आती हुई शक्ति को देखकर सुमित्रा-नन्दन लक्ष्मण ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उसके दस टुकड़े कर भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 44 (yuddha.90.44)
तस्मै दृढधनुः क्रुद्धो हताश्वाय विभीषणः। वज्रस्पर्शसमान् पञ्च ससर्जोरसि मार्गणान् ॥ 90.44 ॥
tasmai dṛḍhadhanuḥ kruddho hatāśvāya vibhīṣaṇaḥ| vajrasparśasamān pañca sasarjorasi mārgaṇān || 90.44 ||
उस पर, जिसके घोड़े मारे जा चुके थे, दृढ़ धनुष धारण करने वाले क्रुद्ध विभीषण ने वज्र के आघात के समान पाँच बाण उसकी छाती में घुसा दिए।
श्लोक 45 (yuddha.90.45)
ते तस्य कायं भित्त्वा तु रुक्मपुङ्खा निमित्तगाः। बभूवुर्लोहितादिग्धा रक्ता इव महोरगाः ॥ 90.45 ॥
te tasya kāyaṃ bhittvā tu rukmapuṅkhā nimittagāḥ| babhūvurlohitādigdhā raktā iva mahoragāḥ || 90.45 ||
निशाने पर लगे वे स्वर्ण-पुंखी बाण उसके शरीर को भेदते हुए रक्त से सने महासर्पों के समान हो गए।
श्लोक 46 (yuddha.90.46)
स पितृव्यस्य संक्रुद्ध इन्द्रजिच्छरमाददे। उत्तमं रक्षसां मध्ये यमदत्तं महाबलः ॥ 90.46 ॥
sa pitṛvyasya saṃkruddha indrajiccharamādade| uttamaṃ rakṣasāṃ madhye yamadattaṃ mahābalaḥ || 90.46 ||
अपने चाचा पर क्रुद्ध होकर महाबली इन्द्रजित् ने राक्षसों के बीच खड़े होकर, यमराज द्वारा प्रदत्त उस उत्तम बाण को उठा लिया।
श्लोक 47 (yuddha.90.47)
तं समीक्ष्य महातेजा महेषुं तेन संहितम्। लक्ष्मणोऽप्याददे बाणमन्यद् भीमपराक्रमः ॥ 90.47 ॥
taṃ samīkṣya mahātejā maheṣuṃ tena saṃhitam| lakṣmaṇo'pyādade bāṇamanyad bhīmaparākramaḥ || 90.47 ||
उसके द्वारा धनुष पर चढ़ाए गए उस महाबाण को देखकर महातेजस्वी और भीमपराक्रमी लक्ष्मण ने भी एक और बाण उठा लिया,
श्लोक 48 (yuddha.90.48)
कुबेरेण स्वयं स्वप्ने यद् दत्तममितात्मना। दुर्जयं दुर्विषह्यं च सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ 90.48 ॥
kubereṇa svayaṃ svapne yad dattamamitātmanā| durjayaṃ durviṣahyaṃ ca sendrairapi surāsuraiḥ || 90.48 ||
जो स्वयं अमित तेजस्वी कुबेर ने स्वप्न में उसे दिया था, जो इन्द्र सहित देवों और असुरों के लिए भी दुर्जेय और असह्य था।
श्लोक 49 (yuddha.90.49)
तयोस्तु धनुषी श्रेष्ठे बाहुभिः परिघोपमैः। विकृष्यमाणे बलवत् क्रौञ्चाविव चुकूजतुः ॥ 90.49 ॥
tayostu dhanuṣī śreṣṭhe bāhubhiḥ parighopamaiḥ| vikṛṣyamāṇe balavat krauñcāviva cukūjatuḥ || 90.49 ||
परिघ के समान बलिष्ठ भुजाओं से बलपूर्वक खींचे जाने पर उन दोनों के उत्तम धनुष क्रौंच पक्षियों के जोड़े के समान बोल उठे।
श्लोक 50 (yuddha.90.50)
ताभ्यां तु धनुषि श्रेष्ठे संहितौ सायकोत्तमौ। विकृष्यमाणौ वीराभ्यां भृशं जज्वलतुः श्रिया ॥ 90.50 ॥
tābhyāṃ tu dhanuṣi śreṣṭhe saṃhitau sāyakottamau| vikṛṣyamāṇau vīrābhyāṃ bhṛśaṃ jajvalatuḥ śriyā || 90.50 ||
उन दोनों वीरों द्वारा उत्तम धनुषों पर चढ़ाए और खींचे गए वे दोनों उत्तम बाण अत्यंत तेज से जगमगा उठे।
श्लोक 51 (yuddha.90.51)
तौ भासयन्तावाकाशं धनुर्भ्यां विशिखौ च्युतौ। मुखेन मुखमाहत्य संनिपेततुरोजसा ॥ 90.51 ॥
tau bhāsayantāvākāśaṃ dhanurbhyāṃ viśikhau cyutau| mukhena mukhamāhatya saṃnipetaturojasā || 90.51 ||
धनुषों से छूटे वे दोनों बाण आकाश को आलोकित करते हुए मुख से मुख टकराकर वेगपूर्वक आपस में भिड़ गए।
श्लोक 52 (yuddha.90.52)
संनिपातस्तयोश्चासीच्छरयोर्घोररूपयोः। सधूमविस्फुलिङ्गश्च तज्जोऽग्निर्दारुणोऽभवत् ॥ 90.52 ॥
saṃnipātastayoścāsīccharayorghorarūpayoḥ| sadhūmavisphuliṅgaśca tajjo'gnirdāruṇo'bhavat || 90.52 ||
उन भयंकर बाणों के टकराने से उत्पन्न हुई अग्नि धुएँ और चिंगारियों से युक्त होकर अत्यंत भीषण हो उठी।
श्लोक 53 (yuddha.90.53)
तौ महाग्रहसंकाशावन्योन्यं संनिपत्य च। संग्रामे शतधा यातौ मेदिन्यां चैव पेततुः ॥ 90.53 ॥
tau mahāgrahasaṃkāśāvanyonyaṃ saṃnipatya ca| saṃgrāme śatadhā yātau medinyāṃ caiva petatuḥ || 90.53 ||
दो महाग्रहों के समान एक-दूसरे से टकराकर वे दोनों बाण युद्धभूमि में सौ-सौ टुकड़ों में बिखरकर धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 54 (yuddha.90.54)
शरौ प्रतिहतौ दृष्ट्वा तावुभौ रणमूर्धनि। व्रीडितौ जातरोषौ च लक्ष्मणेन्द्रजितौ तदा ॥ 90.54 ॥
śarau pratihatau dṛṣṭvā tāvubhau raṇamūrdhani| vrīḍitau jātaroṣau ca lakṣmaṇendrajitau tadā || 90.54 ||
युद्ध के अग्रभाग में अपने-अपने बाणों को इस प्रकार निष्फल हुआ देखकर लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनों ही लज्जित हो उठे और उनका क्रोध और बढ़ गया।
श्लोक 55 (yuddha.90.55)
सुसंरब्धस्तु सौमित्रिरस्त्रं वारुणमाददे। रौद्रं महेन्द्रजिद् युद्धेऽप्यसृजद् युधि निष्ठितः ॥ 90.55 ॥
susaṃrabdhastu saumitrirastraṃ vāruṇamādade| raudraṃ mahendrajid yuddhe'pyasṛjad yudhi niṣṭhitaḥ || 90.55 ||
अत्यंत क्षुब्ध हुए लक्ष्मण ने वारुण अस्त्र धारण किया; और युद्ध में अडिग खड़े महान इन्द्रजित् ने रौद्र अस्त्र का प्रयोग किया।
श्लोक 56 (yuddha.90.56)
तेन तद्विहितं शस्त्रं वारुणं परमाद्भुतम्। ततः क्रुद्धो महातेजा इन्द्रजित् समितिंजयः। आग्नेयं संदधे दीप्तं स लोकं संक्षिपन्निव ॥ 90.56 ॥
tena tadvihitaṃ śastraṃ vāruṇaṃ paramādbhutam| tataḥ kruddho mahātejā indrajit samitiṃjayaḥ| āgneyaṃ saṃdadhe dīptaṃ sa lokaṃ saṃkṣipanniva || 90.56 ||
उससे वह अत्यंत अद्भुत वारुण अस्त्र नष्ट हो गया। तब क्रुद्ध होकर, मानो सम्पूर्ण जगत को समेट लेने की इच्छा से, महातेजस्वी और युद्धविजयी इन्द्रजित् ने प्रज्वलित आग्नेय अस्त्र का प्रयोग किया।
श्लोक 57 (yuddha.90.57)
सौरेणास्त्रेण तद् वीरो लक्ष्मणः पर्यवारयत्। अस्त्रं निवारितं दृष्ट्वा रावणिः क्रोधमूर्च्छितः ॥ 90.57 ॥
saureṇāstreṇa tad vīro lakṣmaṇaḥ paryavārayat| astraṃ nivāritaṃ dṛṣṭvā rāvaṇiḥ krodhamūrcchitaḥ || 90.57 ||
वीर लक्ष्मण ने उसे सौर अस्त्र से रोक दिया। अपने अस्त्र को यों निष्फल हुआ देखकर इन्द्रजित् क्रोध से उन्मत्त हो उठा,
श्लोक 58 (yuddha.90.58)
आददे निशितं बाणमासुरं शत्रुदारणम्। तस्माच्चापाद् विनिष्पेतुर्भास्वराः कूटमुद्गराः ॥ 90.58 ॥
ādade niśitaṃ bāṇamāsuraṃ śatrudāraṇam| tasmāccāpād viniṣpeturbhāsvarāḥ kūṭamudagarāḥ || 90.58 ||
और उसने शत्रु को चीर डालने वाला तीक्ष्ण आसुर बाण उठा लिया। उस धनुष से चमकते हुए छिपे हुए मुद्गर,
श्लोक 59 (yuddha.90.59)
शूलानि च भुशुण्ड्यश्च गदाः खड्गाः परश्वधाः। तद् दृष्ट्वा लक्ष्मणः संख्ये घोरमस्त्रमथासुरम् ॥ 90.59 ॥
śūlāni ca bhuśuṇḍyaśca gadāḥ khaḍgāḥ paraśvadhāḥ| tad dṛṣṭvā lakṣmaṇaḥ saṃkhye ghoramastramathāsuram || 90.59 ||
शूल, भुशुण्डी, गदाएँ, खड्ग और फरसे निकल पड़े। युद्ध में उस भयंकर आसुर अस्त्र को देखकर,
श्लोक 60 (yuddha.90.60)
अवार्यं सर्वभूतानां सर्वशस्त्रविदारणम्। माहेश्वरेण द्युतिमांस्तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ॥ 90.60 ॥
avāryaṃ sarvabhūtānāṃ sarvaśastravidāraṇam| māheśvareṇa dyutimāṃstadastraṃ pratyavārayat || 90.60 ||
जो समस्त प्राणियों के लिए अजेय और सभी शस्त्रों को विदीर्ण करने वाला था, तेजस्वी लक्ष्मण ने उस अस्त्र को माहेश्वर अस्त्र से रोक दिया।
श्लोक 61 (yuddha.90.61)
तयोः समभवद् युद्धमद्भुतं रोमहर्षणम्। गगनस्थानि भूतानि लक्ष्मणं पर्यवारयन् ॥ 90.61 ॥
tayoḥ samabhavad yuddhamadbhutaṃ romaharṣaṇam| gaganasthāni bhūtāni lakṣmaṇaṃ paryavārayan || 90.61 ||
उन दोनों के बीच वह अद्भुत, रोमांचकारी युद्ध होने लगा; और आकाशस्थ प्राणी लक्ष्मण के चारों ओर एकत्रित हो गए।
श्लोक 62 (yuddha.90.62)
भैरवाभिरुते भीमे युद्धे वानररक्षसाम्। भूतैर्बहुभिराकाशं विस्मितैरावृतं बभौ ॥ 90.62 ॥
bhairavābhirute bhīme yuddhe vānararakṣasām| bhūtairbahubhirākāśaṃ vismitairāvṛtaṃ babhau || 90.62 ||
भयंकर गर्जना से गूँजते हुए वानरों और राक्षसों के उस घोर युद्ध में, अनगिनत विस्मित प्राणियों से भरा हुआ आकाश जगमगा उठा।
श्लोक 63 (yuddha.90.63)
ऋषयः पितरो देवा गन्धर्वगरुडोरगाः। शतक्रतुं पुरस्कृत्य ररक्षुर्लक्ष्मणं रणे ॥ 90.63 ॥
ṛṣayaḥ pitaro devā gandharvagaruḍoragāḥ| śatakratuṃ puraskṛtya rarakṣurlakṣmaṇaṃ raṇe || 90.63 ||
ऋषिगण, पितर, देवगण, गंधर्व, गरुड़ और नागगण, इन्द्र को आगे करके युद्ध में लक्ष्मण की रक्षा करने लगे।
श्लोक 64 (yuddha.90.64)
अथान्यं मार्गणश्रेष्ठं संदधे राघवानुजः। हुताशनसमस्पर्शं रावणात्मजदारणम् ॥ 90.64 ॥
athānyaṃ mārgaṇaśreṣṭhaṃ saṃdadhe rāghavānujaḥ| hutāśanasamasparśaṃ rāvaṇātmajadāraṇam || 90.64 ||
तब राम के अनुज लक्ष्मण ने एक और श्रेष्ठ बाण चढ़ाया, जिसका स्पर्श अग्नि के समान था और जो रावणपुत्र को विदीर्ण करने में समर्थ था,
श्लोक 65 (yuddha.90.65)
सुपत्रमनुवृत्ताङ्गं सुपर्वाणं सुसंस्थितम्। सुवर्णविकृतं वीरः शरीरान्तकरं शरम् ॥ 90.65 ॥
supatramanuvṛttāṅgaṃ suparvāṇaṃ susaṃsthitam| suvarṇavikṛtaṃ vīraḥ śarīrāntakaraṃ śaram || 90.65 ||
जो सुन्दर पंखों वाला, सुगोल आकार का, सुदृढ़ पर्वों वाला और सुगठित था, स्वर्ण से अलंकृत उस वीर लक्ष्मण ने शरीर का अन्त कर देने वाले उस बाण को चढ़ाया,
श्लोक 66 (yuddha.90.66)
दुरावारं दुर्विषहं राक्षसानां भयावहम्। आशीविषविषप्रख्यं देवसंघैः समर्चितम् ॥ 90.66 ॥
durāvāraṃ durviṣahaṃ rākṣasānāṃ bhayāvaham| āśīviṣaviṣaprakhyaṃ devasaṃghaiḥ samarcitam || 90.66 ||
जिसे रोकना कठिन था, जो असह्य था, राक्षसों के लिए भयावह था, विषैले सर्प के विष के समान घातक था, और देवगणों द्वारा पूजित था,
श्लोक 67 (yuddha.90.67)
येन शक्रो महातेजा दानवानजयत् प्रभुः। पुरा देवासुरे युद्धे वीर्यवान् हरिवाहनः ॥ 90.67 ॥
yena śakro mahātejā dānavānajayat prabhuḥ| purā devāsure yuddhe vīryavān harivāhanaḥ || 90.67 ||
वही बाण जिससे पूर्वकाल में देव-असुर युद्ध में हरित अश्वों के स्वामी, पराक्रमी और महातेजस्वी इन्द्र ने दानवों पर विजय प्राप्त की थी।
श्लोक 68 (yuddha.90.68)
अथैन्द्रमस्त्रं सौमित्रिः संयुगेष्वपराजितम्। शरश्रेष्ठं धनुश्रेष्ठे विकर्षन्निदमब्रवीत् ॥ 90.68 ॥
athaindramastraṃ saumitriḥ saṃyugeṣvaparājitam| śaraśreṣṭhaṃ dhanuśreṣṭhe vikarṣannidamabravīt || 90.68 ||
तब लक्ष्मण ने युद्धों में कभी पराजित न होने वाले उस श्रेष्ठ ऐन्द्र अस्त्र को अपने उत्तम धनुष पर चढ़ाकर, उसे खींचते हुए यह वचन कहा:
श्लोक 69 (yuddha.90.69)
लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मणो वाक्यमर्थसाधकमात्मनः। धर्मात्मा सत्यसंधश्च रामो दाशरथिर्यदि। पौरुषे चाप्रतिद्वन्द्वस्तदैनं जहि रावणिम् ॥ 90.69 ॥
lakṣmīvā~llakṣmaṇo vākyamarthasādhakamātmanaḥ| dharmātmā satyasaṃdhaśca rāmo dāśarathiryadi| pauruṣe cāpratidvandvastadainaṃ jahi rāvaṇim || 90.69 ||
"यदि दशरथ-पुत्र राम धर्मात्मा हैं, सत्यप्रतिज्ञ हैं और पराक्रम में अद्वितीय हैं, तो हे बाण, तू इस इन्द्रजित् का वध कर दे।"
श्लोक 70 (yuddha.90.70)
इत्युक्त्वा बाणमाकर्णं विकृष्य तमजिह्मगम्। लक्ष्मणः समरे वीरः ससर्जेन्द्रजितं प्रति। ऐन्द्रास्त्रेण समायुज्य लक्ष्मणः परवीरहा ॥ 90.70 ॥
ityuktvā bāṇamākarṇaṃ vikṛṣya tamajihmagam| lakṣmaṇaḥ samare vīraḥ sasarjendrajitaṃ prati| aindrāstreṇa samāyujya lakṣmaṇaḥ paravīrahā || 90.70 ||
ऐसा कहकर और उस अचूक बाण को कान तक खींचकर वीर लक्ष्मण ने युद्ध में उसे इन्द्रजित् पर छोड़ दिया; और ऐन्द्र अस्त्र से युक्त करके वीर शत्रुओं का संहारक लक्ष्मण,
श्लोक 71 (yuddha.90.71)
तच्छिरः सशिरस्त्राणं श्रीमज्ज्वलितकुण्डलम्। प्रमथ्येन्द्रजितः कायात् पातयामास भूतले ॥ 90.71 ॥
tacchiraḥ saśirastrāṇaṃ śrīmajjvalitakuṇḍalam| pramathyendrajitaḥ kāyāt pātayāmāsa bhūtale || 90.71 ||
इन्द्रजित् के उस शिरस्त्राण और चमकते कुण्डलों से सुशोभित सुन्दर सिर को धड़ से अलग करके पृथ्वी पर गिरा दिया।
श्लोक 72 (yuddha.90.72)
तद् राक्षसतनूजस्य भिन्नस्कन्धं शिरो महत्। तपनीयनिभं भूमौ ददृशे रुधिरोक्षितम् ॥ 90.72 ॥
tad rākṣasatanūjasya bhinnaskandhaṃ śiro mahat| tapanīyanibhaṃ bhūmau dadṛśe rudhirokṣitam || 90.72 ||
उस राक्षसपुत्र का कन्धे से कटा हुआ वह विशाल सिर रक्त से सना हुआ, स्वर्ण के समान चमकता हुआ भूमि पर दिखाई पड़ा।
श्लोक 73 (yuddha.90.73)
हतः स निपपाताथ धरण्यां रावणात्मजः। कवची सशिरस्त्राणो विप्रविद्धशरासनः ॥ 90.73 ॥
hataḥ sa nipapātātha dharaṇyāṃ rāvaṇātmajaḥ| kavacī saśirastrāṇo vipraviddhaśarāsanaḥ || 90.73 ||
मारा गया वह रावणपुत्र अपने कवच और शिरस्त्राण सहित, धनुष दूर छिटककर, पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 74 (yuddha.90.74)
चुक्रुशुस्ते ततः सर्वे वानराः सविभीषणाः। हृष्यन्ते निहते तस्मिन् देवा वृत्रवधे यथा ॥ 90.74 ॥
cukruśuste tataḥ sarve vānarāḥ savibhīṣaṇāḥ| hṛṣyante nihate tasmin devā vṛtravadhe yathā || 90.74 ||
तब विभीषण सहित सभी वानर उसके मारे जाने पर हर्ष से चिल्ला उठे, जैसे वृत्रासुर के वध पर देवगण हर्षित हुए थे।
श्लोक 75 (yuddha.90.75)
अथान्तरिक्षे देवानामृषीणां च महात्मनाम्। जज्ञेऽथ जयसंनादो गन्धर्वाप्सरसामपि ॥ 90.75 ॥
athāntarikṣe devānāmṛṣīṇāṃ ca mahātmanām| jajñe'tha jayasaṃnādo gandharvāpsarasāmapi || 90.75 ||
तब आकाश में देवताओं, महात्मा ऋषियों तथा गंधर्वों और अप्सराओं का विजय-घोष गूँज उठा।
श्लोक 76 (yuddha.90.76)
पतितं समभिज्ञाय राक्षसी सा महाचमूः। वध्यमाना दिशो भेजे हरिभिर्जितकाशिभिः ॥ 90.76 ॥
patitaṃ samabhijñāya rākṣasī sā mahācamūḥ| vadhyamānā diśo bheje haribhirjitakāśibhiḥ || 90.76 ||
उसके गिरने का पता लगते ही वह विशाल राक्षस-सेना विजयी वानरों द्वारा मारी जाती हुई दिशाओं में भाग गई।
श्लोक 77 (yuddha.90.77)
वानरैर्वध्यमानास्ते शस्त्राण्युत्सृज्य राक्षसाः। लङ्कामभिमुखाः सस्रुर्भ्रष्टसंज्ञाः प्रधाविताः ॥ 90.77 ॥
vānarairvadhyamānāste śastrāṇyutsṛjya rākṣasāḥ| laṅkāmabhimukhāḥ sasrurbhraṣṭasaṃjñāḥ pradhāvitāḥ || 90.77 ||
वानरों द्वारा मारे जाते हुए वे राक्षस अपने शस्त्रों को त्यागकर, चेतनाशून्य होकर, दौड़ते हुए लंका की ओर भाग चले।
श्लोक 78 (yuddha.90.78)
दुद्रुवुर्बहुधा भीता राक्षसाः शतशो दिशः। त्यक्त्वा प्रहरणान् सर्वे पट्टिशासिपरश्वधान् ॥ 90.78 ॥
dudruvurbahudhā bhītā rākṣasāḥ śataśo diśaḥ| tyaktvā praharaṇān sarve paṭṭiśāsiparaśvadhān || 90.78 ||
भयभीत हुए वे राक्षस सैकड़ों की संख्या में सभी दिशाओं में भाग खड़े हुए, सभी ने पट्टिश, तलवार और फरसे जैसे अपने शस्त्र त्याग दिए।
श्लोक 79 (yuddha.90.79)
केचिल्लङ्कां परित्रस्ताः प्रविष्टा वानरार्दिताः। समुद्रे पतिताः केचित् केचित् पर्वतमाश्रिताः ॥ 90.79 ॥
kecillaṅkāṃ paritrastāḥ praviṣṭā vānarārditāḥ| samudre patitāḥ kecit kecit parvatamāśritāḥ || 90.79 ||
कुछ भयभीत होकर वानरों से पीड़ित हुए लंका में जा घुसे; कुछ समुद्र में जा गिरे; कुछ पर्वत की शरण ले बैठे।
श्लोक 80 (yuddha.90.80)
हतमिन्द्रजितं दृष्ट्वा शयानं च रणक्षितौ। राक्षसानां सहस्रेषु न कश्चित् प्रत्यदृश्यत ॥ 90.80 ॥
hatamindrajitaṃ dṛṣṭvā śayānaṃ ca raṇakṣitau| rākṣasānāṃ sahasreṣu na kaścit pratyadṛśyata || 90.80 ||
इन्द्रजित् को मारा गया और युद्धभूमि में पड़ा देखकर, राक्षसों के उन हजारों में से कोई भी कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था।
श्लोक 81 (yuddha.90.81)
यथास्तं गत आदित्ये नावतिष्ठन्ति रश्मयः। तथा तस्मिन् निपतिते राक्षसास्ते गता दिशः ॥ 90.81 ॥
yathāstaṃ gata āditye nāvatiṣṭhanti raśmayaḥ| tathā tasmin nipatite rākṣasāste gatā diśaḥ || 90.81 ||
जैसे सूर्य के अस्त होने पर उसकी किरणें नहीं ठहरतीं, वैसे ही उसके गिरते ही वे राक्षस दिशाओं में तितर-बितर हो गए।
श्लोक 82 (yuddha.90.82)
शान्तरश्मिरिवादित्यो निर्वाण इव पावकः। बभूव स महाबाहुर्व्यपास्तगतजीवितः ॥ 90.82 ॥
śāntaraśmirivādityo nirvāṇa iva pāvakaḥ| babhūva sa mahābāhurvyapāstagatajīvitaḥ || 90.82 ||
वह महाबाहु इन्द्रजित्, अपने प्राण गँवाकर, वैसा ही हो गया जैसे किरणहीन सूर्य या बुझी हुई अग्नि।
श्लोक 83 (yuddha.90.83)
प्रशान्तपीडाबहुलो विनष्टारिः प्रहर्षवान्। बभूव लोकः पतिते राक्षसेन्द्रसुते तदा ॥ 90.83 ॥
praśāntapīḍābahulo vinaṣṭāriḥ praharṣavān| babhūva lokaḥ patite rākṣasendrasute tadā || 90.83 ||
उस राक्षसराज-पुत्र के गिरते ही समस्त संसार अपनी अनेक पीड़ाओं से मुक्त होकर, शत्रु के नष्ट हो जाने से, हर्ष से भर उठा।
श्लोक 84 (yuddha.90.84)
हर्षं च शक्रो भगवान् सह सर्वैर्महर्षिभिः। जगाम निहते तस्मिन् राक्षसे पापकर्मणि ॥ 90.84 ॥
harṣaṃ ca śakro bhagavān saha sarvairmaharṣibhiḥ| jagāma nihate tasmin rākṣase pāpakarmaṇi || 90.84 ||
उस पापकर्मी राक्षस के मारे जाने पर भगवान इन्द्र सभी महर्षियों सहित हर्ष से भर उठे।
श्लोक 85 (yuddha.90.85)
आकाशे चापि देवानां शुश्रुवे दुन्दुभिस्वनः। नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च गन्धर्वैश्च महात्मभिः ॥ 90.85 ॥
ākāśe cāpi devānāṃ śuśruve dundubhisvanaḥ| nṛtyadbhirapsarobhiśca gandharvaiśca mahātmabhiḥ || 90.85 ||
आकाश में भी देवताओं की दुन्दुभियों की ध्वनि सुनाई पड़ने लगी, साथ ही नृत्य करती अप्सराओं और महात्मा गंधर्वों की भी।
श्लोक 86 (yuddha.90.86)
ववर्षुः पुष्पवर्षाणि तदद्भुतमिवाभवत्। प्रशशाम हते तस्मिन् राक्षसे क्रूरकर्मणि ॥ 90.86 ॥
vavarṣuḥ puṣpavarṣāṇi tadadbhutamivābhavat| praśaśāma hate tasmin rākṣase krūrakarmaṇi || 90.86 ||
पुष्पों की वर्षा होने लगी, वह दृश्य सचमुच अद्भुत था; और उस क्रूरकर्मा राक्षस के मारे जाने पर सारा उपद्रव शान्त हो गया।
श्लोक 87 (yuddha.90.87)
शुद्धा आपो नभश्चैव जहृषुर्देवदानवाः। आजग्मुः पतिते तस्मिन् सर्वलोकभयावहे ॥ 90.87 ॥
śuddhā āpo nabhaścaiva jahṛṣurdevadānavāḥ| ājagmuḥ patite tasmin sarvalokabhayāvahe || 90.87 ||
जल और आकाश दोनों निर्मल हो गए; देव और दानव हर्षित हो उठे और वहाँ एकत्रित हो गए, क्योंकि सम्पूर्ण लोकों को भयभीत करने वाला वह इन्द्रजित् गिर चुका था।
श्लोक 88 (yuddha.90.88)
ऊचुश्च सहितास्तुष्टा देवगन्धर्वदानवाः। विज्वराः शान्तकलुषा ब्राह्मणा विचरन्त्विति ॥ 90.88 ॥
ūcuśca sahitāstuṣṭā devagandharvadānavāḥ| vijvarāḥ śāntakaluṣā brāhmaṇā vicarantviti || 90.88 ||
देव, गंधर्व और दानव सब मिलकर प्रसन्न होकर कहने लगे, "अब ब्राह्मणगण निश्चिंत होकर, अपने कष्टों से मुक्त होकर विचरण करें।"
श्लोक 89 (yuddha.90.89)
ततोऽभ्यनन्दन् संहृष्टाः समरे हरियूथपाः। तमप्रतिबलं दृष्ट्वा हतं नैर्ऋतपुङ्गवम् ॥ 90.89 ॥
tato'bhyanandan saṃhṛṣṭāḥ samare hariyūthapāḥ| tamapratibalaṃ dṛṣṭvā hataṃ nairṛtapuṅgavam || 90.89 ||
तब वानरराज अत्यंत हर्षित होकर, उस अद्वितीय बलशाली राक्षस-श्रेष्ठ को मारा गया देखकर, युद्धभूमि में लक्ष्मण की सराहना करने लगे।
श्लोक 90 (yuddha.90.90)
विभीषणो हनूमांश्च जाम्बवांश्चर्क्षयूथपः। विजयेनाभिनन्दन्तस्तुष्टुवुश्चापि लक्ष्मणम् ॥ 90.90 ॥
vibhīṣaṇo hanūmāṃśca jāmbavāṃścarkṣayūthapaḥ| vijayenābhinandantastuṣṭuvuścāpi lakṣmaṇam || 90.90 ||
विभीषण, हनुमान और भालुओं के स्वामी जाम्बवान, इस विजय से प्रसन्न होकर लक्ष्मण की स्तुति और प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 91 (yuddha.90.91)
क्ष्वेडन्तश्च प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः। लब्धलक्षा रघुसुतं परिवार्योपतस्थिरे ॥ 90.91 ॥
kṣveḍantaśca plavantaśca garjantaśca plavaṃgamāḥ| labdhalakṣā raghusutaṃ parivāryopatasthire || 90.91 ||
चिल्लाते, उछलते और गरजते हुए वानर, अपना लक्ष्य पूर्ण हुआ पाकर, रघुनन्दन लक्ष्मण को घेरकर खड़े हो गए।
श्लोक 92 (yuddha.90.92)
लाङ्गूलानि प्रविध्यन्तः स्फोटयन्तश्च वानराः। लक्ष्मणो जयतीत्येव वाक्यं विश्रावयंस्तदा ॥ 90.92 ॥
lāṅgūlāni pravidhyantaḥ sphoṭayantaśca vānarāḥ| lakṣmaṇo jayatītyeva vākyaṃ viśrāvayaṃstadā || 90.92 ||
अपनी पूँछें घुमाते और फटकारते हुए वानरों ने उस समय "लक्ष्मण की जय हो!" का उद्घोष किया।
श्लोक 93 (yuddha.90.93)
अन्योन्यं च समाश्लिष्य हरयो हृष्टमानसाः। चक्रुरुच्चावचगुणा राघवाश्रयसत्कथाः ॥ 90.93 ॥
anyonyaṃ ca samāśliṣya harayo hṛṣṭamānasāḥ| cakruruccāvacaguṇā rāghavāśrayasatkathāḥ || 90.93 ||
एक-दूसरे को गले लगाते हुए, प्रसन्नचित्त वानर लक्ष्मण के अनेक गुणों और उनसे जुड़ी शुभ कथाओं की चर्चा करने लगे।
श्लोक 94 (yuddha.90.94)
तदसुकरमथाभिवीक्ष्य हृष्टाः प्रियसुहृदो युधि लक्ष्मणस्य कर्म। परममुपलभन्मनःप्रहर्षं विनिहतमिन्द्ररिपुं निशम्य देवाः ॥ 90.94 ॥
tadasukaramathābhivīkṣya hṛṣṭāḥ priyasuhṛdo yudhi lakṣmaṇasya karma| paramamupalabhanmanaḥpraharṣaṃ vinihatamindraripuṃ niśamya devāḥ || 90.94 ||
तब देवगण, युद्ध में अपने प्रिय मित्र लक्ष्मण के उस दुष्कर पराक्रम को देखकर और इन्द्र के शत्रु इन्द्रजित् के वध का समाचार सुनकर, मन में परम हर्ष का अनुभव करने लगे।