युद्धकाण्ड · सर्ग 92
रावण का क्रोध और सुपार्श्व की सलाह
श्लोक 1 (yuddha.92.1)
ततः पौलस्त्यसचिवाः श्रुत्वा चेन्द्रजितो वधम्। आचचक्षुरभिज्ञाय दशग्रीवाय सत्वराः ॥ 92.1 ॥
tataḥ paulastyasacivāḥ śrutvā cendrajito vadham| ācacakṣurabhijñāya daśagrīvāya satvarāḥ || 92.1 ||
तब इन्द्रजित के वध का समाचार सुनकर, पौलस्त्य के मंत्रियों ने बात की पुष्टि कर शीघ्रता से दशग्रीव को इसकी सूचना दी।
श्लोक 2 (yuddha.92.2)
युद्धे हतो महाराज लक्ष्मणेन तवात्मजः। विभीषणसहायेन मिषतां नो महाद्युतिः ॥ 92.2 ॥
yuddhe hato mahārāja lakṣmaṇena tavātmajaḥ| vibhīṣaṇasahāyena miṣatāṃ no mahādyutiḥ || 92.2 ||
"हे महाराज! आपका वह महातेजस्वी पुत्र हमारे देखते-देखते ही विभीषण की सहायता से लक्ष्मण द्वारा युद्ध में मार डाला गया।"
श्लोक 3 (yuddha.92.3)
शूरः शूरेण संगम्य संयुगेष्वपराजितः। लक्ष्मणेन हतः शूरः पुत्रस्ते विबुधेन्द्रजित् ॥ 92.3 ॥
śūraḥ śūreṇa saṃgamya saṃyugeṣvaparājitaḥ| lakṣmaṇena hataḥ śūraḥ putraste vibudhendrajit || 92.3 ||
"युद्धों में सदा अपराजित रहने वाला वह वीर पुत्र, वीर लक्ष्मण से टकराकर मारा गया—आपका वह पुत्र जो देवराज इन्द्र का विजेता था।"
श्लोक 4 (yuddha.92.4)
गतः स परमाँल्लोकान् शरैः संतर्प्य लक्ष्मणम्। स तं प्रतिभयं श्रुत्वा वधं पुत्रस्य दारुणम् ॥ 92.4 ॥
gataḥ sa paramā̐llokān śaraiḥ saṃtarpya lakṣmaṇam| sa taṃ pratibhayaṃ śrutvā vadhaṃ putrasya dāruṇam || 92.4 ||
"लक्ष्मण को अपने बाणों से तृप्त कर, वह वीर परम लोकों को चला गया।" पुत्र के इस भयंकर और दारुण वध का समाचार सुनकर,
श्लोक 5 (yuddha.92.5)
घोरमिन्द्रजितः संख्ये कश्मलं प्राविशन्महत्। उपलभ्य चिरात् संज्ञां राजा राक्षसपुंगवः ॥ 92.5 ॥
ghoramindrajitaḥ saṃkhye kaśmalaṃ prāviśanmahat| upalabhya cirāt saṃjñāṃ rājā rākṣasapuṃgavaḥ || 92.5 ||
इन्द्रजित के युद्ध में मारे जाने की उस भीषण सूचना पर रावण मूर्च्छित होकर गिर पड़ा; बहुत देर बाद जब उस राक्षसश्रेष्ठ राजा की चेतना लौटी,
श्लोक 6 (yuddha.92.6)
पुत्रशोकाकुलो दीनो विललापाकुलेन्द्रियः। हा राक्षसचमूमुख्य मम वत्स महाबल ॥ 92.6 ॥
putraśokākulo dīno vilalāpākulendriyaḥ| hā rākṣasacamūmukhya mama vatsa mahābala || 92.6 ||
तो पुत्र-शोक से व्याकुल, दीन और इन्द्रियों से विचलित होकर वह विलाप करने लगा: "हाय! राक्षससेना के अध्यक्ष, मेरे महाबली पुत्र!
श्लोक 7 (yuddha.92.7)
जित्वेन्द्रं कथमद्य त्वं लक्ष्मणस्य वशं गतः। ननु त्वमिषुभिः क्रुद्धो भिन्द्याः कालान्तकावपि ॥ 92.7 ॥
jitvendraṃ kathamadya tvaṃ lakṣmaṇasya vaśaṃ gataḥ| nanu tvamiṣubhiḥ kruddho bhindyāḥ kālāntakāvapi || 92.7 ||
"इन्द्र तक को जीतने वाले तुम आज लक्ष्मण के वश में कैसे हो गए? क्रुद्ध होने पर तो तुम काल और अन्तक तक को भी बाणों से बींध सकते थे,"
श्लोक 8 (yuddha.92.8)
मन्दरस्यापि शृङ्गाणि किं पुनर्लक्ष्मणं युधि। अद्य वैवस्वतो राजा भूयो बहुमतो मम ॥ 92.8 ॥
mandarasyāpi śṛṅgāṇi kiṃ punarlakṣmaṇaṃ yudhi| adya vaivasvato rājā bhūyo bahumato mama || 92.8 ||
"मन्दराचल के शिखरों को भी भेद सकते थे, फिर लक्ष्मण की क्या बात! आज सूर्यपुत्र यमराज मेरी दृष्टि में और भी बड़े हो गए हैं,"
श्लोक 9 (yuddha.92.9)
येनाद्य त्वं महाबाहो संयुक्तः कालधर्मणा। एष पन्थाः सुयोधानां सर्वामरगणेष्वपि। यः कृते हन्यते भर्तुः स पुमान् स्वर्गमृच्छति ॥ 92.9 ॥
yenādya tvaṃ mahābāho saṃyuktaḥ kāladharmaṇā| eṣa panthāḥ suyodhānāṃ sarvāmaragaṇeṣvapi| yaḥ kṛte hanyate bhartuḥ sa pumān svargamṛcchati || 92.9 ||
"क्योंकि हे महाबाहो, उसी ने आज तुम्हें कालधर्म से युक्त किया है। समस्त देवगणों में भी यही मार्ग श्रेष्ठ योद्धाओं का है—जो पुरुष अपने स्वामी के लिए मारा जाता है, वह स्वर्ग को प्राप्त होता है।"
श्लोक 10 (yuddha.92.10)
अद्य देवगणाः सर्वे लोकपाला महर्षयः। हतमिन्द्रजितं श्रुत्वा सुखं स्वप्स्यन्ति निर्भयाः ॥ 92.10 ॥
adya devagaṇāḥ sarve lokapālā maharṣayaḥ| hatamindrajitaṃ śrutvā sukhaṃ svapsyanti nirbhayāḥ || 92.10 ||
"आज इन्द्रजित के मारे जाने का समाचार सुनकर सभी देवगण, लोकपाल और महर्षिगण निर्भय होकर सुख की नींद सोएँगे।"
श्लोक 11 (yuddha.92.11)
अद्य लोकास्त्रयः कृत्स्ना पृथिवी च सकानना। एकेनेन्द्रजिता हीना शून्येव प्रतिभाति मे ॥ 92.11 ॥
adya lokāstrayaḥ kṛtsnā pṛthivī ca sakānanā| ekenendrajitā hīnā śūnyeva pratibhāti me || 92.11 ||
"आज केवल इन्द्रजित के न रहने से मुझे सारे तीनों लोक और वन-सहित यह पृथ्वी भी सूनी-सूनी प्रतीत होती है।"
श्लोक 12 (yuddha.92.12)
अद्य नैर्ऋतकन्यानां श्रोष्याम्यन्तःपुरे रवम्। करेणुसङ्घस्य यथा निनादं गिरिगह्वरे ॥ 92.12 ॥
adya nairṛtakanyānāṃ śroṣyāmyantaḥpure ravam| kareṇusaṅghasya yathā ninādaṃ girigahvare || 92.12 ||
"आज मैं अपने अन्तःपुर में राक्षस-कन्याओं का वैसा ही करुण क्रन्दन सुनूँगा जैसे पर्वत की कन्दरा में हथिनियों के झुंड की चीत्कार गूँजती है।"
श्लोक 13 (yuddha.92.13)
यौवराज्यं च लङ्कां च रक्षांसि च परंतप। मातरं मां च भार्याश्च क्व गतोऽसि विहाय नः ॥ 92.13 ॥
yauvarājyaṃ ca laṅkāṃ ca rakṣāṃsi ca paraṃtapa| mātaraṃ māṃ ca bhāryāśca kva gato'si vihāya naḥ || 92.13 ||
"हे परंतप! युवराज-पद, लंका, समस्त राक्षसों, अपनी माता, मुझको और अपनी पत्नियों को छोड़कर तुम हम सबको त्यागकर कहाँ चले गए?"
श्लोक 14 (yuddha.92.14)
मम नाम त्वया वीर गतस्य यमसादनम्। प्रेतकार्याणि कार्याणि विपरीते हि वर्तसे ॥ 92.14 ॥
mama nāma tvayā vīra gatasya yamasādanam| pretakāryāṇi kāryāṇi viparīte hi vartase || 92.14 ||
"हे वीर! यमलोक जाने की तो मेरी बारी थी, और मेरे प्रेत-कर्म तुम्हें करने थे—किन्तु तुमने तो विपरीत मार्ग अपना लिया।"
श्लोक 15 (yuddha.92.15)
स त्वं जीवति सुग्रीवे लक्ष्मणे च सराघवे। मम शल्यमनुद्धृत्य क्व गतोऽसि विहाय नः ॥ 92.15 ॥
sa tvaṃ jīvati sugrīve lakṣmaṇe ca sarāghave| mama śalyamanuddhṛtya kva gato'si vihāya naḥ || 92.15 ||
"सुग्रीव, लक्ष्मण और राघव के जीवित रहते हुए ही, मेरे हृदय की इस पीड़ा को बिना दूर किए तुम हमें छोड़कर कहाँ चले गए?"
श्लोक 16 (yuddha.92.16)
एवमादिविलापार्तं रावणं राक्षसाधिपम्। आविवेश महान् कोपः पुत्रव्यसनसम्भवः ॥ 92.16 ॥
evamādivilāpārtaṃ rāvaṇaṃ rākṣasādhipam| āviveśa mahān kopaḥ putravyasanasambhavaḥ || 92.16 ||
इस प्रकार शोकाकुल होकर विलाप करते हुए राक्षसराज रावण को पुत्र की इस विपत्ति से उत्पन्न महान् क्रोध ने आ घेरा।
श्लोक 17 (yuddha.92.17)
प्रकृत्या कोपनं ह्येनं पुत्रस्य पुनराधयः। दीप्तं संदीपयामासुर्घर्मेऽर्कमिव रश्मयः ॥ 92.17 ॥
prakṛtyā kopanaṃ hyenaṃ putrasya punarādhayaḥ| dīptaṃ saṃdīpayāmāsurgharme'rkamiva raśmayaḥ || 92.17 ||
स्वभाव से ही क्रोधी रावण को पुत्र-शोक की उस पीड़ा ने और भी प्रज्वलित कर दिया, जैसे ग्रीष्म में सूर्य की किरणें प्रज्वलित सूर्य को और तेज कर देती हैं।
श्लोक 18 (yuddha.92.18)
ललाटे भ्रुकुटीभिश्च संगताभिर्व्यरोचत। युगान्ते सह नक्रैस्तु महोर्मिभिरिवोदधिः ॥ 92.18 ॥
lalāṭe bhrukuṭībhiśca saṃgatābhirvyarocata| yugānte saha nakraistu mahormibhirivodadhiḥ || 92.18 ||
माथे पर भौंहें चढ़ाए वह वैसे ही दहकने लगा जैसे प्रलयकाल में मगरमच्छों और विशाल लहरों से भरा हुआ समुद्र दहकता है।
श्लोक 19 (yuddha.92.19)
कोपाद् विजृम्भमाणस्य वक्त्राद् व्यक्तमिव ज्वलन्। उत्पपात सधूमाग्निर्वृत्रस्य वदनादिव ॥ 92.19 ॥
kopād vijṛmbhamāṇasya vaktrād vyaktamiva jvalan| utpapāta sadhūmāgnirvṛtrasya vadanādiva || 92.19 ||
क्रोध से जँभाई लेते हुए उसके मुख से मानो साक्षात् धुआँ-युक्त प्रज्वलित अग्नि निकलने लगी, जैसे कभी वृत्रासुर के मुख से निकली थी।
श्लोक 20 (yuddha.92.20)
स पुत्रवधसंतप्तः शूरः क्रोधवशं गतः। समीक्ष्य रावणो बुद्ध्या वैदेह्या रोचयद् वधम् ॥ 92.20 ॥
sa putravadhasaṃtaptaḥ śūraḥ krodhavaśaṃ gataḥ| samīkṣya rāvaṇo buddhyā vaidehyā rocayad vadham || 92.20 ||
पुत्र-वध से संतप्त और क्रोध के वशीभूत हुआ वह वीर रावण, मन में विचार कर सीता के वध का निश्चय करने लगा।
श्लोक 21 (yuddha.92.21)
तस्य प्रकृत्या रक्ते च रक्ते क्रोधाग्निनापि च। रावणस्य महाघोरे दीप्ते नेत्रे बभूवतुः ॥ 92.21 ॥
tasya prakṛtyā rakte ca rakte krodhāgnināpi ca| rāvaṇasya mahāghore dīpte netre babhūvatuḥ || 92.21 ||
स्वभाव से ही लाल और अब क्रोध की अग्नि से और भी लाल हुए रावण के वे दोनों नेत्र अत्यंत भयंकर और अंगारों-से दहकते हुए हो गए।
श्लोक 22 (yuddha.92.22)
घोरं प्रकृत्या रूपं तत् तस्य क्रोधाग्निमूर्च्छितम्। बभूव रूपं क्रुद्धस्य रुद्रस्येव दुरासदम् ॥ 92.22 ॥
ghoraṃ prakṛtyā rūpaṃ tat tasya krodhāgnimūrcchitam| babhūva rūpaṃ kruddhasya rudrasyeva durāsadam || 92.22 ||
स्वभाव से ही भयंकर उसका वह रूप क्रोध की अग्नि से और भी दुर्जेय हो उठा, मानो साक्षात् क्रुद्ध रुद्र का ही रूप हो।
श्लोक 23 (yuddha.92.23)
तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः। दीपाभ्यामिव दीप्ताभ्यां सार्चिषः स्नेहबिन्दवः ॥ 92.23 ॥
tasya kruddhasya netrābhyāṃ prāpatannaśrubindavaḥ| dīpābhyāmiva dīptābhyāṃ sārciṣaḥ snehabindavaḥ || 92.23 ||
उस क्रुद्ध रावण के नेत्रों से आँसू की बूँदें वैसे ही टपकने लगीं जैसे जलते हुए दीपकों से तेल की चिनगारीदार बूँदें टपकती हैं।
श्लोक 24 (yuddha.92.24)
दन्तान् विदशतस्तस्य श्रूयते दशनस्वनः। यन्त्रस्याकृष्यमाणस्य मथ्नतो दानवैरिव ॥ 92.24 ॥
dantān vidaśatastasya śrūyate daśanasvanaḥ| yantrasyākṛṣyamāṇasya mathnato dānavairiva || 92.24 ||
दाँत पीसते हुए उसके दाँतों की वह कड़कड़ाहट ऐसे सुनाई पड़ती थी मानो दानवों द्वारा खींचे और चलाए जा रहे किसी विशाल यंत्र की घर्घराहट हो।
श्लोक 25 (yuddha.92.25)
कालाग्निरिव संक्रुद्धो यां यां दिशमवैक्षत। तस्यां तस्यां भयत्रस्ता राक्षसाः संविलिल्यिरे ॥ 92.25 ॥
kālāgniriva saṃkruddho yāṃ yāṃ diśamavaikṣata| tasyāṃ tasyāṃ bhayatrastā rākṣasāḥ saṃvililyire || 92.25 ||
प्रलयकालीन अग्नि के समान क्रुद्ध वह जिस-जिस दिशा में देखता, उसी-उसी दिशा में भयभीत राक्षस छिप जाते।
श्लोक 26 (yuddha.92.26)
तमन्तकमिव क्रुद्धं चराचरचिखादिषुम्। वीक्षमाणं दिशः सर्वा राक्षसा नोपचक्रमुः ॥ 92.26 ॥
tamantakamiva kruddhaṃ carācaracikhādiṣum| vīkṣamāṇaṃ diśaḥ sarvā rākṣasā nopacakramuḥ || 92.26 ||
चराचर सबको मानो निगल जाने के लिए उद्यत, क्रुद्ध अन्तक के समान सभी दिशाओं में देखते हुए उसके पास कोई भी राक्षस जाने का साहस नहीं कर पाया।
श्लोक 27 (yuddha.92.27)
ततः परमसंक्रुद्धो रावणो राक्षसाधिपः। अब्रवीद् रक्षसां मध्ये संस्तम्भयिषुराहवे ॥ 92.27 ॥
tataḥ paramasaṃkruddho rāvaṇo rākṣasādhipaḥ| abravīd rakṣasāṃ madhye saṃstambhayiṣurāhave || 92.27 ||
तब वह अत्यंत क्रुद्ध राक्षसराज रावण, अपनी सेना को युद्ध के लिए दृढ़ करने की इच्छा से, राक्षसों के बीच बोला।
श्लोक 28 (yuddha.92.28)
मया वर्षसहस्राणि चरित्वा परमं तपः। तेषु तेष्ववकाशेषु स्वयंभूः परितोषितः ॥ 92.28 ॥
mayā varṣasahasrāṇi caritvā paramaṃ tapaḥ| teṣu teṣvavakāśeṣu svayaṃbhūḥ paritoṣitaḥ || 92.28 ||
"मैंने हजारों वर्षों तक परम तप करके, उन-उन अवसरों पर स्वयंभू ब्रह्मा को संतुष्ट किया था।"
श्लोक 29 (yuddha.92.29)
तस्यैव तपसो व्युष्ट्या प्रसादाच्च स्वयंभुवः। नासुरेभ्यो न देवेभ्यो भयं मम कदाचन ॥ 92.29 ॥
tasyaiva tapaso vyuṣṭyā prasādācca svayaṃbhuvaḥ| nāsurebhyo na devebhyo bhayaṃ mama kadācana || 92.29 ||
"उसी तप के फलस्वरूप और स्वयंभू की कृपा से मुझे न कभी असुरों से भय रहा, न देवताओं से।"
श्लोक 30 (yuddha.92.30)
कवचं ब्रह्मदत्तं मे यदादित्यसमप्रभम्। देवासुरविमर्देषु न च्छिन्नं वज्रमुष्टिभिः ॥ 92.30 ॥
kavacaṃ brahmadattaṃ me yadādityasamaprabham| devāsuravimardeṣu na cchinnaṃ vajramuṣṭibhiḥ || 92.30 ||
"ब्रह्मा द्वारा दिया गया मेरा वह सूर्य-समान तेजस्वी कवच देव-असुर संग्रामों में वज्र-धारण करने वालों के प्रहार से भी कभी नहीं भेदा जा सका।"
श्लोक 31 (yuddha.92.31)
तेन मामद्य संयुक्तं रथस्थमिह संयुगे। प्रतीयात् कोऽद्य मामाजौ साक्षादपि पुरंदरः ॥ 92.31 ॥
tena māmadya saṃyuktaṃ rathasthamiha saṃyuge| pratīyāt ko'dya māmājau sākṣādapi puraṃdaraḥ || 92.31 ||
"उसी कवच को धारण किए, आज रथ पर सवार होकर इस युद्धभूमि में, स्वयं इन्द्र भी आज मेरे सम्मुख आने का साहस कहाँ करेगा?"
श्लोक 32 (yuddha.92.32)
यत् तदाभिप्रसन्नेन सशरं कार्मुकं महत्। देवासुरविमर्देषु मम दत्तं स्वयंभुवा ॥ 92.32 ॥
yat tadābhiprasannena saśaraṃ kārmukaṃ mahat| devāsuravimardeṣu mama dattaṃ svayaṃbhuvā || 92.32 ||
"देव-असुर संग्राम के समय प्रसन्न होकर स्वयंभू ने मुझे जो वह महान् धनुष बाणों सहित दिया था—"
श्लोक 33 (yuddha.92.33)
अद्य तूर्यशतैर्भीमं धनुरुत्थाप्यतां मम। रामलक्ष्मणयोरेव वधाय परमाहवे ॥ 92.33 ॥
adya tūryaśatairbhīmaṃ dhanurutthāpyatāṃ mama| rāmalakṣmaṇayoreva vadhāya paramāhave || 92.33 ||
"उस भीषण धनुष को आज सैकड़ों रणवाद्यों के साथ निकाला जाए—इस महासमर में केवल राम और लक्ष्मण के वध के लिए।"
श्लोक 34 (yuddha.92.34)
स पुत्रवधसंतप्तः क्रूरः क्रोधवशं गतः। समीक्ष्य रावणो बुद्ध्या सीतां हन्तुं व्यवस्यत ॥ 92.34 ॥
sa putravadhasaṃtaptaḥ krūraḥ krodhavaśaṃ gataḥ| samīkṣya rāvaṇo buddhyā sītāṃ hantuṃ vyavasyata || 92.34 ||
पुत्र-वध से संतप्त और क्रोधवश हुआ वह क्रूर रावण, मन में विचार कर सीता को मार डालने का निश्चय करने लगा।
श्लोक 35 (yuddha.92.35)
प्रत्यवेक्ष्य तु ताम्राक्षः सुघोरो घोरदर्शनः। दीनो दीनस्वरान् सर्वांस्तानुवाच निशाचरान् ॥ 92.35 ॥
pratyavekṣya tu tāmrākṣaḥ sughoro ghoradarśanaḥ| dīno dīnasvarān sarvāṃstānuvāca niśācarān || 92.35 ||
ताम्रनेत्र, अत्यंत घोर और भयानक-दर्शन वह रावण, दुःखी स्वरों में विलाप करते उन सभी निशाचरों को देखकर स्वयं भी दीन होकर बोला।
श्लोक 36 (yuddha.92.36)
मायया मम वत्सेन वञ्चनार्थं वनौकसाम्। किंचिदेव हतं तत्र सीतेयमिति दर्शितम् ॥ 92.36 ॥
māyayā mama vatsena vañcanārthaṃ vanaukasām| kiṃcideva hataṃ tatra sīteyamiti darśitam || 92.36 ||
"वानरों को धोखा देने के लिए मेरे पुत्र ने माया से किसी और वस्तु को मारकर उसे 'यही सीता है' कहकर दिखा दिया था।"
श्लोक 37 (yuddha.92.37)
तदिदं तथ्यमेवाहं करिष्ये प्रियमात्मनः। वैदेहीं नाशयिष्यामि क्षत्रबन्धुमनुव्रताम् ॥ 92.37 ॥
tadidaṃ tathyamevāhaṃ kariṣye priyamātmanaḥ| vaidehīṃ nāśayiṣyāmi kṣatrabandhumanuvratām || 92.37 ||
"उसी माया को मैं अब सत्य कर दिखाऊँगा, अपनी तुष्टि के लिए—मैं उस वैदेही का नाश कर दूँगा, जो उस क्षत्रिय-अधम के प्रति अनुरक्त है।"
श्लोक 38 (yuddha.92.38)
इत्येवमुक्त्वा सचिवान् खड्गमाशु परामृशत्। उद्धृत्य गुणसम्पन्नं विमलाम्बरवर्चसम् ॥ 92.38 ॥
ityevamuktvā sacivān khaḍgamāśu parāmṛśat| uddhṛtya guṇasampannaṃ vimalāmbaravarcasam || 92.38 ||
मंत्रियों से यह कहकर उसने तुरन्त अपनी तलवार पकड़ ली और निर्मल आकाश-सी कान्ति वाली उस उत्तम तलवार को म्यान से खींच निकाला।
श्लोक 39 (yuddha.92.39)
निष्पपात स वेगेन सभार्यः सचिवैर्वृतः। रावणः पुत्रशोकेन भृशमाकुलचेतनः ॥ 92.39 ॥
niṣpapāta sa vegena sabhāryaḥ sacivairvṛtaḥ| rāvaṇaḥ putraśokena bhṛśamākulacetanaḥ || 92.39 ||
पुत्र-शोक से अत्यंत व्याकुल-चित्त रावण अपने मंत्रियों से घिरा हुआ वेगपूर्वक उठकर चल पड़ा,
श्लोक 40 (yuddha.92.40)
संक्रुद्धः खड्गमादाय सहसा यत्र मैथिली। व्रजन्तं राक्षसं प्रेक्ष्य सिंहनादं विचुक्रुशुः ॥ 92.40 ॥
saṃkruddhaḥ khaḍgamādāya sahasā yatra maithilī| vrajantaṃ rākṣasaṃ prekṣya siṃhanādaṃ vicukruśuḥ || 92.40 ||
क्रुद्ध होकर तलवार लिए हुए सीधे उस स्थान की ओर जहाँ मैथिली थीं। उस राक्षसराज को जाते देख उसके अनुचरों ने सिंहनाद किया।
श्लोक 41 (yuddha.92.41)
ऊचुश्चान्योन्यमालिङ्ग्य संक्रुद्धं प्रेक्ष्य राक्षसम्। अद्यैनं तावुभौ दृष्ट्वा भ्रातरौ प्रव्यथिष्यतः ॥ 92.41 ॥
ūcuścānyonyamāliṅgya saṃkruddhaṃ prekṣya rākṣasam| adyainaṃ tāvubhau dṛṣṭvā bhrātarau pravyathiṣyataḥ || 92.41 ||
क्रुद्ध राजा को देखकर परस्पर आलिंगन करते हुए वे कहने लगे: "आज इन्हें इस रूप में देखकर वे दोनों भाई अवश्य ही व्यथित हो उठेंगे।"
श्लोक 42 (yuddha.92.42)
लोकपाला हि चत्वारः क्रुद्धेनानेन निर्जिताः। बहवः शत्रवश्चान्ये संयुगेष्वभिपातिताः ॥ 92.42 ॥
lokapālā hi catvāraḥ kruddhenānena nirjitāḥ| bahavaḥ śatravaścānye saṃyugeṣvabhipātitāḥ || 92.42 ||
"इसी क्रोधित रूप ने तो चारों लोकपालों को भी जीत लिया था; अन्य अनेक शत्रु भी युद्धों में इसके द्वारा मार गिराए गए हैं।"
श्लोक 43 (yuddha.92.43)
त्रिषु लोकेषु रत्नानि भुङ्क्ते आहृत्य रावणः। विक्रमे च बले चैव नास्त्यस्य सदृशो भुवि ॥ 92.43 ॥
triṣu lokeṣu ratnāni bhuṅkte āhṛtya rāvaṇaḥ| vikrame ca bale caiva nāstyasya sadṛśo bhuvi || 92.43 ||
"रावण तीनों लोकों के रत्नों को हरकर भोगता है; पराक्रम और बल में इसके समान इस पृथ्वी पर कोई नहीं है।"
श्लोक 44 (yuddha.92.44)
तेषां संजल्पमानानामशोकवनिकां गताम्। अभिदुद्राव वैदेहीं रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥ 92.44 ॥
teṣāṃ saṃjalpamānānāmaśokavanikāṃ gatām| abhidudrāva vaidehīṃ rāvaṇaḥ krodhamūrcchitaḥ || 92.44 ||
उनके इस प्रकार परस्पर बातचीत करते रहने के बीच, क्रोध से उन्मत्त रावण अशोक-वाटिका में स्थित वैदेही की ओर दौड़ पड़ा।
श्लोक 45 (yuddha.92.45)
वार्यमाणः सुसंक्रुद्धः सुहृद्भिर्हितबुद्धिभिः। अभ्यधावत संक्रुद्धः खे ग्रहो रोहिणीमिव ॥ 92.45 ॥
vāryamāṇaḥ susaṃkruddhaḥ suhṛdbhirhitabuddhibhiḥ| abhyadhāvata saṃkruddhaḥ khe graho rohiṇīmiva || 92.45 ||
हितैषी मित्रों द्वारा रोके जाने पर भी वह अत्यंत क्रुद्ध रावण उसी प्रकार दौड़ा जैसे आकाश में कोई क्रुद्ध ग्रह रोहिणी नक्षत्र की ओर दौड़ता है।
श्लोक 46 (yuddha.92.46)
मैथिली रक्ष्यमाणा तु राक्षसीभिरनिन्दिता। ददर्श राक्षसं क्रुद्धं निस्त्रिंशवरधारिणम् ॥ 92.46 ॥
maithilī rakṣyamāṇā tu rākṣasībhiraninditā| dadarśa rākṣasaṃ kruddhaṃ nistriṃśavaradhāriṇam || 92.46 ||
राक्षसियों के पहरे में रखी गई निर्दोष मैथिली ने उस उत्तम तलवार को धारण किए हुए क्रुद्ध राक्षसराज को आते देखा।
श्लोक 47 (yuddha.92.47)
तं निशम्य सनिस्त्रिंशं व्यथिता जनकात्मजा। निवार्यमाणं बहुशः सुहृद्भिरनिवर्तिनम् ॥ 92.47 ॥
taṃ niśamya sanistriṃśaṃ vyathitā janakātmajā| nivāryamāṇaṃ bahuśaḥ suhṛdbhiranivartinam || 92.47 ||
तलवार लिए हुए, बार-बार मित्रों द्वारा रोके जाने पर भी न रुकने वाले उस रावण को देखकर जनकनन्दिनी व्यथित हो उठीं।
श्लोक 48 (yuddha.92.48)
सीता दुःखसमाविष्टा विलपन्तीदमब्रवीत्। यथायं मामभिक्रुद्धः समभिद्रवति स्वयम् ॥ 92.48 ॥
sītā duḥkhasamāviṣṭā vilapantīdamabravīt| yathāyaṃ māmabhikruddhaḥ samabhidravati svayam || 92.48 ||
दुःख से आविष्ट सीता विलाप करते हुए स्वयं से कहने लगीं: "जिस प्रकार यह स्वयं क्रुद्ध होकर मेरी ओर दौड़ा आ रहा है,"
श्लोक 49 (yuddha.92.49)
वधिष्यति सनाथां मामनाथामिव दुर्मतिः। बहुशश्चोदयामास भर्तारं मामनुव्रताम् ॥ 92.49 ॥
vadhiṣyati sanāthāṃ māmanāthāmiva durmatiḥ| bahuśaścodayāmāsa bhartāraṃ māmanuvratām || 92.49 ||
"यह दुर्बुद्धि, सनाथ होते हुए भी मुझे अनाथ के समान मार डालेगा। इसने मुझे, जो अपने पति के प्रति अनुरक्त हूँ, बार-बार पति को त्यागने के लिए उकसाया था।"
श्लोक 50 (yuddha.92.50)
भार्या मम भवस्वेति प्रत्याख्यातो ध्रुवं मया। सोऽयं मामनुपस्थाने व्यक्तं नैराश्यमागतः ॥ 92.50 ॥
bhāryā mama bhavasveti pratyākhyāto dhruvaṃ mayā| so'yaṃ māmanupasthāne vyaktaṃ nairāśyamāgataḥ || 92.50 ||
"'मेरी पत्नी बन जाओ' ऐसा कहने पर मैंने इसे दृढ़तापूर्वक अस्वीकार कर दिया था। मेरे न मानने से यह स्पष्ट ही निराशा को प्राप्त हो गया है,"
श्लोक 51 (yuddha.92.51)
क्रोधमोहसमाविष्टो व्यक्तं मां हन्तुमुद्यतः। अथवा तौ नरव्याघ्रौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ 92.51 ॥
krodhamohasamāviṣṭo vyaktaṃ māṃ hantumudyataḥ| athavā tau naravyāghrau bhrātarau rāmalakṣmaṇau || 92.51 ||
"और क्रोध तथा मोह से ग्रस्त होकर स्पष्टतः मुझे मार डालने को उद्यत हो गया है। अथवा—वे दोनों नरव्याघ्र भ्राता राम और लक्ष्मण,"
श्लोक 52 (yuddha.92.52)
मन्निमित्तमनार्येण समरेऽद्य निपातितौ। भैरवो हि महान् नादो राक्षसानां श्रुतो मया ॥ 92.52 ॥
mannimittamanāryeṇa samare'dya nipātitau| bhairavo hi mahān nādo rākṣasānāṃ śruto mayā || 92.52 ||
"शायद मेरे ही कारण, आज इस नीच के द्वारा युद्ध में मार डाले गए हों। क्योंकि मैंने राक्षसों का वह अत्यंत भयंकर महानाद सुना था—"
श्लोक 53 (yuddha.92.53)
बहूनामिह हृष्टानां तथा विक्रोशतां प्रियम्। अहो धिङ्मन्निमित्तोऽयं विनाशो राजपुत्रयोः ॥ 92.53 ॥
bahūnāmiha hṛṣṭānāṃ tathā vikrośatāṃ priyam| aho dhiṅmannimitto'yaṃ vināśo rājaputrayoḥ || 92.53 ||
"बहुत से राक्षस यहाँ किसी प्रिय बात पर हर्षित होकर जय-जयकार कर रहे थे। हाय! धिक्कार है मुझे, यदि उन दोनों राजकुमारों का यह विनाश मेरे ही कारण हुआ हो!"
श्लोक 54 (yuddha.92.54)
अथवा पुत्रशोकेन अहत्वा रामलक्ष्मणौ। विधमिष्यति मां रौद्रो राक्षसः पापनिश्चयः ॥ 92.54 ॥
athavā putraśokena ahatvā rāmalakṣmaṇau| vidhamiṣyati māṃ raudro rākṣasaḥ pāpaniścayaḥ || 92.54 ||
"अथवा राम-लक्ष्मण को न मार सकने के कारण, पुत्र-शोक से पीड़ित यह भयंकर पापी राक्षस अब मुझे ही नष्ट कर देगा।"
श्लोक 55 (yuddha.92.55)
हनूमतस्तु तद् वाक्यं न कृतं क्षुद्रया मया। यद्यहं तस्य पृष्ठेन तदायासमनिर्जिता ॥ 92.55 ॥
hanūmatastu tad vākyaṃ na kṛtaṃ kṣudrayā mayā| yadyahaṃ tasya pṛṣṭhena tadāyāsamanirjitā || 92.55 ||
"हनुमान की उस बात को मैंने अपनी क्षुद्रबुद्धि के कारण नहीं माना था। यदि उस दिन मैं उनकी पीठ पर बैठकर बिना जीते ही चली गई होती,"
श्लोक 56 (yuddha.92.56)
नाद्यैवमनुशोचेयं भर्तुरङ्कगता सती। मन्ये तु हृदयं तस्याः कौसल्यायाः फलिष्यति ॥ 92.56 ॥
nādyaivamanuśoceyaṃ bharturaṅkagatā satī| manye tu hṛdayaṃ tasyāḥ kausalyāyāḥ phaliṣyati || 92.56 ||
"तो आज मुझे इस प्रकार शोक न करना पड़ता, पतिव्रता सीता अपने पति की गोद में विराजमान होती। मुझे तो लगता है कि उस कौसल्या का हृदय ही फट जाएगा—"
श्लोक 57 (yuddha.92.57)
एकपुत्रा यदा पुत्रं विनष्टं श्रोष्यते युधि। सा हि जन्म च बाल्यं च यौवनं च महात्मनः ॥ 92.57 ॥
ekaputrā yadā putraṃ vinaṣṭaṃ śroṣyate yudhi| sā hi janma ca bālyaṃ ca yauvanaṃ ca mahātmanaḥ || 92.57 ||
"जब वह अपने एकमात्र पुत्र को युद्ध में मारा गया सुनेगी। वह उस महात्मा के जन्म, बाल्यकाल और यौवन को,"
श्लोक 58 (yuddha.92.58)
धर्मकार्याणि रूपं च रुदती संस्मरिष्यति। निराशा निहते पुत्रे दत्त्वा श्राद्धमचेतना ॥ 92.58 ॥
dharmakāryāṇi rūpaṃ ca rudatī saṃsmariṣyati| nirāśā nihate putre dattvā śrāddhamacetanā || 92.58 ||
"उनके धर्म-कार्यों और रूप को रोते हुए स्मरण करेगी। पुत्र के मारे जाने पर निराश और मूर्च्छित होकर, श्राद्ध सम्पन्न कर,"
श्लोक 59 (yuddha.92.59)
अग्निमावेक्ष्यते नूनमपो वापि प्रवेक्ष्यति। धिगस्तु कुब्जामसतीं मन्थरां पापनिश्चयाम् ॥ 92.59 ॥
agnimāvekṣyate nūnamapo vāpi pravekṣyati| dhigastu kubjāmasatīṃ mantharāṃ pāpaniścayām || 92.59 ||
"वह निश्चय ही अग्नि में प्रवेश कर लेगी, अथवा जल में डूब जाएगी। धिक्कार है उस कुबड़ी, कुटिल और पापबुद्धि मन्थरा को,"
श्लोक 60 (yuddha.92.60)
यन्निमित्तमिमं शोकं कौसल्या प्रतिपत्स्यते। इत्येवं मैथिलीं दृष्ट्वा विलपन्तीं तपस्विनीम् ॥ 92.60 ॥
yannimittamimaṃ śokaṃ kausalyā pratipatsyate| ityevaṃ maithilīṃ dṛṣṭvā vilapantīṃ tapasvinīm || 92.60 ||
"जिसके कारण कौसल्या को यह शोक सहना पड़ेगा।" इस प्रकार विलाप करती हुई तपस्विनी मैथिली को देखकर,
श्लोक 61 (yuddha.92.61)
रोहिणीमिव चन्द्रेण बिना ग्रहवशं गताम्। एतस्मिन्नन्तरे तस्य अमात्यः शीलवान् शुचिः ॥ 92.61 ॥
rohiṇīmiva candreṇa binā grahavaśaṃ gatām| etasminnantare tasya amātyaḥ śīlavān śuciḥ || 92.61 ||
मानो चन्द्रमा से बिछुड़कर किसी ग्रह के वश में पड़ी रोहिणी हो—उसी समय रावण का एक शीलवान और पवित्र मंत्री,
श्लोक 62 (yuddha.92.62)
सुपार्श्वो नाम मेधावी रावणं रक्षसां वरम्। निवार्यमाणः सचिवैरिदं वचनमब्रवीत् ॥ 92.62 ॥
supārśvo nāma medhāvī rāvaṇaṃ rakṣasāṃ varam| nivāryamāṇaḥ sacivairidaṃ vacanamabravīt || 92.62 ||
जिसका नाम सुपार्श्व था और जो अत्यंत बुद्धिमान था, अन्य मंत्रियों द्वारा रोके जाने पर भी राक्षसश्रेष्ठ रावण से यह वचन बोला।
श्लोक 63 (yuddha.92.63)
कथं नाम दशग्रीव साक्षाद्वैश्रवणानुज। हन्तुमिच्छसि वैदेहीं क्रोधाद् धर्ममपास्य च ॥ 92.63 ॥
kathaṃ nāma daśagrīva sākṣādvaiśravaṇānuja| hantumicchasi vaidehīṃ krodhād dharmamapāsya ca || 92.63 ||
"हे दशग्रीव! साक्षात् वैश्रवण के अनुज होकर भी तुम धर्म को त्यागकर क्रोधवश वैदेही को मार डालना कैसे चाहते हो?"
श्लोक 64 (yuddha.92.64)
वेदविद्याव्रतस्नातः स्वकर्मनिरतस्तथा। स्त्रियः कस्माद् वधं वीर मन्यसे राक्षसेश्वर ॥ 92.64 ॥
vedavidyāvratasnātaḥ svakarmaniratastathā| striyaḥ kasmād vadhaṃ vīra manyase rākṣaseśvara || 92.64 ||
"वेदाध्ययन-व्रत से स्नातक और सदा अपने कर्तव्य में तत्पर रहने वाले तुम, हे वीर राक्षसेश्वर, एक स्त्री का वध क्यों सोचते हो?"
श्लोक 65 (yuddha.92.65)
मैथिलीं रूपसम्पन्नां प्रत्यवेक्षस्व पार्थिव। तस्मिन्नेव सहास्माभिराहवे क्रोधमुत्सृज ॥ 92.65 ॥
maithilīṃ rūpasampannāṃ pratyavekṣasva pārthiva| tasminneva sahāsmābhirāhave krodhamutsṛja || 92.65 ||
"हे राजन्, रूपसम्पन्न इस मैथिली को फिर से देखिए, और अपना यह क्रोध हम सबके साथ युद्ध में केवल राम पर उतारिए।"
श्लोक 66 (yuddha.92.66)
अभ्युत्थानं त्वमद्यैव कृष्णपक्षचतुर्दशी। कृत्वा निर्याह्यमावास्यां विजयाय बलैर्वृतः ॥ 92.66 ॥
abhyutthānaṃ tvamadyaiva kṛṣṇapakṣacaturdaśī| kṛtvā niryāhyamāvāsyāṃ vijayāya balairvṛtaḥ || 92.66 ||
"आज ही, इस कृष्णपक्ष चतुर्दशी को, तैयारी कर लीजिए और कल अमावस्या को अपनी सेनाओं सहित विजय के लिए प्रस्थान कीजिए।"
श्लोक 67 (yuddha.92.67)
शूरो धीमान् रथी खड्गी रथप्रवरमास्थितः। हत्वा दाशरथिं रामं भवान् प्राप्स्यति मैथिलीम् ॥ 92.67 ॥
śūro dhīmān rathī khaḍgī rathapravaramāsthitaḥ| hatvā dāśarathiṃ rāmaṃ bhavān prāpsyati maithilīm || 92.67 ||
"शूरवीर, बुद्धिमान, रथी और खड्गधारी होकर श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ आप दाशरथि राम को मारकर ही मैथिली को प्राप्त कर सकेंगे।"
श्लोक 68 (yuddha.92.68)
स तद् दुरात्मा सुहृदा निवेदितं वचः सुधर्म्यं प्रतिगृह्य रावणः। गृहं जगामाथ ततश्च वीर्यवान् पुनः सभां च प्रययौ सुहृद्वृतः ॥ 92.68 ॥
sa tad durātmā suhṛdā niveditaṃ vacaḥ sudharmyaṃ pratigṛhya rāvaṇaḥ| gṛhaṃ jagāmātha tataśca vīryavān punaḥ sabhāṃ ca prayayau suhṛdvṛtaḥ || 92.68 ||
मित्र द्वारा दिए गए उस धर्मानुकूल परामर्श को स्वीकार कर दुरात्मा रावण अपने महल को गया; और फिर वह पराक्रमी रावण अपने मित्रों से घिरा हुआ पुनः सभा-भवन की ओर चला गया।