अगस्त्य उवाच ॥ न गृह्णाति वचः पथ्यं कामक्रोधादिपीडितः । हितं न रोचते तस्य मुमूर्षोरिव भेषजम् ॥३-१॥
agastya uvāca || na gṛhṇāti vacaḥ pathyaṃ kāmakrodhādipīḍitaḥ | hitaṃ na rocate tasya mumūrṣoriva bheṣajam ||3-1||
।।३-१।। काम-क्रोध आदि से पीड़ित व्यक्ति हितकर वचन ग्रहण नहीं करता; उसे हित नहीं भाता, जैसे मरणासन्न को औषधि नहीं भाती।
Modern Reflection
।।३-१।। एक भारतीय कैंसर-विशेषज्ञ प्रशिक्षण में शीघ्र सीखता है कि तीव्र संकट में रोगी अक्सर आँकड़े या उपचार-योजना नहीं समझ पाते चाहे कितनी स्पष्टता से समझाई जाए, जानकारी चिकित्सकीय रूप से सही और उस क्षण मनोवैज्ञानिक रूप से बेकार होती है। यह श्लोक आधुनिक चिकित्सा के औपचारिक होने से सदियों पहले ठीक इसी नैदानिक सच्चाई का नाम लेता है: हितं न रोचते, हितकर बात इस अवस्था के मन को भाती ही नहीं। अगस्त्य की प्रतिक्रिया वही औषधि ज़ोर से दोहराना नहीं, बल्कि आगे के श्लोकों में पूरी तरह दिशा बदलना है, तत्त्वज्ञान से सैन्य-रणनीति की ओर, राम की वास्तविक क्षमता से मिलते हुए, उनकी आदर्श क्षमता से नहीं।