सूत उवाच ॥ अथ प्रादुरभूत्तत्र हिरण्मयरथो महान् । अनेकदिव्यरत्नांशुकिर्मीरितदिगन्तरः ॥ १॥
sūta uvāca || atha prādurabhūttatra hiraṇmayaratho mahān | anekadivyaratnāṁśukirmīritadigantaraḥ || 1||
।।5.1।। सूत जी बोले: तब वहाँ एक विशाल स्वर्णिम रथ प्रकट हुआ, जिसके अनेक दिव्य रत्नों की किरणें समस्त दिशाओं को रंग रही थीं।
Modern Reflection
।।5.1।। पुरी की रथयात्रा हर जून में लकड़ी से बिल्कुल नई बना कर, सुनहरे रंग में सजा कर निकलती है, और इस श्लोक के वर्णन जैसा ही प्रभाव पैदा करती है, हज़ारों तीर्थयात्री रथ के हिलने से पहले ही सूरज की रोशनी में उसकी किरणों की एक झलक पाने के लिए संघर्ष करते हैं। श्लोक का 'हिरण्मयरथः', स्वर्णिम रथ, रत्न-प्रकाश से हर दिशा को रंगते हुए आना, ठीक वही सांवेदनिक आघात वर्णित कर रहा है जो एक पुरी तीर्थयात्री आज भी हर साल नए बने जगन्नाथ रथ की पहली झलक पर महसूस करता है।