श्रीराम उवाच । भगवन्नत्र मे चित्रं महदेतत्प्रजायते । शुद्धस्फटिकसंकाशस्त्रिनेत्रश्चन्द्रशेखरः ॥६-१॥
śrīrāma uvāca | bhagavannatra me citraṃ mahadetatprajāyate | śuddhasphaṭikasaṃkāśastrinetraścandraśekharaḥ ||6-1||
।।6.1।। श्रीराम ने कहा: हे भगवन्, मुझे यहाँ एक महान आश्चर्य होता है। आप शुद्ध स्फटिक के समान, त्रिनेत्र और चन्द्रशेखर हैं।
Modern Reflection
।।6.1।। छठा अध्याय राम के 'चित्रम्,' आश्चर्य से खुलता है, संदेह से नहीं — पाँचवें अध्याय की सामरिक चिंता से बिल्कुल भिन्न भाव। पिछले अध्याय की अंतिम पंक्तियों में यह दिखाए जाने के बाद कि शिव पूरे ब्रह्मांड को निगल जाते हैं, राम अब सामने वाले वास्तविक रूप को देखते हैं: स्फटिक-शुद्ध, त्रिनेत्र, चन्द्रशेखर, पार्वती सहित रथ पर बैठे। ब्रह्मांडीय दावे और दृश्यमान रूप के बीच का यह अंतर ही आश्चर्य उत्पन्न करता है, भय नहीं। यह वही ध्यान है जो एक भक्त मंदिर में दर्शन के समय देता है — विशिष्ट, वर्णनीय मूर्ति को देखते हुए और साथ ही यह जानते हुए कि यही रूप संपूर्ण ब्रह्मांड को समाहित करता कहा जाता है।