श्रीराम उवाच ॥ भगवन्नत्र जीवोऽसौ जन्तोर्देहेऽवतिष्ठते । जायते वा कुतो जीवः स्वरूपं चास्य किं वद ॥१०-१॥
śrīrāma uvāca || bhagavannatra jīvo'sau jantordehe'vatiṣṭhate | jāyate vā kuto jīvaḥ svarūpaṁ cāsya kiṁ vada ||10-1||
।।४४०।। श्रीराम ने कहा: हे भगवन्, क्या यह जीव प्राणी की देह में मात्र निवास करता है, या उत्पन्न होता है? कहाँ से? इसका स्वरूप क्या है, कहिए।
Modern Reflection
।।४४०।। वाराणसी के एक घाट पर पहली बार सम्मानजनक दूरी से दाह-संस्कार देखने के बाद एक दस-वर्षीय बच्ची अपने दादा से पूछती है, 'वह कहाँ गए, क्या वे कभी सचमुच उस देह में थे भी', ठीक राम का यही प्रश्न पूछ रही है, कि क्या जीव किसी देह में जिसे वह जन्म नहीं देता केवल अस्थायी रूप से 'निवास' करता है, या किसी तरह उसके साथ ही जन्म लेता है। अध्याय-विभाजन की अचानकता स्वयं शिक्षाप्रद है: अध्याय 9 शरीर की पूर्ण असारता पर समाप्त होता है, और अध्याय 10 लगभग बिना रुके उसी स्पष्ट अगले प्रश्न पर खुलता है जिसे कोई भी ध्यानपूर्ण श्रोता पहले से बना रहा होगा।