श्रीराम उवाच । भगवन्यदि ते रूपं सच्चिदानन्दविग्रहम् । निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ॥१४-१॥
śrīrāma uvāca | bhagavanyadi te rūpaṃ saccidānandavigraham | niṣkalaṃ niṣkriyaṃ śāntaṃ niravadyaṃ nirañjanam ||14-1||
।।१४-१।। श्रीराम बोले: हे भगवन्, यदि आपका रूप सच्चिदानन्दविग्रह है, निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरवद्य, निरञ्जन है,
Modern Reflection
।।१४-१।। यह श्लोक अध्याय की शुरुआत पाँच निषेधात्मक या अभावात्मक विशेषणों की तेज़ शृंखला से करता है, निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरवद्य, निरञ्जन, और विशेषणों का यह ढेर स्वयं एक अलंकारिक रणनीति है जिसका प्रयोग राम आगे आने वाले श्लोक में उस कठिन प्रश्न को स्थापित करने के लिए कर रहे हैं।