श्रीभगवानुवाच यो विद्याश्रुतसम्पन्नः आत्मवान् नानुमानिकः । मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥ 19.1 ॥
śrī-bhagavān uvāca yo vidyā-śruta-sampannaḥ ātmavān nānumānikaḥ māyā-mātram idaṁ jñātvā jñānaṁ ca mayi sannyaset
श्री भगवान ने कहा — जो विद्या और शास्त्रज्ञान से सम्पन्न है, आत्मवान है और मात्र तर्कवादी नहीं है, वह इस जगत् को केवल माया जानकर, अपने उस ज्ञान को भी मुझमें समर्पित कर दे।