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The Uddhava Gita is drawn from the Srimad Bhagavata Purana

The Perfection of Spiritual Knowledge

ज्ञान की पूर्णता

श्रीउद्धवगीता

45 versesChapter 14

Verses · श्लोक

Verse 1

श्रीभगवानुवाच यो विद्याश्रुतसम्पन्नः आत्मवान् नानुमानिकः । मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥ 19.1 ॥

śrī-bhagavān uvāca yo vidyā-śruta-sampannaḥ ātmavān nānumānikaḥ māyā-mātram idaṁ jñātvā jñānaṁ ca mayi sannyaset

श्री भगवान ने कहा — जो विद्या और शास्त्रज्ञान से सम्पन्न है, आत्मवान है और मात्र तर्कवादी नहीं है, वह इस जगत् को केवल माया जानकर, अपने उस ज्ञान को भी मुझमें समर्पित कर दे।

Verse 2

ज्ञानिनस्त्वहमेवेष्टः स्वार्थो हेतुश्च सम्मतः । स्वर्गश्चैवापवर्गश्च नान्योऽर्थो मदृते प्रियः ॥ 19.2 ॥

jñāninas tv aham eveṣṭaḥ svārtho hetuś ca sammataḥ svargaś caivāpavargaś ca nānyo ’rtho mad-ṛte priyaḥ

ज्ञानी पुरुष के लिए मैं ही इष्ट हूं, मैं ही उसका स्वार्थ और स्वर्ग व मोक्ष दोनों का हेतु हूं; मेरे अतिरिक्त उसे कोई अन्य वस्तु प्रिय नहीं होती।

Verse 3

ज्ञानविज्ञानसंसिद्धाः पदं श्रेष्ठं विदुर्मम । ज्ञानी प्रियतमोऽतो मे ज्ञानेनासौ बिभर्ति माम् ॥ 19.3 ॥

jñāna-vijñāna-saṁsiddhāḥ padaṁ śreṣṭhaṁ vidur mama jñānī priyatamo ’to me jñānenāsau bibharti mām

ज्ञान और विज्ञान से सिद्ध पुरुष मेरे परम पद को जानते हैं; अतः ज्ञानी मुझे सबसे प्रिय है, और वह अपने ज्ञान से मुझे धारण करता है।

Verse 4

तपस्तीर्थं जपो दानं पवित्राणीतराणि च । नालं कुर्वन्ति तां सिद्धिं या ज्ञानकलया कृता ॥ 19.4 ॥

tapas tīrthaṁ japo dānaṁ pavitrāṇītarāṇi ca nālaṁ kurvanti tāṁ siddhiṁ yā jñāna-kalayā kṛtā

तप, तीर्थ, जप, दान और अन्य पवित्र कर्म भी वह सिद्धि प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं, जो ज्ञान की एक कणिका मात्र से प्राप्त हो जाती है।

Verse 5

तस्माज्ज्ञानेन सहितं ज्ञात्वा स्वात्मानमुद्धव । ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो भज मां भक्तिभावतः ॥ 19.5 ॥

tasmāj jñānena sahitaṁ jñātvā svātmānam uddhava jñāna-vijñāna-sampanno bhaja māṁ bhakti-bhāvataḥ

अतः हे उद्धव! ज्ञान सहित अपनी आत्मा को जानकर, ज्ञान और विज्ञान से सम्पन्न होकर, भक्तिभाव से मेरा भजन करो।

Verse 6

ज्ञानविज्ञानयज्ञेन मामिष्ट्वात्मानमात्मनि । सर्वयज्ञपतिं मां वै संसिद्धिं मुनयोऽगमन् ॥ 19.6 ॥

jñāna-vijñāna-yajñena mām iṣṭvātmānam ātmani sarva-yajña-patiṁ māṁ vai saṁsiddhiṁ munayo ’gaman

ज्ञान और विज्ञान के यज्ञ द्वारा, आत्मा में स्थित आत्मस्वरूप, सर्वयज्ञपति मुझको पूजकर, मुनियों ने सिद्धि प्राप्त की।

Verse 7

त्वय्युद्धवाश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायान्तरापतति नाद्यपवर्गयोर्यत् । जन्मादयोऽस्य यदमी तव तस्य किं स्यु- राद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये ॥ 19.7 ॥

tvayy uddhavāśrayati yas tri-vidho vikāro māyāntarāpatati nādy-apavargayor yat janmādayo ’sya yad amī tava tasya kiṁ syur ādy-antayor yad asato ’sti tad eva madhye

हे उद्धव! जो त्रिविध विकार (शरीर, मन, इन्द्रियां) तुझमें आश्रित प्रतीत होता है, वह केवल माया के मध्यकाल में प्रकट होता है, उसकी आदि और अंत में कोई सत्ता नहीं है। उसके जन्मादि विकार तुझ आत्मा के कैसे हो सकते हैं? जो आदि और अंत में असत् है, वह मध्य में भी वास्तव में सत् नहीं है।

Verse 8

श्रीउद्धव उवाच ज्ञानं विशुद्धं विपुलं यथैत- द्वैराग्यविज्ञानयुतं पुराणम् । आख्याहि विश्वेश्वर विश्वमूर्ते त्वद्भक्तियोगं च महद्विमृग्यम् ॥ 19.8 ॥

śrī-uddhava uvāca jñānaṁ viśuddhaṁ vipulaṁ yathaitad vairāgya-vijñāna-yutaṁ purāṇam ākhyāhi viśveśvara viśva-mūrte tvad-bhakti-yogaṁ ca mahad-vimṛgyam

श्री उद्धव ने कहा — हे विश्वेश्वर, हे विश्वमूर्ते! उस शुद्ध, विपुल, वैराग्य और विज्ञान से युक्त सनातन ज्ञान का, तथा महापुरुषों द्वारा अन्वेषित आपकी भक्तियोग का वर्णन कीजिए।

Verse 9

तापत्रयेणाभिहतस्य घोरे सन्तप्यमानस्य भवाध्वनीश । पश्यामि नान्यच्छरणं तवाङ्घ्रि- द्वन्द्वातपत्रादमृताभिवर्षात् ॥ 19.9 ॥

tāpa-trayeṇābhihatasya ghore santapyamānasya bhavādhvanīśa paśyāmi nānyac charaṇaṁ tavāṅghri- dvandvātapatrād amṛtābhivarṣāt

हे संसार-मार्ग के स्वामी! त्रिविध तापों से पीड़ित और संतप्त होते हुए मुझे आपके चरण-युगल रूपी छत्र के अतिरिक्त, जो अमृत की वर्षा करता है, अन्य कोई शरण नहीं दिखाई देती।

Verse 10

दष्टं जनं सम्पतितं बिलेऽस्मिन् कालाहिना क्षुद्रसुखोरुतर्षम् । समुद्धरैनं कृपयापवर्ग्यै- र्वचोभिरासिञ्च महानुभाव ॥ 19.10 ॥

daṣṭaṁ janaṁ sampatitaṁ bile ’smin kālāhinā kṣudra-sukhoru-tarṣam samuddharainaṁ kṛpayāpavargyair vacobhir āsiñca mahānubhāva

हे महानुभाव! इस बिल में गिरे हुए, काल-सर्प द्वारा दंशित, तथा तुच्छ सुख की तीव्र तृष्णा वाले इस जन का कृपापूर्वक उद्धार कीजिए, और मुझे मुक्तिदायक वचनों से सींचिए।

Verse 11

श्रीभगवानुवाच इत्थमेतत् पुरा राजा भीष्मं धर्मभृतां वरम् । अजातशत्रुः पप्रच्छ सर्वेषां नोऽनुशृण्वताम् ॥ 19.11 ॥

śrī-bhagavān uvāca ittham etat purā rājā bhīṣmaṁ dharma-bhṛtāṁ varam ajāta-śatruḥ papraccha sarveṣāṁ no ’nuśṛṇvatām

श्री भगवान ने कहा — पूर्वकाल में इसी प्रकार राजा अजातशत्रु (युधिष्ठिर) ने धर्मधुरन्धरों में श्रेष्ठ भीष्म से यह प्रश्न पूछा था, जब हम सब सुन रहे थे।

Verse 12

निवृत्ते भारते युद्धे सुहृन्निधनविह्वलः । श्रुत्वा धर्मान् बहून् पश्चान्मोक्षधर्मानपृच्छत ॥ 19.12 ॥

nivṛtte bhārate yuddhe suhṛn-nidhana-vihvalaḥ śrutvā dharmān bahūn paścān mokṣa-dharmān apṛcchata

भारत-युद्ध समाप्त होने पर, अपने बन्धुजनों की मृत्यु से व्याकुल होकर, बहुत से धर्मों को सुनने के पश्चात्, उन्होंने अन्त में मोक्ष-धर्म के विषय में पूछा था।

Verse 13

तानहं तेऽभिधास्यामि देवव्रतमुखाच्छ्रुतान् । ज्ञानवैराग्यविज्ञानश्रद्धाभक्त्युपबृंहितान् ॥ 19.13 ॥

tān ahaṁ te ’bhidhāsyāmi deva-vrata-mukhāc chrutān jñāna-vairāgya-vijñāna- śraddhā-bhakty-upabṛṁhitān

मैं तुम्हें वे ही बातें बताऊंगा, जो देवव्रत (भीष्म) के मुख से सुनी गई थीं, और जो ज्ञान, वैराग्य, विज्ञान, श्रद्धा तथा भक्ति से समृद्ध हैं।

Verse 14

नवैकादश पञ्च त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै । ईक्षेताथैकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम् ॥ 19.14 ॥

navaikādaśa pañca trīn bhāvān bhūteṣu yena vai īkṣetāthaikam apy eṣu taj jñānaṁ mama niścitam

जिसके द्वारा मनुष्य समस्त प्राणियों में नौ, ग्यारह, पांच और तीन तत्त्वों को, और फिर उनमें एक ही तत्त्व को देखता है — वही ज्ञान मेरे निश्चित मत में है।

Verse 15

एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत् । स्थित्युत्पत्त्यप्ययान् पश्येद् भावानां त्रिगुणात्मनाम् ॥ 19.15 ॥

etad eva hi vijñānaṁ na tathaikena yena yat sthity-utpatty-apyayān paśyed bhāvānāṁ tri-guṇātmanām

यही विज्ञान है — इसके विपरीत, त्रिगुणात्मक भावों की उत्पत्ति, स्थिति और लय को अलग-अलग देखना विज्ञान नहीं है, अपितु उन सबको एक ही आत्मा के द्वारा देखना, वही सच्चा विज्ञान है।

Verse 16

आदावन्ते च मध्ये च सृज्यात् सृज्यं यदन्वियात् । पुनस्तत्प्रतिसङ्क्रामे यच्छिष्येत तदेव सत् ॥ 19.16 ॥

ādāv ante ca madhye ca sṛjyāt sṛjyaṁ yad anviyāt punas tat-pratisaṅkrāme yac chiṣyeta tad eva sat

जो सृष्टि से सृष्टि तक, आदि, मध्य और अन्त में अन्वित रहता है, और जो उनके पुनः लय होने पर भी शेष रह जाता है — वही सत् है।

Verse 17

श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम् । प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते ॥ 19.17 ॥

śrutiḥ pratyakṣam aitihyam anumānaṁ catuṣṭayam pramāṇeṣv anavasthānād vikalpāt sa virajyate

श्रुति, प्रत्यक्ष, ऐतिह्य और अनुमान — ये चार प्रमाण हैं; इन प्रमाणों में भी स्थिरता न पाकर, मनुष्य इस विकल्प-जाल से विरक्त हो जाता है।

Verse 18

कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्च्यादमङ्गलम् । विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत् ॥ 19.18 ॥

karmaṇāṁ pariṇāmitvād ā-viriñcyād amaṅgalam vipaścin naśvaraṁ paśyed adṛṣṭam api dṛṣṭa-vat

कर्मों के परिणामशील होने के कारण ब्रह्मलोक तक सब कुछ अमंगलमय है; विवेकी पुरुष अदृष्ट को भी दृष्ट के समान नश्वर समझे।

Verse 19

भक्तियोगः पुरैवोक्तः प्रीयमाणाय तेऽनघ । पुनश्च कथयिष्यामि मद्भक्तेः कारणं परं ॥ 19.19 ॥

bhakti-yogaḥ puraivoktaḥ prīyamāṇāya te ’nagha punaś ca kathayiṣyāmi mad-bhakteḥ kāraṇaṁ paraṁ

हे निष्पाप! तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैंने पहले ही भक्तियोग का वर्णन किया है; अब मैं पुनः मेरी भक्ति के परम कारण का वर्णन करूंगा।

Verse 20

श्रद्धामृतकथायां मे शश्वन्मदनुकीर्तनम् । परिनिष्ठा च पूजायां स्तुतिभिः स्तवनं मम ॥ 19.20 ॥

śraddhāmṛta-kathāyāṁ me śaśvan mad-anukīrtanam pariniṣṭhā ca pūjāyāṁ stutibhiḥ stavanaṁ mama

मेरी अमृतमयी कथा में श्रद्धा, मेरा निरन्तर कीर्तन, मेरी पूजा में दृढ़ निष्ठा, और स्तुतियों द्वारा मेरा स्तवन —

Verse 21

आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम् । मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः ॥ 19.21 ॥

ādaraḥ paricaryāyāṁ sarvāṅgair abhivandanam mad-bhakta-pūjābhyadhikā sarva-bhūteṣu man-matiḥ

— मेरी सेवा में आदर, सम्पूर्ण अंगों से प्रणाम, मेरे भक्तों की विशेष पूजा, और सब प्राणियों में मेरी भावना —

Verse 22

मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम् । मय्यर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्जनम् ॥ 19.22 ॥

mad-artheṣv aṅga-ceṣṭā ca vacasā mad-guṇeraṇam mayy arpaṇaṁ ca manasaḥ sarva-kāma-vivarjanam

— अपने शरीर की चेष्टाओं को मेरे लिए लगाना, वाणी से मेरे गुणों का वर्णन, मन को मुझे अर्पित करना, और सब कामनाओं का त्याग —

Verse 23

मदर्थेऽर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च । इष्टं दत्तं हुतं जप्तं मदर्थं यद् व्रतं तपः ॥ 19.23 ॥

mad-arthe ’rtha-parityāgo bhogasya ca sukhasya ca iṣṭaṁ dattaṁ hutaṁ japtaṁ mad-arthaṁ yad vrataṁ tapaḥ

— मेरे लिए धन, भोग और सुख का त्याग, तथा जो भी इष्ट, दान, हवन, जप, व्रत और तप हो, वह सब मेरे ही लिए करना —

Verse 24

एवं धर्मैर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम् । मयि सञ्जायते भक्तिः कोऽन्योऽर्थोऽस्यावशिष्यते ॥ 19.24 ॥

evaṁ dharmair manuṣyāṇām uddhavātma-nivedinām mayi sañjāyate bhaktiḥ ko ’nyo ’rtho ’syāvaśiṣyate

— हे उद्धव! इस प्रकार के आचरण से आत्मनिवेदी मनुष्यों में मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। ऐसे व्यक्ति के लिए और कौन-सा प्रयोजन शेष रह जाता है?

Verse 25

यदात्मन्यर्पितं चित्तं शान्तं सत्त्वोपबृंहितम् । धर्मं ज्ञानं सवैराग्यमैश्वर्यं चाभिपद्यते ॥ 19.25 ॥

yadātmany arpitaṁ cittaṁ śāntaṁ sattvopabṛṁhitam dharmaṁ jñānaṁ sa vairāgyam aiśvaryaṁ cābhipadyate

जब शान्त और सत्त्वगुण से पुष्ट चित्त आत्मा में अर्पित हो जाता है, तब मनुष्य धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।

Verse 26
vikalperajas valamasan niṣṭhamparidhāvatiscattered consciousness

यदर्पितं तद् विकल्पे इन्द्रियैः परिधावति । रजस्वलं चासन्निष्ठं चित्तं विद्धि विपर्ययम् ॥१९-२६॥

yad arpitaṁ tad vikalpe indriyaiḥ paridhāvati | rajas-valaṁ cāsan-niṣṭhaṁ cittaṁ viddhi viparyayam ||19-26||

।।19.26।। जब चित्त शरीर, घर और संपत्ति की विविधता में उलझा रहता है, तब वह इन्द्रियों के सहारे इधर-उधर दौड़ता रहता है। जान लो कि रजोगुण से भरा और असत् वस्तुओं पर टिका हुआ ऐसा चित्त, शुद्ध चेतना का ठीक उल्टा रूप है।

Modern Reflection

मुंबई के एक परिवार की वित्तीय स्थिति विकल्प-चित्त की सबसे स्पष्ट आधुनिक तस्वीर देती है। एक पिता एक ही सप्ताह में गृह-ऋण की किस्त चुका रहा है, बेटे की स्कूल फ़ीस की अंतिम तिथि याद रख रहा है, और दीवाली के लिए सोने के भाव तुलना कर रहा है। उसका ध्यान कहीं नहीं टिकता; वह परिधावति करता है, बैंक के ऐप से जौहरी के व्हाट्सऐप कैटलॉग तक, केवल इसलिए क्योंकि आँख को स्क्रीन पर अगली चीज़ दिख जाती है। श्लोक इसे ठीक-ठीक 'रजस्वलं' कहता है, क्योंकि रजोगुण को संस्कृत चिन्तन में बेचैन बहुलता की, कम नहीं अधिक वस्तुओं की चाह की अवस्था माना गया है। उसका चित्त 'असन्निष्ठं' है, इसलिए नहीं कि पैसा या फ़ीस माया है, बल्कि इसलिए कि उसकी चेतना का इन बदलते दबावों से परे कोई स्थिर केंद्र नहीं है। कृष्ण किस्तों की निंदा नहीं कर रहे। वे उस मन का निदान कर रहे हैं जिसका कोई स्थिर बिंदु नहीं, और यह निदान आज हर उस व्यक्ति पर सटीक बैठता है जो एक साथ तीन खुले टैब में उलझा है।
Verse 27
mad bhakti kṛtekātmya darśanamguṇeṣv asaṅgaḥaṇimādayaḥfunctional definitions

धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् । गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः ॥१९-२७॥

dharmo mad-bhakti-kṛt prokto jñānaṁ caikātmya-darśanam | guṇeṣv asaṅgo vairāgyam aiśvaryaṁ cāṇimādayaḥ ||19-27||

।।19.27।। सच्चा धर्म वही है, जो मेरे प्रति भक्ति उत्पन्न करे। सच्चा ज्ञान है सब में एक आत्मा के दर्शन। सच्चा वैराग्य है गुणों के विषयों से अनासक्ति। और सच्चा ऐश्वर्य है अणिमा आदि योग-सिद्धियाँ।

Modern Reflection

एक भारतीय नागरिक-शास्त्र की पाठ्यपुस्तक धर्म को कर्तव्य बताती है, और कोई ज्योतिष चैनल ऐश्वर्य को धन बताता है, पर यह श्लोक भीतर से दोनों परिभाषाओं को पलट देता है। बेंगलुरु के एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर की कल्पना करें, जो हर शनिवार मंदिर जाता है, गौशाला को उदारता से दान देता है, हर व्रत रखता है, पर अपनी घरेलू सहायिका से तिरस्कार से पेश आता है। श्लोक की कसौटी पर उसकी धार्मिक गतिविधि 'धर्म' नहीं ठहरती, क्योंकि यहाँ धर्म को उसके परिणाम से परिभाषित किया गया है, 'मद्भक्तिकृत्', जो वास्तव में भक्ति उत्पन्न करे, न कि उसके रूप से। उसकी उस सहकर्मी से तुलना करें जिसकी कोई मंदिर-आदत नहीं, पर जो ट्रैफ़िक में, बैठकों में, छोटे लेन-देन में हर व्यक्ति को उसी एक आत्मा का वाहक मानती है जिसे वह रात में उपनिषदों में पढ़ती है, 'एकात्म्यदर्शन'। उसकी सामान्य सजगता इस श्लोक की परिभाषा में 'ज्ञान' ठहरती है; उसका अनुष्ठान स्वतः 'धर्म' नहीं ठहरता। श्लोक अनुष्ठान-विरोधी नहीं है। वह केवल इतना कहता है कि धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य जैसे चार महान शब्द केवल अपने परिणाम से अर्जित होते हैं, अपने रूप से कभी नहीं।
Verse 28
uddhavas questionsyama niyamavāri karṣaṇaoperational definitionscatechism

श्रीउद्धव उवाच यमः कतिविधः प्रोक्तो नियमो वारिकर्षण । कः शमः को दमः कृष्ण का तितिक्षा धृतिः प्रभो ॥१९-२८॥

śrī-uddhava uvāca yamaḥ kati-vidhaḥ prokto niyamo vāri-karṣaṇa | kaḥ śamaḥ ko damaḥ kṛṣṇa kā titikṣā dhṛtiḥ prabho ||19-28||

।।19.28।। श्री उद्धव ने कहा: हे वारिकर्षण, यम कितने प्रकार का है, और नियम क्या है? हे कृष्ण, हे प्रभो, शम क्या है, दम क्या है? तितिक्षा और धृति क्या है?

Modern Reflection

दिल्ली की एक प्रथम-वर्ष दर्शनशास्त्र की छात्रा नीतिशास्त्र के व्याख्यान के बाद अपने प्राध्यापक के पास जाती है, और पाठ का सारांश नहीं माँगती। वह उनसे प्रसंगवश प्रयुक्त चार शब्दों की एक-एक करके परिभाषा माँगती है: सत्यनिष्ठा, अनुशासन, धैर्य, संकल्प। उद्धव कृष्ण से ठीक यही कर रहे हैं। उन्होंने अभी-अभी चार महान शब्द सुने हैं, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, और सिर पर हिलाने के बजाय वे कठिन और अधिक उपयोगी प्रश्न से टोकते हैं: इन्हें उनके काम करने वाले हिस्सों में तोड़िए। संबोधन 'वारिकर्षण', जल खींचने वाला, जो कृष्ण की वर्षा बुलाने की शक्ति का सूचक है, सजावटी नहीं है। उद्धव उससे, जो आकाश से जल खींच सकता है, अब अस्पष्ट गुण-शब्दों से सटीक परिभाषाएँ खींचने को कह रहे हैं, वही कठिनाई जो एक प्रबंधक को तब होती है जब कंपनी का कथन 'नवाचार' कहता है पर कोई नहीं समझा पाता कि इससे किसी कर्मचारी को मंगलवार सुबह वास्तव में क्या अलग करना है।
Verse 29
satyam ṛtamdāna and tyāgayajña dakṣiṇācosmic orderpaired virtues

किं दानं किं तपः शौर्यं किम् सत्यमृतमुच्यते । कस्त्यागः किं धनं चेष्टं को यज्ञः का च दक्षिणा ॥१९-२९॥

kiṁ dānaṁ kiṁ tapaḥ śauryaṁ kim satyam ṛtam ucyate | kas tyāgaḥ kiṁ dhanaṁ ceṣṭaṁ ko yajñaḥ kā ca dakṣiṇā ||19-29||

।।19.29।। दान क्या है, तप और शौर्य क्या है? सत्य क्या है, और वास्तविकता किसे कहते हैं? त्याग क्या है? धन क्या है, और वांछनीय क्या है? यज्ञ क्या है, और दक्षिणा क्या है?

Modern Reflection

पुणे की एक विनिर्माण कंपनी के सीएसआर अधिकारी के पास दान का वार्षिक बजट है, पर श्लोक का 'दान' को 'सत्य' और 'ऋत', अंतर्निहित वास्तविकता, के साथ जोड़ना ऐसे बजटों के संचालन के तरीक़े को शांत चुनौती देता है। कर-छूट के लिए दिया गया पैसा केवल नाम का दान है; श्लोक पूछता है कि देने को वास्तविक क्या बनाता है। एक ही कंपनी-आयोजन के दो दानदाताओं का अंतर देखें: एक स्कूल को चेक देकर चला जाता है, कभी जाँच नहीं करता कि छत बनी या नहीं; दूसरा कम राशि देता है पर साल में दो बार जाकर देखता है कि बच्चे उसके द्वारा वित्त-पोषित पुस्तकालय का उपयोग कर रहे हैं या नहीं। उद्धव का युग्मित प्रश्न, 'किं दानं किं सत्यम्', ठीक यही तुलना करने पर बाध्य करता है। श्लोक 'त्याग' के साथ 'धनं' के बारे में भी पूछता है, दोनों को विपरीत मानने से इनकार करते हुए; ईमानदारी से कमाने और उदारता से देने वाला एक दुकानदार धन और त्याग के बीच चुनाव नहीं कर रहा, बल्कि एक ही सप्ताह के लेन-देन में दोनों का अभ्यास कर रहा है।
Verse 30
bhaga lābhahrīḥ parāvidyāinner metricstrue strength

पुंसः किं स्विद् बलं श्रीमन् भगो लाभश्च केशव । का विद्या ह्रीः परा का श्रीः किं सुखं दुःखमेव च ॥१९-३०॥

puṁsaḥ kiṁ svid balaṁ śrīman bhago lābhaś ca keśava | kā vidyā hrīḥ parā kā śrīḥ kiṁ sukhaṁ duḥkham eva ca ||19-30||

।।19.30।। हे श्रीमान् केशव, मनुष्य का सच्चा बल क्या है? भाग्य और लाभ क्या है? सच्ची विद्या क्या है, और परम लज्जा क्या है? सच्ची शोभा क्या है, और सुख-दुःख वास्तव में क्या हैं?

Modern Reflection

एक आईआईटी टॉपर जो बाद में अमेरिका की अच्छी नौकरी के बावजूद भीतर से खोखला महसूस करता है, और कोटा का एक छोटे-शहर का शिक्षक जिसके विद्यार्थियों का जीवन वास्तव में सुधरता है, इस श्लोक के 'विद्या', सच्ची शिक्षा, को 'बल' और 'लाभ' के साथ जोड़ने की एक जीवंत परीक्षा देते हैं। भारतीय संस्कृति अक्सर बल को परीक्षा-रैंक और लाभ को आरंभिक वेतन से मापती है, पर श्लोक इन शब्दों को खुला रखता है, अंकों या पैसे से सरल समीकरण से इनकार करते हुए। लखनऊ की एक माँ की कल्पना करें जो बोर्ड-परीक्षा में कम अंक आने पर अपने बेटे से कहती है कि उसका सच्चा बल उसकी मार्कशीट का प्रतिशत नहीं, बल्कि यह है कि जब सब उसके आसपास नक़ल कर रहे थे, तब भी उसने नहीं की। वह ठीक वही भेद लागू कर रही है जो उद्धव कृष्ण से स्पष्ट करने को कह रहे हैं: बल, लाभ और ज्ञान आंतरिक गुणों के रूप में, जिन्हें संसार का सामान्य स्कोरबोर्ड दर्ज नहीं कर पाता, और साथ ही 'ह्रीः', इतनी परिष्कृत लज्जा कि व्यक्ति सच्चे गुण का श्रेय लेने से भी रुक जाए।
Verse 31
paṇḍitaḥ mūrkhaḥpanthā utpathaḥsvarga narakabandhu gṛhamsystematic catechism

कः पण्डितः कश्च मूर्खः कः पन्था उत्पथश्च कः । कः स्वर्गो नरकः कः स्वित् को बन्धुरुत किं गृहम् ॥१९-३१॥

kaḥ paṇḍitaḥ kaś ca mūrkhaḥ kaḥ panthā utpathaś ca kaḥ | kaḥ svargo narakaḥ kaḥ svit ko bandhur uta kiṁ gṛham ||19-31||

।।19.31।। कौन विद्वान है और कौन मूर्ख? सही मार्ग क्या है और कुमार्ग क्या है? स्वर्ग वास्तव में क्या है और नरक क्या है? सच्चा बंधु कौन है, और सच्चा घर क्या है?

Modern Reflection

प्रयागराज का एक सिविल सेवा अभ्यर्थी, जिसने परीक्षा पास कर ली है पर उन माता-पिता से दूर हो गया है जिन्होंने उसकी कोचिंग के लिए त्याग किया था, और उसी ज़िले का एक अनपढ़ किसान, जो पढ़ नहीं सकता पर अपने बच्चों को कठोर सत्यनिष्ठा से पालता है, इस श्लोक के प्रश्न को, 'कः पण्डितः कश्च मूर्खः', कौन विद्वान है और कौन मूर्ख, खुला छोड़ देते हैं। उस अभ्यर्थी के गाँव में सब उसे डिग्री के लिए 'पण्डित' कहते हैं; श्लोक यह शब्द इतनी सस्ती में देने से इनकार करता है। यही दुहराव 'गृहम्', घर, पर भी लागू होता है: एक एनआरआई का संगमरमरी बंगला जो अपने पैतृक गाँव में साल के ग्यारह महीने बंद खड़ा रहता है, कानूनी दस्तावेज़ से 'गृहम्' है, पर श्लोक का दूसरा प्रश्न, 'को बन्धुः', सच्चा बंधु कौन है, सुझाता है कि घर उसके भीतर के लोगों से बनता है, ढाँचे से नहीं, जिससे मज़दूर का एक-कमरे का किराए का फ़्लैट, जो रात के खाने पर परिवार से भरा हो, श्लोक के सच्चे 'गृहम्' के अधिक निकट ठहरता है।
Verse 32THE FAMOUS closing of Uddhava's twenty-four questions - who is rich, who is poor
āḍhyaḥ daridraḥkṛpaṇaḥ īśvaraḥsat pateviparītāndefine with opposites

क आढ्यः को दरिद्रो वा कृपणः कः क ईश्वरः । एतान् प्रश्नान् मम ब्रूहि विपरीतांश्च सत्पते ॥१९-३२॥

ka āḍhyaḥ ko daridro vā kṛpaṇaḥ kaḥ ka īśvaraḥ | etān praśnān mama brūhi viparītāṁś ca sat-pate ||19-32||

।।19.32।। धनी कौन है, और दरिद्र कौन है? कृपण कौन है, और सच्चा ईश्वर कौन है? हे सत्पते, मेरे इन प्रश्नों का उत्तर, इनके विपरीत सहित, कृपया दीजिए।

Modern Reflection

यह श्लोक उद्धव गीता के सबसे अधिक उद्धृत प्रश्न-समूह को बंद करता है, और इसकी अंतिम जोड़ी, 'आढ्यः' और 'दरिद्रः', धनी और दरिद्र, उस देश में विशेष भार से उतरती है जहाँ 'गरीब' शब्द भूमिहीन मज़दूर पर भी लागू होता है, और एक करोड़पति व्यवसायी द्वारा सम्मान-समारोह में अपनी विनम्र शुरुआत बताते हुए आत्म-लघुकरण में भी। कोलकाता का एक चाय-वाला जो अपनी छोटी दुकान का स्वयं मालिक है, अपने परिवार को खिलाता है, और बिना कर्ज़ के सोता है, इस श्लोक के अपरिभाषित मानक से 'आढ्यः', धनी, हो सकता है, जबकि गुड़गाँव का एक अधिकारी, जो लक्ज़री-अपार्टमेंट के कर्ज़ में डूबा है, ईएमआई की चिंता से सो नहीं पाता, सात-अंकीय वेतन के बावजूद इसका 'दरिद्रः', दरिद्र, हो सकता है। कृष्ण ने इस श्लोक में अभी उत्तर नहीं दिया है; उद्धव ने बस इतना आग्रह किया है, 'सत्पते', हे भक्तों के स्वामी, कि कोई भी उत्तर तब तक पूर्ण नहीं जब तक उसके साथ उसका ठीक विपरीत भी परिभाषित न हो।
Verse 33
twelve yamasasañcayaḥasaṅgaḥkṣamā abhayamāstikyam

श्रीभगवानुवाच अहिंसा सत्यमस्तेयमसङ्गो ह्रीरसञ्चयः । आस्तिक्यं ब्रह्मचर्यं च मौनं स्थैर्यं क्षमाभयम् ॥१९-३३॥

śrī-bhagavān uvāca ahiṁsā satyam asteyam asaṅgo hrīr asañcayaḥ | āstikyaṁ brahmacaryaṁ ca maunaṁ sthairyaṁ kṣamābhayam ||19-33||

।।19.33।। भगवान ने कहा: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, असंग, ह्री और असंचय; आस्तिक्यता, ब्रह्मचर्य, मौन, स्थैर्य, क्षमा और अभय, ये बारह यम हैं।

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चेन्नई की एक वकील, जो केवल वही मामले लेती है जिन्हें वह न्यायसंगत मानती है, आभारी मुवक्किलों से एक छोटे मिठाई-बॉक्स से अधिक उपहार लेने से इनकार करती है, और गोपनीय समझौता-वार्ता में जो सुनती है वह कभी नहीं दोहराती, इन बारह यमों में से तीन, सत्यं, असंचयः और मौनं, का अभ्यास कर रही है, बिना कभी उनके संस्कृत नाम जाने। यह सूची आज किसी एचआर विभाग के जारी किए नैतिकता-कोड जैसी पढ़ी जाती है, सिवाय इसके कि यह हर नियम को नीति-अनुपालन में नहीं, आत्म-संयम में जड़ें देती है। 'असंगः', अनासक्ति, को आधुनिक अभ्यास में उतारना सबसे कठिन है: इसका अर्थ कुछ न रखना नहीं, बल्कि जो रखा है उससे इस तरह जुड़ना कि वह रखना ही अपनी पहचान न बन जाए। 'क्षमा' को यहाँ 'अभयम्' के साथ रखा जाना सुझाता है कि दोनों कारण-रूप से जुड़े हैं: जो अभी भी डरा हुआ है उसने अभी क्षमा नहीं की।
Verse 34
twelve niyamasmad arcanamparārthehātīrthāṭanamācārya sevanam

शौचं जपस्तपो होमः श्रद्धातिथ्यं मदर्चनम् । तीर्थाटनं परार्थेहा तुष्टिराचार्यसेवनम् ॥१९-३४॥

śaucaṁ japas tapo homaḥ śraddhātithyaṁ mad-arcanam | tīrthāṭanaṁ parārthehā tuṣṭir ācārya-sevanam ||19-34||

।।19.34।। शौच, जप, तप, होम; श्रद्धा, अतिथि-सत्कार, मेरी पूजा; तीर्थाटन, परार्थ-चेष्टा, संतोष और आचार्य-सेवन, ये बारह नियम हैं।

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वाराणसी का एक घर जो अपनी रसोई को अत्यंत स्वच्छ रखता है, दिन शुरू होने से पहले हर सुबह एक माला जपता है, किसी भी अनपेक्षित अतिथि को स्वयं खाने से पहले खिलाता है, और बिना पूछे हर सेमेस्टर भतीजे की कॉलेज फ़ीस भेजता है, सुबह नौ बजे से पहले ही इस श्लोक के अधिकांश नियमों से गुज़र चुका होता है। इस सूची में जो चीज़ उभरती है वह है 'परार्थेहा', दूसरे के हित के लिए सक्रिय प्रयास, जिसे जान-बूझकर 'तुष्टिः', संतोष, के साथ रखा गया है; यह जोड़ी सुझाती है कि संतोष निष्क्रिय समर्पण नहीं, बल्कि वह आंतरिक स्थिरता है जो दूसरों के लिए निरंतर प्रयास को संभव बनाती है।
Verse 35
yathā kāmam duhantiupāsitāḥtātatwenty four itemscultivated practice

एते यमाः सनियमा उभयोर्द्वादश स्मृताः । पुंसामुपासितास्तात यथाकामं दुहन्ति हि ॥१९-३५॥

ete yamāḥ sa-niyamā ubhayor dvādaśa smṛtāḥ | puṁsām upāsitās tāta yathā-kāmaṁ duhanti hi ||19-35||

।।19.35।। ये यम और नियम हैं, प्रत्येक बारह-बारह, जैसा शास्त्रों में स्मरण किया गया है। हे तात, जब मनुष्य इन्हें भक्तिपूर्वक साधता है, तो ये उसकी इच्छानुसार फल देते हैं।

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श्लोक का समापन-दावा, 'यथाकामं दुहन्ति हि', ये इच्छानुसार फल देते हैं, 'दुहन्ति' शब्द का प्रयोग करता है, गाय दुहने की क्रिया, जो भारतीय भक्ति-साहित्य में सामान्य कामधेनु-प्रतीक की गूँज है। चेन्नई का एक शास्त्रीय संगीतकार, जिसने बीस वर्षों तक अनुशासन से रियाज़ किया, अंततः पाता है कि संगीत ज़रूरत पड़ने पर स्वयं आ जाता है। पर श्लोक 'उपासिताः', भक्तिपूर्वक साधित, कहता है, केवल यांत्रिक अभ्यास नहीं।
Verse 36
man niṣṭhatāindriya saṁyamaḥjihvopastha jayaḥśama damaspecific organs

शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियसंयमः । तितिक्षा दुःखसम्मर्षो जिह्वोपस्थजयो धृतिः ॥१९-३६॥

śamo man-niṣṭhatā buddher dama indriya-saṁyamaḥ | titikṣā duḥkha-sammarṣo jihvopastha-jayo dhṛtiḥ ||19-36||

।।19.36।। शम है बुद्धि का मुझ में स्थिर होना। दम है इन्द्रियों का संयम। तितिक्षा है दुःख का धैर्यपूर्वक सहन। और धृति है जिह्वा और उपस्थ पर विजय।

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चंडीगढ़ की एक हृदय-रोग विशेषज्ञ अपने संकट के समय की शांति को जबरन संयम नहीं, बल्कि मन का अपने स्थिर बिंदु, प्रातःकालीन ध्यान, पर लौटना बताती है, ठीक वही जिसे श्लोक 'शमः' कहता है। 'दम' और 'धृति', जिह्वा और उपस्थ पर विजय, असामान्य रूप से विशिष्ट हैं: कृष्ण उन दो अंगों का नाम लेते हैं जिन्हें भारतीय नैतिक साहित्य सबसे अनियंत्रणीय मानता है, स्वाद और वासना।
Verse 37
daṇḍa nyāsaḥsvabhāva vijayaḥsama darśanamkāma tyāgaḥrestraint of power

दण्डन्यासः परं दानं कामत्यागस्तप स्मृतम् । स्वभावविजयः शौर्यं सत्यं च समदर्शनम् ॥१९-३७॥

daṇḍa-nyāsaḥ paraṁ dānaṁ kāma-tyāgas tapaḥ smṛtam | svabhāva-vijayaḥ śauryaṁ satyaṁ ca sama-darśanam ||19-37||

।।19.37।। दण्ड को त्याग देना, अर्थात् दूसरों के प्रति हिंसा को त्याग देना, सबसे बड़ा दान है। काम का त्याग तप कहलाता है। अपने स्वभाव पर विजय ही शौर्य है। और समदृष्टि ही सत्य है।

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लखनऊ का एक ट्रैफ़िक पुलिसकर्मी, जिसके पास हर नियम-तोड़ने वाले को दंडित करने का अधिकार है, पर जो इसके बजाय एक बुज़ुर्ग स्कूटर-चालक को समझाने में समय लगाता है, अपनी शक्ति के संयम से 'दण्डन्यासः परं दानं' कर रहा है। श्लोक की सबसे कठिन पुनर्परिभाषा है 'शौर्यं' को 'स्वभावविजयः' के रूप में, बाहरी शत्रु पर विजय के रूप में नहीं।
Verse 38
sunṛtā vāṇīkarmasv asaṅgamaḥtyāgaḥ sannyāsaḥtruthful and pleasantinner renunciation

अन्यच्च सुनृता वाणी कविभिः परिकीर्तिता । कर्मस्वसङ्गमः शौचं त्यागः सन्न्यास उच्यते ॥१९-३८॥

anyac ca sunṛtā vāṇī kavibhiḥ parikīrtitā | karmasv asaṅgamaḥ śaucaṁ tyāgaḥ sannyāsa ucyate ||19-38||

।।19.38।। एक और बात, मधुर और सत्य वाणी, ऋषियों द्वारा सराही गई है। कर्मों में अनासक्ति ही सच्ची शुद्धता है। और त्याग को ही संन्यास कहा जाता है।

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कोयंबटूर की एक स्कूल प्रधानाचार्या, जो किसी अभिभावक को कठिन संदेश देती है, अपने शब्द सावधानी से चुनती है, सत्य को झूठ में नरम नहीं करती पर क्रूर भी नहीं बनने देती; यही 'सुनृता वाणी' है। श्लोक की अंतिम पुनर्परिभाषा सबसे साहसी है: 'त्यागः सन्न्यास उच्यते', त्याग को ही संन्यास कहते हैं, भगवा वस्त्र को केवल प्रतीक बनाकर सार को सबके लिए सुलभ बना देती है।
Verse 39
dharma iṣṭaṁ dhanamyajño 'hamdakṣiṇā jñāna sandeśaḥprāṇāyāmaḥtheological redefinition

धर्म इष्टं धनं नृणां यज्ञोऽहं भगवत्तमः । दक्षिणा ज्ञानसन्देशः प्राणायामः परं बलम् ॥१९-३९॥

dharma iṣṭaṁ dhanaṁ nṝṇāṁ yajño 'haṁ bhagavattamaḥ | dakṣiṇā jñāna-sandeśaḥ prāṇāyāmaḥ paraṁ balam ||19-39||

।।19.39।। धर्म ही मनुष्यों का वास्तविक वांछित धन है। यज्ञ मैं स्वयं हूँ, परम भगवान। सच्ची दक्षिणा ज्ञान का संप्रेषण है। और प्राणायाम परम बल है।

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ओडिशा के एक छोटे शहर की एक सेवानिवृत्त शिक्षिका, जो अपनी पेंशन दो लड़कियों की शिक्षा पर ख़र्च करती है, 'धर्म इष्टं धनं' को साकार कर रही है। श्लोक का साहसी दावा, 'यज्ञोऽहं', हर वैदिक अनुष्ठान को एक ही भक्ति-लक्ष्य की ओर मोड़ता है। 'दक्षिणा' को 'ज्ञानसन्देशः' के रूप में पुनःपरिभाषित करना गुरु-दक्षिणा की परंपरा को नई गरिमा देता है।
Verse 40
aiśvaro bhāvaḥmad bhaktir uttamaḥbhidā bādhaḥjugupsā akarmasuinner fortune

भगो म ऐश्वरो भावो लाभो मद्भक्तिरुत्तमः । विद्यात्मनि भिदाबाधो जुगुप्सा ह्रीरकर्मसु ॥१९-४०॥

bhago ma aiśvaro bhāvo lābho mad-bhaktir uttamaḥ | vidyātmani bhidā-bādho jugupsā hrīr akarmasu ||19-40||

।।19.40।। सच्चा भाग्य मेरी अपनी ऐश्वर्यमयी अवस्था है। सबसे बड़ा लाभ मेरी भक्ति है। सच्चा ज्ञान आत्मा के विषय में भेद-भावना का निवारण है। और सच्ची लज्जा अनुचित कर्मों के प्रति घृणा है।

Modern Reflection

केरल का एक व्यवसायी अपने सच्चे भाग्य को कंपनी के टर्नओवर के रूप में नहीं बल्कि एक स्थिर आंतरिक अवस्था के रूप में बताता है, यह श्लोक के 'ऐश्वरो भावः' के निकट है। श्लोक की 'लाभ' को 'मद्भक्तिः' के रूप में पुनःपरिभाषा भारत के लाभ-केन्द्रित मोह के सामने चुपचाप क्रांतिकारी है।
Verse 41
nairapekṣyamkāma sukhāpekṣābandha mokṣa vittrue happinessdependence as suffering

श्रीर्गुणा नैरपेक्ष्याद्याः सुखं दुःखसुखात्ययः । दुःखं कामसुखापेक्षा पण्डितो बन्धमोक्षवित् ॥१९-४१॥

śrīr guṇā nairapekṣyādyāḥ sukhaṁ duḥkha-sukhātyayaḥ | duḥkhaṁ kāma-sukhāpekṣā paṇḍito bandha-mokṣa-vit ||19-41||

।।19.41।। सच्ची शोभा निरपेक्षता जैसे गुणों में है। सच्चा सुख दुःख-सुख दोनों से परे जाना है। सच्चा दुःख इन्द्रिय-सुख पर निर्भरता है। और सच्चा पण्डित वही है जो बंधन और मोक्ष दोनों की प्रक्रिया जानता है।

Modern Reflection

भोपाल का एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अपने अंतिम वर्ष झुग्गी के बच्चों को मुफ़्त पढ़ाने में बिताता है, उनसे कुछ भी नहीं चाहता। यह अपेक्षा-रहितता ही श्लोक की सच्ची 'श्रीः' है। 'दुःखं कामसुखापेक्षा', सच्चा दुःख इन्द्रिय-सुख पर निर्भरता है: दिल्ली का किशोर जो अगली रील के लिए स्क्रॉल कर रहा है, इस परिभाषा से पहले से दुःख में है।
Verse 42
deha ādy ahaṁ buddhiḥman nigamaḥcitta vikṣepaḥsattva guṇodayaḥheaven as inner state

मूर्खो देहाद्यहंबुद्धिः पन्था मन्निगमः स्मृतः । उत्पथश्चित्तविक्षेपः स्वर्गः सत्त्वगुणोदयः ॥१९-४२॥

mūrkho dehādy-ahaṁ-buddhiḥ panthā man-nigamaḥ smṛtaḥ | utpathaś citta-vikṣepaḥ svargaḥ sattva-guṇodayaḥ ||19-42||

।।19.42।। सच्चा मूर्ख वही है जो शरीर आदि में अहं-बुद्धि रखता है। सही मार्ग मेरा ही उपदेश माना जाता है। कुमार्ग वह है जो चित्त को बिखेर दे। और स्वर्ग सत्त्वगुण का उदय है।

Modern Reflection

कोलकाता का एक हृदय-शल्यचिकित्सक हर पार्टी में स्वयं का परिचय अपने अस्पताल के नाम और कार के ब्रांड से देता है, ठीक वही 'देहाद्यहंबुद्धिः' प्रकट करते हुए जिसे श्लोक 'मूर्खः' कहता है। श्लोक की 'स्वर्गः' को 'सत्त्वगुणोदयः' के रूप में परिभाषा इसे इसी जीवन में उपलब्ध एक मनोवैज्ञानिक अवस्था बना देती है।
Verse 43
tama unnāhaḥbandhur guruḥ ahamgṛhaṁ śarīramguṇāḍhyaḥhell as inner state

नरकस्तमउन्नाहो बन्धुर्गुरुरहं सखे । गृहं शरीरं मानुष्यं गुणाढ्यो ह्याढ्य उच्यते ॥१९-४३॥

narakas tama-unnāho bandhur gurur ahaṁ sakhe | gṛhaṁ śarīraṁ mānuṣyaṁ guṇāḍhyo hy āḍhya ucyate ||19-43||

।।19.43।। सच्चा नरक तमोगुण का अत्यधिक उभार है। हे सखे, सच्चा बंधु गुरु है, और मैं स्वयं। सच्चा घर यह मनुष्य-शरीर है। और गुणों से समृद्ध व्यक्ति ही सच में धनी कहलाता है।

Modern Reflection

पटना के एक छात्रावास में एक युवक परीक्षा में असफल होने के बाद तीन दिन क्रोध और भ्रम में बिताता है, और इसे 'नरक' बताता है, तब तक जब तक काउंसलर नहीं बताती कि श्लोक नरक को 'तमउन्नाहः' कहता है, वही धुंध जो उसने जी। श्लोक की 'गृहम्' को 'शरीरं मानुष्यम्' के रूप में परिभाषा भारतीय रियल-एस्टेट-मोह को काट देती है।
Verse 44
asantuṣṭaḥajitendriyaḥguṇeṣv asakta dhīḥguṇa saṅgaḥtrue wealth

दरिद्रो यस्त्वसन्तुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः । गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्ययः ॥१९-४४॥

daridro yas tv asantuṣṭaḥ kṛpaṇo yo 'jitendriyaḥ | guṇeṣv asakta-dhīr īśo guṇa-saṅgo viparyayaḥ ||19-44||

।।19.44।। जो कभी संतुष्ट नहीं होता, वही सच्चा दरिद्र है। जिसकी इन्द्रियाँ अजित रह जाएँ, वही सच्चा कृपण है। जिसकी बुद्धि गुणों में अनासक्त रहे, वही सच्चा ईश्वर, स्वामी है। और गुणों में आसक्ति उसका ठीक उल्टा, बंधन की स्थिति है।

Modern Reflection

मुंबई का एक अरबपति उद्योगपति, जो रात दो बजे भी पोर्टफ़ोलियो देखना बंद नहीं कर पाता, ठीक वही 'दरिद्रः' है जिसे यह श्लोक वर्णित करता है, क्योंकि 'असंतुष्टः' ही दरिद्रता की एकमात्र कसौटी है। चेन्नई का एक संतुष्ट ऑटोरिक्शा चालक, इस श्लोक की परिभाषा से 'आढ्य', धनी, है।
Verse 45THE FAMOUS transcendent conclusion - seeing guna and dosha as such is itself the flaw
guṇa doṣa dṛśir doṣaḥubhaya varjitaḥtranscending categoriesnirūpitāḥbeyond virtue and vice

एत उद्धव ते प्रश्नाः सर्वे साधु निरूपिताः । किं वर्णितेन बहुना लक्षणं गुणदोषयोः । गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जितः ॥१९-४५॥

eta uddhava te praśnāḥ sarve sādhu nirūpitāḥ | kiṁ varṇitena bahunā lakṣaṇaṁ guṇa-doṣayoḥ | guṇa-doṣa-dṛśir doṣo guṇas tūbhaya-varjitaḥ ||19-45||

।।19.45।। हे उद्धव, तुम्हारे ये सब प्रश्न भली-भाँति उत्तरित हो गए। पर गुण और दोष के लक्षणों का इतना विस्तृत वर्णन किस काम का? गुण और दोष को गुण-दोष के रूप में देखना ही सबसे बड़ा दोष है; सच्चा गुण तो दोनों से परे होना है।

Modern Reflection

अठारह श्लोकों में गुण-दोष की चौबीस परिभाषाएँ देने के बाद, कृष्ण अचानक पूरी कवायद के नीचे से ज़मीन खींच लेते हैं: 'गुणदोषदृशिर्दोषो', चीज़ों को गुणी या दोषी देखना ही दोष है। चेन्नई की एक कठोर शिक्षिका जो एक दिन महसूस करती है कि उसकी निरंतर वर्गीकरण-आदत स्वयं एक सूक्ष्म क्रूरता बन गई है, इस श्लोक को साकार करती है।
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