श्रीउद्धव उवाच विधिश्च प्रतिषेधश्च निगमो हीश्वरस्य ते । अवेक्षतेऽरविन्दाक्ष गुणं दोषं च कर्मणाम् ॥२०-१॥
śrī-uddhava uvāca vidhiś ca pratiṣedhaś ca nigamo hīśvarasya te | avekṣate 'raviṇḍākṣa guṇaṁ doṣaṁ ca karmaṇām ||20-1||
।।20.1।। श्री उद्धव ने कहा: हे कमल-नयन, विधि और निषेध सहित वेद-शास्त्र वास्तव में आपकी ही आज्ञा है, और यह कर्मों के गुण-दोष का सावधानी से लेखा-जोखा रखता है।
Modern Reflection
उद्धव कृष्ण के इस विरोधाभासी निष्कर्ष के तुरंत बाद कि गुण-दोष को देखना स्वयं दोष है, नई कड़ी खोलते हैं: यदि भेद अंततः पार करने ही हैं, तो वैदिक विधि-निषेध का पूरा तंत्र किसलिए है? अहमदाबाद का एक युवा सीए क्लर्क, जिसे बताया गया कि अंततः लाभ-हानि माया है, ठीक यही आपत्ति उठाता है: तो फ़र्म इतनी सूक्ष्म नियमावली क्यों रखती है?