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प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14

भगवान कृष्ण का तिरोभाव

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (bhagavata.1.14.1)

सूत उवाच सम्प्रस्थिते द्वारकायां जिष्णौ बन्धुदिदृक्षया । ज्ञातुं च पुण्यश्लोकस्य कृष्णस्य च विचेष्टितम् ॥ १ ॥

sūta uvāca samprasthite dvārakāyāṁ jiṣṇau bandhu-didṛkṣayā jñātuṁ ca puṇya-ślokasya kṛṣṇasya ca viceṣṭitam

सूत ने कहा: जब अर्जुन बंधुजनों को देखने की इच्छा से, तथा पुण्यश्लोक कृष्ण की गतिविधियों को जानने के लिए द्वारका को प्रस्थान कर चुके थे —

श्लोक 2 (bhagavata.1.14.2)

व्यतीताः कतिचिन्मासास्तदा नायात्ततोऽर्जुनः । ददर्श घोररूपाणि निमित्तानि कुरूद्वहः ॥ २ ॥

vyatītāḥ katicin māsās tadā nāyāt tato ’rjunaḥ dadarśa ghora-rūpāṇi nimittāni kurūdvahaḥ

— कुछ महीने बीत गए, किंतु अर्जुन वहाँ से नहीं लौटे; और कुरुवंशधर (युधिष्ठिर) भयावह अपशकुनों को देखने लगे।

श्लोक 3 (bhagavata.1.14.3)

कालस्य च गतिं रौद्रां विपर्यस्तर्तुधर्मिणः । पापीयसीं नृणां वार्तां क्रोधलोभानृतात्मनाम् ॥ ३ ॥

kālasya ca gatiṁ raudrāṁ viparyastartu-dharmiṇaḥ pāpīyasīṁ nṛṇāṁ vārtāṁ krodha-lobhānṛtātmanām

उन्होंने काल की भयावह गति देखी, ऋतुओं का स्वाभाविक क्रम उलट गया था, तथा मनुष्यों के व्यवहार अत्यंत पापपूर्ण हो गए थे, उनके हृदय क्रोध, लोभ और असत्य से भर गए थे।

श्लोक 4 (bhagavata.1.14.4)

जिह्मप्रायं व्यवहृतं शाठ्यमिश्रं च सौहृदम् । पितृमातृसुहृद्भ्रातृदम्पतीनां च कल्कनम् ॥ ४ ॥

jihma-prāyaṁ vyavahṛtaṁ śāṭhya-miśraṁ ca sauhṛdam pitṛ-mātṛ-suhṛd-bhrātṛ- dam-patīnāṁ ca kalkanam

व्यवहार प्रायः कुटिल हो गए थे, मैत्री भी छल से मिश्रित हो गई थी; माता-पिता, सुहृद-भाइयों, तथा पति-पत्नी के बीच भी कलह उत्पन्न हो गया था।

श्लोक 5 (bhagavata.1.14.5)

निमित्तान्यत्यरिष्टानि काले त्वनुगते नृणाम् । लोभाद्यधर्मप्रकृतिं दृष्ट्वोवाचानुजं नृपः ॥ ५ ॥

nimittāny atyariṣṭāni kāle tv anugate nṛṇām lobhādy-adharma-prakṛtiṁ dṛṣṭvovācānujaṁ nṛpaḥ

इन अत्यंत अशुभ लक्षणों को देखकर, तथा मनुष्यों में लोभ आदि अधर्म की प्रवृत्ति के आ जाने पर, राजा ने अपने अनुज से कहा।

श्लोक 6 (bhagavata.1.14.6)

युधिष्ठिर उवाच सम्प्रेषितो द्वारकायां जिष्णुर्बन्धुदिदृक्षया । ज्ञातुं च पुण्यश्लोकस्य कृष्णस्य च विचेष्टितम् ॥ ६ ॥

yudhiṣṭhira uvāca sampreṣito dvārakāyāṁ jiṣṇur bandhu-didṛkṣayā jñātuṁ ca puṇya-ślokasya kṛṣṇasya ca viceṣṭitam

युधिष्ठिर ने कहा: मैंने अर्जुन को बंधुजनों को देखने की इच्छा से, तथा पुण्यश्लोक कृष्ण की गतिविधियों को जानने के लिए द्वारका भेजा था —

श्लोक 7 (bhagavata.1.14.7)

गताः सप्ताधुना मासा भीमसेन तवानुजः । नायाति कस्य वा हेतोर्नाहं वेदेदमञ्जसा ॥ ७ ॥

gatāḥ saptādhunā māsā bhīmasena tavānujaḥ nāyāti kasya vā hetor nāhaṁ vededam añjasā

— और अब, हे भीमसेन, तुम्हारे अनुज को गए सात महीने हो चुके हैं, फिर भी वे नहीं लौटे। किस कारण से, यह मुझे सचमुच ज्ञात नहीं।

श्लोक 8 (bhagavata.1.14.8)

अपि देवर्षिणादिष्टः स कालोऽयमुपस्थितः । यदात्मनोऽङ्गमाक्रीडं भगवानुत्सिसृक्षति ॥ ८ ॥

api devarṣiṇādiṣṭaḥ sa kālo ’yam upasthitaḥ yadātmano ’ṅgam ākrīḍaṁ bhagavān utsisṛkṣati

क्या वह समय अब आ पहुँचा है, जिसका संकेत देवर्षि (नारद) ने दिया था — जब भगवान अपने उस शरीर को, जो उनकी क्रीड़ास्थली है, समेट लेने की इच्छा करेंगे?

श्लोक 9 (bhagavata.1.14.9)

यस्मान्नः सम्पदो राज्यं दाराः प्राणाः कुलं प्रजाः । आसन्सपत्नविजयो लोकाश्च यदनुग्रहात् ॥ ९ ॥

yasmān naḥ sampado rājyaṁ dārāḥ prāṇāḥ kulaṁ prajāḥ āsan sapatna-vijayo lokāś ca yad-anugrahāt

क्योंकि उन्हीं के अनुग्रह से हमारी संपदा, राज्य, पत्नियाँ, प्राण, कुल, प्रजा, शत्रुओं पर विजय, तथा भावी लोक — ये सब हमें प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.1.14.10)

पश्योत्पातान्नरव्याघ्र दिव्यान् भौमान् सदैहिकान् । दारुणान् शंसतोऽदूराद्भयं नो बुद्धिमोहनम् ॥ १० ॥

paśyotpātān nara-vyāghra divyān bhaumān sadaihikān dāruṇān śaṁsato ’dūrād bhayaṁ no buddhi-mohanam

देखो, हे नरव्याघ्र, दिव्य, भौमिक और शारीरिक — ये भयंकर उत्पात, निकट ही से उस भय की घोषणा कर रहे हैं जो बुद्धि को मोहित कर देता है।

श्लोक 11 (bhagavata.1.14.11)

ऊर्वक्षिबाहवो मह्यं स्फुरन्त्यङ्ग पुनः पुनः । वेपथुश्चापि हृदये आराद्दास्यन्ति विप्रियम् ॥ ११ ॥

ūrv-akṣi-bāhavo mahyaṁ sphuranty aṅga punaḥ punaḥ vepathuś cāpi hṛdaye ārād dāsyanti vipriyam

हे भाई, मेरी जाँघें, नेत्र और भुजाएँ बार-बार फड़क रही हैं; हृदय भी काँप रहा है — शीघ्र ही ये निकट से मुझे दुःख देंगे।

श्लोक 12 (bhagavata.1.14.12)

शिवैषोद्यन्तमादित्यमभिरौत्यनलानना । मामङ्ग सारमेयोऽयमभिरेभत्यभीरुवत् ॥ १२ ॥

śivaiṣodyantam ādityam abhirauty analānanā mām aṅga sārameyo ’yam abhirebhaty abhīruvat

देखो, कैसे यह शृगालिनी मुख से मानो अग्नि उगलती हुई उदय होते सूर्य की ओर देखकर रो रही है — यह अशुभ संकेत है; और यह कुत्ता, हे भाई, मानो निडर होकर मेरी ओर भौंक रहा है।

श्लोक 13 (bhagavata.1.14.13)

शस्ताः कुर्वन्ति मां सव्यं दक्षिणं पशवोऽपरे । वाहांश्च पुरुषव्याघ्र लक्षये रुदतो मम ॥ १३ ॥

śastāḥ kurvanti māṁ savyaṁ dakṣiṇaṁ paśavo ’pare vāhāṁś ca puruṣa-vyāghra lakṣaye rudato mama

शुभ पशु अब मेरे बाईं ओर से, और अन्य दाईं ओर से गुजर रहे हैं; और, हे पुरुषव्याघ्र, मुझे अपने घोड़े भी रोते हुए दिखाई दे रहे हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.1.14.14)

मृत्युदूतः कपोतोऽयमुलूकः कम्पयन् मनः । प्रत्युलूकश्च कुह्वानैर्विश्वं वै शून्यमिच्छतः ॥ १४ ॥

mṛtyu-dūtaḥ kapoto ’yam ulūkaḥ kampayan manaḥ pratyulūkaś ca kuhvānair viśvaṁ vai śūnyam icchataḥ

यह कबूतर मानो मृत्यु का दूत है; उल्लू की बोली और उसे उत्तर देता कौआ मेरे मन को कँपा रहे हैं — मानो वे समूचे संसार को शून्य कर देना चाहते हों।

श्लोक 15 (bhagavata.1.14.15)

धूम्रा दिशः परिधयः कम्पते भूः सहाद्रिभिः । निर्घातश्च महांस्तात साकं च स्तनयित्नुभिः ॥ १५ ॥

dhūmrā diśaḥ paridhayaḥ kampate bhūḥ sahādribhiḥ nirghātaś ca mahāṁs tāta sākaṁ ca stanayitnubhiḥ

चारों दिशाएँ धूम्रवर्ण हो गई हैं; पृथ्वी पर्वतों सहित काँप रही है; तथा, हे तात, बिना बादल के ही बड़े-बड़े वज्रपात और गर्जन हो रहे हैं।

श्लोक 16 (bhagavata.1.14.16)

वायुर्वाति खरस्पर्शो रजसा विसृजंस्तमः । असृग् वर्षन्ति जलदा बीभत्समिव सर्वतः ॥ १६ ॥

vāyur vāti khara-sparśo rajasā visṛjaṁs tamaḥ asṛg varṣanti jaladā bībhatsam iva sarvataḥ

कठोर स्पर्श वाली वायु चल रही है, जो धूल से अंधकार फैला रही है; तथा मेघ चारों ओर मानो रक्त की भयावह वर्षा कर रहे हैं।

श्लोक 17 (bhagavata.1.14.17)

सूर्यं हतप्रभं पश्य ग्रहमर्दं मिथो दिवि । ससङ्कुलैर्भूतगणैर्ज्वलिते इव रोदसी ॥ १७ ॥

sūryaṁ hata-prabhaṁ paśya graha-mardaṁ mitho divi sasaṅkulair bhūta-gaṇair jvalite iva rodasī

देखो — सूर्य का तेज ही मंद पड़ गया है, और आकाश में ग्रह परस्पर टकराते-से प्रतीत होते हैं; तथा पृथ्वी और आकाश दोनों मानो भ्रमित, व्याकुल प्राणियों से भरकर जल रहे हों।

श्लोक 18 (bhagavata.1.14.18)

नद्यो नदाश्च क्षुभिताः सरांसि च मनांसि च । न ज्वलत्यग्निराज्येन कालोऽयं किं विधास्यति ॥ १८ ॥

nadyo nadāś ca kṣubhitāḥ sarāṁsi ca manāṁsi ca na jvalaty agnir ājyena kālo ’yaṁ kiṁ vidhāsyati

नदियाँ और सरोवर व्याकुल हैं, और मन भी; घी डालने पर भी अग्नि प्रज्वलित नहीं होती। यह विचित्र काल हमारे लिए क्या विधान करने जा रहा है?

श्लोक 19 (bhagavata.1.14.19)

न पिबन्ति स्तनं वत्सा न दुह्यन्ति च मातरः । रुदन्त्यश्रुमुखा गावो न हृष्यन्त्यृषभा व्रजे ॥ १९ ॥

na pibanti stanaṁ vatsā na duhyanti ca mātaraḥ rudanty aśru-mukhā gāvo na hṛṣyanty ṛṣabhā vraje

बछड़े स्तनपान नहीं कर रहे, और गौएँ दूध नहीं दे रहीं; गौएँ रोती हुई, अश्रुपूरित मुख लिए खड़ी हैं, और बैल चरागाह में हर्षित नहीं हैं।

श्लोक 20 (bhagavata.1.14.20)

दैवतानि रुदन्तीव स्विद्यन्ति ह्युच्चलन्ति च । इमे जनपदा ग्रामाः पुरोद्यानाकराश्रमाः । भ्रष्टश्रियो निरानन्दाः किमघं दर्शयन्ति नः ॥ २० ॥

daivatāni rudantīva svidyanti hy uccalanti ca ime jana-padā grāmāḥ purodyānākarāśramāḥ bhraṣṭa-śriyo nirānandāḥ kim aghaṁ darśayanti naḥ

देवमूर्तियाँ भी मानो रो रही हैं, पसीना बहा रही हैं, और काँप रही हैं; और ये जनपद, ग्राम, नगर, उद्यान, खान और आश्रम — शोभा और आनंद से रहित हुए — हमें कौन-सा अनिष्ट दिखा रहे हैं?

श्लोक 21 (bhagavata.1.14.21)

मन्य एतैर्महोत्पातैर्नूनं भगवतः पदैः । अनन्यपुरुषश्रीभिर्हीना भूर्हतसौभगा ॥ २१ ॥

manya etair mahotpātair nūnaṁ bhagavataḥ padaiḥ ananya-puruṣa-śrībhir hīnā bhūr hata-saubhagā

मुझे लगता है कि इन महाउत्पातों के द्वारा, यह पृथ्वी निश्चय ही भगवान के उन चरणचिह्नों से — जो किसी अन्य पुरुष के समान नहीं — वंचित हो गई है, और इस प्रकार अपने सौभाग्य से हीन हो गई है।

श्लोक 22 (bhagavata.1.14.22)

इति चिन्तयतस्तस्य दृष्टारिष्टेन चेतसा । राज्ञः प्रत्यागमद् ब्रह्मन् यदुपुर्याः कपिध्वजः ॥ २२ ॥

iti cintayatas tasya dṛṣṭāriṣṭena cetasā rājñaḥ pratyāgamad brahman yadu-puryāḥ kapi-dhvajaḥ

हे ब्रह्मन्, राजा इस प्रकार चिंतन कर ही रहे थे, उनका हृदय पहले ही अपशकुनों को भाँप चुका था, कि वानरध्वज (अर्जुन) यदुनगरी से लौट आए।

श्लोक 23 (bhagavata.1.14.23)

तं पादयोर्निपतितमयथापूर्वमातुरम् । अधोवदनमब्बिन्दून् सृजन्तं नयनाब्जयोः ॥ २३ ॥

taṁ pādayor nipatitam ayathā-pūrvam āturam adho-vadanam ab-bindūn sṛjantaṁ nayanābjayoḥ

राजा के चरणों में गिरे हुए अर्जुन — जो पहले कभी न देखी गई पीड़ा से व्याकुल थे, मुख नीचे झुका हुआ, कमल-नेत्रों से जल की बूँदें टपकाते हुए —

श्लोक 24 (bhagavata.1.14.24)

विलोक्योद्विग्नहृदयो विच्छायमनुजं नृपः । पृच्छति स्म सुहृन्मध्ये संस्मरन्नारदेरितम् ॥ २४ ॥

vilokyodvigna-hṛdayo vicchāyam anujaṁ nṛpaḥ pṛcchati sma suhṛn madhye saṁsmaran nāraderitam

— उन्हें इस प्रकार निस्तेज और उदास देखकर, राजा का हृदय भी व्याकुल हो उठा, और उन्होंने नारद के कथन का स्मरण करते हुए, बंधुजनों के बीच ही उनसे प्रश्न किया।

श्लोक 25 (bhagavata.1.14.25)

युधिष्ठिर उवाच कच्चिदानर्तपुर्यां नः स्वजनाः सुखमासते । मधुभोजदशार्हार्हसात्वतान्धकवृष्णयः ॥ २५ ॥

yudhiṣṭhira uvāca kaccid ānarta-puryāṁ naḥ sva-janāḥ sukham āsate madhu-bhoja-daśārhārha- sātvatāndhaka-vṛṣṇayaḥ

युधिष्ठिर ने कहा: बताओ, क्या हमारे स्वजन आनर्तपुरी में सुखपूर्वक निवास कर रहे हैं — मधु, भोज, दशार्ह, अर्ह, सात्वत, अंधक और वृष्णिजन?

श्लोक 26 (bhagavata.1.14.26)

शूरो मातामहः कच्चित्स्वस्त्यास्ते वाथ मारिषः । मातुलः सानुजः कच्चित्कुशल्यानकदुन्दुभिः ॥ २६ ॥

śūro mātāmahaḥ kaccit svasty āste vātha māriṣaḥ mātulaḥ sānujaḥ kaccit kuśaly ānakadundubhiḥ

क्या मेरे नाना शूरसेन कुशल हैं? और मेरे आदरणीय मामा (वसुदेव) — क्या वे अपने अनुजों सहित कुशल हैं?

श्लोक 27 (bhagavata.1.14.27)

सप्त स्वसारस्तत्पत्न्यो मातुलान्यः सहात्मजाः । आसते सस्नुषाः क्षेमं देवकीप्रमुखाः स्वयम् ॥ २७ ॥

sapta sva-sāras tat-patnyo mātulānyaḥ sahātmajāḥ āsate sasnuṣāḥ kṣemaṁ devakī-pramukhāḥ svayam

उनकी सात पत्नियाँ, जो आपस में बहनें हैं, तथा मेरी मातुल-पत्नियाँ, उनके पुत्र और पुत्रवधुएँ — देवकी-प्रमुख वे सब क्या कुशल हैं?

श्लोक 28 (bhagavata.1.14.28)

कच्चिद्राजाहुको जीवत्यसत्पुत्रोऽस्य चानुजः । हृदीकः ससुतोऽक्रूरो जयन्तगदसारणाः ॥ २८ ॥

kaccid rājāhuko jīvaty asat-putro ’sya cānujaḥ hṛdīkaḥ sasuto ’krūro jayanta-gada-sāraṇāḥ

क्या राजा उग्रसेन कुशल हैं, तथा उनके अनुज (जो दुष्ट कंस के पिता थे)? और हृदीक अपने पुत्र सहित, अक्रूर, जयंत, गद और सारण —

श्लोक 29 (bhagavata.1.14.29)

आसते कुशलं कच्चिद्ये च शत्रुजिदादयः । कच्चिदास्ते सुखं रामो भगवान् सात्वतां प्रभुः ॥ २९ ॥

āsate kuśalaṁ kaccid ye ca śatrujid-ādayaḥ kaccid āste sukhaṁ rāmo bhagavān sātvatāṁ prabhuḥ

— और शत्रुजित आदि — क्या वे सब कुशल हैं? और क्या स्वयं भगवान बलराम, सात्वतों के स्वामी, सुखपूर्वक हैं?

श्लोक 30 (bhagavata.1.14.30)

प्रद्युम्नः सर्ववृष्णीनां सुखमास्ते महारथः । गम्भीररयोऽनिरुद्धो वर्धते भगवानुत ॥ ३० ॥

pradyumnaḥ sarva-vṛṣṇīnāṁ sukham āste mahā-rathaḥ gambhīra-rayo ’niruddho vardhate bhagavān uta

क्या समस्त वृष्णियों के महारथी प्रद्युम्न सुखी हैं? और क्या गंभीर पराक्रम वाले, भगवान के अंशस्वरूप अनिरुद्ध वृद्धिंगत हैं?

श्लोक 31 (bhagavata.1.14.31)

सुषेणश्चारुदेष्णश्च साम्बो जाम्बवतीसुतः । अन्ये च कार्ष्णिप्रवराः सपुत्रा ऋषभादयः ॥ ३१ ॥

suṣeṇaś cārudeṣṇaś ca sāmbo jāmbavatī-sutaḥ anye ca kārṣṇi-pravarāḥ saputrā ṛṣabhādayaḥ

और सुषेण, चारुदेष्ण, तथा जाम्बवती-पुत्र साम्ब, तथा कृष्ण के अन्य श्रेष्ठ पुत्र, ऋषभ आदि, अपने-अपने पुत्रों सहित —

श्लोक 32 (bhagavata.1.14.32)

तथैवानुचराः शौरेः श्रुतदेवोद्धवादयः । सुनन्दनन्दशीर्षण्या ये चान्ये सात्वतर्षभाः ॥ ३२ ॥

tathaivānucarāḥ śaureḥ śrutadevoddhavādayaḥ sunanda-nanda-śīrṣaṇyā ye cānye sātvatarṣabhāḥ

— तथा इसी प्रकार शौरि (कृष्ण) के अनुचर — श्रुतदेव, उद्धव आदि, तथा सुनंद और नंद जैसे प्रमुख, और सात्वतों के अन्य श्रेष्ठजन —

श्लोक 33 (bhagavata.1.14.33)

अपि स्वस्त्यासते सर्वे रामकृष्णभुजाश्रयाः । अपि स्मरन्ति कुशलमस्माकं बद्धसौहृदाः ॥ ३३ ॥

api svasty āsate sarve rāma-kṛṣṇa-bhujāśrayāḥ api smaranti kuśalam asmākaṁ baddha-sauhṛdāḥ

— रामकृष्ण की भुजाओं का आश्रय लेने वाले वे सब क्या कुशल हैं? और क्या हमसे दृढ़ मैत्री से बंधे वे लोग अब भी हमारे कल्याण का स्मरण करते हैं?

श्लोक 34 (bhagavata.1.14.34)

भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः । कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृद्वृतः ॥ ३४ ॥

bhagavān api govindo brahmaṇyo bhakta-vatsalaḥ kaccit pure sudharmāyāṁ sukham āste suhṛd-vṛtaḥ

और स्वयं भगवान गोविंद, जो ब्राह्मणों के हितैषी और भक्तवत्सल हैं — क्या वे सुधर्मा नगरी में अपने सुहृदों से घिरे सुखपूर्वक निवास कर रहे हैं?

श्लोक 35 (bhagavata.1.14.35)

मङ्गलाय च लोकानां क्षेमाय च भवाय च । आस्ते यदुकुलाम्भोधावाद्योऽनन्तसखः पुमान् ॥ ३५ ॥

maṅgalāya ca lokānāṁ kṣemāya ca bhavāya ca āste yadu-kulāmbhodhāv ādyo ’nanta-sakhaḥ pumān

समस्त लोकों के मंगल, कल्याण और अभ्युदय हेतु, वे आदि पुरुष — जिनके सखा स्वयं अनंत (बलराम) हैं — यदुवंश-रूपी सागर में निवास कर रहे हैं।

श्लोक 36 (bhagavata.1.14.36)

यद्बाहुदण्डगुप्तायां स्वपुर्यां यदवोऽर्चिताः । क्रीडन्ति परमानन्दं महापौरुषिका इव ॥ ३६ ॥

yad bāhu-daṇḍa-guptāyāṁ sva-puryāṁ yadavo ’rcitāḥ krīḍanti paramānandaṁ mahā-pauruṣikā iva

उनकी अपनी नगरी में, उनकी भुजदंड की शक्ति से रक्षित, वे सम्मानित यादव परम आनंद में क्रीड़ा करते हैं, मानो वे किसी उच्चतर लोक के महापुरुष हों।

श्लोक 37 (bhagavata.1.14.37)

यत्पादशुश्रूषणमुख्यकर्मणा सत्यादयो द्व्यष्टसहस्रयोषितः । निर्जित्य सङ्ख्ये त्रिदशांस्तदाशिषो हरन्ति वज्रायुधवल्लभोचिताः ॥ ३७ ॥

yat-pāda-śuśrūṣaṇa-mukhya-karmaṇā satyādayo dvy-aṣṭa-sahasra-yoṣitaḥ nirjitya saṅkhye tri-daśāṁs tad-āśiṣo haranti vajrāyudha-vallabhocitāḥ

उनके चरणों की सेवा — जो सर्वोत्तम कर्म है — के द्वारा सत्यभामा आदि सोलह हज़ार रानियाँ, देवताओं को भी युद्ध में जीतकर, वज्रधारी इंद्र की प्रिया के योग्य वे वरदान प्राप्त करती हैं।

श्लोक 38 (bhagavata.1.14.38)

यद्बाहुदण्डाभ्युदयानुजीविनो यदुप्रवीरा ह्यकुतोभया मुहुः । अधिक्रमन्त्यङ्घ्रिभिराहृतां बलात् सभां सुधर्मां सुरसत्तमोचिताम् ॥ ३८ ॥

yad bāhu-daṇḍābhyudayānujīvino yadu-pravīrā hy akutobhayā muhuḥ adhikramanty aṅghribhir āhṛtāṁ balāt sabhāṁ sudharmāṁ sura-sattamocitām

यदुवंश के महावीर, उनकी भुजदंड की समृद्ध शक्ति के आश्रय में सर्वथा निर्भय होकर जीते हुए, अपने ही चरणों से उस सुधर्मा सभा को रौंदते हैं — वह सभा जो देवताओं में श्रेष्ठों के योग्य थी और बलपूर्वक ले आई गई थी।

श्लोक 39 (bhagavata.1.14.39)

कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे । अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः ॥ ३९ ॥

kaccit te ’nāmayaṁ tāta bhraṣṭa-tejā vibhāsi me alabdha-māno ’vajñātaḥ kiṁ vā tāta ciroṣitaḥ

बताओ, भाई, क्या तुम कुशल हो? तुम मुझे अपने पूर्व तेज से रहित दिखाई दे रहे हो। क्या किसी ने तुम्हारा उचित सम्मान नहीं किया, या तुम्हारा तिरस्कार किया? या फिर, भाई, यह केवल तुम्हारे दीर्घकालीन प्रवास का ही प्रभाव है?

श्लोक 40 (bhagavata.1.14.40)

कच्चिन्नाभिहतोऽभावैः शब्दादिभिरमङ्गलैः । न दत्तमुक्तमर्थिभ्य आशया यत्प्रतिश्रुतम् ॥ ४० ॥

kaccin nābhihato ’bhāvaiḥ śabdādibhir amaṅgalaiḥ na dattam uktam arthibhya āśayā yat pratiśrutam

क्या तुम्हें कटु वचनों अथवा किसी अन्य अपशकुन ने आहत नहीं किया? क्या तुमने किसी याचक को न दिया, अथवा सद्भावपूर्वक किया कोई वचन नहीं निभाया?

श्लोक 41 (bhagavata.1.14.41)

कच्चित्त्वं ब्राह्मणं बालं गां वृद्धं रोगिणं स्त्रियम् । शरणोपसृतं सत्त्वं नात्याक्षीः शरणप्रदः ॥ ४१ ॥

kaccit tvaṁ brāhmaṇaṁ bālaṁ gāṁ vṛddhaṁ rogiṇaṁ striyam śaraṇopasṛtaṁ sattvaṁ nātyākṣīḥ śaraṇa-pradaḥ

तुम, जो शरणागत-रक्षक हो — क्या तुमने किसी योग्य प्राणी की रक्षा नहीं की, जो तुम्हारी शरण में आया था — कोई ब्राह्मण, बालक, गौ, वृद्ध, रोगी, अथवा स्त्री?

श्लोक 42 (bhagavata.1.14.42)

कच्चित्त्वं नागमोऽगम्यां गम्यां वासत्कृतां स्त्रियम् । पराजितो वाथ भवान्नोत्तमैर्नासमैः पथि ॥ ४२ ॥

kaccit tvaṁ nāgamo ’gamyāṁ gamyāṁ vāsat-kṛtāṁ striyam parājito vātha bhavān nottamair nāsamaiḥ pathi

क्या तुमने भूलवश किसी अगम्य स्त्री का संग किया, अथवा किसी गम्य स्त्री का उचित सम्मान न किया? अथवा क्या मार्ग में किसी ऐसे व्यक्ति से पराजित हुए जो तुमसे श्रेष्ठ या समान भी नहीं था?

श्लोक 43 (bhagavata.1.14.43)

अपि स्वित्पर्यभुङ्क्थास्त्वं सम्भोज्यान् वृद्धबालकान् । जुगुप्सितं कर्म किञ्चित्कृतवान्न यदक्षमम् ॥ ४३ ॥

api svit parya-bhuṅkthās tvaṁ sambhojyān vṛddha-bālakān jugupsitaṁ karma kiñcit kṛtavān na yad akṣamam

अथवा क्या तुमने वृद्धों और बालकों को, जो सहभोजन के अधिकारी थे, छोड़कर अकेले भोजन कर लिया? क्या तुमने भूलवश कोई निंदनीय, अपने योग्य न होने वाला कार्य किया है?

श्लोक 44 (bhagavata.1.14.44)

कच्चित् प्रेष्ठतमेनाथ हृदयेनात्मबन्धुना । शून्योऽस्मि रहितो नित्यं मन्यसे तेऽन्यथा न रुक् ॥ ४४ ॥

kaccit preṣṭhatamenātha hṛdayenātma-bandhunā śūnyo ’smi rahito nityaṁ manyase te ’nyathā na ruk

अथवा क्या यह है कि तुम अपने आपको सर्वथा शून्य, अपने प्रियतम हृदय, अपनी आत्मा के सखा से सदा के लिए वंचित अनुभव कर रहे हो? मुझे तुम्हारी इस पीड़ा का और कोई कारण नहीं सूझता।

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