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प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17

कलि को दण्ड और वरदान

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (bhagavata.1.17.1)

सूत उवाच तत्र गोमिथुनं राजा हन्यमानमनाथवत् । दण्डहस्तं च वृषलं ददृशे नृपलाञ्छनम् ॥ १ ॥

sūta uvāca tatra go-mithunaṁ rājā hanyamānam anāthavat daṇḍa-hastaṁ ca vṛṣalaṁ dadṛśe nṛpa-lāñchanam

सूत जी ने कहा — वहाँ राजा ने देखा कि एक गौ और बैल को, स्वामीरहित अनाथों के समान, हाथ में दण्ड लिए हुए एक राजवेषधारी शूद्र पीट रहा है।

श्लोक 2 (bhagavata.1.17.2)

वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् । वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रताडितम् ॥ २ ॥

vṛṣaṁ mṛṇāla-dhavalaṁ mehantam iva bibhyatam vepamānaṁ padaikena sīdantaṁ śūdra-tāḍitam

कमल-नाल के समान श्वेत वह बैल, भयभीत होकर, काँपते हुए और एक ही पैर पर खड़ा होकर, भय से मूत्र त्यागते हुए, उस शूद्र द्वारा पीटा जा रहा था।

श्लोक 3 (bhagavata.1.17.3)

गां च धर्मदुघां दीनां भृशं शूद्रपदाहताम् । विवत्सामाश्रुवदनां क्षामां यवसमिच्छतीम् ॥ ३ ॥

gāṁ ca dharma-dughāṁ dīnāṁ bhṛśaṁ śūdra-padāhatām vivatsām āśru-vadanāṁ kṣāmāṁ yavasam icchatīm

और वह गौ, जिससे धर्म का दोहन किया जाता है, अब दीन हो गई थी; शूद्र द्वारा उसके पैरों पर निर्दयतापूर्वक प्रहार किया जा रहा था; वह बछड़े से रहित, अश्रुपूर्ण मुख वाली, क्षीण तथा केवल थोड़ी घास की अभिलाषा करती हुई खड़ी थी।

श्लोक 4 (bhagavata.1.17.4)

पप्रच्छ रथमारूढः कार्तस्वरपरिच्छदम् । मेघगम्भीरया वाचा समारोपितकार्मुकः ॥ ४ ॥

papraccha ratham ārūḍhaḥ kārtasvara-paricchadam megha-gambhīrayā vācā samāropita-kārmukaḥ

स्वर्ण से अलंकृत रथ पर बैठे, धनुष चढ़ाए हुए राजा ने बादल के समान गम्भीर वाणी में उससे प्रश्न किया।

श्लोक 5 (bhagavata.1.17.5)

कस्त्वं मच्छरणे लोके बलाद्धंस्यबलान् बली । नरदेवोऽसि वेशेण नटवत्कर्मणाद्विजः ॥ ५ ॥

kas tvaṁ mac-charaṇe loke balād dhaṁsy abalān balī nara-devo ’si veṣeṇa naṭavat karmaṇā ’dvijaḥ

तुम कौन हो, जो बलवान होते हुए भी मेरे राज्य में निर्बलों को बलपूर्वक मार डालते हो? वेश से तुम राजा-सम प्रतीत होते हो, परन्तु कर्म से तुम द्विज नहीं, अभिनेता के समान केवल स्वांग रचते हो।

श्लोक 6 (bhagavata.1.17.6)

यस्त्वं कृष्णे गते दूरं सहगाण्डीवधन्वना । शोच्योऽस्यशोच्यान् रहसि प्रहरन् वधमर्हसि ॥ ६ ॥

yas tvaṁ kṛṣṇe gate dūraṁ saha-gāṇḍīva-dhanvanā śocyo ’sy aśocyān rahasi praharan vadham arhasi

दुष्ट! क्या तुम कृष्ण और गाण्डीवधारी अर्जुन को दूर तथा अदृश्य जानकर ही इस निर्दोष पर प्रहार कर रहे हो? एकान्त में निर्दोष को पीटने के कारण तुम वध के ही योग्य हो।

श्लोक 7 (bhagavata.1.17.7)

त्वं वा मृणालधवलः पादैर्न्यूनः पदा चरन् । वृषरूपेण किं कश्चिद् देवो नः परिखेदयन् ॥ ७ ॥

tvaṁ vā mṛṇāla-dhavalaḥ pādair nyūnaḥ padā caran vṛṣa-rūpeṇa kiṁ kaścid devo naḥ parikhedayan

तत्पश्चात उन्होंने बैल से पूछा — क्या तुम कमल-नाल के समान श्वेत बैल हो, जिसकी तीन टाँगें खो गई हैं और जो एक पर ही चल रहा है — अथवा तुम कोई देवता हो, जो बैल का रूप धरकर हमें दुखी कर रहे हो?

श्लोक 8 (bhagavata.1.17.8)

न जातु कौरवेन्द्राणां दोर्दण्डपरिरम्भिते । भूतलेऽनुपतन्त्यस्मिन् विना ते प्राणिनां शुचः ॥ ८ ॥

na jātu kauravendrāṇāṁ dordaṇḍa-parirambhite bhū-tale ’nupatanty asmin vinā te prāṇināṁ śucaḥ

कौरववंशी राजाओं की भुजाओं से संरक्षित इस भूतल पर आज तक तुम्हारे समान आँसू बहाते हुए किसी प्राणी को मैंने कभी नहीं देखा।

श्लोक 9 (bhagavata.1.17.9)

मा सौरभेयात्र शुचो व्येतु ते वृषलाद् भयम् । मा रोदीरम्ब भद्रं ते खलानां मयि शास्तरि ॥ ९ ॥

mā saurabheyātra śuco vyetu te vṛṣalād bhayam mā rodīr amba bhadraṁ te khalānāṁ mayi śāstari

हे सुरभि-पुत्र! यहाँ अब तुम्हारा शोक दूर हो जाए, इस शूद्र से भय मत करो। हे माता! मत रोओ — जब तक मैं दुष्टों का दमन करने वाला शासक हूँ, तुम्हारा सब कुछ भला ही होगा।

श्लोक 10 (bhagavata.1.17.10)

यस्य राष्ट्रे प्रजाः सर्वास्त्रस्यन्ते साध्व्यसाधुभिः । तस्य मत्तस्य नश्यन्ति कीर्तिरायुर्भगो गतिः ॥ १० ॥

yasya rāṣṭre prajāḥ sarvās trasyante sādhvy asādhubhiḥ tasya mattasya naśyanti kīrtir āyur bhago gatiḥ

हे साध्वी! जिस राजा के राज्य में समस्त प्राणी दुष्टों से भयभीत रहते हैं, उस मोहग्रस्त राजा की कीर्ति, आयु, सौभाग्य और सद्गति — सब नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.1.17.11)

एष राज्ञां परो धर्मो ह्यार्तानामार्तिनिग्रहः । अत एनं वधिष्यामि भूतद्रुहमसत्तमम् ॥ ११ ॥

eṣa rājñāṁ paro dharmo hy ārtānām ārti-nigrahaḥ ata enaṁ vadhiṣyāmi bhūta-druham asattamam

पीड़ितों की पीड़ा को दूर करना ही राजाओं का सर्वोच्च धर्म है। अतः मैं इस अधमाधम को, जो अन्य प्राणियों को कष्ट पहुँचाता है, अवश्य मार डालूँगा।

श्लोक 12 (bhagavata.1.17.12)

कोऽवृश्चत् तव पादांस्त्रीन् सौरभेय चतुष्पद । मा भूवंस्त्वादृशा राष्ट्रे राज्ञां कृष्णानुवर्तिनाम् ॥ १२ ॥

ko ’vṛścat tava pādāṁs trīn saurabheya catuṣ-pada mā bhūvaṁs tvādṛśā rāṣṭre rājñāṁ kṛṣṇānuvartinām

हे सुरभि-पुत्र! तुम तो चतुष्पद थे, तुम्हारी तीन टाँगें किसने काट डालीं? कृष्ण का अनुसरण करने वाले राजाओं के राज्य में तुम्हारे समान दुर्दशा कभी नहीं होनी चाहिए थी।

श्लोक 13 (bhagavata.1.17.13)

आख्याहि वृष भद्रं वः साधूनामकृतागसाम् । आत्मवैरूप्यकर्तारं पार्थानां कीर्तिदूषणम् ॥ १३ ॥

ākhyāhi vṛṣa bhadraṁ vaḥ sādhūnām akṛtāgasām ātma-vairūpya-kartāraṁ pārthānāṁ kīrti-dūṣaṇam

हे बैल! मुझे बताओ, तुम्हारा कल्याण हो — तुम निर्दोष और सत्यनिष्ठ हो — तुम्हें इस प्रकार विकृत करने वाला तथा पृथा-पुत्रों की कीर्ति को कलंकित करने वाला कौन है?

श्लोक 14 (bhagavata.1.17.14)

जनेऽनागस्यघं युञ्जन् सर्वतोऽस्य च मद्भयम् । साधूनां भद्रमेव स्यादसाधुदमने कृते ॥ १४ ॥

jane ’nāgasy aghaṁ yuñjan sarvato ’sya ca mad-bhayam sādhūnāṁ bhadram eva syād asādhu-damane kṛte

जो कोई निर्दोष प्राणियों को कष्ट पहुँचाता है, उसे मुझसे कहीं भी भय होना चाहिए; दुष्टों का दमन करने से साधुजनों का ही कल्याण होता है।

श्लोक 15 (bhagavata.1.17.15)

अनागःस्विह भूतेषु य आगस्कृन्निरङ्कुशः । आहर्तास्मि भुजं साक्षादमर्त्यस्यापि साङ्गदम् ॥ १५ ॥

anāgaḥsv iha bhūteṣu ya āgas-kṛn niraṅkuśaḥ āhartāsmi bhujaṁ sākṣād amartyasyāpi sāṅgadam

जो कोई निरंकुश होकर निर्दोष प्राणियों के प्रति यहाँ अपराध करता है, मैं उसकी भुजाओं को साक्षात उखाड़ फेंकूँगा, चाहे वह आभूषणों से सुसज्जित देवता ही क्यों न हो।

श्लोक 16 (bhagavata.1.17.16)

राज्ञो हि परमो धर्मः स्वधर्मस्थानुपालनम् । शासतोऽन्यान् यथाशास्त्रमनापद्युत्पथानिह ॥ १६ ॥

rājño hi paramo dharmaḥ sva-dharma-sthānupālanam śāsato ’nyān yathā-śāstram anāpady utpathān iha

राजा का सर्वोच्च धर्म यही है कि वह अपने धर्म में स्थित प्रजा की सतत रक्षा करे, तथा सामान्य काल में, बिना किसी आपात्काल के, शास्त्रानुसार कुमार्गगामियों को दण्डित करे।

श्लोक 17 (bhagavata.1.17.17)

धर्म उवाच एतद् वः पाण्डवेयानां युक्तमार्ताभयं वचः । येषां गुणगणैः कृष्णो दौत्यादौ भगवान् कृतः ॥ १७ ॥

dharma uvāca etad vaḥ pāṇḍaveyānāṁ yuktam ārtābhayaṁ vacaḥ yeṣāṁ guṇa-gaṇaiḥ kṛṣṇo dautyādau bhagavān kṛtaḥ

धर्म ने कहा — ये वचन तुम्हें, पाण्डवों के वंशज को, शोभा देते हैं, जिनके गुणों से मुग्ध होकर स्वयं भगवान कृष्ण ने भी दूत का पद स्वीकार किया था।

श्लोक 18 (bhagavata.1.17.18)

न वयं क्लेशबीजानि यतः स्युः पुरुषर्षभ । पुरुषं तं विजानीमो वाक्यभेदविमोहिताः ॥ १८ ॥

na vayaṁ kleśa-bījāni yataḥ syuḥ puruṣarṣabha puruṣaṁ taṁ vijānīmo vākya-bheda-vimohitāḥ

हे पुरुषश्रेष्ठ! हम उस व्यक्ति को वास्तव में नहीं जानते, जो दुःख का मूल कारण है — विभिन्न विचारकों के परस्पर विरोधी मतों से हम मोहित हो जाते हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.1.17.19)

केचिद् विकल्पवसना आहुरात्मानमात्मनः । दैवमन्येऽपरे कर्म स्वभावमपरे प्रभुम् ॥ १९ ॥

kecid vikalpa-vasanā āhur ātmānam ātmanaḥ daivam anye ’pare karma svabhāvam apare prabhum

कुछ अद्वैतवादी कहते हैं कि आत्मा स्वयं ही अपने सुख-दुःख का कारण है; अन्य कहते हैं दैव; कुछ कर्म को; और कुछ प्रकृति को ही स्वामी मानते हैं।

श्लोक 20 (bhagavata.1.17.20)

अप्रतर्क्यादनिर्देश्यादिति केष्वपि निश्चयः । अत्रानुरूपं राजर्षे विमृश स्वमनीषया ॥ २० ॥

apratarkyād anirdeśyād iti keṣv api niścayaḥ atrānurūpaṁ rājarṣe vimṛśa sva-manīṣayā

कुछ अन्य यह मानते हैं कि कारण तर्क से परे और निर्देश से परे है — यही उनका निश्चित मत है। हे राजर्षे! आप स्वयं अपनी बुद्धि से इस विषय पर विचार करें।

श्लोक 21 (bhagavata.1.17.21)

सूत उवाच एवं धर्मे प्रवदति स सम्राड् द्विजसत्तमाः । समाहितेन मनसा विखेदः पर्यचष्ट तम् ॥ २१ ॥

sūta uvāca evaṁ dharme pravadati sa samrāḍ dvija-sattamāḥ samāhitena manasā vikhedaḥ paryacaṣṭa tam

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! धर्म के इस प्रकार कहने पर, सम्राट ने एकाग्र मन से, शोकरहित होकर, उन्हें यह उत्तर दिया।

श्लोक 22 (bhagavata.1.17.22)

राजोवाच धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् । यदधर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्भवेत् ॥ २२ ॥

rājovāca dharmaṁ bravīṣi dharma-jña dharmo ’si vṛṣa-rūpa-dhṛk yad adharma-kṛtaḥ sthānaṁ sūcakasyāpi tad bhavet

राजा ने कहा — हे धर्मज्ञ! तुम धर्म की ही बात करते हो, क्योंकि बैल-रूप में तुम स्वयं धर्म ही हो; क्योंकि जो गति अधर्म करने वाले की होती है, वही उसे इंगित करने वाले की भी होती है।

श्लोक 23 (bhagavata.1.17.23)

अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा । चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः ॥ २३ ॥

athavā deva-māyāyā nūnaṁ gatir agocarā cetaso vacasaś cāpi bhūtānām iti niścayaḥ

अथवा यह भी निश्चित है कि भगवान की उस दिव्य माया की गति किसी भी प्राणी के मन या वाणी की पहुँच से परे है।

श्लोक 24 (bhagavata.1.17.24)

तपः शौचं दया सत्यमिति पादाः कृते कृताः । अधर्मांशैस्त्रयो भग्नाः स्मयसङ्गमदैस्तव ॥ २४ ॥

tapaḥ śaucaṁ dayā satyam iti pādāḥ kṛte kṛtāḥ adharmāṁśais trayo bhagnāḥ smaya-saṅga-madais tava

सत्ययुग में तुम्हारे चार पैर तप, शौच, दया और सत्य के रूप में स्थापित थे। परन्तु अब उनमें से तीन, अधर्म के अंशों — अभिमान, कामासक्ति और मद — से टूट चुके हैं।

श्लोक 25 (bhagavata.1.17.25)

इदानीं धर्म पादस्ते सत्यं निर्वर्तयेद्यतः । तं जिघृक्षत्यधर्मोऽयमनृतेनैधितः कलिः ॥ २५ ॥

idānīṁ dharma pādas te satyaṁ nirvartayed yataḥ taṁ jighṛkṣaty adharmo ’yam anṛtenaidhitaḥ kaliḥ

हे धर्म! अब तुम्हारा केवल एक ही पैर, सत्य, किसी प्रकार तुम्हें सहारा दे रहा है; और असत्य से पुष्ट यह अधर्म-रूप कलि उसे भी छीनने का प्रयत्न कर रहा है।

श्लोक 26 (bhagavata.1.17.26)

इयं च भूमिर्भगवता न्यासितोरुभरा सती । श्रीमद्भिस्तत्पदन्यासैः सर्वतः कृतकौतुका ॥ २६ ॥

iyaṁ ca bhūmir bhagavatā nyāsitoru-bharā satī śrīmadbhis tat-pada-nyāsaiḥ sarvataḥ kṛta-kautukā

यह पृथ्वी भी, जिसका भारी बोझ स्वयं भगवान ने उतार दिया था, सर्वत्र उनके शुभ चरण-चिह्नों से सुशोभित होकर प्रसन्न और संतुष्ट रहती थी।

श्लोक 27 (bhagavata.1.17.27)

शोचत्यश्रुकला साध्वी दुर्भगेवोज्झिता सती । अब्रह्मण्या नृपव्याजाः शूद्रा भोक्ष्यन्ति मामिति ॥ २७ ॥

śocaty aśru-kalā sādhvī durbhagevojjhitā satī abrahmaṇyā nṛpa-vyājāḥ śūdrā bhokṣyanti mām iti

परन्तु अब वह सती पृथ्वी, मानो अभागी होकर त्यक्त हो गई हो, अश्रुपूर्ण होकर विलाप करती है — यह सोचकर कि अब ब्रह्मण्य-विहीन, राजा के वेष में शूद्र उसका भोग करेंगे।

श्लोक 28 (bhagavata.1.17.28)

इति धर्मं महीं चैव सान्त्वयित्वा महारथः । निशातमाददे खड्गं कलयेऽधर्महेतवे ॥ २८ ॥

iti dharmaṁ mahīṁ caiva sāntvayitvā mahā-rathaḥ niśātam ādade khaḍgaṁ kalaye ’dharma-hetave

इस प्रकार धर्म और पृथ्वी दोनों को सान्त्वना देकर, उस महारथी ने अधर्म के मूल कारण कलि का वध करने हेतु अपनी तीक्ष्ण तलवार उठा ली।

श्लोक 29 (bhagavata.1.17.29)

तं जिघांसुमभिप्रेत्य विहाय नृपलाञ्छनम् । तत्पादमूलं शिरसा समगाद् भयविह्वलः ॥ २९ ॥

taṁ jighāṁsum abhipretya vihāya nṛpa-lāñchanam tat-pāda-mūlaṁ śirasā samagād bhaya-vihvalaḥ

यह जानकर कि राजा उसका वध करना चाहते हैं, कलि ने अपना राजवेष त्याग दिया और भय से विह्वल होकर, राजा के चरणों में सिर रखकर पूर्णतः शरणागत हो गया।

श्लोक 30 (bhagavata.1.17.30)

पतितं पादयोर्वीरः कृपया दीनवत्सलः । शरण्यो नावधीच्छ्लोक्य आह चेदं हसन्निव ॥ ३० ॥

patitaṁ pādayor vīraḥ kṛpayā dīna-vatsalaḥ śaraṇyo nāvadhīc chlokya āha cedaṁ hasann iva

दीनों पर दयालु, शरणागत-वत्सल, सदा कीर्तनीय उस वीर राजा ने चरणों में पड़े कलि का वध नहीं किया, अपितु मुस्कुराते हुए उससे यह कहा।

श्लोक 31 (bhagavata.1.17.31)

राजोवाच न ते गुडाकेशयशोधराणां बद्धाञ्जलेर्वै भयमस्ति किञ्चित् । न वर्तितव्यं भवता कथञ्चन क्षेत्रे मदीये त्वमधर्मबन्धुः ॥ ३१ ॥

rājovāca na te guḍākeśa-yaśo-dharāṇāṁ baddhāñjaler vai bhayam asti kiñcit na vartitavyaṁ bhavatā kathañcana kṣetre madīye tvam adharma-bandhuḥ

राजा ने कहा — गुडाकेश (अर्जुन) की कीर्ति के उत्तराधिकारियों के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े होने वाले तुम्हें किंचित भी भय नहीं है। किन्तु तुम मेरे राज्य में किसी भी प्रकार नहीं रह सकते, क्योंकि तुम अधर्म के मित्र हो।

श्लोक 32 (bhagavata.1.17.32)

त्वां वर्तमानं नरदेवदेहे- ष्वनुप्रवृत्तोऽयमधर्मपूगः । लोभोऽनृतं चौर्यमनार्यमंहो ज्येष्ठा च माया कलहश्च दम्भः ॥ ३२ ॥

tvāṁ vartamānaṁ nara-deva-deheṣv anupravṛtto ’yam adharma-pūgaḥ lobho ’nṛtaṁ cauryam anāryam aṁho jyeṣṭhā ca māyā kalahaś ca dambhaḥ

जहाँ भी तुम राजा बने हुए मनुष्यों के शरीर में निवास करते हो, वहाँ लोभ, असत्य, चोरी, अशिष्टता, पाप, माया में सर्वप्रमुख छल, कलह और पाखण्ड — यह सम्पूर्ण अधर्म-समूह तुम्हारे पीछे-पीछे चलता है।

श्लोक 33 (bhagavata.1.17.33)

न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये । ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञै- र्यज्ञेश्वरं यज्ञवितानविज्ञाः ॥ ३३ ॥

na vartitavyaṁ tad adharma-bandho dharmeṇa satyena ca vartitavye brahmāvarte yatra yajanti yajñair yajñeśvaraṁ yajña-vitāna-vijñāḥ

अतः हे अधर्म के सखे! ब्रह्मावर्त में, जहाँ केवल धर्म और सत्य का ही आचरण होना चाहिए, जहाँ यज्ञ-विधि में निपुण जन यज्ञों द्वारा यज्ञेश्वर की आराधना करते हैं, तुम्हें रहने का कोई अधिकार नहीं है।

श्लोक 34 (bhagavata.1.17.34)

यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इज्यात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति । कामानमोघान् स्थिरजङ्गमाना- मन्तर्बहिर्वायुरिवैष आत्मा ॥ ३४ ॥

yasmin harir bhagavān ijyamāna ijyātma-mūrtir yajatāṁ śaṁ tanoti kāmān amoghān sthira-jaṅgamānām antar bahir vāyur ivaiṣa ātmā

जहाँ भगवान हरि, समस्त पूज्य देवताओं की आत्मा, यज्ञों में पूजित होते हैं, वहाँ वे यजमानों की समस्त अमोघ कामनाओं को पूर्ण करते हैं, चर-अचर सभी के भीतर-बाहर वायु के समान आत्मरूप में व्याप्त रहकर।

श्लोक 35 (bhagavata.1.17.35)

सूत उवाच परीक्षितैवमादिष्टः स कलिर्जातवेपथुः । तमुद्यतासिमाहेदं दण्डपाणिमिवोद्यतम् ॥ ३५ ॥

sūta uvāca parīkṣitaivam ādiṣṭaḥ sa kalir jāta-vepathuḥ tam udyatāsim āhedaṁ daṇḍa-pāṇim ivodyatam

सूत जी ने कहा — परीक्षित द्वारा इस प्रकार आदेशित होकर कलि काँपने लगा। राजा को अपने ऊपर तलवार उठाए, मानो दण्डधारी यमराज के समान देखकर, उसने यह कहा।

श्लोक 36 (bhagavata.1.17.36)

कलिरुवाच यत्र क्व वाथ वत्स्यामि सार्वभौम तवाज्ञया । लक्षये तत्र तत्रापि त्वामात्तेषुशरासनम् ॥ ३६ ॥

kalir uvāca yatra kva vātha vatsyāmi sārva-bhauma tavājñayā lakṣaye tatra tatrāpi tvām ātteṣu-śarāsanam

कलि ने कहा — हे सार्वभौम! आपकी आज्ञा से मैं जहाँ कहीं भी निवास करूँ, वहाँ-वहाँ भी मुझे आप ही धनुष-बाण लिए दिखाई देंगे।

श्लोक 37 (bhagavata.1.17.37)

तन्मे धर्मभृतां श्रेष्ठ स्थानं निर्देष्टुमर्हसि । यत्रैव नियतो वत्स्य आतिष्ठंस्तेऽनुशासनम् ॥ ३७ ॥

tan me dharma-bhṛtāṁ śreṣṭha sthānaṁ nirdeṣṭum arhasi yatraiva niyato vatsya ātiṣṭhaṁs te ’nuśāsanam

अतः हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ! कृपया मुझे कोई निश्चित स्थान बता दीजिए, जहाँ मैं सदा आपके शासन के अधीन रहते हुए निवास कर सकूँ।

श्लोक 38 (bhagavata.1.17.38)

सूत उवाच अभ्यर्थितस्तदा तस्मै स्थानानि कलये ददौ । द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः ॥ ३८ ॥

sūta uvāca abhyarthitas tadā tasmai sthānāni kalaye dadau dyūtaṁ pānaṁ striyaḥ sūnā yatrādharmaś catur-vidhaḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर राजा ने कलि को वे स्थान प्रदान किए, जहाँ द्यूत, मद्यपान, वेश्यागमन और पशु-हिंसा — ये चार प्रकार के अधर्म व्याप्त हों।

श्लोक 39 (bhagavata.1.17.39)

पुनश्च याचमानाय जातरूपमदात्प्रभुः । ततोऽनृतं मदं कामं रजो वैरं च पञ्चमम् ॥ ३९ ॥

punaś ca yācamānāya jāta-rūpam adāt prabhuḥ tato ’nṛtaṁ madaṁ kāmaṁ rajo vairaṁ ca pañcamam

पुनः याचना करने पर राजा ने उसे स्वर्ण भी दे दिया — जिसके साथ असत्य, मद, काम, रजोगुण तथा वैर नामक पाँचवाँ दोष भी संलग्न रहते हैं।

श्लोक 40 (bhagavata.1.17.40)

अमूनि पञ्च स्थानानि ह्यधर्मप्रभवः कलिः । औत्तरेयेण दत्तानि न्यवसत् तन्निदेशकृत् ॥ ४० ॥

amūni pañca sthānāni hy adharma-prabhavaḥ kaliḥ auttareyeṇa dattāni nyavasat tan-nideśa-kṛt

अधर्म के इन पाँच उद्गम-स्थानों को उत्तरा-पुत्र परीक्षित द्वारा दिए जाने पर, कलि उनके आदेश का पालन करते हुए वहीं निवास करने लगा।

श्लोक 41 (bhagavata.1.17.41)

अथैतानि न सेवेत बुभूषुः पुरुषः क्वचित् । विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरुः ॥ ४१ ॥

athaitāni na seveta bubhūṣuḥ puruṣaḥ kvacit viśeṣato dharma-śīlo rājā loka-patir guruḥ

अतः जो कोई अपने कल्याण की इच्छा रखता हो — विशेषतः धर्मशील राजा, लोकनायक अथवा गुरुजन — उन्हें इन स्थानों से किसी भी परिस्थिति में सम्पर्क नहीं रखना चाहिए।

श्लोक 42 (bhagavata.1.17.42)

वृषस्य नष्टांस्त्रीन् पादान् तपः शौचं दयामिति । प्रतिसन्दध आश्वास्य महीं च समवर्धयत् ॥ ४२ ॥

vṛṣasya naṣṭāṁs trīn pādān tapaḥ śaucaṁ dayām iti pratisandadha āśvāsya mahīṁ ca samavardhayat

तत्पश्चात राजा ने बैल के तप, शौच और दया नामक तीन खोए हुए पैरों को पुनः स्थापित किया, तथा पृथ्वी को सान्त्वना देकर उसे सब प्रकार से समृद्ध किया।

श्लोक 43 (bhagavata.1.17.43)

स एष एतर्ह्यध्यास्त आसनं पार्थिवोचितम् । पितामहेनोपन्यस्तं राज्ञारण्यं विविक्षता ॥ ४३ ॥

sa eṣa etarhy adhyāsta āsanaṁ pārthivocitam pitāmahenopanyastaṁ rājñāraṇyaṁ vivikṣatā

यही राजा अब उस राजोचित सिंहासन पर विराजमान हैं, जो उनके पितामह युधिष्ठिर ने वन जाने की इच्छा से उन्हें सौंपा था —

श्लोक 44 (bhagavata.1.17.44)

आस्तेऽधुना स राजर्षिः कौरवेन्द्रश्रियोल्लसन् । गजाह्वये महाभागश्चक्रवर्ती बृहच्छ्रवाः ॥ ४४ ॥

āste ’dhunā sa rājarṣiḥ kauravendra-śriyollasan gajāhvaye mahā-bhāgaś cakravartī bṛhac-chravāḥ

— और वही परम भाग्यशाली, अत्यंत यशस्वी राजर्षि अब भी कौरववंश के गौरव से देदीप्यमान होकर हस्तिनापुर में शासन कर रहे हैं।

श्लोक 45 (bhagavata.1.17.45)

इत्थम्भूतानुभावोऽयमभिमन्युसुतो नृपः । यस्य पालयतः क्षौणीं यूयं सत्राय दीक्षिताः ॥ ४५ ॥

ittham-bhūtānubhāvo ’yam abhimanyu-suto nṛpaḥ yasya pālayataḥ kṣauṇīṁ yūyaṁ satrāya dīkṣitāḥ

इस राजा, अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित, की महिमा ऐसी है कि उनके पृथ्वी-पालन के फलस्वरूप ही आप सब इस यज्ञ हेतु दीक्षित हो सके हैं।

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