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प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5

व्यासदेव के प्रति नारद का उपदेश

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (bhagavata.1.5.1)

सूत उवाच अथ तं सुखमासीन उपासीनं बृहच्छ्रवाः । देवर्षिः प्राह विप्रर्षिं वीणापाणिः स्मयन्निव ॥ १ ॥

sūta uvāca atha taṁ sukham āsīna upāsīnaṁ bṛhac-chravāḥ devarṣiḥ prāha viprarṣiṁ vīṇā-pāṇiḥ smayann iva

सूत जी बोले — तब वीणा हाथ में लिए देवर्षि नारद ने, मानो मुस्कराते हुए, समीप ही सुखपूर्वक बैठे परम यशस्वी ब्राह्मणश्रेष्ठ (व्यास) से यह कहा।

श्लोक 2 (bhagavata.1.5.2)

नारद उवाच पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना । परितुष्यति शारीर आत्मा मानस एव वा ॥ २ ॥

nārada uvāca pārāśarya mahā-bhāga bhavataḥ kaccid ātmanā parituṣyati śārīra ātmā mānasa eva vā

नारद बोले — हे महाभाग पराशरनन्दन! क्या आपका मन शरीर अथवा मन के साथ तादात्म्य से सन्तुष्ट हो गया है?

श्लोक 3 (bhagavata.1.5.3)

जिज्ञासितं सुसम्पन्नमपि ते महदद्भुतम् । कृतवान् भारतं यस्त्वं सर्वार्थपरिबृंहितम् ॥ ३ ॥

jijñāsitaṁ susampannam api te mahad-adbhutam kṛtavān bhārataṁ yas tvaṁ sarvārtha-paribṛṁhitam

आपकी जिज्ञासा भलीभाँति पूर्ण हो चुकी है, क्योंकि आपने वह महान और अद्भुत महाभारत रच डाला है, जिसमें समस्त विषयों का विस्तारपूर्वक वर्णन है।

श्लोक 4 (bhagavata.1.5.4)

जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत्सनातनम् । तथापि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४ ॥

jijñāsitam adhītaṁ ca brahma yat tat sanātanam tathāpi śocasy ātmānam akṛtārtha iva prabho

आपने उस सनातन ब्रह्म के विषय में जिज्ञासा और अध्ययन भी कर लिया है; फिर भी, हे प्रभो, आप ऐसे शोकाकुल हैं मानो आपका प्रयोजन अब भी अपूर्ण हो।

श्लोक 5 (bhagavata.1.5.5)

व्यास उवाच अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं तथापि नात्मा परितुष्यते मे । तन्मूलमव्यक्तमगाधबोधं पृच्छामहे त्वात्मभवात्मभूतम् ॥ ५ ॥

vyāsa uvāca asty eva me sarvam idaṁ tvayoktaṁ tathāpi nātmā parituṣyate me tan-mūlam avyaktam agādha-bodhaṁ pṛcchāmahe tvātma-bhavātma-bhūtam

व्यास बोले — आपने जो कुछ मेरे विषय में कहा, वह सब सत्य है; फिर भी मेरा मन सन्तुष्ट नहीं है। अतः हे स्वयंभू ब्रह्मा के पुत्र, अगाध ज्ञान वाले! मैं आपसे इस असन्तोष के अव्यक्त मूल कारण के विषय में पूछता हूँ।

श्लोक 6 (bhagavata.1.5.6)

स वै भवान् वेद समस्तगुह्य- मुपासितो यत्पुरुषः पुराणः । परावरेशो मनसैव विश्वं सृजत्यवत्यत्ति गुणैरसङ्गः ॥ ६ ॥

sa vai bhavān veda samasta-guhyam upāsito yat puruṣaḥ purāṇaḥ parāvareśo manasaiva viśvaṁ sṛjaty avaty atti guṇair asaṅgaḥ

आप निःसन्देह समस्त गूढ़ रहस्यों को जानते हैं, क्योंकि आप उस पुरातन पुरुष की उपासना करते हैं, जो कारण और कार्य दोनों के ईश्वर हैं और गुणों से असंग रहकर मन मात्र से ही इस विश्व की रचना, पालन और संहार करते हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.1.5.7)

त्वं पर्यटन्नर्क इव त्रिलोकी- मन्तश्चरो वायुरिवात्मसाक्षी । परावरे ब्रह्मणि धर्मतो व्रतैः स्नातस्य मे न्यूनमलं विचक्ष्व ॥ ७ ॥

tvaṁ paryaṭann arka iva tri-lokīm antaś-caro vāyur ivātma-sākṣī parāvare brahmaṇi dharmato vrataiḥ snātasya me nyūnam alaṁ vicakṣva

आप सूर्य के समान तीनों लोकों में विचरण करते हैं और वायु के समान सबके भीतर संचरण करते हुए आत्मा के साक्षी हैं। अतः कारण और कार्यरूप ब्रह्म में धर्मपूर्वक व्रतों द्वारा स्नात मुझमें जो न्यूनता शेष है, उसे स्पष्ट रूप से बताइए।

श्लोक 8 (bhagavata.1.5.8)

श्रीनारद उवाच भवतानुदितप्रायं यशो भगवतोऽमलम् । येनैवासौ न तुष्येत मन्ये तद्दर्शनं खिलम् ॥ ८ ॥

śrī-nārada uvāca bhavatānudita-prāyaṁ yaśo bhagavato ’malam yenaivāsau na tuṣyeta manye tad darśanaṁ khilam

श्री नारद बोले — आपने भगवान की निर्मल कीर्ति का लगभग कोई वर्णन ही नहीं किया। मेरी दृष्टि में वह दर्शन निष्फल है, जिससे भगवान प्रसन्न न हों।

श्लोक 9 (bhagavata.1.5.9)

यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिताः । न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ ९ ॥

yathā dharmādayaś cārthā muni-varyānukīrtitāḥ na tathā vāsudevasya mahimā hy anuvarṇitaḥ

हे मुनिश्रेष्ठ, जिस प्रकार आपने धर्मादि पुरुषार्थों का बार-बार वर्णन किया है, उस प्रकार वासुदेव की महिमा का वर्णन नहीं किया।

श्लोक 10 (bhagavata.1.5.10)

न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो जगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित् । तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा न यत्र हंसा निरमन्त्युशिक्क्षयाः ॥ १० ॥

na yad vacaś citra-padaṁ harer yaśo jagat-pavitraṁ pragṛṇīta karhicit tad vāyasaṁ tīrtham uśanti mānasā na yatra haṁsā niramanty uśik-kṣayāḥ

जो वाणी, चाहे कितनी भी अलंकृत क्यों न हो, जगत को पवित्र करने वाले हरि के यश का कभी वर्णन नहीं करती, उसे विचारशील जन कौओं के तीर्थ के समान मानते हैं, जहाँ दिव्य धाम में निवास करने वाले हंस कोई रमण नहीं पाते।

श्लोक 11 (bhagavata.1.5.11)

तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवो यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि । नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि यत् शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः ॥ ११ ॥

tad-vāg-visargo janatāgha-viplavo yasmin prati-ślokam abaddhavaty api nāmāny anantasya yaśo ’ṅkitāni yat śṛṇvanti gāyanti gṛṇanti sādhavaḥ

किन्तु वह वाग्-विसर्ग, जो जनसाधारण के पापों का उन्मूलन कर देता है और जिसके प्रत्येक श्लोक में — चाहे वह असंस्कृत ही क्यों न हो — अनन्त भगवान के नाम और यश अंकित हों, उसे साधुजन सुनते, गाते और स्वीकार करते हैं।

श्लोक 12 (bhagavata.1.5.12)

नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् । कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ १२ ॥

naiṣkarmyam apy acyuta-bhāva-varjitaṁ na śobhate jñānam alaṁ nirañjanam kutaḥ punaḥ śaśvad abhadram īśvare na cārpitaṁ karma yad apy akāraṇam

अच्युत के भाव से रहित निष्कर्मता और निरंजन ज्ञान भी शोभा नहीं पाता, तो फिर वह कर्म कैसे शोभा पाएगा, जो अकारण होते हुए भी सदा अशुभ है और ईश्वर को अर्पित नहीं किया गया?

श्लोक 13 (bhagavata.1.5.13)

अथो महाभाग भवानमोघदृक् शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः । उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये समाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम् ॥ १३ ॥

atho mahā-bhāga bhavān amogha-dṛk śuci-śravāḥ satya-rato dhṛta-vrataḥ urukramasyākhila-bandha-muktaye samādhinānusmara tad-viceṣṭitam

अतः हे महाभाग! आप, जिनकी दृष्टि अमोघ है, जिनका यश शुद्ध है, जो सत्यनिष्ठ और दृढ़-व्रत हैं — समस्त प्राणियों को बन्धन से मुक्त करने के लिए समाधि में उन उरुक्रम भगवान की लीलाओं का स्मरण कीजिए।

श्लोक 14 (bhagavata.1.5.14)

ततोऽन्यथा किञ्चन यद्विवक्षतः पृथग्दृशस्तत्कृतरूपनामभिः । न कर्हिचित्क्वापि च दुःस्थिता मति- र्लभेत वाताहतनौरिवास्पदम् ॥ १४ ॥

tato ’nyathā kiñcana yad vivakṣataḥ pṛthag dṛśas tat-kṛta-rūpa-nāmabhiḥ na karhicit kvāpi ca duḥsthitā matir labheta vātāhata-naur ivāspadam

जो कोई भगवान से पृथक दृष्टि रखते हुए अन्य किसी विषय का वर्णन करना चाहता है, उसकी बुद्धि उन्हीं के द्वारा उत्पन्न रूपों और नामों से विचलित होकर वायु से आहत नौका के समान कहीं भी स्थिरता नहीं पाती।

श्लोक 15 (bhagavata.1.5.15)

जुगुप्सितं धर्मकृतेऽनुशासतः स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः । यद्वाक्यतो धर्म इतीतरः स्थितो न मन्यते तस्य निवारणं जनः ॥ १५ ॥

jugupsitaṁ dharma-kṛte ’nuśāsataḥ svabhāva-raktasya mahān vyatikramaḥ yad-vākyato dharma itītaraḥ sthito na manyate tasya nivāraṇaṁ janaḥ

जो पहले से ही भोग की ओर स्वभावतः आसक्त है, उसे धर्म के नाम पर वैसा ही उपदेश देना एक महान अपराध है; क्योंकि आपके वचन से "यही धर्म है" ऐसा मानकर स्थित हो जाने पर साधारण जन फिर उसके निवारण को स्वीकार नहीं करते।

श्लोक 16 (bhagavata.1.5.16)

विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो- रनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् । प्रवर्तमानस्य गुणैरनात्मन- स्ततो भवान्दर्शय चेष्टितं विभोः ॥ १६ ॥

vicakṣaṇo ’syārhati vedituṁ vibhor ananta-pārasya nivṛttitaḥ sukham pravartamānasya guṇair anātmanas tato bhavān darśaya ceṣṭitaṁ vibhoḥ

उस अनन्त एवं सर्वव्यापी भगवान के सुख को जानने का अधिकार केवल उसी विचक्षण पुरुष को है, जो भोगों से निवृत्त हो चुका है। किन्तु जो गुणों से प्रवृत्त और आत्मज्ञान से रहित हैं, उनके लिए भी आप ही भगवान की लीलाओं को प्रकट कीजिए।

श्लोक 17 (bhagavata.1.5.17)

त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरे- र्भजन्नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि । यत्र क्व वाभद्रमभूदमुष्य किं को वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः ॥ १७ ॥

tyaktvā sva-dharmaṁ caraṇāmbujaṁ harer bhajann apakvo ’tha patet tato yadi yatra kva vābhadram abhūd amuṣya kiṁ ko vārtha āpto ’bhajatāṁ sva-dharmataḥ

अपने स्वधर्म को त्यागकर हरि के चरणकमलों का भजन करने वाला यदि अपरिपक्व अवस्था में गिर भी जाए, तो उसका वस्तुतः क्या अहित हुआ और कहाँ हुआ? और जो केवल अपने स्वधर्म में लगा रहकर भजन नहीं करता, उसने ही क्या प्रयोजन प्राप्त किया?

श्लोक 18 (bhagavata.1.5.18)

तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः । तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं कालेन सर्वत्र गभीररंहसा ॥ १८ ॥

tasyaiva hetoḥ prayateta kovido na labhyate yad bhramatām upary adhaḥ tal labhyate duḥkhavad anyataḥ sukhaṁ kālena sarvatra gabhīra-raṁhasā

बुद्धिमान पुरुष को केवल उसी लक्ष्य के लिए प्रयत्न करना चाहिए, जो ऊपर-नीचे भटकने से भी प्राप्त नहीं होता; क्योंकि सुख भी दुःख के समान अन्यत्र से, काल की गहन गति द्वारा, सर्वत्र स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 19 (bhagavata.1.5.19)

न वै जनो जातु कथञ्चनाव्रजे- न्मुकुन्दसेव्यन्यवदङ्ग संसृतिम् । स्मरन्मुकुन्दाङ्घ्र्युरपगूहनं पुन- र्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो जनः ॥ १९ ॥

na vai jano jātu kathañcanāvrajen mukunda-sevy anyavad aṅga saṁsṛtim smaran mukundāṅghry-upagūhanaṁ punar vihātum icchen na rasa-graho janaḥ

हे प्रिय! मुकुन्द का सेवक अन्य लोगों के समान संसार-बन्धन में कभी नहीं पड़ता; क्योंकि जिस व्यक्ति ने एक बार मुकुन्द के चरणों के आलिंगन का रस चख लिया है, वह उसका स्मरण करते हुए उसे पुनः त्यागना नहीं चाहता।

श्लोक 20 (bhagavata.1.5.20)

इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवाः । तद्धि स्वयं वेद भवांस्तथापि ते प्रादेशमात्रं भवतः प्रदर्शितम् ॥ २० ॥

idaṁ hi viśvaṁ bhagavān ivetaro yato jagat-sthāna-nirodha-sambhavāḥ tad dhi svayaṁ veda bhavāṁs tathāpi te prādeśa-mātraṁ bhavataḥ pradarśitam

यह सम्पूर्ण विश्व वस्तुतः भगवान ही है, तथापि उनसे भिन्न-सा प्रतीत होता है, क्योंकि इसी से जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय होती है। यह आप स्वयं भलीभाँति जानते हैं; तथापि मैंने आपको केवल संक्षिप्त संकेत मात्र दिया है।

श्लोक 21 (bhagavata.1.5.21)

त्वमात्मनात्मानमवेह्यमोघदृक् परस्य पुंसः परमात्मनः कलाम् । अजं प्रजातं जगतः शिवाय त- न्महानुभावाभ्युदयोऽधिगण्यताम् ॥ २१ ॥

tvam ātmanātmānam avehy amogha-dṛk parasya puṁsaḥ paramātmanaḥ kalām ajaṁ prajātaṁ jagataḥ śivāya tan mahānubhāvābhyudayo ’dhigaṇyatām

आप, जिनकी दृष्टि अमोघ है, स्वयं अपने द्वारा उस परमात्मा को जानते हैं, क्योंकि आप उस परम पुरुष की ही एक कला हैं; अजन्मा होते हुए भी आपने जगत के कल्याण हेतु जन्म लिया है। अतः उस महानुभाव के अभ्युदय का सम्यक् वर्णन कीजिए।

श्लोक 22 (bhagavata.1.5.22)

इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य वा स्विष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदत्तयोः । अविच्युतोऽर्थः कविभिर्निरूपितो यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम् ॥ २२ ॥

idaṁ hi puṁsas tapasaḥ śrutasya vā sviṣṭasya sūktasya ca buddhi-dattayoḥ avicyuto ’rthaḥ kavibhir nirūpito yad-uttamaśloka-guṇānuvarṇanam

तपस्या, वेदाध्ययन, यज्ञ, सूक्त-पाठ, बुद्धि और दान — इन सबका अच्युत प्रयोजन विद्वान कवियों ने यही निरूपित किया है कि इनसे उत्तमश्लोक भगवान के गुणों का अनुवर्णन हो।

श्लोक 23 (bhagavata.1.5.23)

अहं पुरातीतभवेऽभवं मुने दास्यास्तु कस्याश्चन वेदवादिनाम् । निरूपितो बालक एव योगिनां शुश्रूषणे प्रावृषि निर्विविक्षताम् ॥ २३ ॥

ahaṁ purātīta-bhave ’bhavaṁ mune dāsyās tu kasyāścana veda-vādinām nirūpito bālaka eva yogināṁ śuśrūṣaṇe prāvṛṣi nirvivikṣatām

हे मुने, पूर्वजन्म में मैं वेदवादी मुनियों की किसी दासी के पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ था। बालक होते हुए भी मुझे वर्षा ऋतु में एकत्र रहने वाले उन योगिजनों की सेवा में नियुक्त किया गया था।

श्लोक 24 (bhagavata.1.5.24)

ते मय्यपेताखिलचापलेऽर्भके दान्तेऽधृतक्रीडनकेऽनुवर्तिनि । चक्रुः कृपां यद्यपि तुल्यदर्शनाः शुश्रूषमाणे मुनयोऽल्पभाषिणि ॥ २४ ॥

te mayy apetākhila-cāpale ’rbhake dānte ’dhṛta-krīḍanake ’nuvartini cakruḥ kṛpāṁ yadyapi tulya-darśanāḥ śuśrūṣamāṇe munayo ’lpa-bhāṣiṇi

यद्यपि वे मुनिजन सर्वत्र समदर्शी थे, तथापि उन्होंने मुझ पर, जो चंचलता से रहित, इन्द्रियसंयमी, क्रीड़ा में अनासक्त, आज्ञाकारी, सेवा में तत्पर और अल्पभाषी बालक था, कृपा की।

श्लोक 25 (bhagavata.1.5.25)

उच्छिष्टलेपाननुमोदितो द्विजैः सकृत्स्म भुञ्जे तदपास्तकिल्बिषः । एवं प्रवृत्तस्य विशुद्धचेतस- स्तद्धर्म एवात्मरुचिः प्रजायते ॥ २५ ॥

ucchiṣṭa-lepān anumodito dvijaiḥ sakṛt sma bhuñje tad-apāsta-kilbiṣaḥ evaṁ pravṛttasya viśuddha-cetasas tad-dharma evātma-ruciḥ prajāyate

उन द्विजों की अनुमति से एक बार मैंने उनके भोजन के उच्छिष्ट अंश को ग्रहण किया, जिससे मेरे समस्त पाप नष्ट हो गए। इस प्रकार प्रवृत्त होकर, हृदय के विशुद्ध होने पर, मुझमें उन्हीं के धर्म के प्रति स्वाभाविक रुचि उत्पन्न हो गई।

श्लोक 26 (bhagavata.1.5.26)

तत्रान्वहं कृष्णकथाः प्रगायता- मनुग्रहेणाशृणवं मनोहराः । ताः श्रद्धया मेऽनुपदं विशृण्वतः प्रियश्रवस्यङ्ग ममाभवद्रुचिः ॥ २६ ॥

tatrānvahaṁ kṛṣṇa-kathāḥ pragāyatām anugraheṇāśṛṇavaṁ manoharāḥ tāḥ śraddhayā me ’nupadaṁ viśṛṇvataḥ priyaśravasy aṅga mamābhavad ruciḥ

वहाँ प्रतिदिन उनकी कृपा से मैं कृष्ण की मनोहर कथाएँ गाई जाती सुनता रहा; और हे अङ्ग! श्रद्धापूर्वक पद-पद पर उन्हें सुनते हुए मुझमें उस प्रियश्रवा भगवान के प्रति रुचि उत्पन्न हो गई।

श्लोक 27 (bhagavata.1.5.27)

तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामते प्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम । ययाहमेतत्सदसत्स्वमायया पश्ये मयि ब्रह्मणि कल्पितं परे ॥ २७ ॥

tasmiṁs tadā labdha-rucer mahā-mate priyaśravasy askhalitā matir mama yayāham etat sad-asat sva-māyayā paśye mayi brahmaṇi kalpitaṁ pare

हे महामते! उस समय वह रुचि प्राप्त हो जाने पर उस प्रियश्रवा भगवान में मेरी बुद्धि अस्खलित हो गई, जिसके द्वारा मैं इस स्थूल-सूक्ष्म जगत को अपनी ही माया से कल्पित और परब्रह्म रूप मुझमें ही आश्रित देखने लगा।

श्लोक 28 (bhagavata.1.5.28)

इत्थं शरत्प्रावृषिकावृतू हरे- र्विशृण्वतो मेऽनुसवं यशोऽमलम् । सङ्कीर्त्यमानं मुनिभिर्महात्मभि- र्भक्तिः प्रवृत्तात्मरजस्तमोपहा ॥ २८ ॥

itthaṁ śarat-prāvṛṣikāv ṛtū harer viśṛṇvato me ’nusavaṁ yaśo ’malam saṅkīrtyamānaṁ munibhir mahātmabhir bhaktiḥ pravṛttātma-rajas-tamopahā

इस प्रकार शरद और वर्षा — इन दो ऋतुओं में उन महात्मा मुनियों द्वारा सतत संकीर्तित हरि के निर्मल यश को सुनते हुए मुझमें भक्ति का उदय हुआ, जिसने जीव के रज और तम को दूर कर दिया।

श्लोक 29 (bhagavata.1.5.29)

तस्यैवं मेऽनुरक्तस्य प्रश्रितस्य हतैनसः । श्रद्दधानस्य बालस्य दान्तस्यानुचरस्य च ॥ २९ ॥

tasyaivaṁ me ’nuraktasya praśritasya hatainasaḥ śraddadhānasya bālasya dāntasyānucarasya ca

इस प्रकार उनसे अनुरक्त, विनम्र, पापरहित, श्रद्धावान, यद्यपि बालक तथापि जितेन्द्रिय और उनका अनुगामी शिष्य होने के कारण —

श्लोक 30 (bhagavata.1.5.30)

ज्ञानं गुह्यतमं यत्तत्साक्षाद्भगवतोदितम् । अन्ववोचन् गमिष्यन्तः कृपया दीनवत्सलाः ॥ ३० ॥

jñānaṁ guhyatamaṁ yat tat sākṣād bhagavatoditam anvavocan gamiṣyantaḥ kṛpayā dīna-vatsalāḥ

— मुझे प्रस्थान के समय उन दीनवत्सल मुनियों ने कृपापूर्वक वह परम गुह्य ज्ञान बता दिया, जो स्वयं भगवान द्वारा साक्षात् कहा गया था।

श्लोक 31 (bhagavata.1.5.31)

येनैवाहं भगवतो वासुदेवस्य वेधसः । मायानुभावमविदं येन गच्छन्ति तत्पदम् ॥ ३१ ॥

yenaivāhaṁ bhagavato vāsudevasya vedhasaḥ māyānubhāvam avidaṁ yena gacchanti tat-padam

उसी ज्ञान के द्वारा मैंने सृष्टिकर्ता भगवान वासुदेव की माया-शक्ति के प्रभाव को जान लिया, जिससे मनुष्य उनके परमपद को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.1.5.32)

एतत्संसूचितं ब्रह्मंस्तापत्रयचिकित्सितम् । यदीश्वरे भगवति कर्म ब्रह्मणि भावितम् ॥ ३२ ॥

etat saṁsūcitaṁ brahmaṁs tāpa-traya-cikitsitam yad īśvare bhagavati karma brahmaṇi bhāvitam

हे ब्रह्मन्! यही त्रिविध तापों की चिकित्सा बताई गई है कि मनुष्य के समस्त कर्म परब्रह्मस्वरूप ईश्वर भगवान को समर्पित हों।

श्लोक 33 (bhagavata.1.5.33)

आमयो यश्च भूतानां जायते येन सुव्रत । तदेव ह्यामयं द्रव्यं न पुनाति चिकित्सितम् ॥ ३३ ॥

āmayo yaś ca bhūtānāṁ jāyate yena suvrata tad eva hy āmayaṁ dravyaṁ na punāti cikitsitam

हे सुव्रत! जिस वस्तु से प्राणियों में रोग उत्पन्न होता है, क्या वही वस्तु चिकित्सा के रूप में प्रयुक्त होने पर उसी रोग को शान्त नहीं करती?

श्लोक 34 (bhagavata.1.5.34)

एवं नृणां क्रियायोगाः सर्वे संसृतिहेतवः । त एवात्मविनाशाय कल्पन्ते कल्पिताः परे ॥ ३४ ॥

evaṁ nṛṇāṁ kriyā-yogāḥ sarve saṁsṛti-hetavaḥ ta evātma-vināśāya kalpante kalpitāḥ pare

उसी प्रकार मनुष्यों के समस्त क्रियाकलाप, जो संसार-बन्धन के कारण होते हैं, परब्रह्म को अर्पित हो जाने पर उसी बन्धन के मूल-नाश में समर्थ हो जाते हैं।

श्लोक 35 (bhagavata.1.5.35)

यदत्र क्रियते कर्म भगवत्परितोषणम् । ज्ञानं यत्तदधीनं हि भक्तियोगसमन्वितम् ॥ ३५ ॥

yad atra kriyate karma bhagavat-paritoṣaṇam jñānaṁ yat tad adhīnaṁ hi bhakti-yoga-samanvitam

इस लोक में जो भी कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए किया जाता है, वही भक्तियोग से युक्त होकर सच्चे ज्ञान का आधार बनता है।

श्लोक 36 (bhagavata.1.5.36)

कुर्वाणा यत्र कर्माणि भगवच्छिक्षयासकृत् । गृणन्ति गुणनामानि कृष्णस्यानुस्मरन्ति च ॥ ३६ ॥

kurvāṇā yatra karmāṇi bhagavac-chikṣayāsakṛt gṛṇanti guṇa-nāmāni kṛṣṇasyānusmaranti ca

भगवान की शिक्षा के अनुसार निरन्तर कर्म करते हुए वे उनके गुणों और नामों का उच्चारण करते हैं और कृष्ण का सतत स्मरण करते हैं।

श्लोक 37 (bhagavata.1.5.37)

ॐ नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च ॥ ३७ ॥

oṁ namo bhagavate tubhyaṁ vāsudevāya dhīmahi pradyumnāyāniruddhāya namaḥ saṅkarṣaṇāya ca

ॐ, हे भगवन् वासुदेव! आपको नमस्कार है, हम आपका ध्यान करते हैं; तथा प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षण को भी नमस्कार है।

श्लोक 38 (bhagavata.1.5.38)

इति मूर्त्यभिधानेन मन्त्रमूर्तिममूर्तिकम् । यजते यज्ञपुरुषं स सम्यग्दर्शनः पुमान् ॥ ३८ ॥

iti mūrty-abhidhānena mantra-mūrtim amūrtikam yajate yajña-puruṣaṁ sa samyag-darśanaḥ pumān

इस प्रकार नामरूप के माध्यम से उस निराकार यज्ञपुरुष की मन्त्ररूप में उपासना करने वाला ही सम्यक् दर्शन-सम्पन्न पुरुष कहलाता है।

श्लोक 39 (bhagavata.1.5.39)

इमं स्वनिगमं ब्रह्मन्नवेत्य मदनुष्ठितम् । अदान्मे ज्ञानमैश्वर्यं स्वस्मिन् भावं च केशवः ॥ ३९ ॥

imaṁ sva-nigamaṁ brahmann avetya mad-anuṣṭhitam adān me jñānam aiśvaryaṁ svasmin bhāvaṁ ca keśavaḥ

हे ब्रह्मन्! अपने ही वेद-वचन से प्राप्त इस उपदेश का मेरे द्वारा पालन देखकर केशव ने मुझे ज्ञान, ऐश्वर्य और अपने प्रति भावयुक्त प्रेम प्रदान किया।

श्लोक 40 (bhagavata.1.5.40)

त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोः समाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् । प्राख्याहि दुःखैर्मुहुरर्दितात्मनां सङ्क्लेशनिर्वाणमुशन्ति नान्यथा ॥ ४० ॥

tvam apy adabhra-śruta viśrutaṁ vibhoḥ samāpyate yena vidāṁ bubhutsitam prākhyāhi duḥkhair muhur arditātmanāṁ saṅkleśa-nirvāṇam uśanti nānyathā

हे विशाल श्रुत-ज्ञानी! आप भी उस विभु की सुविख्यात महिमा का वर्णन कीजिए, जिससे ज्ञानीजनों की जिज्ञासा पूर्ण होती है; क्योंकि विद्वान मानते हैं कि दुःखों से बारम्बार पीड़ित प्राणियों के क्लेश की निवृत्ति अन्य किसी उपाय से सम्भव नहीं है।

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6