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एकादश स्कन्ध · अध्याय 12

सत्संग की महिमा

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (bhagavata.11.12.1)

श्रीभगवानुवाच न रोधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म एव च । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥ 12.1 ॥

śrī-bhagavān uvāca na rodhayati māṁ yogo na sāṅkhyaṁ dharma eva ca na svādhyāyas tapas tyāgo neṣṭā-pūrtaṁ na dakṣiṇā

भगवान ने कहा — न योग मुझे वश में करता है, न सांख्य, न स्वयं धर्म ही; न स्वाध्याय, न तप, न त्याग, न इष्ट-पूर्त कर्म और न ही दक्षिणा।

श्लोक 2 (bhagavata.11.12.2)

व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः । यथावरुन्धे सत्सङ्गः सर्वसङ्गापहो हि माम् ॥ 12.2 ॥

vratāni yajñaś chandāṁsi tīrthāni niyamā yamāḥ yathāvarundhe sat-saṅgaḥ sarva-saṅgāpaho hi mām

न व्रत, न यज्ञ, न वेदमंत्र, न तीर्थ, न नियम और न यम — मुझे उस प्रकार वश में नहीं करते जिस प्रकार सत्संग करता है, जो समस्त अन्य आसक्तियों का नाश करने वाला है।

श्लोक 3 (bhagavata.11.12.3)

सत्सङ्गेन हि दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः । गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चारणगुह्यकाः ॥ 12.3 ॥

sat-saṅgena hi daiteyā yātudhānā mṛgāḥ khagāḥ gandharvāpsaraso nāgāḥ siddhāś cāraṇa-guhyakāḥ

सत्संग के द्वारा ही दैत्य, यातुधान (राक्षस), पशु, पक्षी, गंधर्व, अप्सराएँ, नाग, सिद्ध, चारण और गुह्यक —

श्लोक 4 (bhagavata.11.12.4)

विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः । रजस्तमःप्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन् युगे युगे ॥ 12.4 ॥

vidyādharā manuṣyeṣu vaiśyāḥ śūdrāḥ striyo ’ntya-jāḥ rajas-tamaḥ-prakṛtayas tasmiṁs tasmin yuge yuge

— विद्याधर, तथा मनुष्यों में वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ और अंत्यज, जो प्रत्येक युग में रज और तम प्रधान स्वभाव वाले होते हैं —

श्लोक 5 (bhagavata.11.12.5)

बहवो मत्पदं प्राप्तास्त्वाष्ट्रकायाधवादयः । वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्चाथ विभीषणः ॥ 12.5 ॥

bahavo mat-padaṁ prāptās tvāṣṭra-kāyādhavādayaḥ vṛṣaparvā balir bāṇo mayaś cātha vibhīṣaṇaḥ

— त्वष्टा-पुत्र वृत्रासुर और कयाधु-पुत्र प्रह्लाद आदि अनेक, तथा वृषपर्वा, बलि, बाण, मय और विभीषण जैसे अनेक जन मेरे परम पद को प्राप्त हुए।

श्लोक 6 (bhagavata.11.12.6)

सुग्रीवो हनुमानृक्षो गजो गृध्रो वणिक्पथः । व्याधः कुब्जा व्रजे गोप्यो यज्ञपत्न्यस्तथापरे ॥ 12.6 ॥

sugrīvo hanumān ṛkṣo gajo gṛdhro vaṇikpathaḥ vyādhaḥ kubjā vraje gopyo yajña-patnyas tathāpare

— सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवान, गजेन्द्र, गिद्ध जटायु, वणिक तुलाधार, व्याध धर्मव्याध, कुब्जा, व्रज की गोपियाँ, तथा यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों की पत्नियाँ, और भी अनेक जन।

श्लोक 7 (bhagavata.11.12.7)

ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः । अव्रतातप्ततपसः मत्सङ्गान्मामुपागताः ॥ 12.7 ॥

te nādhīta-śruti-gaṇā nopāsita-mahattamāḥ avratātapta-tapasaḥ mat-saṅgān mām upāgatāḥ

उन्होंने न तो वेदों का समूह पढ़ा, न ही महापुरुषों की उपासना की, न व्रत लिया और न तप किया — वे केवल मेरे संग से ही मुझे प्राप्त हुए।

श्लोक 8 (bhagavata.11.12.8)

केवलेन हि भावेन गोप्यो गावो नगा मृगाः । येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्जसा ॥ 12.8 ॥

kevalena hi bhāvena gopyo gāvo nagā mṛgāḥ ye ’nye mūḍha-dhiyo nāgāḥ siddhā mām īyur añjasā

केवल शुद्ध भाव के बल पर ही गोपियाँ, गौएँ, वृक्ष, मृग, तथा अन्य मंदबुद्धि प्राणी और नाग भी सहज रूप से सिद्धि प्राप्त कर मुझे प्राप्त हुए।

श्लोक 9 (bhagavata.11.12.9)

यं न योगेन साङ्ख्येन दानव्रततपोऽध्वरैः । व्याख्यास्वाध्यायसन्न्यासैः प्राप्नुयाद् यत्नवानपि ॥ 12.9 ॥

yaṁ na yogena sāṅkhyena dāna-vrata-tapo-’dhvaraiḥ vyākhyā-svādhyāya-sannyāsaiḥ prāpnuyād yatnavān api

जिन्हें कोई मनुष्य योग, सांख्य, दान, व्रत, तप, यज्ञ, शास्त्र-प्रवचन, स्वाध्याय अथवा संन्यास द्वारा अत्यंत प्रयत्न करने पर भी प्राप्त नहीं कर पाता —

श्लोक 10 (bhagavata.11.12.10)

रामेण सार्धं मथुरां प्रणीते श्वाफल्किना मय्यनुरक्तचित्ताः । विगाढभावेन न मे वियोग- तीव्राधयोऽन्यं ददृशुः सुखाय ॥ 12.10 ॥

rāmeṇa sārdhaṁ mathurāṁ praṇīte śvāphalkinā mayy anurakta-cittāḥ vigāḍha-bhāvena na me viyoga- tīvrādhayo ’nyaṁ dadṛśuḥ sukhāya

— जब अक्रूर, जो श्वफल्क के पुत्र थे, मुझे बलराम सहित मथुरा ले गए, तब वे गोपियाँ, जिनका चित्त मुझमें गहराई से अनुरक्त था, मेरे वियोग की तीव्र पीड़ा से व्याकुल होकर किसी अन्य वस्तु में सुख न पा सकीं।

श्लोक 11 (bhagavata.11.12.11)

तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण । क्षणार्धवत्ताः पुनरङ्ग तासां हीना मया कल्पसमा बभूवुः ॥ 12.11 ॥

tās tāḥ kṣapāḥ preṣṭhatamena nītā mayaiva vṛndāvana-gocareṇa kṣaṇārdha-vat tāḥ punar aṅga tāsāṁ hīnā mayā kalpa-samā babhūvuḥ

हे उद्धव! वे ही रातें, जो उन्होंने वृन्दावन-भूमि में विचरण करते हुए अपने अत्यंत प्रिय मेरे साथ बिताईं, उनके लिए आधे क्षण के समान बीत गईं; परंतु मेरे बिना वे ही रातें उन्हें एक कल्प के समान प्रतीत हुईं।

श्लोक 12 (bhagavata.11.12.12)

ता नाविदन् मय्यनुषङ्गबद्ध- धियः स्वमात्मानमदस्तथेदम् । यथा समाधौ मुनयोऽब्धितोये नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे ॥ 12.12 ॥

tā nāvidan mayy anuṣaṅga-baddha- dhiyaḥ svam ātmānam adas tathedam yathā samādhau munayo ’bdhi-toye nadyaḥ praviṣṭā iva nāma-rūpe

मुझमें आसक्ति से बंधे हुए मन वाली उन गोपियों को न अपने शरीर का, न उस लोक का और न ही इस लोक का बोध रहा — जैसे समाधि में लीन मुनि, अथवा समुद्र के जल में प्रवेश करती नदियाँ, अपने नाम और रूप को भूल जाती हैं।

श्लोक 13 (bhagavata.11.12.13)

मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोऽबलाः । ब्रह्म मां परमं प्रापुः सङ्गाच्छतसहस्रशः ॥ 12.13 ॥

mat-kāmā ramaṇaṁ jāram asvarūpa-vido ’balāḥ brahma māṁ paramaṁ prāpuḥ saṅgāc chata-sahasraśaḥ

वे सैकड़ों-हजारों स्त्रियाँ, मुझे केवल प्रियतम रमण-रूप में चाहती हुईं, मेरे वास्तविक स्वरूप को न जानते हुए भी, केवल उस संग के द्वारा ही मुझ परब्रह्म को प्राप्त हुईं।

श्लोक 14 (bhagavata.11.12.14)

तस्मात्त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम् । प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च ॥ 12.14 ॥

tasmāt tvam uddhavotsṛjya codanāṁ praticodanām pravṛttiṁ ca nivṛttiṁ ca śrotavyaṁ śrutam eva ca

अतः हे उद्धव! तुम विधि-निषेध, प्रवृत्ति और निवृत्ति, तथा जो सुना जा चुका है और जो सुनना शेष है — इन सबको त्याग दो।

श्लोक 15 (bhagavata.11.12.15)

मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् । याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभयः ॥ 12.15 ॥

mām ekam eva śaraṇam ātmānaṁ sarva-dehinām yāhi sarvātma-bhāvena mayā syā hy akuto-bhayaḥ

केवल मेरी ही शरण में जाओ, जो समस्त देहधारियों की आत्मा हूँ — पूर्ण आत्म-भाव से मेरे पास आओ, और मेरे द्वारा तुम सर्वथा निर्भय हो जाओगे।

श्लोक 16 (bhagavata.11.12.16)

श्रीउद्धव उवाच संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर । न निवर्तत आत्मस्थो येन भ्राम्यति मे मनः ॥ 12.16 ॥

śrī-uddhava uvāca saṁśayaḥ śṛṇvato vācaṁ tava yogeśvareśvara na nivartata ātma-stho yena bhrāmyati me manaḥ

श्री उद्धव ने कहा — हे योगेश्वरेश्वर! आपकी वाणी सुनते हुए भी मेरे भीतर स्थित संशय दूर नहीं होता, जिसके कारण मेरा मन भ्रमित रहता है।

श्लोक 17 (bhagavata.11.12.17)

श्रीभगवानुवाच स एष जीवो विवरप्रसूतिः प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः । मनोमयं सूक्ष्ममुपेत्य रूपं मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठः ॥ 12.17 ॥

śrī-bhagavān uvāca sa eṣa jīvo vivara-prasūtiḥ prāṇena ghoṣeṇa guhāṁ praviṣṭaḥ mano-mayaṁ sūkṣmam upetya rūpaṁ mātrā svaro varṇa iti sthaviṣṭhaḥ

भगवान ने कहा — यह जीव, [सृष्टि की] गुहा से उत्पन्न होकर, प्राण और नाद (ध्वनि) के साथ हृदय-गुहा में प्रवेश करता है; मनोमय सूक्ष्म रूप को प्राप्त कर, वह मात्रा, स्वर और वर्ण के रूप में स्थूल हो जाता है।

श्लोक 18 (bhagavata.11.12.18)

यथानलः खेऽनिलबन्धुरुष्मा बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः । अणुः प्रजातो हविषा समेधते तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी ॥ 12.18 ॥

yathānalaḥ khe ’nila-bandhur uṣmā balena dāruṇy adhimathyamānaḥ aṇuḥ prajāto haviṣā samedhate tathaiva me vyaktir iyaṁ hi vāṇī

जिस प्रकार आकाश में वायु की सहचरी उष्णता (अग्नि) लकड़ी को बलपूर्वक मथने से एक सूक्ष्म चिनगारी के रूप में प्रकट होकर घृत डालने से प्रबल हो जाती है, उसी प्रकार यह वाणी मेरी ही अभिव्यक्ति है।

श्लोक 19 (bhagavata.11.12.19)

एवं गदिः कर्म गतिर्विसर्गो घ्राणो रसो दृक् स्पर्शः श्रुतिश्च । सङ्कल्पविज्ञानमथाभिमानः सूत्रं रजःसत्त्वतमोविकारः ॥ 12.19 ॥

evaṁ gadiḥ karma gatir visargo ghrāṇo raso dṛk sparśaḥ śrutiś ca saṅkalpa-vijñānam athābhimānaḥ sūtraṁ rajaḥ-sattva-tamo-vikāraḥ

इसी प्रकार वाणी, कर्म-इन्द्रियाँ, गति, विसर्ग, घ्राण, रस, दृक्, स्पर्श और श्रवण; संकल्प, विज्ञान और अभिमान; सूत्र (सूक्ष्म तत्व), तथा रज-सत्व-तम के विकार — इन सबको मेरे ही प्रकट स्वरूप के रूप में जानना चाहिए।

श्लोक 20 (bhagavata.11.12.20)

अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि- रव्यक्त एको वयसा स आद्यः । विश्लिष्टशक्तिर्बहुधेव भाति बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् ॥ 12.20 ॥

ayaṁ hi jīvas tri-vṛd abja-yonir avyakta eko vayasā sa ādyaḥ viśliṣṭa-śaktir bahudheva bhāti bījāni yoniṁ pratipadya yadvat

यह वही आद्य जीव है, त्रिविध (त्रिगुणात्मक) और ब्रह्मांडीय कमल का उद्गम, जो एक, अव्यक्त और अनादि है; तथापि अपनी शक्ति के विभाजन से वह अनेक रूपों में प्रकट होता प्रतीत होता है, जैसे अनेक बीज एक ही भूमि में पड़कर नाना रूपों में उगते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.11.12.21)

यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं पटो यथा तन्तुवितानसंस्थः । य एष संसारतरुः पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ॥ 12.21 ॥

yasminn idaṁ protam aśeṣam otaṁ paṭo yathā tantu-vitāna-saṁsthaḥ ya eṣa saṁsāra-taruḥ purāṇaḥ karmātmakaḥ puṣpa-phale prasūte

जिनमें यह सम्पूर्ण विश्व ताने-बाने के समान बुना हुआ है, जैसे वस्त्र सूत के विस्तार पर टिका होता है — यही वह प्राचीन संसार-वृक्ष है, जो कर्ममय होकर पुष्प और फल उत्पन्न करता है।

श्लोक 22 (bhagavata.11.12.22)

द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः पञ्चस्कन्धः पञ्चरसप्रसूतिः । दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड- स्त्रिवल्कलो द्विफलोऽर्कं प्रविष्टः ॥ 12.22 ॥

dve asya bīje śata-mūlas tri-nālaḥ pañca-skandhaḥ pañca-rasa-prasūtiḥ daśaika-śākho dvi-suparṇa-nīḍas tri-valkalo dvi-phalo ’rkaṁ praviṣṭaḥ

इस वृक्ष के दो बीज हैं, सौ जड़ें, तीन तने, पाँच शाखाएँ जिनसे पाँच रस उत्पन्न होते हैं, ग्यारह उपशाखाएँ, दो पक्षियों का घोंसला, तीन परतों की छाल, दो फल, और यह सूर्य तक फैला हुआ है।

श्लोक 23 (bhagavata.11.12.23)

अदन्ति चैकं फलमस्य गृध्रा ग्रामेचरा एकमरण्यवासाः । हंसा य एकं बहुरूपमिज्यै- र्मायामयं वेद स वेद वेदम् ॥ 12.23 ॥

adanti caikaṁ phalam asya gṛdhrā grāme-carā ekam araṇya-vāsāḥ haṁsā ya ekaṁ bahu-rūpam ijyair māyā-mayaṁ veda sa veda vedam

इसके एक फल को ग्राम में रहने वाले गिद्ध-तुल्य (विषयासक्त) लोग खाते हैं, और दूसरे फल को वन में रहने वाले हंस-तुल्य संन्यासी खाते हैं। जो सद्गुरुओं की उपासना द्वारा इस एक ही वृक्ष को, जो अनेक रूपों में माया-रचित होकर प्रकट होता है, जान लेता है, वही वास्तव में वेद के अर्थ को जानता है।

श्लोक 24 (bhagavata.11.12.24)

एवं गुरूपासनयैकभक्त्या विद्याकुठारेण शितेन धीरः । विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्तः सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् ॥ 12.24 ॥

evaṁ gurūpāsanayaika-bhaktyā vidyā-kuṭhāreṇa śitena dhīraḥ vivṛścya jīvāśayam apramattaḥ sampadya cātmānam atha tyajāstram

इस प्रकार गुरु की सेवा में अनन्य भक्ति रखते हुए, ज्ञानरूपी तीक्ष्ण कुल्हाड़ी से, धीर और सावधान पुरुष जीव के सूक्ष्म आवरण को काट डाले; और अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर, फिर उस कुल्हाड़ी को भी त्याग दे।

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