एकादश स्कन्ध · अध्याय 13
हंस अवतार का ब्रह्मा-पुत्रों को उपदेश
श्लोक 1 (bhagavata.11.13.1)
श्रीभगवानुवाच सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मनः । सत्त्वेनान्यतमौ हन्यात् सत्त्वं सत्त्वेन चैव हि ॥ 13.1 ॥
śrī-bhagavān uvāca sattvaṁ rajas tama iti guṇā buddher na cātmanaḥ sattvenānyatamau hanyāt sattvaṁ sattvena caiva hi
भगवान ने कहा — सत्व, रज और तम — ये बुद्धि के गुण हैं, आत्मा के नहीं। सत्व गुण के द्वारा शेष दोनों गुणों का नाश करना चाहिए, और फिर सत्व गुण को भी दिव्य सत्व के द्वारा ही पार करना चाहिए।
श्लोक 2 (bhagavata.11.13.2)
सत्त्वाद् धर्मो भवेद् वृद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः । सात्त्विकोपासया सत्त्वं ततो धर्मः प्रवर्तते ॥ 13.2 ॥
sattvād dharmo bhaved vṛddhāt puṁso mad-bhakti-lakṣaṇaḥ sāttvikopāsayā sattvaṁ tato dharmaḥ pravartate
जब मनुष्य में सत्व गुण की वृद्धि होती है, तब मेरी भक्ति से युक्त धर्म प्रकट होता है। सात्विक वस्तुओं की उपासना से सत्व गुण बढ़ता है, और उससे धर्म की प्रवृत्ति होती है।
श्लोक 3 (bhagavata.11.13.3)
धर्मो रजस्तमो हन्यात् सत्त्ववृद्धिरनुत्तमः । आशु नश्यति तन्मूलो ह्यधर्म उभये हते ॥ 13.3 ॥
dharmo rajas tamo hanyāt sattva-vṛddhir anuttamaḥ āśu naśyati tan-mūlo hy adharma ubhaye hate
उत्तम सत्व-वृद्धि से उत्पन्न धर्म रज और तम को नष्ट कर देता है; और जब ये दोनों नष्ट हो जाते हैं, तब उनकी जड़ अधर्म भी शीघ्र ही समाप्त हो जाता है।
श्लोक 4 (bhagavata.11.13.4)
आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च । ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः ॥ 13.4 ॥
āgamo ’paḥ prajā deśaḥ kālaḥ karma ca janma ca dhyānaṁ mantro ’tha saṁskāro daśaite guṇa-hetavaḥ
शास्त्र, जल, संतान, देश, काल, कर्म, जन्म, ध्यान, मंत्र और संस्कार — ये दस ही गुणों की प्रधानता के हेतु हैं।
श्लोक 5 (bhagavata.11.13.5)
तत्तत् सात्त्विकमेवैषां यद् यद् वृद्धाः प्रचक्षते । निन्दन्ति तामसं तत्तद् राजसं तदुपेक्षितम् ॥ 13.5 ॥
tat tat sāttvikam evaiṣāṁ yad yad vṛddhāḥ pracakṣate nindanti tāmasaṁ tat tad rājasaṁ tad-upekṣitam
इन दसों में से जिस-जिस को वृद्धजन सराहते हैं, वह सात्विक है; जिस-जिस की वे निंदा करते हैं, वह तामसिक है; और जिस-जिस के प्रति वे उपेक्षा भाव रखते हैं, वह राजसिक है।
श्लोक 6 (bhagavata.11.13.6)
सात्त्विकान्येव सेवेत पुमान् सत्त्वविवृद्धये । ततो धर्मस्ततो ज्ञानं यावत् स्मृतिरपोहनम् ॥ 13.6 ॥
sāttvikāny eva seveta pumān sattva-vivṛddhaye tato dharmas tato jñānaṁ yāvat smṛtir apohanam
मनुष्य को सत्व-वृद्धि के लिए केवल सात्विक वस्तुओं का ही सेवन करना चाहिए। उससे धर्म उत्पन्न होता है, धर्म से ज्ञान — यहाँ तक कि आत्म-स्मृति को ढकने वाला भ्रम दूर हो जाए।
श्लोक 7 (bhagavata.11.13.7)
वेणुसङ्घर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम् । एवं गुणव्यत्ययजो देहः शाम्यति तत्क्रियः ॥ 13.7 ॥
veṇu-saṅgharṣa-jo vahnir dagdhvā śāmyati tad-vanam evaṁ guṇa-vyatyaya-jo dehaḥ śāmyati tat-kriyaḥ
बाँसों के परस्पर घर्षण से उत्पन्न अग्नि उस वन को जलाकर स्वयं भी शांत हो जाती है। इसी प्रकार गुणों के परस्पर व्यतिकरण से उत्पन्न यह शरीर भी अपनी ही क्रिया (ज्ञान) द्वारा शांत हो जाता है।
श्लोक 8 (bhagavata.11.13.8)
श्रीउद्धव उवाच विदन्ति मर्त्याः प्रायेण विषयान् पदमापदाम् । तथापि भुञ्जते कृष्ण तत्कथं श्वखराजवत् ॥ 13.8 ॥
śrī-uddhava uvāca vidanti martyāḥ prāyeṇa viṣayān padam āpadām tathāpi bhuñjate kṛṣṇa tat kathaṁ śva-kharāja-vat
श्री उद्धव ने कहा — हे कृष्ण! मनुष्य प्रायः यह जानते हैं कि विषय ही विपत्तियों के आश्रय हैं, फिर भी वे उनका भोग करते रहते हैं। यह श्वान, गर्दभ और बकरी के समान आचरण कैसे होता है?
श्लोक 9 (bhagavata.11.13.9)
श्रीभगवानुवाच अहमित्यन्यथाबुद्धिः प्रमत्तस्य यथा हृदि । उत्सर्पति रजो घोरं ततो वैकारिकं मनः ॥ 13.9 ॥
śrī-bhagavān uvāca aham ity anyathā-buddhiḥ pramattasya yathā hṛdi utsarpati rajo ghoraṁ tato vaikārikaṁ manaḥ
भगवान ने कहा — असावधान व्यक्ति के हृदय में 'मैं यह देह हूँ' — ऐसी मिथ्या बुद्धि उत्पन्न होती है, और उसके साथ ही घोर रज उमड़ आता है, जो स्वभावतः सत्व से उत्पन्न मन को दूषित कर देता है।
श्लोक 10 (bhagavata.11.13.10)
रजोयुक्तस्य मनसः सङ्कल्पः सविकल्पकः । ततः कामो गुणध्यानाद् दुःसहः स्याद्धि दुर्मतेः ॥ 13.10 ॥
rajo-yuktasya manasaḥ saṅkalpaḥ sa-vikalpakaḥ tataḥ kāmo guṇa-dhyānād duḥsahaḥ syād dhi durmateḥ
रज से युक्त मन में नाना संकल्प-विकल्प उत्पन्न होते हैं; और गुणों के निरंतर चिंतन से दुर्बुद्धि मनुष्य में असहनीय कामना उत्पन्न हो जाती है।
श्लोक 11 (bhagavata.11.13.11)
करोति कामवशगः कर्माण्यविजितेन्द्रियः । दुःखोदर्काणि सम्पश्यन् रजोवेगविमोहितः ॥ 13.11 ॥
karoti kāma-vaśa-gaḥ karmāṇy avijitendriyaḥ duḥkhodarkāṇi sampaśyan rajo-vega-vimohitaḥ
जिसने अपनी इन्द्रियों को नहीं जीता, वह काम के वशीभूत होकर तथा रज के वेग से मोहित होकर, यह स्पष्ट देखते हुए भी कि इसका परिणाम भविष्य में दुःख ही होगा, वैसे ही कर्म करता रहता है।
श्लोक 12 (bhagavata.11.13.12)
रजस्तमोभ्यां यदपि विद्वान् विक्षिप्तधीः पुनः । अतन्द्रितो मनो युञ्जन् दोषदृष्टिर्न सज्जते ॥ 13.12 ॥
rajas-tamobhyāṁ yad api vidvān vikṣipta-dhīḥ punaḥ atandrito mano yuñjan doṣa-dṛṣṭir na sajjate
यद्यपि विद्वान पुरुष की बुद्धि भी कभी रज और तम से विक्षिप्त हो जाती है, तथापि सावधान रहकर वह पुनः मन को वश में कर लेता है; दोष को स्पष्ट देखते हुए वह उसमें आसक्त नहीं होता।
श्लोक 13 (bhagavata.11.13.13)
अप्रमत्तोऽनुयुञ्जीत मनो मय्यर्पयञ्छनैः । अनिर्विण्णो यथाकालं जितश्वासो जितासनः ॥ 13.13 ॥
apramatto ’nuyuñjīta mano mayy arpayañ chanaiḥ anirviṇṇo yathā-kālaṁ jita-śvāso jitāsanaḥ
सदा सावधान और अविषण्ण रहते हुए, श्वास और आसन पर विजय प्राप्त कर, मनुष्य को यथासमय धीरे-धीरे अपने मन को मुझमें अर्पित करते हुए स्थिर करना चाहिए।
श्लोक 14 (bhagavata.11.13.14)
एतावान् योग आदिष्टो मच्छिष्यैः सनकादिभिः । सर्वतो मन आकृष्य मय्यद्धावेश्यते यथा ॥ 13.14 ॥
etāvān yoga ādiṣṭo mac-chiṣyaiḥ sanakādibhiḥ sarvato mana ākṛṣya mayy addhāveśyate yathā
यही वह योग है जो सनक आदि मेरे शिष्यों द्वारा उपदिष्ट है — कि मन को समस्त अन्य विषयों से खींचकर उसे सीधे और पूर्णतः मुझमें ही लीन कर देना चाहिए।
श्लोक 15 (bhagavata.11.13.15)
श्रीउद्धव उवाच यदा त्वं सनकादिभ्यो येन रूपेण केशव । योगमादिष्टवानेतद् रूपमिच्छामि वेदितुम् ॥ 13.15 ॥
śrī-uddhava uvāca yadā tvaṁ sanakādibhyo yena rūpeṇa keśava yogam ādiṣṭavān etad rūpam icchāmi veditum
श्री उद्धव ने कहा — हे केशव! जिस रूप में और जिस समय आपने सनक आदि को यह योग सिखाया था, मैं उस रूप को जानना चाहता हूँ।
श्लोक 16 (bhagavata.11.13.16)
श्रीभगवानुवाच पुत्रा हिरण्यगर्भस्य मानसाः सनकादयः । पप्रच्छुः पितरं सूक्ष्मां योगस्यैकान्तिकीं गतिम् ॥ 13.16 ॥
śrī-bhagavān uvāca putrā hiraṇyagarbhasya mānasāḥ sanakādayaḥ papracchuḥ pitaraṁ sūkṣmāṁ yogasyaikāntikīṁ gatim
भगवान ने कहा — ब्रह्मा के मानस-पुत्र सनक आदि ऋषियों ने एक बार अपने पिता से योग की सूक्ष्म और परम गति के विषय में पूछा।
श्लोक 17 (bhagavata.11.13.17)
सनकादय ऊचुः गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रभो । कथमन्योन्यसन्त्यागो मुमुक्षोरतितितीर्षोः ॥ 13.17 ॥
sanakādaya ūcuḥ guṇeṣv āviśate ceto guṇāś cetasi ca prabho katham anyonya-santyāgo mumukṣor atititīrṣoḥ
सनक आदि ने कहा — हे प्रभो! मन गुणों में प्रवेश करता है और गुण मन में प्रवेश करते हैं — तो फिर मुमुक्षु, जो इस बंधन को पार करना चाहता है, इन दोनों के परस्पर संबंध को कैसे त्यागे?
श्लोक 18 (bhagavata.11.13.18)
श्रीभगवानुवाच एवं पृष्टो महादेवः स्वयम्भूर्भूतभावनः । ध्यायमानः प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधीः ॥ 13.18 ॥
śrī-bhagavān uvāca evaṁ pṛṣṭo mahā-devaḥ svayambhūr bhūta-bhāvanaḥ dhyāyamānaḥ praśna-bījaṁ nābhyapadyata karma-dhīḥ
भगवान ने कहा — इस प्रकार पूछे जाने पर, स्वयंभू महादेव, जो प्राणियों के उत्पत्तिकर्ता हैं, उस प्रश्न के मूल पर गहन विचार करने लगे, किंतु सृष्टि-कर्म में लगी हुई उनकी बुद्धि उसका समाधान न पा सकी।
श्लोक 19 (bhagavata.11.13.19)
स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारतितीर्षया । तस्याहं हंसरूपेण सकाशमगमं तदा ॥ 13.19 ॥
sa mām acintayad devaḥ praśna-pāra-titīrṣayā tasyāhaṁ haṁsa-rūpeṇa sakāśam agamaṁ tadā
उस प्रश्न के पार जाने की इच्छा से उन देव (ब्रह्मा) ने मेरा ध्यान किया। तब मैं हंस-रूप में उनके समक्ष प्रकट हुआ।
श्लोक 20 (bhagavata.11.13.20)
दृष्ट्वा मां त उपव्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम् । ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा पप्रच्छुः को भवानिति ॥ 13.20 ॥
dṛṣṭvā māṁ ta upavrajya kṛtvā pādābhivandanam brahmāṇam agrataḥ kṛtvā papracchuḥ ko bhavān iti
मुझे देखकर, वे सब आगे बढ़े और ब्रह्मा को अपने आगे रखकर मेरे चरणों में प्रणाम कर पूछने लगे — 'आप कौन हैं?'
श्लोक 21 (bhagavata.11.13.21)
इत्यहं मुनिभिः पृष्टस्तत्त्वजिज्ञासुभिस्तदा । यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे ॥ 13.21 ॥
ity ahaṁ munibhiḥ pṛṣṭas tattva-jijñāsubhis tadā yad avocam ahaṁ tebhyas tad uddhava nibodha me
तत्व की जिज्ञासा रखने वाले उन मुनियों द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर मैंने जो कुछ उनसे कहा था, हे उद्धव, वही अब मुझसे सुनो।
श्लोक 22 (bhagavata.11.13.22)
वस्तुनो यद्यनानात्व आत्मनः प्रश्न ईदृशः । कथं घटेत वो विप्रा वक्तुर्वा मे क आश्रयः ॥ 13.22 ॥
vastuno yady anānātva ātmanaḥ praśna īdṛśaḥ kathaṁ ghaṭeta vo viprā vaktur vā me ka āśrayaḥ
हे विप्रो! यदि तुम्हारी और मेरी आत्मा में वास्तव में कोई भेद नहीं है, तो फिर ऐसा प्रश्न कैसे संभव हो सकता है? और मुझ वक्ता का, तुमसे पृथक्, कौन-सा आधार रह जाता है?
श्लोक 23 (bhagavata.11.13.23)
पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः । को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो ह्यनर्थकः ॥ 13.23 ॥
pañcātmakeṣu bhūteṣu samāneṣu ca vastutaḥ ko bhavān iti vaḥ praśno vācārambho hy anarthakaḥ
पंचमहाभूतों से बने शरीर वास्तव में सभी एक समान हैं; अतः तुम्हारा यह प्रश्न 'आप कौन हैं?' केवल शब्दों का उच्चारण मात्र है, जिसका कोई सार्थक अर्थ नहीं।
श्लोक 24 (bhagavata.11.13.24)
मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः । अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा ॥ 13.24 ॥
manasā vacasā dṛṣṭyā gṛhyate ’nyair apīndriyaiḥ aham eva na matto ’nyad iti budhyadhvam añjasā
जो कुछ भी मन से, वाणी से, दृष्टि से अथवा अन्य इन्द्रियों से ग्रहण किया जाता है, वह मैं ही हूँ — मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है। इसे भलीभाँति और सीधे रूप में समझो।
श्लोक 25 (bhagavata.11.13.25)
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः । जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मनः ॥ 13.25 ॥
guṇeṣv āviśate ceto guṇāś cetasi ca prajāḥ jīvasya deha ubhayaṁ guṇāś ceto mad-ātmanaḥ
हे पुत्रो! मन गुणों में प्रवेश करता है और गुण मन में; परंतु उस जीव के लिए, जो मेरा ही अंश है, गुण और मन दोनों ही केवल शरीर मात्र हैं — उसे ढकने वाले आवरण मात्र।
श्लोक 26 (bhagavata.11.13.26)
गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया । गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥ 13.26 ॥
guṇeṣu cāviśac cittam abhīkṣṇaṁ guṇa-sevayā guṇāś ca citta-prabhavā mad-rūpa ubhayaṁ tyajet
निरंतर गुणों के सेवन से चित्त गुणों में प्रविष्ट होता है, और गुण भी चित्त से ही उत्पन्न होते हैं। मुझमें अपनी अभिन्नता को जानकर मनुष्य को इन दोनों का ही त्याग कर देना चाहिए।
श्लोक 27 (bhagavata.11.13.27)
जाग्रत् स्वप्नः सुषुप्तं च गुणतो बुद्धिवृत्तयः । तासां विलक्षणो जीवः साक्षित्वेन विनिश्चितः ॥ 13.27 ॥
jāgrat svapnaḥ suṣuptaṁ ca guṇato buddhi-vṛttayaḥ tāsāṁ vilakṣaṇo jīvaḥ sākṣitvena viniścitaḥ
जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति — ये गुणों से उत्पन्न बुद्धि की वृत्तियाँ हैं। जीव इन तीनों से भिन्न है, और साक्षी-रूप में सुनिश्चित है।
श्लोक 28 (bhagavata.11.13.28)
यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तिदः । मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तद् गुणचेतसाम् ॥ 13.28 ॥
yarhi saṁsṛti-bandho ’yam ātmano guṇa-vṛtti-daḥ mayi turye sthito jahyāt tyāgas tad guṇa-cetasām
चूँकि आत्मा को गुणों की वृत्ति में बाँधने वाला यह संसार-बंधन तभी तक रहता है जब तक वह मुझ तुरीय (चौथी अवस्था) में स्थित नहीं होता — मुझमें स्थित होकर वह इसे त्याग देता है; यही गुण और मन का वास्तविक त्याग है।
श्लोक 29 (bhagavata.11.13.29)
अहङ्कारकृतं बन्धमात्मनोऽर्थविपर्ययम् । विद्वान् निर्विद्य संसारचिन्तां तुर्ये स्थितस्त्यजेत् ॥ 13.29 ॥
ahaṅkāra-kṛtaṁ bandham ātmano ’rtha-viparyayam vidvān nirvidya saṁsāra- cintāṁ turye sthitas tyajet
यह जानकर कि अहंकार से उत्पन्न बंधन आत्मा के वास्तविक हित के सर्वथा विपरीत है, विद्वान पुरुष को संसार की चिंता से विरक्त होकर, तुरीय अवस्था में स्थित होकर, उसे पूर्णतः त्याग देना चाहिए।
श्लोक 30 (bhagavata.11.13.30)
यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः । जागर्त्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥ 13.30 ॥
yāvan nānārtha-dhīḥ puṁso na nivarteta yuktibhiḥ jāgarty api svapann ajñaḥ svapne jāgaraṇaṁ yathā
जब तक मनुष्य की नानात्व-बुद्धि उचित युक्ति द्वारा निवृत्त नहीं होती, तब तक वह जागते हुए भी अज्ञानवश सोया हुआ ही रहता है — जैसे स्वप्न में ही यह स्वप्न देखना कि मैं जाग गया हूँ।
श्लोक 31 (bhagavata.11.13.31)
असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां तत्कृता भिदा । गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा ॥ 13.31 ॥
asattvād ātmano ’nyeṣāṁ bhāvānāṁ tat-kṛtā bhidā gatayo hetavaś cāsya mṛṣā svapna-dṛśo yathā
आत्मा से भिन्न भावों का कोई वास्तविक अस्तित्व न होने के कारण, उनसे उत्पन्न भेद, तथा उससे जुड़ी गतियाँ और कारण — ये सब स्वप्नद्रष्टा के देखे हुए दृश्यों के समान मिथ्या हैं।
श्लोक 32 (bhagavata.11.13.32)
यो जागरे बहिरनुक्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणैर्हृदि तत्सदृक्षान् । स्वप्ने सुषुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात्त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः ॥ 13.32 ॥
yo jāgare bahir anukṣaṇa-dharmiṇo ’rthān bhuṅkte samasta-karaṇair hṛdi tat-sadṛkṣān svapne suṣupta upasaṁharate sa ekaḥ smṛty-anvayāt tri-guṇa-vṛtti-dṛg indriyeśaḥ
जो जाग्रत अवस्था में समस्त इन्द्रियों द्वारा प्रतिक्षण बदलते बाह्य विषयों का उपभोग करता है, स्वप्न में हृदय में उन्हीं के सदृश विषयों का, और सुषुप्ति में इन सबका संहरण कर लेता है — वही एक है, जो स्मृति के सातत्य से इन तीनों अवस्थाओं का साक्षी सिद्ध होता है, त्रिगुण की वृत्तियों का द्रष्टा और इन्द्रियों का वास्तविक स्वामी।
श्लोक 33 (bhagavata.11.13.33)
एवं विमृश्य गुणतो मनसस्त्र्यवस्था मन्मायया मयि कृता इति निश्चितार्थाः । सञ्छिद्य हार्दमनुमानसदुक्तितीक्ष्ण- ज्ञानासिना भजत माखिलसंशयाधिम् ॥ 13.33 ॥
evaṁ vimṛśya guṇato manasas try-avasthā man-māyayā mayi kṛtā iti niścitārthāḥ sañchidya hārdam anumāna-sad-ukti-tīkṣṇa- jñānāsinā bhajata mākhila-saṁśayādhim
इस प्रकार विचार कर यह निश्चित रूप से समझ लो कि गुणों से उत्पन्न मन की ये तीनों अवस्थाएँ मेरी ही माया द्वारा मुझ पर आरोपित की गई हैं; युक्ति और सत्पुरुषों के वचनों से तीक्ष्ण किए गए ज्ञान-खड्ग से समस्त संशयों की जड़ हृदयस्थ अहंकार को काट डालो, और मेरा भजन करो।
श्लोक 34 (bhagavata.11.13.34)
ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम् । विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया स्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्पः ॥ 13.34 ॥
īkṣeta vibhramam idaṁ manaso vilāsaṁ dṛṣṭaṁ vinaṣṭam ati-lolam alāta-cakram vijñānam ekam urudheva vibhāti māyā svapnas tridhā guṇa-visarga-kṛto vikalpaḥ
इस संसार को मन के भ्रमपूर्ण विलास के रूप में देखना चाहिए — दिखता है और तुरंत लुप्त हो जाता है, अत्यंत चंचल, जैसे जलती हुई लकड़ी को घुमाने से बना अलात-चक्र। विज्ञान (चेतना) एक ही है, किन्तु माया के प्रभाव से वह अनेक रूपों में प्रतीत होता है, और गुणों के विसर्ग से उत्पन्न त्रिविध स्वप्न केवल एक कल्पना मात्र है।
श्लोक 35 (bhagavata.11.13.35)
दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततृष्ण- स्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः सन्दृश्यते क्व च यदीदमवस्तुबुद्ध्या त्यक्तं भ्रमाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात् ॥ 13.35 ॥
dṛṣṭiṁ tataḥ pratinivartya nivṛtta-tṛṣṇas tūṣṇīṁ bhaven nija-sukhānubhavo nirīhaḥ sandṛśyate kva ca yadīdam avastu-buddhyā tyaktaṁ bhramāya na bhavet smṛtir ā-nipātāt
तब दृष्टि को लौटाकर, तृष्णा-रहित होकर, निष्क्रिय भाव से अपने ही सुख का अनुभव करते हुए मौन हो जाना चाहिए। यदि यह संसार कभी दिखाई भी दे, तो उसे अवस्तु समझकर त्यक्त ही मानना चाहिए — यह स्मृति मृत्युपर्यंत बनी रहने पर पुनः भ्रम उत्पन्न नहीं करती।
श्लोक 36 (bhagavata.11.13.36)
देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । दैवादपेतमथ दैववशादुपेतं वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥ 13.36 ॥
dehaṁ ca naśvaram avasthitam utthitaṁ vā siddho na paśyati yato ’dhyagamat svarūpam daivād apetam atha daiva-vaśād upetaṁ vāso yathā parikṛtaṁ madirā-madāndhaḥ
सिद्ध पुरुष, जिसने अपने वास्तविक स्वरूप को जान लिया है, यह नहीं देखता कि यह नश्वर शरीर बैठा है या खड़ा है, भाग्यवश छूट गया है या भाग्यवश नया प्राप्त हुआ है — जैसे मदिरा के नशे में अंधा हुआ व्यक्ति अपने पहने हुए वस्त्र की स्थिति पर ध्यान नहीं देता।
श्लोक 37 (bhagavata.11.13.37)
देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः । तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥ 13.37 ॥
deho ’pi daiva-vaśa-gaḥ khalu karma yāvat svārambhakaṁ pratisamīkṣata eva sāsuḥ taṁ sa-prapañcam adhirūḍha-samādhi-yogaḥ svāpnaṁ punar na bhajate pratibuddha-vastuḥ
यह शरीर भी भाग्य के अधीन तभी तक जीवित रहता है जब तक उसे उत्पन्न करने वाला कर्म शेष है। परंतु समाधि-योग में आरूढ़ और तत्व को जान चुका पुरुष इस शरीर और इसके समस्त प्रपंच को, स्वप्न में देखे गए शरीर के समान जानकर, पुनः कभी नहीं अपनाता।
श्लोक 38 (bhagavata.11.13.38)
मयैतदुक्तं वो विप्रा गुह्यं यत् साङ्ख्ययोगयोः । जानीत मागतं यज्ञं युष्मद्धर्मविवक्षया ॥ 13.38 ॥
mayaitad uktaṁ vo viprā guhyaṁ yat sāṅkhya-yogayoḥ jānīta māgataṁ yajñaṁ yuṣmad-dharma-vivakṣayā
हे विप्रो! मैंने तुम्हें सांख्य और योग दोनों का यह गोपनीय तत्व बता दिया है। जानो कि मैं यज्ञ-स्वरूप में यहाँ तुम्हारे वास्तविक धर्म को समझाने की इच्छा से आया हूँ।
श्लोक 39 (bhagavata.11.13.39)
अहं योगस्य सांख्यस्य सत्यस्यर्तस्य तेजसः । परायणं द्विजश्रेष्ठाः श्रियः कीर्तेर्दमस्य च ॥ 13.39 ॥
ahaṁ yogasya sāṅkhyasya satyasyartasya tejasaḥ parāyaṇaṁ dvija-śreṣṭhāḥ śriyaḥ kīrter damasya ca
हे द्विजश्रेष्ठो! जानो कि मैं ही योग का, सांख्य का, सत्य का, ऋत (नियम) का, तेज का, श्री का, कीर्ति का और दम का परम आश्रय हूँ।
श्लोक 40 (bhagavata.11.13.40)
मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् । सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासङ्गादयोऽगुणाः ॥ 13.40 ॥
māṁ bhajanti guṇāḥ sarve nirguṇaṁ nirapekṣakam suhṛdaṁ priyam ātmānaṁ sāmyāsaṅgādayo ’guṇāḥ
समता, असंगता आदि जैसे समस्त अगुण (दिव्य) गुण भी मुझ निर्गुण, निरपेक्ष, सबके हितैषी, प्रिय और आत्मस्वरूप का ही आश्रय लेते हैं।
श्लोक 41 (bhagavata.11.13.41)
इति मे छिन्नसन्देहा मुनयः सनकादयः । सभाजयित्वा परया भक्त्यागृणत संस्तवैः ॥ 13.41 ॥
iti me chinna-sandehā munayaḥ sanakādayaḥ sabhājayitvā parayā bhaktyāgṛṇata saṁstavaiḥ
[भगवान कृष्ण ने आगे कहा —] इस प्रकार, हे उद्धव, मेरे इन वचनों से सनक आदि मुनियों के सभी संशय दूर हो गए; परम भक्ति से मेरी पूजा कर उन्होंने उत्तम स्तुतियों द्वारा मेरा गुणगान किया।
श्लोक 42 (bhagavata.11.13.42)
तैरहं पूजितः सम्यक् संस्तुतः परमर्षिभिः । प्रत्येयाय स्वकं धाम पश्यतः परमेष्ठिनः ॥ 13.42 ॥
tair ahaṁ pūjitaḥ saṁyak saṁstutaḥ paramarṣibhiḥ pratyeyāya svakaṁ dhāma paśyataḥ parameṣṭhinaḥ
उन महर्षियों द्वारा इस प्रकार भलीभाँति पूजित और स्तुत होकर, परमेष्ठी ब्रह्मा के देखते हुए ही, मैं अपने धाम को लौट गया।