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एकादश स्कन्ध · अध्याय 15

योग की सिद्धियाँ

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16

श्लोक 1 (bhagavata.11.15.1)

श्रीभगवानुवाच जितेन्द्रियस्य युक्तस्य जितश्वासस्य योगिनः । मयि धारयतश्चेत उपतिष्ठन्ति सिद्धयः ॥ 15.1 ॥

śrī-bhagavān uvāca jitendriyasya yuktasya jita-śvāsasya yoginaḥ mayi dhārayataś ceta upatiṣṭhanti siddhayaḥ

भगवान ने कहा — जिस योगी ने इन्द्रियों को जीत लिया है, जो संयमी है, जिसने श्वास को वश में कर लिया है, और जो अपना मन मुझमें स्थिर रखता है — उसके समक्ष सिद्धियाँ स्वयं ही उपस्थित हो जाती हैं।

श्लोक 2 (bhagavata.11.15.2)

श्रीउद्धव उवाच कया धारणया कास्वित् कथं वा सिद्धिरच्युत । कति वा सिद्धयो ब्रूहि योगिनां सिद्धिदो भवान् ॥ 15.2 ॥

śrī-uddhava uvāca kayā dhāraṇayā kā svit kathaṁ vā siddhir acyuta kati vā siddhayo brūhi yogināṁ siddhi-do bhavān

श्री उद्धव ने कहा — हे अच्युत! किस धारणा से कौन-सी सिद्धि किस प्रकार प्राप्त होती है? सिद्धियाँ कितनी हैं? कृपया मुझे बताइए, क्योंकि आप ही योगियों को सिद्धि प्रदान करने वाले हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.11.15.3)

श्रीभगवानुवाच सिद्धयोऽष्टादश प्रोक्ता धारणा योगपारगैः । तासामष्टौ मत्प्रधाना दशैव गुणहेतवः ॥ 15.3 ॥

śrī-bhagavān uvāca siddhayo ’ṣṭādaśa proktā dhāraṇā yoga-pāra-gaiḥ tāsām aṣṭau mat-pradhānā daśaiva guṇa-hetavaḥ

भगवान ने कहा — योग के पारगामी विद्वानों ने अठारह प्रकार की धारणा-सिद्धियाँ बताई हैं; इनमें से आठ का मूल मैं ही हूँ, और शेष दस गुणों से उत्पन्न होती हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.11.15.4)

अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियैः । प्राकाम्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप्रेरणमीशिता ॥ 15.4 ॥

aṇimā mahimā mūrter laghimā prāptir indriyaiḥ prākāmyaṁ śruta-dṛṣṭeṣu śakti-preraṇam īśitā

शरीर की अणिमा, महिमा और लघिमा; इन्द्रियों द्वारा प्राप्ति; सुने और देखे हुए विषयों में प्राकाम्य; शक्तियों को प्रेरित करने की सामर्थ्य, तथा ईशिता (सर्वोपरि नियंत्रण की सामर्थ्य);

श्लोक 5 (bhagavata.11.15.5)

गुणेष्वसङ्गो वशिता यत्कामस्तदवस्यति । एता मे सिद्धयः सौम्य अष्टावौत्पत्तिका मताः ॥ 15.5 ॥

guṇeṣv asaṅgo vaśitā yat-kāmas tad avasyati etā me siddhayaḥ saumya aṣṭāv autpattikā matāḥ

— वशिता, गुणों के मध्य रहते हुए भी असंगता; तथा कामावसायिता, जिससे मनुष्य जो कुछ भी चाहे उसे प्राप्त कर लेता है — हे सौम्य उद्धव! ये आठ ही मेरी स्वाभाविक (औत्पत्तिक) सिद्धियाँ मानी जाती हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.11.15.6)

अनूर्मिमत्त्वं देहेऽस्मिन् दूरश्रवणदर्शनम् । मनोजवः कामरूपं परकायप्रवेशनम् ॥ 15.6 ॥

anūrmimattvaṁ dehe ’smin dūra-śravaṇa-darśanam mano-javaḥ kāma-rūpaṁ para-kāya-praveśanam

इस शरीर में क्षुधा-तृषा आदि की ऊर्मियों से मुक्ति; दूर की वस्तुओं का श्रवण और दर्शन; मन के समान वेग से गति; इच्छानुसार रूप धारण करना; दूसरे के शरीर में प्रवेश करना;

श्लोक 7 (bhagavata.11.15.7)

स्वच्छन्दमृत्युर्देवानां सहक्रीडानुदर्शनम् । यथासङ्कल्पसंसिद्धिराज्ञाप्रतिहता गतिः ॥ 15.7 ॥

svacchanda-mṛtyur devānāṁ saha-krīḍānudarśanam yathā-saṅkalpa-saṁsiddhir ājñāpratihatā gatiḥ

— इच्छानुसार मृत्यु; देवताओं की क्रीड़ाओं का साक्षात् दर्शन; जैसा संकल्प किया जाए वैसी ही पूर्ण सिद्धि; तथा अपनी आज्ञा का सर्वत्र अबाधित पालन होना।

श्लोक 8 (bhagavata.11.15.8)

त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता । अग्न्यर्काम्बुविषादीनां प्रतिष्टम्भोऽपराजयः ॥ 15.8 ॥

tri-kāla-jñatvam advandvaṁ para-cittādy-abhijñatā agny-arkāmbu-viṣādīnāṁ pratiṣṭambho ’parājayaḥ

त्रिकाल-ज्ञान; द्वन्द्वों (सर्दी-गर्मी आदि) से मुक्ति; दूसरों के चित्त आदि को जानने की सामर्थ्य; अग्नि, सूर्य, जल, विष आदि को रोक देने की शक्ति; तथा सदा अपराजित रहना —

श्लोक 9 (bhagavata.11.15.9)

एताश्चोद्देशतः प्रोक्ता योगधारणसिद्धयः । यया धारणया या स्याद् यथा वा स्यान्निबोध मे ॥ 15.9 ॥

etāś coddeśataḥ proktā yoga-dhāraṇa-siddhayaḥ yayā dhāraṇayā yā syād yathā vā syān nibodha me

— ये संक्षेप में योग-धारणा से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ हैं। अब मुझसे यह समझो कि कौन-सी धारणा से कौन-सी सिद्धि किस प्रकार उत्पन्न होती है।

श्लोक 10 (bhagavata.11.15.10)

भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयेन्मनः । अणिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको मम ॥ 15.10 ॥

bhūta-sūkṣmātmani mayi tan-mātraṁ dhārayen manaḥ aṇimānam avāpnoti tan-mātropāsako mama

जो अपना मन केवल भूतों के सूक्ष्म तत्व-रूप मुझ पर ही स्थिर करता है, और मेरी उसी सूक्ष्म तन्मात्रा-रूप में उपासना करता है, वह अणिमा सिद्धि को प्राप्त करता है।

श्लोक 11 (bhagavata.11.15.11)

महत्तत्त्वात्मनि मयि यथासंस्थं मनो दधत् । महिमानमवाप्नोति भूतानां च पृथक् पृथक् ॥ 15.11 ॥

mahat-tattvātmani mayi yathā-saṁsthaṁ mano dadhat mahimānam avāpnoti bhūtānāṁ ca pṛthak pṛthak

महत्तत्व-रूप मुझमें, उसकी यथोचित स्थिति में मन को स्थिर करने वाला मनुष्य महिमा सिद्धि को, तथा पृथक्-पृथक् प्रत्येक भूत पर प्रभुत्व को प्राप्त करता है।

श्लोक 12 (bhagavata.11.15.12)

परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रञ्जयन् । कालसूक्ष्मार्थतां योगी लघिमानमवाप्नुयात् ॥ 15.12 ॥

paramāṇu-maye cittaṁ bhūtānāṁ mayi rañjayan kāla-sūkṣmārthatāṁ yogī laghimānam avāpnuyāt

जो योगी अपने चित्त को भूतों के परमाणु-रूप में स्थित मुझमें अनुरक्त करता है, और इस प्रकार काल के सूक्ष्मतम स्वरूप को समझ लेता है, वह लघिमा सिद्धि को प्राप्त करता है।

श्लोक 13 (bhagavata.11.15.13)

धारयन् मय्यहंतत्त्वे मनो वैकारिकेऽखिलम् । सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं प्राप्तिं प्राप्नोति मन्मनाः ॥ 15.13 ॥

dhārayan mayy ahaṁ-tattve mano vaikārike ’khilam sarvendriyāṇām ātmatvaṁ prāptiṁ prāpnoti man-manāḥ

सत्वगुण से उत्पन्न अहंतत्व में स्थित मुझमें अपने संपूर्ण मन को स्थिर करने वाला साधक, समस्त इन्द्रियों की आत्मता रूपी प्राप्ति सिद्धि को प्राप्त करता है।

श्लोक 14 (bhagavata.11.15.14)

महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयेन्मयि मानसम् । प्राकाम्यं पारमेष्ठ्यं मे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः ॥ 15.14 ॥

mahaty ātmani yaḥ sūtre dhārayen mayi mānasam prākāmyaṁ pārameṣṭhyaṁ me vindate ’vyakta-janmanaḥ

जो अपना मन महत्तत्व के सूत्र-रूप आत्मा में स्थित मुझमें लगाता है, वह अव्यक्त-जन्मा मुझसे परम श्रेष्ठ प्राकाम्य सिद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 15 (bhagavata.11.15.15)

विष्णौ त्र्यधीश्वरे चित्तं धारयेत् कालविग्रहे । स ईशित्वमवाप्नोति क्षेत्रज्ञक्षेत्रचोदनाम् ॥ 15.15 ॥

viṣṇau try-adhīśvare cittaṁ dhārayet kāla-vigrahe sa īśitvam avāpnoti kṣetrajña-kṣetra-codanām

जो अपना चित्त त्रिगुणाधीश्वर, काल-स्वरूप विष्णु में स्थिर करता है, वह क्षेत्रज्ञ और क्षेत्र दोनों को प्रेरित करने वाली ईशित्व सिद्धि को प्राप्त करता है।

श्लोक 16 (bhagavata.11.15.16)

नारायणे तुरीयाख्ये भगवच्छब्दशब्दिते । मनो मय्यादधद् योगी मद्धर्मा वशितामियात् ॥ 15.16 ॥

nārāyaṇe turīyākhye bhagavac-chabda-śabdite mano mayy ādadhad yogī mad-dharmā vaśitām iyāt

जो योगी 'भगवान' शब्द से अभिहित, तुरीय कहलाने वाले मेरे नारायण-स्वरूप में अपना मन स्थिर करता है, वह मेरे ही धर्म से युक्त होकर वशिता सिद्धि को प्राप्त करता है।

श्लोक 17 (bhagavata.11.15.17)

निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः । परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते ॥ 15.17 ॥

nirguṇe brahmaṇi mayi dhārayan viśadaṁ manaḥ paramānandam āpnoti yatra kāmo ’vasīyate

जो अपने निर्मल मन को मुझ निर्गुण ब्रह्म में स्थिर करता है, वह उस परम आनंद को प्राप्त करता है जिसमें समस्त कामनाएँ पूर्णतः तृप्त हो जाती हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.11.15.18)

श्वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि । धारयञ्छ्वेततां याति षडूर्मिरहितो नरः ॥ 15.18 ॥

śvetadvīpa-patau cittaṁ śuddhe dharma-maye mayi dhārayañ chvetatāṁ yāti ṣaḍ-ūrmi-rahito naraḥ

जो अपना चित्त शुद्ध और धर्ममय, श्वेतद्वीप के स्वामी मुझमें स्थिर करता है, वह उस श्वेत (निर्मल) अवस्था को प्राप्त करता है, जो षड्-ऊर्मियों (क्षुधा, तृषा, शोक, मोह, जरा और मृत्यु) से रहित है।

श्लोक 19 (bhagavata.11.15.19)

मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्वहन् । तत्रोपलब्धा भूतानां हंसो वाचः शृणोत्यसौ ॥ 15.19 ॥

mayy ākāśātmani prāṇe manasā ghoṣam udvahan tatropalabdhā bhūtānāṁ haṁso vācaḥ śṛṇoty asau

जो मन के द्वारा आकाश-स्वरूप और प्राण-स्वरूप मुझमें स्थित नाद (ध्वनि) को धारण करता है, वह वहाँ समस्त प्राणियों की वाणी को सुनने में समर्थ हो जाता है।

श्लोक 20 (bhagavata.11.15.20)

चक्षुस्त्वष्टरि संयोज्य त्वष्टारमपि चक्षुषि । मां तत्र मनसा ध्यायन् विश्वं पश्यति दूरतः ॥ 15.20 ॥

cakṣus tvaṣṭari saṁyojya tvaṣṭāram api cakṣuṣi māṁ tatra manasā dhyāyan viśvaṁ paśyati dūrataḥ

दृष्टि को सूर्य में और सूर्य को दृष्टि में मिलाकर, वहाँ मन से मेरा ध्यान करने वाला साधक दूर से ही समस्त विश्व को देखने में समर्थ हो जाता है।

श्लोक 21 (bhagavata.11.15.21)

मनो मयि सुसंयोज्य देहं तदनुवायुना । मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मनः ॥ 15.21 ॥

mano mayi su-saṁyojya dehaṁ tad-anuvāyunā mad-dhāraṇānubhāvena tatrātmā yatra vai manaḥ

जो अपने मन को मुझमें भलीभाँति संयुक्त कर, तथा मन का अनुसरण करने वाले प्राण द्वारा शरीर को भी संयुक्त कर देता है, वह इस धारणा के प्रभाव से जहाँ भी उसका मन जाए, वहीं उसकी आत्मा उपस्थित हो जाती है।

श्लोक 22 (bhagavata.11.15.22)

यदा मन उपादाय यद् यद् रूपं बुभूषति । तत्तद् भवेन्मनोरूपं मद्योगबलमाश्रयः ॥ 15.22 ॥

yadā mana upādāya yad yad rūpaṁ bubhūṣati tat tad bhaven mano-rūpaṁ mad-yoga-balam āśrayaḥ

जब मनुष्य अपने मन को लगाकर जिस-जिस रूप को धारण करना चाहता है, वह-वह मनोरूप मेरी योग-शक्ति के आश्रय से साकार हो जाता है।

श्लोक 23 (bhagavata.11.15.23)

परकायं विशन् सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत् । पिण्डं हित्वा विशेत् प्राणो वायुभूतः षडङ्घ्रिवत् ॥ 15.23 ॥

para-kāyaṁ viśan siddha ātmānaṁ tatra bhāvayet piṇḍaṁ hitvā viśet prāṇo vāyu-bhūtaḥ ṣaḍaṅghri-vat

दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की इच्छा रखने वाले सिद्ध योगी को पहले स्वयं को वहाँ स्थित भावित करना चाहिए; फिर अपने शरीर को त्यागकर, वायु-रूप बना प्राण उसमें उसी प्रकार प्रवेश करता है जैसे भ्रमर एक फूल से दूसरे फूल में जाता है।

श्लोक 24 (bhagavata.11.15.24)

पार्ष्ण्यापीड्य गुदं प्राणं हृदुरःकण्ठमूर्धसु । आरोप्य ब्रह्मरन्ध्रेण ब्रह्म नीत्वोत्सृजेत्तनुम् ॥ 15.24 ॥

pārṣṇyāpīḍya gudaṁ prāṇaṁ hṛd-uraḥ-kaṇṭha-mūrdhasu āropya brahma-randhreṇa brahma nītvotsṛjet tanum

एड़ी से गुदा को दबाकर, प्राण को हृदय, वक्ष, कंठ और मस्तक में क्रमशः चढ़ाते हुए, ब्रह्मरंध्र के द्वारा उसे ब्रह्म तक ले जाकर, इस प्रकार शरीर का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 25 (bhagavata.11.15.25)

विहरिष्यन् सुराक्रीडे मत्स्थं सत्त्वं विभावयेत् । विमानेनोपतिष्ठन्ति सत्त्ववृत्तीः सुरस्त्रियः ॥ 15.25 ॥

vihariṣyan surākrīḍe mat-sthaṁ sattvaṁ vibhāvayet vimānenopatiṣṭhanti sattva-vṛttīḥ sura-striyaḥ

देवताओं के क्रीड़ा-उद्यानों में विहार करने की इच्छा रखने वाले को मुझमें स्थित सत्वगुण का ध्यान करना चाहिए, तत्पश्चात् सत्वगुण से युक्त देवांगनाएँ विमान द्वारा उसके पास आ पहुँचती हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.11.15.26)

यथा सङ्कल्पयेद् बुद्ध्या यदा वा मत्परः पुमान् । मयि सत्ये मनो युञ्जंस्तथा तत् समुपाश्नुते ॥ 15.26 ॥

yathā saṅkalpayed buddhyā yadā vā mat-paraḥ pumān mayi satye mano yuñjaṁs tathā tat samupāśnute

मुझमें अनुरक्त पुरुष अपनी बुद्धि से जैसा भी संकल्प करे, सत्यस्वरूप मुझमें मन लगाकर, वह उसी प्रकार उस संकल्प को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 27 (bhagavata.11.15.27)

यो वै मद्भावमापन्न ईशितुर्वशितुः पुमान् । कुतश्चिन्न विहन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम ॥ 15.27 ॥

yo vai mad-bhāvam āpanna īśitur vaśituḥ pumān kutaścin na vihanyeta tasya cājñā yathā mama

जो पुरुष मेरे भाव को वास्तव में प्राप्त कर चुका है, वह स्वयं भी शासक और नियंता बन जाता है, और वह कहीं भी बाधित नहीं होता — उसकी आज्ञा भी मेरी आज्ञा के समान ही प्रभावी होती है।

श्लोक 28 (bhagavata.11.15.28)

मद्भक्त्या शुद्धसत्त्वस्य योगिनो धारणाविदः । तस्य त्रैकालिकी बुद्धिर्जन्ममृत्यूपबृंहिता ॥ 15.28 ॥

mad-bhaktyā śuddha-sattvasya yogino dhāraṇā-vidaḥ tasya trai-kālikī buddhir janma-mṛtyūpabṛṁhitā

मेरी भक्ति से जिसका अस्तित्व शुद्ध हो चुका है और जो धारणा-विद्या में निपुण है, उस योगी की बुद्धि त्रिकाल को जानने वाली हो जाती है, जिसमें जन्म और मृत्यु का ज्ञान भी सम्मिलित है।

श्लोक 29 (bhagavata.11.15.29)

अग्न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपुः । मद्योगशान्तचित्तस्य यादसामुदकं यथा ॥ 15.29 ॥

agny-ādibhir na hanyeta muner yoga-mayaṁ vapuḥ mad-yoga-śānta-cittasya yādasām udakaṁ yathā

जिस प्रकार जल जलचरों के शरीर को हानि नहीं पहुँचा सकता, उसी प्रकार मुझमें योग द्वारा शांत चित्त वाले मुनि के योगमय शरीर को अग्नि आदि तत्व हानि नहीं पहुँचा सकते।

श्लोक 30 (bhagavata.11.15.30)

मद्विभूतीरभिध्यायन् श्रीवत्सास्त्रविभूषिताः । ध्वजातपत्रव्यजनैः स भवेदपराजितः ॥ 15.30 ॥

mad-vibhūtīr abhidhyāyan śrīvatsāstra-vibhūṣitāḥ dhvajātapatra-vyajanaiḥ sa bhaved aparājitaḥ

जो मेरे उन ऐश्वर्यमय अवतारों का ध्यान करता है, जो श्रीवत्स-चिह्न और दिव्य अस्त्रों से सुशोभित हैं, तथा ध्वज, छत्र और चँवर से युक्त हैं, वह अपराजित हो जाता है।

श्लोक 31 (bhagavata.11.15.31)

उपासकस्य मामेवं योगधारणया मुनेः । सिद्धयः पूर्वकथिता उपतिष्ठन्त्यशेषतः ॥ 15.31 ॥

upāsakasya mām evaṁ yoga-dhāraṇayā muneḥ siddhayaḥ pūrva-kathitā upatiṣṭhanty aśeṣataḥ

इस प्रकार योग-धारणा द्वारा मेरी उपासना करने वाले मुनि को पूर्वकथित समस्त सिद्धियाँ सम्पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाती हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.11.15.32)

जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुनेः । मद्धारणां धारयतः का सा सिद्धिः सुदुर्लभा ॥ 15.32 ॥

jitendriyasya dāntasya jita-śvāsātmano muneḥ mad-dhāraṇāṁ dhārayataḥ kā sā siddhiḥ su-durlabhā

जिस मुनि ने इन्द्रियों को जीत लिया है, जो संयमी है, जिसने श्वास और मन को वश में कर लिया है, और जो मुझमें धारणा को धारण किए हुए है — उसके लिए कौन-सी सिद्धि अत्यंत दुर्लभ रह जाती है?

श्लोक 33 (bhagavata.11.15.33)

अन्तरायान् वदन्त्येता युञ्जतो योगमुत्तमम् । मया सम्पद्यमानस्य कालक्षपणहेतवः ॥ 15.33 ॥

antarāyān vadanty etā yuñjato yogam uttamam mayā sampadyamānasya kāla-kṣapaṇa-hetavaḥ

ये सिद्धियाँ ही, जो मुझसे सीधे प्राप्ति देने वाले उत्तम योग का अभ्यास करने वाले के लिए विघ्न स्वरूप हैं, ज्ञानीजनों द्वारा केवल समय के अपव्यय का कारण बताई जाती हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.11.15.34)

जन्मौषधितपोमन्त्रैर्यावतीरिह सिद्धयः । योगेनाप्नोति ताः सर्वा नान्यैर्योगगतिं व्रजेत् ॥ 15.34 ॥

janmauṣadhi-tapo-mantrair yāvatīr iha siddhayaḥ yogenāpnoti tāḥ sarvā nānyair yoga-gatiṁ vrajet

इस लोक में जन्म, औषधि, तप और मंत्र द्वारा जितनी भी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, वे सभी योग से भी प्राप्त हो सकती हैं; परंतु योग की वास्तविक गति इन अन्य साधनों से प्राप्त नहीं होती।

श्लोक 35 (bhagavata.11.15.35)

सर्वासामपि सिद्धीनां हेतुः पतिरहं प्रभुः । अहं योगस्य साङ्ख्यस्य धर्मस्य ब्रह्मवादिनाम् ॥ 15.35 ॥

sarvāsām api siddhīnāṁ hetuḥ patir ahaṁ prabhuḥ ahaṁ yogasya sāṅkhyasya dharmasya brahma-vādinām

मैं ही समस्त सिद्धियों का कारण, स्वामी और प्रभु हूँ; मैं ही योग का, सांख्य का, धर्म का, और ब्रह्मवादियों का मूल आधार हूँ।

श्लोक 36 (bhagavata.11.15.36)

अहमात्मान्तरो बाह्योऽनावृतः सर्वदेहिनाम् । यथा भूतानि भूतेषु बहिरन्तः स्वयं तथा ॥ 15.36 ॥

aham ātmāntaro bāhyo ’nāvṛtaḥ sarva-dehinām yathā bhūtāni bhūteṣu bahir antaḥ svayaṁ tathā

मैं ही समस्त देहधारियों की आंतरिक आत्मा हूँ, और मैं ही उनसे बाह्य भी हूँ, किसी से भी अनावृत — जैसे पंचमहाभूत स्वयं समस्त प्राणियों के भीतर और बाहर दोनों ओर विद्यमान रहते हैं।

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