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एकादश स्कन्ध · अध्याय 17

वर्णाश्रम-व्यवस्था का वर्णन

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (bhagavata.11.17.1)

श्रीउद्धव उवाच यस्त्वयाभिहितः पूर्वं धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः । वर्णाश्रमाचारवतां सर्वेषां द्विपदामपि ॥ 17.1 ॥

śrī-uddhava uvāca yas tvayābhihitaḥ pūrvaṁ dharmas tvad-bhakti-lakṣaṇaḥ varṇāśramācāravatāṁ sarveṣāṁ dvi-padām api

श्री उद्धव ने कहा — हे प्रभो, आपने पहले जिस भक्तिलक्षण धर्म का वर्णन किया था, जो वर्णाश्रम का पालन करने वाले और न करने वाले, सभी मनुष्यों के लिए है,

श्लोक 2 (bhagavata.11.17.2)

यथानुष्ठीयमानेन त्वयि भक्तिर्नृणां भवेत् । स्वधर्मेणारविन्दाक्ष तन् ममाख्यातुमर्हसि ॥ 17.2 ॥

yathānuṣṭhīyamānena tvayi bhaktir nṛṇāṁ bhavet sva-dharmeṇāravindākṣa tan mamākhyātum arhasi

हे कमलनयन! उसी धर्म का वर्णन कीजिए, जिसका पालन करने से मनुष्यों को अपने स्वधर्म के द्वारा आपमें भक्ति प्राप्त हो सके।

श्लोक 3 (bhagavata.11.17.3)

पुरा किल महाबाहो धर्मं परमकं प्रभो । यत्तेन हंसरूपेण ब्रह्मणेऽभ्यात्थ माधव ॥ 17.3 ॥

purā kila mahā-bāho dharmaṁ paramakaṁ prabho yat tena haṁsa-rūpeṇa brahmaṇe ’bhyāttha mādhava

हे महाबाहो प्रभो! प्राचीन काल में आपने हंस-रूप में ब्रह्मा जी से जो परम धर्म कहा था, हे माधव,

श्लोक 4 (bhagavata.11.17.4)

स इदानीं सुमहता कालेनामित्रकर्शन । न प्रायो भविता मर्त्यलोके प्रागनुशासितः ॥ 17.4 ॥

sa idānīṁ su-mahatā kālenāmitra-karśana na prāyo bhavitā martya- loke prāg anuśāsitaḥ

हे शत्रुनाशक! अब इतने दीर्घ काल के बीत जाने से, वह पूर्वकाल में उपदिष्ट धर्म मृत्युलोक में लगभग लुप्तप्राय हो चुका है।

श्लोक 5 (bhagavata.11.17.5)

वक्ता कर्ताविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि । सभायामपि वैरिञ्च्यां यत्र मूर्तिधराः कलाः ॥ 17.5 ॥

vaktā kartāvitā nānyo dharmasyācyuta te bhuvi sabhāyām api vairiñcyāṁ yatra mūrti-dharāḥ kalāḥ

हे अच्युत! इस पृथ्वी पर आपके अतिरिक्त धर्म का न कोई वक्ता है, न कर्ता और न रक्षक — यहां तक कि ब्रह्मा जी की सभा में भी नहीं, जहां वेद स्वयं मूर्तिमान होकर उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.11.17.6)

कर्त्रावित्रा प्रवक्त्रा च भवता मधुसूदन । त्यक्ते महीतले देव विनष्टं कः प्रवक्ष्यति ॥ 17.6 ॥

kartrāvitrā pravaktrā ca bhavatā madhusūdana tyakte mahī-tale deva vinaṣṭaṁ kaḥ pravakṣyati

हे मधुसूदन! जब आप, जो स्वयं धर्म के कर्ता, रक्षक और वक्ता हैं, इस पृथ्वी को त्याग देंगे, तब उस नष्ट हुए धर्म को फिर कौन कहेगा?

श्लोक 7 (bhagavata.11.17.7)

तत्त्वं नः सर्वधर्मज्ञ धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः । यथा यस्य विधीयेत तथा वर्णय मे प्रभो ॥ 17.7 ॥

tat tvaṁ naḥ sarva-dharma-jña dharmas tvad-bhakti-lakṣaṇaḥ yathā yasya vidhīyeta tathā varṇaya me prabho

अतः हे सर्वधर्मज्ञ प्रभो! वह भक्तिलक्षण धर्म जिस व्यक्ति के लिए जैसे विहित है, वैसे ही मुझे बताइए।

श्लोक 8 (bhagavata.11.17.8)

श्रीशुक उवाच इत्थं स्वभृत्यमुख्येन पृष्टः स भगवान् हरिः । प्रीतः क्षेमाय मर्त्यानां धर्मानाह सनातनान् ॥ 17.8 ॥

śrī-śuka uvāca itthaṁ sva-bhṛtya-mukhyena pṛṣṭaḥ sa bhagavān hariḥ prītaḥ kṣemāya martyānāṁ dharmān āha sanātanān

श्री शुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार अपने प्रधान सेवक द्वारा पूछे जाने पर, भगवान हरि ने प्रसन्न होकर मनुष्यों के कल्याण हेतु सनातन धर्मों का वर्णन किया।

श्लोक 9 (bhagavata.11.17.9)

श्रीभगवानुवाच धर्म्य एष तव प्रश्नो नैःश्रेयसकरो नृणाम् । वर्णाश्रमाचारवतां तमुद्धव निबोध मे ॥ 17.9 ॥

śrī-bhagavān uvāca dharmya eṣa tava praśno naiḥśreyasa-karo nṛṇām varṇāśramācāravatāṁ tam uddhava nibodha me

श्री भगवान ने कहा — हे उद्धव! तुम्हारा यह प्रश्न धर्मानुकूल है और वर्णाश्रम का पालन करने वाले तथा न करने वाले, सभी मनुष्यों के लिए परम कल्याणकारी है। उसे मुझसे सुनो।

श्लोक 10 (bhagavata.11.17.10)

आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृतः । कृतकृत्याः प्रजा जात्या तस्मात् कृतयुगं विदुः ॥ 17.10 ॥

ādau kṛta-yuge varṇo nṛṇāṁ haṁsa iti smṛtaḥ kṛta-kṛtyāḥ prajā jātyā tasmāt kṛta-yugaṁ viduḥ

आदिकाल में, कृतयुग में, मनुष्यों का एक ही वर्ण था, जिसे हंस कहा जाता था। उस युग की प्रजा जन्म से ही कृतकृत्य होती थी, इसीलिए विद्वान उसे कृतयुग कहते हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.11.17.11)

वेदः प्रणव एवाग्रे धर्मोऽहं वृषरूपधृक् । उपासते तपोनिष्ठा हंसं मां मुक्तकिल्बिषाः ॥ 17.11 ॥

vedaḥ praṇava evāgre dharmo ’haṁ vṛṣa-rūpa-dhṛk upāsate tapo-niṣṭhā haṁsaṁ māṁ mukta-kilbiṣāḥ

उस युग में समस्त वेद केवल प्रणव (ॐ) रूप में था, और मैं धर्म चतुष्पाद वृष के रूप में स्थित था। तपस्या में निष्ठ, पापरहित पुरुष मुझे हंस रूप में उपासते थे।

श्लोक 12 (bhagavata.11.17.12)

त्रेतामुखे महाभाग प्राणान्मे हृदयात्त्रयी । विद्या प्रादुरभूत्तस्या अहमासं त्रिवृन्मखः ॥ 17.12 ॥

tretā-mukhe mahā-bhāga prāṇān me hṛdayāt trayī vidyā prādurabhūt tasyā aham āsaṁ tri-vṛn makhaḥ

हे महाभाग! त्रेतायुग के आरम्भ में मेरे हृदय से, जो प्राणों का आश्रय है, त्रयी विद्या प्रकट हुई; उससे मैं त्रिविध यज्ञ के रूप में प्रकट हुआ।

श्लोक 13 (bhagavata.11.17.13)

विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा मुखबाहूरुपादजाः । वैराजात् पुरुषाज्जाता य आत्माचारलक्षणाः ॥ 17.13 ॥

vipra-kṣatriya-viṭ-śūdrā mukha-bāhūru-pāda-jāḥ vairājāt puruṣāj jātā ya ātmācāra-lakṣaṇāḥ

विराट पुरुष के मुख, बाहु, ऊरु और पैरों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उत्पन्न हुए, जो अपने-अपने स्वभाव और आचार से पहचाने जाते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.11.17.14)

गृहाश्रमो जघनतो ब्रह्मचर्यं हृदो मम । वक्षःस्थलाद्वनेवासः संन्यासः शिरसि स्थितः ॥ 17.14 ॥

gṛhāśramo jaghanato brahmacaryaṁ hṛdo mama vakṣaḥ-sthalād vane-vāsaḥ sannyāsaḥ śirasi sthitaḥ

गृहस्थाश्रम मेरी कटि से, ब्रह्मचर्य हृदय से, वानप्रस्थ वक्षःस्थल से उत्पन्न हुआ, और संन्यास मेरे शिर में स्थित है।

श्लोक 15 (bhagavata.11.17.15)

वर्णानामाश्रमाणां च जन्मभूम्यनुसारिणीः । आसन् प्रकृतयो नृणां नीचैर्नीचोत्तमोत्तमाः ॥ 17.15 ॥

varṇānām āśramāṇāṁ ca janma-bhūmy-anusāriṇīḥ āsan prakṛtayo nṝnāṁ nīcair nīcottamottamāḥ

वर्णों और आश्रमों के अनुसार मनुष्यों के स्वभाव उनके जन्म-स्थान के अनुरूप हुए, जो निम्नतम से लेकर उच्चतम तक विविध थे।

श्लोक 16 (bhagavata.11.17.16)

शमो दमस्तपः शौचं सन्तोषः क्षान्तिरार्जवम् । मद्भक्तिश्च दया सत्यं ब्रह्मप्रकृतयस्त्विमाः ॥ 17.16 ॥

śamo damas tapaḥ śaucaṁ santoṣaḥ kṣāntir ārjavam mad-bhaktiś ca dayā satyaṁ brahma-prakṛtayas tv imāḥ

मन का संयम, इन्द्रिय-संयम, तप, शौच, संतोष, क्षमा, सरलता, मेरी भक्ति, दया और सत्य — ये ब्राह्मण के स्वाभाविक गुण हैं।

श्लोक 17 (bhagavata.11.17.17)

तेजो बलं धृतिः शौर्यं तितिक्षौदार्यमुद्यमः । स्थैर्यं ब्रह्मण्यमैश्वर्यं क्षत्रप्रकृतयस्त्विमाः ॥ 17.17 ॥

tejo balaṁ dhṛtiḥ śauryaṁ titikṣaudāryam udyamaḥ sthairyaṁ brahmanyam aiśvaryaṁ kṣatra-prakṛtayas tv imāḥ

तेज, बल, धृति, शौर्य, सहनशीलता, उदारता, उद्यम, स्थिरता, ब्राह्मणों के प्रति आदर और ऐश्वर्य — ये क्षत्रिय के स्वाभाविक गुण हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.11.17.18)

आस्तिक्यं दाननिष्ठा च अदम्भो ब्रह्मसेवनम् । अतुष्टिरर्थोपचयैर्वैश्यप्रकृतयस्त्विमाः ॥ 17.18 ॥

āstikyaṁ dāna-niṣṭhā ca adambho brahma-sevanam atuṣṭir arthopacayair vaiśya-prakṛtayas tv imāḥ

आस्तिकता, दान में निष्ठा, निष्कपटता, ब्राह्मणों की सेवा, और धन बढ़ जाने पर भी असंतोष — ये वैश्य के स्वाभाविक गुण हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.11.17.19)

शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया । तत्र लब्धेन सन्तोषः शूद्रप्रकृतयस्त्विमाः ॥ 17.19 ॥

śuśrūṣaṇaṁ dvija-gavāṁ devānāṁ cāpy amāyayā tatra labdhena santoṣaḥ śūdra-prakṛtayas tv imāḥ

द्विजों, गौओं और देवताओं की निष्कपट सेवा, और उससे प्राप्त वस्तु में संतोष — ये शूद्र के स्वाभाविक गुण हैं।

श्लोक 20 (bhagavata.11.17.20)

अशौचमनृतं स्तेयं नास्तिक्यं शुष्कविग्रहः । कामः क्रोधश्च तर्षश्च स भावोऽन्त्यावसायिनाम् ॥ 17.20 ॥

aśaucam anṛtaṁ steyaṁ nāstikyaṁ śuṣka-vigrahaḥ kāmaḥ krodhaś ca tarṣaś ca sa bhāvo ’ntyāvasāyinām

अशौच, असत्य, चोरी, नास्तिकता, व्यर्थ का विग्रह, काम, क्रोध और लालच — यह अन्त्यावसायियों (वर्णबाह्य जनों) का स्वभाव है।

श्लोक 21 (bhagavata.11.17.21)

अहिंसा सत्यमस्तेयमकामक्रोधलोभता । भूतप्रियहितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिकः ॥ 17.21 ॥

ahiṁsā satyam asteyam akāma-krodha-lobhatā bhūta-priya-hitehā ca dharmo ’yaṁ sārva-varṇikaḥ

अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), काम-क्रोध-लोभ का अभाव, और सब प्राणियों के प्रिय एवं हित की चेष्टा — यह सभी वर्णों का सामान्य धर्म है।

श्लोक 22 (bhagavata.11.17.22)

द्वितीयं प्राप्यानुपूर्व्याज्जन्मोपनयनं द्विजः । वसन् गुरुकुले दान्तो ब्रह्माधीयीत चाहूतः ॥ 17.22 ॥

dvitīyaṁ prāpyānupūrvyāj janmopanayanaṁ dvijaḥ vasan gurukule dānto brahmādhīyīta cāhūtaḥ

उपनयन संस्कार से द्विज क्रमशः दूसरा जन्म प्राप्त करता है। गुरुकुल में रहते हुए, इन्द्रियों को वश में रखकर, गुरु द्वारा बुलाए जाने पर ही उसे वेद का अध्ययन करना चाहिए।

श्लोक 23 (bhagavata.11.17.23)

मेखलाजिनदण्डाक्षब्रह्मसूत्रकमण्डलून् । जटिलोऽधौतदद्वासोऽरक्तपीठः कुशान् दधत् ॥ 17.23 ॥

mekhalājina-daṇḍākṣa- brahma-sūtra-kamaṇḍalūn jaṭilo ’dhauta-dad-vāso ’rakta-pīṭhaḥ kuśān dadhat

ब्रह्मचारी मेखला, मृगचर्म, दण्ड, अक्षमाला, यज्ञोपवीत और कमण्डलु धारण करे; जटाधारी होकर, दांत बिना मांजे, वस्त्र बिना धोए, तथा रंगहीन सादे आसन पर बैठकर कुश धारण करे।

श्लोक 24 (bhagavata.11.17.24)

स्नानभोजनहोमेषु जपोच्चारे च वाग्यतः । न च्छिन्द्यान्नखरोमाणि कक्षोपस्थगतान्यपि ॥ 17.24 ॥

snāna-bhojana-homeṣu japoccāre ca vāg-yataḥ na cchindyān nakha-romāṇi kakṣopastha-gatāny api

स्नान, भोजन, होम तथा जप-उच्चारण के समय वाणी को संयत रखे, और नख तथा रोम — काँख और गुह्य स्थान के भी — न काटे।

श्लोक 25 (bhagavata.11.17.25)

रेतो नावकिरेज्जातु ब्रह्मव्रतधरः स्वयम् । अवकीर्णेऽवगाह्याप्सु यतासुस्त्रिपदां जपेत् ॥ 17.25 ॥

reto nāvakirej jātu brahma-vrata-dharaḥ svayam avakīrṇe ’vagāhyāpsu yatāsus tri-padāṁ japet

ब्रह्मचर्य व्रतधारी को कभी स्वयं वीर्यपात नहीं करना चाहिए। यदि अनायास वीर्यस्खलन हो जाए, तो जल में स्नान कर, प्राणायाम द्वारा श्वास को संयत कर, त्रिपदा गायत्री का जप करे।

श्लोक 26 (bhagavata.11.17.26)

अग्न्यर्काचार्यगोविप्रगुरुवृद्धसुराञ्शुचिः । समाहित उपासीत सन्ध्ये द्वे यतवाग् जपन् ॥ 17.26 ॥

agny-arkācārya-go-vipra- guru-vṛddha-surāñ śuciḥ samāhita upāsīta sandhye dve yata-vāg japan

शुद्ध और एकाग्रचित्त होकर वह अग्नि, सूर्य, आचार्य, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्धजन और देवताओं की उपासना दोनों संध्याओं में करे, वाणी को संयत रखते हुए जप करता हुआ।

श्लोक 27 (bhagavata.11.17.27)

आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित् । न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः ॥ 17.27 ॥

ācāryaṁ māṁ vijānīyān navamanyeta karhicit na martya-buddhyāsūyeta sarva-deva-mayo guruḥ

आचार्य को मुझ स्वरूप जानना चाहिए और कभी उसका अनादर नहीं करना चाहिए; उसे साधारण मनुष्य समझकर ईर्ष्या भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि गुरु सर्वदेवमय है।

श्लोक 28 (bhagavata.11.17.28)

सायं प्रातरुपानीय भैक्ष्यं तस्मै निवेदयेत् । यच्चान्यदप्यनुज्ञातमुपयुञ्जीत संयतः ॥ 17.28 ॥

sāyaṁ prātar upānīya bhaikṣyaṁ tasmai nivedayet yac cānyad apy anujñātam upayuñjīta saṁyataḥ

प्रातः और सायं भिक्षा लाकर उसे गुरु को अर्पित करे; उससे जो अनुमति मिले, संयमी होकर वही ग्रहण करे।

श्लोक 29 (bhagavata.11.17.29)

शुश्रूषमाण आचार्यं सदोपासीत नीचवत् । यानशय्यासनस्थानैर्नातिदूरे कृताञ्जलिः ॥ 17.29 ॥

śuśrūṣamāṇa ācāryaṁ sadopāsīta nīca-vat yāna-śayyāsana-sthānair nāti-dūre kṛtāñjaliḥ

गुरु की सेवा करते हुए, वह सदा एक नम्र सेवक की भांति उनके निकट रहे — चलते, सोते, बैठते, खड़े होते समय, हाथ जोड़कर, दूर न जाकर।

श्लोक 30 (bhagavata.11.17.30)

एवंवृत्तो गुरुकुले वसेद् भोगविवर्जितः । विद्या समाप्यते यावद् बिभ्रद् व्रतमखण्डितम् ॥ 17.30 ॥

evaṁ-vṛtto gurukule vased bhoga-vivarjitaḥ vidyā samāpyate yāvad bibhrad vratam akhaṇḍitam

इस प्रकार आचरण करते हुए, भोगों से रहित, गुरुकुल में तब तक निवास करे जब तक विद्या पूर्ण न हो, अपने व्रत को अखण्डित रखते हुए।

श्लोक 31 (bhagavata.11.17.31)

यद्यसौ छन्दसां लोकमारोक्ष्यन् ब्रह्मविष्टपम् । गुरवे विन्यसेद् देहं स्वाध्यायार्थं बृहद्व्रतः ॥ 17.31 ॥

yady asau chandasāṁ lokam ārokṣyan brahma-viṣṭapam gurave vinyased dehaṁ svādhyāyārthaṁ bṛhad-vrataḥ

यदि वह छन्दों के लोक अर्थात् ब्रह्मलोक तक जाना चाहे, तो अपने शरीर को गुरु को सौंपकर, बृहद्व्रत धारण करते हुए स्वाध्याय में लगे।

श्लोक 32 (bhagavata.11.17.32)

अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेषु मां परम् । अपृथग्धीरुपासीत ब्रह्मवर्चस्व्यकल्मषः ॥ 17.32 ॥

agnau gurāv ātmani ca sarva-bhūteṣu māṁ param apṛthag-dhīr upasīta brahma-varcasvy akalmaṣaḥ

ब्रह्मतेज से दीप्त और निष्पाप होकर, वह मुझ परमेश्वर को अग्नि, गुरु, अपनी आत्मा और समस्त प्राणियों में अभेद बुद्धि से उपासे।

श्लोक 33 (bhagavata.11.17.33)

स्त्रीणां निरीक्षणस्पर्शसंलापक्ष्वेलनादिकम् । प्राणिनो मिथुनीभूतानगृहस्थोऽग्रतस्त्यजेत् ॥ 17.33 ॥

strīṇāṁ nirīkṣaṇa-sparśa- saṁlāpa-kṣvelanādikam prāṇino mithunī-bhūtān agṛhastho ’gratas tyajet

जो गृहस्थ नहीं है, उसे स्त्रियों को देखना, स्पर्श करना, उनसे वार्तालाप करना, हंसी-मजाक करना — इन सबसे दूर रहना चाहिए, तथा मैथुनरत प्राणियों के सामने से भी हट जाना चाहिए।

श्लोक 34 (bhagavata.11.17.34)

शौचमाचमनं स्नानं सन्ध्योपास्तिर्ममार्चनम् । तीर्थसेवा जपोऽस्पृश्याभक्ष्यासम्भाष्यवर्जनम् ॥ 17.34 ॥

śaucam ācamanaṁ snānaṁ sandhyopāstir mamārcanam tīrtha-sevā japo ’spṛśyā- bhakṣyāsambhāṣya-varjanam

शौच, आचमन, स्नान, संध्योपासना, मेरी अर्चना, तीर्थसेवन, जप, तथा अस्पृश्य, अभक्ष्य और असम्भाष्य वस्तुओं का त्याग —

श्लोक 35 (bhagavata.11.17.35)

सर्वाश्रमप्रयुक्तोऽयं नियमः कुलनन्दन । मद्भावः सर्वभूतेषु मनोवाक्कायसंयमः ॥ 17.35 ॥

sarvāśrama-prayukto ’yaṁ niyamaḥ kula-nandana mad-bhāvaḥ sarva-bhūteṣu mano-vāk-kāya-saṁyamaḥ

— हे कुलनन्दन! यह नियम सभी आश्रमों के लिए है; तथा सब प्राणियों में मेरी भावना रखना और मन, वाणी व शरीर का संयम भी सबके लिए है।

श्लोक 36 (bhagavata.11.17.36)

एवं बृहद्व्रतधरो ब्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन् । मद्भक्तस्तीव्रतपसा दग्धकर्माशयोऽमलः ॥ 17.36 ॥

evaṁ bṛhad-vrata-dharo brāhmaṇo ’gnir iva jvalan mad-bhaktas tīvra-tapasā dagdha-karmāśayo ’malaḥ

इस प्रकार बृहद्व्रतधारी ब्राह्मण अग्नि के समान प्रज्वलित होकर, तीव्र तप से अपने कर्माशय को भस्म कर, मेरा भक्त एवं निर्मल बन जाता है।

श्लोक 37 (bhagavata.11.17.37)

अथानन्तरमावेक्ष्यन् यथा जिज्ञासितागमः । गुरवे दक्षिणां दत्त्वा स्नायाद् गुर्वनुमोदितः ॥ 17.37 ॥

athānantaram āvekṣyan yathā-jijñāsitāgamaḥ gurave dakṣiṇāṁ dattvā snāyād gurv-anumoditaḥ

इसके पश्चात्, इच्छानुसार शास्त्रों का अध्ययन करके, गृहस्थाश्रम में प्रवेश की इच्छा से, गुरु को दक्षिणा देकर, स्नान करके, गुरु की अनुमति से आगे बढ़े।

श्लोक 38 (bhagavata.11.17.38)

गृहं वनं वोपविशेत् प्रव्रजेद् वा द्विजोत्तमः । आश्रमादाश्रमं गच्छेन्नान्यथामत्परश्चरेत् ॥ 17.38 ॥

gṛhaṁ vanaṁ vopaviśet pravrajed vā dvijottamaḥ āśramād āśramaṁ gacchen nānyathāmat-paraś caret

श्रेष्ठ द्विज गृहस्थाश्रम में बस सकता है, वन में जा सकता है अथवा संन्यास ले सकता है। जो मुझमें अनुरक्त नहीं है, उसे इसी क्रम से आश्रम से आश्रम में जाना चाहिए, अन्यथा नहीं।

श्लोक 39 (bhagavata.11.17.39)

गृहार्थी सदृशीं भार्यामुद्वहेदजुगुप्सिताम् । यवीयसीं तु वयसा यां सवर्णामनुक्रमात् ॥ 17.39 ॥

gṛhārthī sadṛśīṁ bhāryām udvahed ajugupsitām yavīyasīṁ tu vayasā yāṁ sa-varṇām anu kramāt

गृहस्थ बनने का इच्छुक निन्दारहित, अपनी अवस्था से छोटी, समान वर्ण की पत्नी से विवाह करे, तथा और विवाह करना हो तो क्रमशः निम्न वर्ण की।

श्लोक 40 (bhagavata.11.17.40)

इज्याध्ययनदानानि सर्वेषां च द्विजन्मनाम् । प्रतिग्रहोऽध्यापनं च ब्राह्मणस्यैव याजनम् ॥ 17.40 ॥

ijyādhyayana-dānāni sarveṣāṁ ca dvi-janmanām pratigraho ’dhyāpanaṁ ca brāhmaṇasyaiva yājanam

यज्ञ, अध्ययन और दान — ये सभी द्विजों के लिए हैं; किन्तु प्रतिग्रह, अध्यापन और याजन केवल ब्राह्मण के लिए हैं।

श्लोक 41 (bhagavata.11.17.41)

प्रतिग्रहं मन्यमानस्तपस्तेजोयशोनुदम् । अन्याभ्यामेव जीवेत शिलैर्वा दोषदृक् तयोः ॥ 17.41 ॥

pratigrahaṁ manyamānas tapas-tejo-yaśo-nudam anyābhyām eva jīveta śilair vā doṣa-dṛk tayoḥ

जो प्रतिग्रह को अपने तप, तेज और यश का नाशक मानता है, वह अन्य दो उपायों (अध्यापन-याजन) से जीवन-निर्वाह करे; और यदि उनमें भी दोष देखे, तो शिला-वृत्ति अर्थात् खेत में गिरे अन्न बीनकर जीवन बिताए।

श्लोक 42 (bhagavata.11.17.42)

ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते । कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥ 17.42 ॥

brāhmaṇasya hi deho ’yaṁ kṣudra-kāmāya neṣyate kṛcchrāya tapase ceha pretyānanta-sukhāya ca

ब्राह्मण का यह शरीर तुच्छ कामनाओं के लिए नहीं है, अपितु इस लोक में कठिन तप के लिए है, जिससे मृत्यु के पश्चात् वह अनन्त सुख को प्राप्त करे।

श्लोक 43 (bhagavata.11.17.43)

शिलोञ्छवृत्त्या परितुष्टचित्तो धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः । मय्यर्पितात्मा गृह एव तिष्ठ- न्नातिप्रसक्तः समुपैति शान्तिम् ॥ 17.43 ॥

śiloñcha-vṛttyā parituṣṭa-citto dharmaṁ mahāntaṁ virajaṁ juṣāṇaḥ mayy arpitātmā gṛha eva tiṣṭhan nāti-prasaktaḥ samupaiti śāntim

शिलोञ्छवृत्ति से संतुष्टचित्त होकर, महान् और निर्मल धर्म का पालन करते हुए, मुझमें आत्मसमर्पित होकर — गृहस्थ रहते हुए भी, अनासक्त रहकर वह शान्ति को प्राप्त करता है।

श्लोक 44 (bhagavata.11.17.44)

समुद्धरन्ति ये विप्रं सीदन्तं मत्परायणम् । तानुद्धरिष्ये नचिरादापद्भ्यो नौरिवार्णवात् ॥ 17.44 ॥

samuddharanti ye vipraṁ sīdantaṁ mat-parāyaṇam tān uddhariṣye na cirād āpadbhyo naur ivārṇavāt

जो मेरे परायण, संकटग्रस्त ब्राह्मण का उद्धार करते हैं, उन्हें मैं शीघ्र ही आपत्तियों से उसी प्रकार उबार लेता हूं जैसे नौका सागर से उबारती है।

श्लोक 45 (bhagavata.11.17.45)

सर्वाः समुद्धरेद् राजा पितेव व्यसनात् प्रजाः । आत्मानमात्मना धीरो यथा गजपतिर्गजान् ॥ 17.45 ॥

sarvāḥ samuddhared rājā piteva vyasanāt prajāḥ ātmānam ātmanā dhīro yathā gaja-patir gajān

राजा पिता के समान सभी प्रजाओं का संकट से उद्धार करे, और धीर होकर स्वयं अपने द्वारा अपनी भी रक्षा करे, जैसे गजराज अपने गजसमूह की रक्षा करता है।

श्लोक 46 (bhagavata.11.17.46)

एवंविधो नरपतिर्विमानेनार्कवर्चसा । विधूयेहाशुभं कृत्स्नमिन्द्रेण सह मोदते ॥ 17.46 ॥

evaṁ-vidho nara-patir vimānenārka-varcasā vidhūyehāśubhaṁ kṛtsnam indreṇa saha modate

ऐसा राजा अपने राज्य से समस्त अशुभ को दूर करके, सूर्य के समान तेजस्वी विमान में इन्द्र के साथ आनन्द भोगता है।

श्लोक 47 (bhagavata.11.17.47)

सीदन् विप्रो वणिग्वृत्त्या पण्यैरेवापदं तरेत् । खड्गेन वापदाक्रान्तो न श्ववृत्त्या कथञ्चन ॥ 17.47 ॥

sīdan vipro vaṇig-vṛttyā paṇyair evāpadaṁ taret khaḍgena vāpadākrānto na śva-vṛttyā kathañcana

संकटग्रस्त ब्राह्मण वणिक्-वृत्ति द्वारा वस्तुओं के व्यापार से आपत्ति को पार करे, अथवा घोर आपत्ति में तलवार धारण करके; परन्तु किसी भी स्थिति में श्ववृत्ति (कुत्ते की भांति पराश्रित जीवन) को न अपनाए।

श्लोक 48 (bhagavata.11.17.48)

वैश्यवृत्त्या तु राजन्यो जीवेन्मृगययापदि । चरेद् वा विप्ररूपेण न श्ववृत्त्या कथञ्चन ॥ 17.48 ॥

vaiśya-vṛttyā tu rājanyo jīven mṛgayayāpadi cared vā vipra-rūpeṇa na śva-vṛttyā kathañcana

क्षत्रिय आपत्ति में वैश्यवृत्ति से अथवा मृगया से जीवन-निर्वाह करे, अथवा ब्राह्मण के समान आचरण करे; परन्तु किसी भी स्थिति में श्ववृत्ति को न अपनाए।

श्लोक 49 (bhagavata.11.17.49)

शूद्रवृत्तिं भजेद् वैश्यः शूद्रः कारुकटक्रियाम् । कृच्छ्रान्मुक्तो न गर्ह्येण वृत्तिं लिप्सेत कर्मणा ॥ 17.49 ॥

śūdra-vṛttiṁ bhajed vaiśyaḥ śūdraḥ kāru-kaṭa-kriyām kṛcchrān mukto na garhyeṇa vṛttiṁ lipseta karmaṇā

वैश्य शूद्रवृत्ति अपनाए, और शूद्र कारीगरी अथवा चटाई बुनने जैसा कार्य करे; परन्तु संकट से मुक्त होते ही निन्दनीय कर्म द्वारा जीविका पाने की इच्छा न करे।

श्लोक 50 (bhagavata.11.17.50)

वेदाध्यायस्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम् । देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपाण्यन्वहं यजेत् ॥ 17.50 ॥

vedādhyāya-svadhā-svāhā- baly-annādyair yathodayam devarṣi-pitṛ-bhūtāni mad-rūpāṇy anv-ahaṁ yajet

वेदाध्ययन, स्वधा, स्वाहा तथा बलि-अन्नादि के द्वारा, अपनी सामर्थ्य के अनुसार, प्रतिदिन देव, ऋषि, पितर तथा समस्त प्राणियों का पूजन करे — उन्हें मेरा ही स्वरूप जानकर।

श्लोक 51 (bhagavata.11.17.51)

यदृच्छयोपपन्नेन शुक्लेनोपार्जितेन वा । धनेनापीडयन् भृत्यान् न्यायेनैवाहरेत् क्रतून् ॥ 17.51 ॥

yadṛcchayopapannena śuklenopārjitena vā dhanenāpīḍayan bhṛtyān nyāyenaivāharet kratūn

अनायास प्राप्त अथवा न्यायपूर्वक अर्जित धन से, अपने आश्रितों को कष्ट दिए बिना, न्यायपूर्वक ही यज्ञ-कर्म सम्पन्न करे।

श्लोक 52 (bhagavata.11.17.52)

कुटुम्बेषु न सज्जेत न प्रमाद्येत् कुटुम्ब्यपि । विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत् ॥ 17.52 ॥

kuṭumbeṣu na sajjeta na pramādyet kuṭumby api vipaścin naśvaraṁ paśyed adṛṣṭam api dṛṣṭa-vat

परिवार में आसक्त न हो, तथा परिवार का पालन करते हुए भी असावधान न हो; विवेकी पुरुष अदृष्ट भविष्य को भी दृष्ट के समान नश्वर समझे।

श्लोक 53 (bhagavata.11.17.53)

पुत्रदाराप्तबन्धूनां सङ्गमः पान्थसङ्गमः । अनुदेहं वियन्त्येते स्वप्नो निद्रानुगो यथा ॥ 17.53 ॥

putra-dārāpta-bandhūnāṁ saṅgamaḥ pāntha-saṅgamaḥ anu-dehaṁ viyanty ete svapno nidrānugo yathā

पुत्र, पत्नी, आत्मीयजन और बन्धुओं का समागम पथिकों के समागम के समान है; प्रत्येक नए शरीर के साथ ये सब बिछुड़ जाते हैं, जैसे स्वप्न निद्रा के साथ समाप्त हो जाता है।

श्लोक 54 (bhagavata.11.17.54)

इत्थं परिमृशन्मुक्तो गृहेष्वतिथिवद् वसन् । न गृहैरनुबध्येत निर्ममो निरहङ्कृतः ॥ 17.54 ॥

itthaṁ parimṛśan mukto gṛheṣv atithi-vad vasan na gṛhair anubadhyeta nirmamo nirahaṅkṛtaḥ

इस प्रकार विचार करता हुआ मुक्त पुरुष घर में अतिथि के समान रहे; ममता और अहंकार से रहित होकर वह घर के बन्धन में न बंधे।

श्लोक 55 (bhagavata.11.17.55)

कर्मभिगृहमेधीयैरिष्ट्वा मामेव भक्तिमान् । तिष्ठेद् वनं वोपविशेत् प्रजावान् वा परिव्रजेत् ॥ 17.55 ॥

karmabhir gṛha-medhīyair iṣṭvā mām eva bhaktimān tiṣṭhed vanaṁ vopaviśet prajāvān vā parivrajet

भक्तिमान गृहस्थ अपने गृहस्थोचित कर्मों द्वारा मुझे ही पूजकर, घर में रह सकता है, वन में जा सकता है, अथवा संतानवान होने पर संन्यास ग्रहण कर सकता है।

श्लोक 56 (bhagavata.11.17.56)

यस्त्वासक्तमतिर्गेहे पुत्रवित्तैषणातुरः । स्त्रैणः कृपणधीर्मूढो ममाहमिति बध्यते ॥ 17.56 ॥

yas tv āsakta-matir gehe putra-vittaiṣaṇāturaḥ straiṇaḥ kṛpaṇa-dhīr mūḍho mamāham iti badhyate

किन्तु जिसका मन घर में आसक्त है, पुत्र और धन की कामना से पीड़ित है, जो स्त्री के वशीभूत, कृपण-बुद्धि और मूढ़ है, तथा 'यह मेरा है, मैं यह हूं' — ऐसा सोचता है, वह बंधन में पड़ता है।

श्लोक 57 (bhagavata.11.17.57)

अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजात्मजाः । अनाथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः ॥ 17.57 ॥

aho me pitarau vṛddhau bhāryā bālātmajātmajāḥ anāthā mām ṛte dīnāḥ kathaṁ jīvanti duḥkhitāḥ

'हाय! मेरे वृद्ध माता-पिता, मेरी पत्नी, मेरे बालक — मेरे बिना वे अनाथ और दीन हो जाएंगे। बेचारे दुःखी होकर कैसे जिएंगे?'

श्लोक 58 (bhagavata.11.17.58)

एवं गृहाशयाक्षिप्तहृदयो मूढधीरयम् । अतृप्तस्ताननुध्यायन् मृतोऽन्धं विशते तमः ॥ 17.58 ॥

evaṁ gṛhāśayākṣipta- hṛdayo mūḍha-dhīr ayam atṛptas tān anudhyāyan mṛto ’ndhaṁ viśate tamaḥ

इस प्रकार घर की आसक्ति से जिसका हृदय जकड़ा हुआ है, वह मूढ़बुद्धि पुरुष असंतुष्ट रहते हुए, उन्हीं का चिन्तन करता हुआ मरकर अंध तमस में प्रवेश करता है।

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