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एकादश स्कन्ध · अध्याय 18

वर्णाश्रम-धर्म का वर्णन

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (bhagavata.11.18.1)

श्रीभगवानुवाच वनं विविक्षुः पुत्रेषु भार्यां न्यस्य सहैव वा । वन एव वसेच्छान्तस्तृतीयं भागमायुषः ॥ 18.1 ॥

śrī-bhagavān uvāca vanaṁ vivikṣuḥ putreṣu bhāryāṁ nyasya sahaiva vā vana eva vasec chāntas tṛtīyaṁ bhāgam āyuṣaḥ

श्री भगवान ने कहा — वानप्रस्थ में प्रवेश करने का इच्छुक पुरुष अपनी पत्नी को पुत्रों के पास छोड़कर अथवा साथ लेकर, शान्तचित्त होकर आयु के तीसरे भाग में वन में ही निवास करे।

श्लोक 2 (bhagavata.11.18.2)

कन्दमूलफलैर्वन्यैर्मेध्यैर्वृत्तिं प्रकल्पयेत् । वसीत वल्कलं वासस्तृणपर्णाजिनानि वा ॥ 18.2 ॥

kanda-mūla-phalair vanyair medhyair vṛttiṁ prakalpayet vasīta valkalaṁ vāsas tṛṇa-parṇājināni vā

वन में कन्द, मूल और फल जैसे शुद्ध वन्य पदार्थों से अपनी जीविका चलाए, और वल्कल, तृण, पत्ते या मृगचर्म पहने।

श्लोक 3 (bhagavata.11.18.3)

केशरोमनखश्मश्रुमलानि बिभृयाद् दतः । न धावेदप्सु मज्जेत त्रिकालं स्थण्डिलेशयः ॥ 18.3 ॥

keśa-roma-nakha-śmaśru- malāni bibhṛyād dataḥ na dhāved apsu majjeta tri kālaṁ sthaṇḍile-śayaḥ

केश, रोम, नख और दाढ़ी-मूंछ बढ़ने दे, दांत न मांजे, नियमित समय पर शौच न जाए, तीनों संध्याओं में जल में स्नान करे, और भूमि पर शयन करे।

श्लोक 4 (bhagavata.11.18.4)

ग्रीष्मे तप्येत पञ्चाग्नीन् वर्षास्वासारषाड्जले । आकण्ठमग्नः शिशिर एवंवृत्तस्तपश्चरेत् ॥ 18.4 ॥

grīṣme tapyeta pañcāgnīn varṣāsv āsāra-ṣāḍ jale ākaṇṭha-magnaḥ śiśira evaṁ vṛttas tapaś caret

ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि तप करे, वर्षा ऋतु में मूसलाधार वर्षा में खुले रहे, और शिशिर में गले तक जल में डूबा रहे — इस प्रकार तपस्या का आचरण करे।

श्लोक 5 (bhagavata.11.18.5)

अग्निपक्वं समश्नीयात् कालपक्वमथापि वा । उलूखलाश्मकुट्टो वा दन्तोलूखल एव वा ॥ 18.5 ॥

agni-pakvaṁ samaśnīyāt kāla-pakvam athāpi vā ulūkhalāśma-kuṭṭo vā dantolūkhala eva vā

अग्नि से पकाया हुआ अथवा समय से पका हुआ (फल आदि) खाए; अन्न को उखली-पत्थर से कूट ले अथवा अपने ही दांतों से चबा ले।

श्लोक 6 (bhagavata.11.18.6)

स्वयं सञ्चिनुयात् सर्वमात्मनो वृत्तिकारणम् । देशकालबलाभिज्ञो नाददीतान्यदाहृतम् ॥ 18.6 ॥

svayaṁ sañcinuyāt sarvam ātmano vṛtti-kāraṇam deśa-kāla-balābhijño nādadītānyadāhṛtam

अपने निर्वाह की सभी सामग्री स्वयं एकत्र करे, देश-काल और अपनी शक्ति को समझते हुए; दूसरों द्वारा लाई हुई वस्तु ग्रहण न करे।

श्लोक 7 (bhagavata.11.18.7)

वन्यैश्चरुपुरोडाशैर्निर्वपेत् कालचोदितान् । न तु श्रौतेन पशुना मां यजेत वनाश्रमी ॥ 18.7 ॥

vanyaiś caru-puroḍāśair nirvapet kāla-coditān na tu śrautena paśunā māṁ yajeta vanāśramī

वन्य चरु और पुरोडाश से ऋतु-अनुसार यज्ञ करे; परन्तु वनवासी मुझे कभी वैदिक पशुयज्ञ से न पूजे।

श्लोक 8 (bhagavata.11.18.8)

अग्निहोत्रं च दर्शश्च पौर्णमासश्च पूर्ववत् । चातुर्मास्यानि च मुनेराम्नातानि च नैगमैः ॥ 18.8 ॥

agnihotraṁ ca darśaś ca paurṇamāsaś ca pūrva-vat cāturmāsyāni ca muner āmnātāni ca naigamaiḥ

पूर्ववत् अग्निहोत्र, दर्श और पौर्णमास यज्ञ करे, तथा वेदज्ञों द्वारा वानप्रस्थ के लिए बताए गए चातुर्मास्य व्रत भी करे।

श्लोक 9 (bhagavata.11.18.9)

एवं चीर्णेन तपसा मुनिर्धमनिसन्ततः । मां तपोमयमाराध्य ऋषिलोकादुपैति माम् ॥ 18.9 ॥

evaṁ cīrṇena tapasā munir dhamani-santataḥ māṁ tapo-mayam ārādhya ṛṣi-lokād upaiti mām

इस प्रकार तप का आचरण करते हुए, नाड़ियां मात्र से युक्त कृशकाय मुनि, तपोमय मेरी आराधना करके, ऋषिलोक होते हुए मुझे ही प्राप्त करता है।

श्लोक 10 (bhagavata.11.18.10)

यस्त्वेतत् कृच्छ्रतश्चीर्णं तपो निःश्रेयसं महत् । कामायाल्पीयसे युञ्ज्याद् बालिशः कोऽपरस्ततः ॥ 18.10 ॥

yas tv etat kṛcchrataś cīrṇaṁ tapo niḥśreyasaṁ mahat kāmāyālpīyase yuñjyād bāliśaḥ ko ’paras tataḥ

जो पुरुष कठिनता से किए गए इस महान् और कल्याणकारी तप को थोड़ी सी कामना की सिद्धि के लिए लगाता है, उससे बड़ा मूर्ख और कौन होगा?

श्लोक 11 (bhagavata.11.18.11)

यदासौ नियमेऽकल्पो जरया जातवेपथुः । आत्मन्यग्नीन् समारोप्य मच्चित्तोऽग्निं समाविशेत् ॥ 18.11 ॥

yadāsau niyame ’kalpo jarayā jāta-vepathuḥ ātmany agnīn samāropya mac-citto ’gniṁ samāviśet

जब वृद्धावस्था के कारण वह नियमों के पालन में असमर्थ हो जाए और शरीर कांपने लगे, तो अपनी अग्नियों को अपने भीतर स्थापित कर, मुझमें चित्त लगाकर अग्नि में प्रवेश करे।

श्लोक 12 (bhagavata.11.18.12)

यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु । विरागो जायते सम्यङ् न्यस्ताग्निः प्रव्रजेत्ततः ॥ 18.12 ॥

yadā karma-vipākeṣu lokeṣu nirayātmasu virāgo jāyate samyaṅ nyastāgniḥ pravrajet tataḥ

जब कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले लोकों को, ब्रह्मलोक तक को भी, नरक-तुल्य समझकर उनसे सम्यक् वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तब अग्नि का त्याग कर वह संन्यास ग्रहण करे।

श्लोक 13 (bhagavata.11.18.13)

इष्ट्वा यथोपदेशं मां दत्त्वा सर्वस्वमृत्विजे । अग्नीन् स्वप्राण आवेश्य निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ 18.13 ॥

iṣṭvā yathopadeśaṁ māṁ dattvā sarva-svam ṛtvije agnīn sva-prāṇa āveśya nirapekṣaḥ parivrajet

शास्त्रोक्त विधि से मुझे पूजकर, अपना सर्वस्व ऋत्विक को देकर, अपनी अग्नियों को अपने ही प्राण में लीन कर, वह निरपेक्ष होकर संन्यासी बनकर विचरण करे।

श्लोक 14 (bhagavata.11.18.14)

विप्रस्य वै सन्न्यसतो देवा दारादिरूपिणः । विघ्नान् कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम् ॥ 18.14 ॥

viprasya vai sannyasato devā dārādi-rūpiṇaḥ vighnān kurvanty ayaṁ hy asmān ākramya samiyāt param

संन्यास लेने वाले ब्राह्मण को देवगण पत्नी आदि के रूप धरकर विघ्न उत्पन्न करते हैं, यह सोचकर कि यह हमें लांघकर परमपद को प्राप्त कर लेगा।

श्लोक 15 (bhagavata.11.18.15)

बिभृयाच्चेन्मुनिर्वासः कौपीनाच्छादनं परम् । त्यक्तं न दण्डपात्राभ्यामन्यत् किञ्चिदनापदि ॥ 18.15 ॥

bibhṛyāc cen munir vāsaḥ kaupīnācchādanaṁ param tyaktaṁ na daṇḍa-pātrābhyām anyat kiñcid anāpadi

यदि मुनि केवल कौपीन के अतिरिक्त कोई वस्त्र धारण करना चाहे, तो एक और वस्त्र रख सकता है; परन्तु आपातकाल के अतिरिक्त दण्ड और पात्र के सिवा कुछ और नहीं त्यागे — अर्थात् इनके अतिरिक्त कुछ और ग्रहण भी न करे।

श्लोक 16 (bhagavata.11.18.16)

दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम् । सत्यपूतां वदेद् वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ 18.16 ॥

dṛṣṭi-pūtaṁ nyaset pādaṁ vastra-pūtaṁ pibej jalam satya-pūtāṁ vaded vācaṁ manaḥ-pūtaṁ samācaret

दृष्टि से देखकर शुद्ध किया हुआ पैर रखे, वस्त्र से छानकर जल पिए, सत्य से पवित्र वाणी बोले, और मन से पवित्र किए हुए कर्म का ही आचरण करे।

श्लोक 17 (bhagavata.11.18.17)

मौनानीहानिलायामा दण्डा वाग्देहचेतसाम् । न ह्येते यस्य सन्त्यङ्ग वेणुभिर्न भवेद् यतिः ॥ 18.17 ॥

maunānīhānilāyāmā daṇḍā vāg-deha-cetasām na hy ete yasya santy aṅga veṇubhir na bhaved yatiḥ

मौन, निष्क्रियता और प्राणायाम — ये क्रमशः वाणी, शरीर और मन के दण्ड हैं; हे प्रिय! जिसके पास ये नहीं हैं, वह केवल बांस के दण्ड धारण करने से यति नहीं बनता।

श्लोक 18 (bhagavata.11.18.18)

भिक्षां चतुर्षु वर्णेषु विगर्ह्यान् वर्जयंश्चरेत् । सप्तागारानसङ्क्लृप्तांस्तुष्येल्लब्धेन तावता ॥ 18.18 ॥

bhikṣāṁ caturṣu varṇeṣu vigarhyān varjayaṁś caret saptāgārān asaṅkḷptāṁs tuṣyel labdhena tāvatā

चारों वर्णों में भिक्षा के लिए विचरण करे, निन्दित घरों को छोड़कर; बिना पूर्व निश्चय के सात घरों में जाए और जो कुछ वहां मिले, उसी से संतुष्ट रहे।

श्लोक 19 (bhagavata.11.18.19)

बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः । विभज्य पावितं शेषं भुञ्जीताशेषमाहृतम् ॥ 18.19 ॥

bahir jalāśayaṁ gatvā tatropaspṛśya vāg-yataḥ vibhajya pāvitaṁ śeṣaṁ bhuñjītāśeṣam āhṛtam

बाहर किसी जलाशय पर जाकर, वहां आचमन करके, वाणी को संयत रखते हुए, प्राप्त भिक्षा को शुद्ध करके बांटे, और शेष पूरा भोजन कर ले।

श्लोक 20 (bhagavata.11.18.20)

एकश्चरेन्महीमेतां निःसङ्गः संयतेन्द्रियः । आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान् समदर्शनः ॥ 18.20 ॥

ekaś caren mahīm etāṁ niḥsaṅgaḥ saṁyatendriyaḥ ātma-krīḍa ātma-rata ātma-vān sama-darśanaḥ

संगरहित, इन्द्रिय-संयमी, आत्म-क्रीड़, आत्म-रत, आत्मवान् और समदर्शी होकर इस पृथ्वी पर अकेला विचरण करे।

श्लोक 21 (bhagavata.11.18.21)

विविक्तक्षेमशरणो मद्भावविमलाशयः । आत्मानं चिन्तयेदेकमभेदेन मया मुनिः ॥ 18.21 ॥

vivikta-kṣema-śaraṇo mad-bhāva-vimalāśayaḥ ātmānaṁ cintayed ekam abhedena mayā muniḥ

एकान्त और सुरक्षित स्थान का आश्रय लेकर, मेरे भाव से निर्मल हुए चित्त से, मुनि आत्मा को मुझसे अभिन्न, एक ही तत्त्व मानकर उसका चिन्तन करे।

श्लोक 22 (bhagavata.11.18.22)

अन्वीक्षेतात्मनो बन्धं मोक्षं च ज्ञाननिष्ठया । बन्ध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयमः ॥ 18.22 ॥

anvīkṣetātmano bandhaṁ mokṣaṁ ca jñāna-niṣṭhayā bandha indriya-vikṣepo mokṣa eṣāṁ ca saṁyamaḥ

ज्ञान-निष्ठा से आत्मा के बन्धन और मोक्ष का सम्यक् अनुसंधान करे — इन्द्रियों का विक्षेप बन्धन है, और उनका संयम ही मोक्ष है।

श्लोक 23 (bhagavata.11.18.23)

तस्मान्नियम्य षड्वर्गं मद्भावेन चरेन्मुनिः । विरक्तः क्षुद्रकामेभ्यो लब्ध्वात्मनि सुखं महत् ॥ 18.23 ॥

tasmān niyamya ṣaḍ-vargaṁ mad-bhāvena caren muniḥ viraktaḥ kṣudra-kāmebhyo labdhvātmani sukhaṁ mahat

अतः षड्वर्ग (मन सहित पांच इन्द्रियों) को वश में करके मुनि मेरे भाव से युक्त होकर विचरे, तुच्छ कामनाओं से विरक्त होकर आत्मा में महान् सुख पाकर।

श्लोक 24 (bhagavata.11.18.24)

पुरग्रामव्रजान्सार्थान् भिक्षार्थं प्रविशंश्चरेत् । पुण्यदेशसरिच्छैलवनाश्रमवतीं महीम् ॥ 18.24 ॥

pura-grāma-vrajān sārthān bhikṣārthaṁ praviśaṁś caret puṇya-deśa-saric-chaila- vanāśrama-vatīṁ mahīm

भिक्षा के लिए नगर, ग्राम और गोष्ठों में जाकर विचरण करे, तथा पवित्र प्रदेशों, नदियों, पर्वतों, वनों और आश्रमों से युक्त भूमि पर घूमे।

श्लोक 25 (bhagavata.11.18.25)

वानप्रस्थाश्रमपदेष्वभीक्ष्णं भैक्ष्यमाचरेत् । संसिध्यत्याश्वसम्मोहः शुद्धसत्त्वः शिलान्धसा ॥ 18.25 ॥

vānaprasthāśrama-padeṣv abhīkṣṇaṁ bhaikṣyam ācaret saṁsidhyaty āśv asammohaḥ śuddha-sattvaḥ śilāndhasā

वानप्रस्थ के आश्रम-स्थलों में निरन्तर भिक्षा मांगे; इस भिक्षान्न से जीने वाला शीघ्र ही मोह-रहित शुद्धसत्त्व होकर सिद्धि पाता है।

श्लोक 26 (bhagavata.11.18.26)

नैतद् वस्तुतया पश्येद् दृश्यमानं विनश्यति । असक्तचित्तो विरमेदिहामुत्र चिकीर्षितात् ॥ 18.26 ॥

naitad vastutayā paśyed dṛśyamānaṁ vinaśyati asakta-citto viramed ihāmutra-cikīrṣitāt

जो कुछ दिखाई देता है वह नष्ट होने वाला है, उसे वास्तविक वस्तु न समझे; आसक्ति-रहित चित्त से इस लोक और परलोक में जो कुछ करने की इच्छा हो, उससे विरत हो जाए।

श्लोक 27 (bhagavata.11.18.27)

यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसंहतम् । सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत् ॥ 18.27 ॥

yad etad ātmani jagan mano-vāk-prāṇa-saṁhatam sarvaṁ māyeti tarkeṇa sva-sthas tyaktvā na tat smaret

मन, वाणी और प्राण से बने इस जगत् को, जो आत्मा में प्रतीत होता है, तर्क द्वारा सम्पूर्णतः माया जानकर, स्वस्थ रहकर उसे त्याग दे और फिर उसका स्मरण न करे।

श्लोक 28 (bhagavata.11.18.28)

ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः । सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः ॥ 18.28 ॥

jñāna-niṣṭho virakto vā mad-bhakto vānapekṣakaḥ sa-liṅgān āśramāṁs tyaktvā cared avidhi-gocaraḥ

ज्ञाननिष्ठ अथवा विरक्त पुरुष, या मेरा भक्त जो मुक्ति की भी अपेक्षा नहीं रखता, बाह्य चिह्न और आश्रमों को त्यागकर विधि-निरपेक्ष होकर विचरे।

श्लोक 29 (bhagavata.11.18.29)

बुधो बालकवत् क्रीडेत् कुशलो जडवच्चरेत् । वदेदुन्मत्तवद् विद्वान् गोचर्यां नैगमश्चरेत् ॥ 18.29 ॥

budho bālaka-vat krīḍet kuśalo jaḍa-vac caret vaded unmatta-vad vidvān go-caryāṁ naigamaś caret

बुद्धिमान होकर बालक के समान क्रीड़ा करे, कुशल होकर जड़ के समान आचरण करे, विद्वान होकर उन्मत्त के समान बोले, और वेदज्ञ होकर स्वच्छन्द विचरण करे।

श्लोक 30 (bhagavata.11.18.30)

वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकः । शुष्कवादविवादे न कञ्चित् पक्षं समाश्रयेत् ॥ 18.30 ॥

veda-vāda-rato na syān na pāṣaṇḍī na haitukaḥ śuṣka-vāda-vivāde na kañcit pakṣaṁ samāśrayet

वेदवाद (कर्मकाण्ड) में रत न हो, न पाखण्डी बने, न कुतर्की बने; निरर्थक वाद-विवाद में किसी पक्ष का आश्रय न ले।

श्लोक 31 (bhagavata.11.18.31)

नोद्विजेत जनाद् धीरो जनं चोद्वेजयेन्न तु । अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन । देहमुद्दिश्य पशुवद् वैरं कुर्यान्न केनचित् ॥ 18.31 ॥

nodvijeta janād dhīro janaṁ codvejayen na tu ati-vādāṁs titikṣeta nāvamanyeta kañcana deham uddiśya paśu-vad vairaṁ kuryān na kenacit

धीर पुरुष न किसी से भयभीत हो, न किसी को भयभीत करे; अपमानजनक वचन सहन करे, किसी का तिरस्कार न करे, और देह के निमित्त पशु के समान किसी से वैर न करे।

श्लोक 32 (bhagavata.11.18.32)

एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः । यथेन्दुरुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च ॥ 18.32 ॥

eka eva paro hy ātmā bhūteṣv ātmany avasthitaḥ yathendur uda-pātreṣu bhūtāny ekātmakāni ca

एक ही परम आत्मा समस्त प्राणियों में और अपनी आत्मा में स्थित है, जैसे एक ही चन्द्रमा जल से भरे अनेक पात्रों में प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही सब प्राणी एक ही आत्मा से युक्त हैं।

श्लोक 33 (bhagavata.11.18.33)

अलब्ध्वा न विषीदेत काले कालेऽशनं क्वचित् । लब्ध्वा न हृष्येद् धृतिमानुभयं दैवतन्त्रितम् ॥ 18.33 ॥

alabdhvā na viṣīdeta kāle kāle ’śanaṁ kvacit labdhvā na hṛṣyed dhṛtimān ubhayaṁ daiva-tantritam

समय पर भोजन न मिलने से खिन्न न हो, और मिलने पर हर्षित न हो; धैर्यवान पुरुष दोनों ही स्थितियों को दैव के अधीन समझे।

श्लोक 34 (bhagavata.11.18.34)

आहारार्थं समीहेत युक्तं तत् प्राणधारणम् । तत्त्वं विमृश्यते तेन तद् विज्ञाय विमुच्यते ॥ 18.34 ॥

āhārārthaṁ samīheta yuktaṁ tat-prāṇa-dhāraṇam tattvaṁ vimṛśyate tena tad vijñāya vimucyate

आहार के लिए उतना ही प्रयत्न करे जितना प्राण-धारण के लिए युक्त हो; इस प्रकार तत्त्व का चिन्तन होता है, और उसे जानकर मुक्ति मिलती है।

श्लोक 35 (bhagavata.11.18.35)

यदृच्छयोपपन्नान्नमद्याच्छ्रेष्ठमुतापरम् । तथा वासस्तथा शय्यां प्राप्तं प्राप्तं भजेन्मुनिः ॥ 18.35 ॥

yadṛcchayopapannānnam adyāc chreṣṭham utāparam tathā vāsas tathā śayyāṁ prāptaṁ prāptaṁ bhajen muniḥ

अनायास प्राप्त अन्न को खाए, चाहे वह उत्तम हो या साधारण; उसी प्रकार जैसा भी वस्त्र और शय्या मिले, मुनि उसी को स्वीकार करे।

श्लोक 36 (bhagavata.11.18.36)

शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत् । अन्यांश्च नियमाञ्ज्ञानी यथाहं लीलयेश्वरः ॥ 18.36 ॥

śaucam ācamanaṁ snānaṁ na tu codanayā caret anyāṁś ca niyamāñ jñānī yathāhaṁ līlayeśvaraḥ

शौच, आचमन और स्नान — इन्हें विधि के दबाव से न करे; ज्ञानी पुरुष अन्य नियमों को भी उसी प्रकार करे जैसे मैं ईश्वर होते हुए भी लीला से करता हूं।

श्लोक 37 (bhagavata.11.18.37)

न हि तस्य विकल्पाख्या या च मद्वीक्षया हता । आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया ॥ 18.37 ॥

na hi tasya vikalpākhyā yā ca mad-vīkṣayā hatā ā-dehāntāt kvacit khyātis tataḥ sampadyate mayā

मेरे दर्शन से नष्ट हुई भेद-बुद्धि उसमें फिर नहीं रहती; यदि शरीर के अन्त तक कभी वह पुनः दिखाई भी दे, तो भी उसके बाद वह मुझे ही प्राप्त होता है।

श्लोक 38 (bhagavata.11.18.38)

दुःखोदर्केषु कामेषु जातनिर्वेद आत्मवान् । अजिज्ञासितमद्धर्मो मुनिं गुरुमुपव्रजेत् ॥ 18.38 ॥

duḥkhodarkeṣu kāmeṣu jāta-nirveda ātmavān ajijñāsita-mad-dharmo muniṁ gurum upavrajet

दुःखान्त होने वाले भोगों से जिसमें वैराग्य उत्पन्न हो गया है, जो आत्मवान् है, किन्तु जिसने मेरी प्राप्ति के धर्म को अभी विशेष रूप से नहीं जाना, उसे किसी मुनि गुरु के पास जाना चाहिए।

श्लोक 39 (bhagavata.11.18.39)

तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः । यावद् ब्रह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः ॥ 18.39 ॥

tāvat paricared bhaktaḥ śraddhāvān anasūyakaḥ yāvad brahma vijānīyān mām eva gurum ādṛtaḥ

भक्त श्रद्धावान और ईर्ष्यारहित होकर गुरु की, जो साक्षात् मेरा ही स्वरूप है, तब तक सेवा करता रहे जब तक वह ब्रह्म को न जान ले।

श्लोक 40 (bhagavata.11.18.40)

यस्त्वसंयतषड्वर्गः प्रचण्डेन्द्रियसारथिः । ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीवति ॥ 18.40 ॥

yas tv asaṁyata-ṣaḍ-vargaḥ pracaṇḍendriya-sārathiḥ jñāna-vairāgya-rahitas tridaṇḍam upajīvati

जिसने अपने षड्वर्ग को वश में नहीं किया, जिसका सारथी उग्र इन्द्रियां हैं, जो ज्ञान और वैराग्य से रहित है, और केवल जीविका के लिए त्रिदण्ड धारण करता है —

श्लोक 41 (bhagavata.11.18.41)

सुरानात्मानमात्मस्थं निह्नुते मां च धर्महा । अविपक्वकषायोऽस्मादमुष्माच्च विहीयते ॥ 18.41 ॥

surān ātmānam ātma-sthaṁ nihnute māṁ ca dharma-hā avipakva-kaṣāyo ’smād amuṣmāc ca vihīyate

जो धर्मघाती देवताओं को, अपने आत्मस्थ स्वरूप को और मुझे भी छिपाता (नकारता) है, वह अपरिपक्व कषायवाला इस लोक और परलोक दोनों से भ्रष्ट हो जाता है।

श्लोक 42 (bhagavata.11.18.42)

भिक्षोर्धर्मः शमोऽहिंसा तप ईक्षा वनौकसः । गृहिणो भूतरक्षेज्या द्विजस्याचार्यसेवनम् ॥ 18.42 ॥

bhikṣor dharmaḥ śamo ’hiṁsā tapa īkṣā vanaukasaḥ gṛhiṇo bhūta-rakṣejyā dvijasyācārya-sevanam

भिक्षु का धर्म शम और अहिंसा है, वनवासी का धर्म तप और (आत्मा-अनात्मा का) विवेचन है, गृहस्थ का धर्म प्राणियों की रक्षा और यज्ञ है, तथा द्विज (ब्रह्मचारी) का धर्म आचार्य की सेवा है।

श्लोक 43 (bhagavata.11.18.43)

ब्रह्मचर्यं तपः शौचं सन्तोषो भूतसौहृदम् । गृहस्थस्याप्यृतौ गन्तुः सर्वेषां मदुपासनम् ॥ 18.43 ॥

brahmacaryaṁ tapaḥ śaucaṁ santoṣo bhūta-sauhṛdam gṛhasthasyāpy ṛtau gantuḥ sarveṣāṁ mad-upāsanam

ब्रह्मचर्य, तप, शौच, संतोष और प्राणियों के प्रति सौहार्द — तथा गृहस्थ के लिए भी, ऋतुकाल के अतिरिक्त, यह सब लागू है; और सभी के लिए मेरी उपासना अनिवार्य है।

श्लोक 44 (bhagavata.11.18.44)

इति मां यः स्वधर्मेण भजेन् नित्यमनन्यभाक् । सर्वभूतेषु मद्भावो मद्भक्तिं विन्दते दृढाम् ॥ 18.44 ॥

iti māṁ yaḥ sva-dharmeṇa bhajen nityam ananya-bhāk sarva-bhūteṣu mad-bhāvo mad-bhaktiṁ vindate dṛḍhām

इस प्रकार जो अपने स्वधर्म से अनन्यभाव से नित्य मेरा भजन करता है, और सब प्राणियों में मेरी भावना रखता है, वह मेरी दृढ़ भक्ति को प्राप्त करता है।

श्लोक 45 (bhagavata.11.18.45)

भक्त्योद्धवानपायिन्या सर्वलोकमहेश्वरम् । सर्वोत्पत्त्यप्ययं ब्रह्म कारणं मोपयाति सः ॥ 18.45 ॥

bhaktyoddhavānapāyinyā sarva-loka-maheśvaram sarvotpatty-apyayaṁ brahma kāraṇaṁ mopayāti saḥ

हे उद्धव! अटल भक्ति के द्वारा सब लोकों के महेश्वर, सबकी उत्पत्ति और लय के कारण, परब्रह्म — मुझे ही वह प्राप्त करता है।

श्लोक 46 (bhagavata.11.18.46)

इति स्वधर्मनिर्णिक्तसत्त्वो निर्ज्ञातमद्गतिः । ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो नचिरात् समुपैति माम् ॥ 18.46 ॥

iti sva-dharma-nirṇikta- sattvo nirjñāta-mad-gatiḥ jñāna-vijñāna-sampanno na cirāt samupaiti mām

इस प्रकार अपने स्वधर्म से जिसका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, जिसने मेरी गति को भली-भांति जान लिया है, ज्ञान और विज्ञान से सम्पन्न वह पुरुष शीघ्र ही मुझे प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 47 (bhagavata.11.18.47)

वर्णाश्रमवतां धर्म एष आचारलक्षणः । स एव मद्भक्तियुतो निःश्रेयसकरः परः ॥ 18.47 ॥

varṇāśramavatāṁ dharma eṣa ācāra-lakṣaṇaḥ sa eva mad-bhakti-yuto niḥśreyasa-karaḥ paraḥ

वर्णाश्रम के अनुयायियों का यह आचार-लक्षण धर्म है; वही धर्म जब मेरी भक्ति से युक्त हो जाता है, तब वह परम कल्याणकारी बनता है।

श्लोक 48 (bhagavata.11.18.48)

एतत्तेऽभिहितं साधो भवान् पृच्छति यच्च माम् । यथा स्वधर्मसंयुक्तो भक्तो मां समियात् परम् ॥ 18.48 ॥

etat te ’bhihitaṁ sādho bhavān pṛcchati yac ca mām yathā sva-dharma-saṁyukto bhakto māṁ samiyāt param

हे साधु! तुमने जो मुझसे पूछा था, वह मैंने तुम्हें बता दिया — जिससे स्वधर्म से युक्त भक्त मुझ परमेश्वर को प्राप्त कर सके।

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