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एकादश स्कन्ध · अध्याय 23

अवन्ती-ब्राह्मण का गीत

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (bhagavata.11.23.1)

श्रीबादरायणिरुवाच स एवमाशंसित उद्धवेन भागवतमुख्येन दाशार्हमुख्यः । सभाजयन् भृत्यवचो मुकुन्द- स्तमाबभाषे श्रवणीयवीर्यः ॥ 23.1 ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca sa evam āśaṁsita uddhavena bhāgavata-mukhyena dāśārha-mukhyaḥ sabhājayan bhṛtya-vaco mukundas tam ābabhāṣe śravaṇīya-vīryaḥ

श्री बादरायणि (शुकदेव) ने कहा — भक्तों में श्रेष्ठ उद्धव द्वारा इस प्रकार निवेदन किए जाने पर, दाशार्हों में श्रेष्ठ, श्रवणीय-पराक्रम मुकुन्द ने अपने सेवक के वचन का सम्मान करते हुए उन्हें उत्तर दिया।

श्लोक 2 (bhagavata.11.23.2)

श्रीभगवानुवाच बार्हस्पत्य स नास्त्यत्र साधुर्वै दुर्जनेरितैः । दुरक्तैर्भिन्नमात्मानं यः समाधातुमीश्वरः ॥ 23.2 ॥

śrī-bhagavān uvāca bārhaspatya sa nāsty atra sādhur vai durjaneritaiḥ duraktair bhinnam ātmānaṁ yaḥ samādhātum īśvaraḥ

श्री भगवान ने कहा — हे बार्हस्पत्य! इस जगत् में ऐसा कोई साधु पुरुष प्रायः नहीं है, जो दुर्जनों के कठोर वचनों से खण्डित हुए अपने मन को पुनः समाहित कर सके।

श्लोक 3 (bhagavata.11.23.3)

न तथा तप्यते विद्धः पुमान् बाणैस्तु मर्मगैः । यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्यसतां परुषेषवः ॥ 23.3 ॥

na tathā tapyate viddhaḥ pumān bāṇais tu marma-gaiḥ yathā tudanti marma-sthā hy asatāṁ paruṣeṣavaḥ

मर्मस्थान में लगे हुए बाणों से बिंधा हुआ पुरुष उतना संतप्त नहीं होता, जितना दुर्जनों के मर्मभेदी कठोर वचन उसे पीड़ा देते हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.11.23.4)

कथयन्ति महत्पुण्यमितिहासमिहोद्धव । तमहं वर्णयिष्यामि निबोध सुसमाहितः ॥ 23.4 ॥

kathayanti mahat puṇyam itihāsam ihoddhava tam ahaṁ varṇayiṣyāmi nibodha su-samāhitaḥ

हे उद्धव! इस विषय में एक महान् पुण्यकारी इतिहास कहा जाता है, जिसे मैं तुम्हें सुनाऊंगा; एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 5 (bhagavata.11.23.5)

केनचिद् भिक्षुणा गीतं परिभूतेन दुर्जनैः । स्मरता धृतियुक्तेन विपाकं निजकर्मणाम् ॥ 23.5 ॥

kenacid bhikṣuṇā gītaṁ paribhūtena durjanaiḥ smaratā dhṛti-yuktena vipākaṁ nija-karmaṇām

दुर्जनों द्वारा अपमानित किसी भिक्षु ने, अपने ही कर्मों के फल का स्मरण करते हुए, धैर्यपूर्वक यह गीत गाया था।

श्लोक 6 (bhagavata.11.23.6)

अवन्तिषु द्विजः कश्चिदासीदाढ्यतमः श्रिया । वार्तावृत्तिः कदर्यस्तु कामी लुब्धोऽतिकोपनः ॥ 23.6 ॥

avantiṣu dvijaḥ kaścid āsīd āḍhyatamaḥ śriyā vārtā-vṛttiḥ kadaryas tu kāmī lubdho ’ti-kopanaḥ

अवन्ति देश में कोई ब्राह्मण था, जो धन-सम्पत्ति से अत्यन्त सम्पन्न था, वृत्ति से व्यापारी था, किन्तु स्वभाव से कंजूस, कामी, लोभी और अत्यन्त क्रोधी था।

श्लोक 7 (bhagavata.11.23.7)

ज्ञातयोऽतिथयस्तस्य वाङ्मात्रेणापि नार्चिताः । शून्यावसथ आत्मापि काले कामैरनर्चितः ॥ 23.7 ॥

jñātayo ’tithayas tasya vāṅ-mātreṇāpi nārcitāḥ śūnyāvasatha ātmāpi kāle kāmair anarcitaḥ

उसके यहां आए हुए बन्धु-बांधव और अतिथि मात्र वचन से भी सम्मानित नहीं किए जाते थे; उसका घर सूना पड़ा रहता था, और उपयुक्त समय पर वह अपनी ही इच्छाओं को भी संतुष्ट नहीं करता था।

श्लोक 8 (bhagavata.11.23.8)

दुःशीलस्य कदर्यस्य द्रुह्यन्ते पुत्रबान्धवाः । दारा दुहितरो भृत्या विषण्णा नाचरन् प्रियम् ॥ 23.8 ॥

duḥśīlasya kadaryasya druhyante putra-bāndhavāḥ dārā duhitaro bhṛtyā viṣaṇṇā nācaran priyam

उस दुःशील और कंजूस पुरुष से उसके पुत्र और बन्धु द्रोह करने लगे; उसकी पत्नी, पुत्रियां और सेवक, उदास होकर, कभी उसके प्रति प्रेम नहीं दिखाते थे।

श्लोक 9 (bhagavata.11.23.9)

तस्यैवं यक्षवित्तस्य च्युतस्योभयलोकतः । धर्मकामविहीनस्य चुक्रुधुः पञ्चभागिनः ॥ 23.9 ॥

tasyaivaṁ yakṣa-vittasya cyutasyobhaya-lokataḥ dharma-kāma-vihīnasya cukrudhuḥ pañca-bhāginaḥ

इस प्रकार यक्ष के समान धन की रखवाली करने वाला, दोनों लोकों से भ्रष्ट, धर्म और काम दोनों से रहित वह ब्राह्मण — उसके पंचयज्ञ के अधिकारी देवता आदि उस पर क्रुद्ध हो गए।

श्लोक 10 (bhagavata.11.23.10)

तदवध्यानविस्रस्तपुण्यस्कन्धस्य भूरिद । अर्थोऽप्यगच्छन्निधनं बह्वायासपरिश्रमः ॥ 23.10 ॥

tad-avadhyāna-visrasta- puṇya-skandhasya bhūri-da artho ’py agacchan nidhanaṁ bahv-āyāsa-pariśramaḥ

हे उदार उद्धव! उनकी अवहेलना से उसका पुण्य-संचय ढह गया, और अत्यधिक परिश्रम और उद्यम से अर्जित उसका धन भी नष्ट हो गया।

श्लोक 11 (bhagavata.11.23.11)

ज्ञातयो जगृहुः किञ्चित् किञ्चिद् दस्यव उद्धव । दैवतः कालतः किञ्चिद् ब्रह्मबन्धोर्नृपार्थिवात् ॥ 23.11 ॥

jñātyo jagṛhuḥ kiñcit kiñcid dasyava uddhava daivataḥ kālataḥ kiñcid brahma-bandhor nṛ-pārthivāt

हे उद्धव! उसका कुछ धन बन्धुओं ने ले लिया, कुछ चोरों ने, कुछ दैव और काल के प्रभाव से नष्ट हुआ, तथा कुछ राजपुरुषों ने उस झूठे ब्राह्मण से छीन लिया।

श्लोक 12 (bhagavata.11.23.12)

स एवं द्रविणे नष्टे धर्मकामविवर्जितः । उपेक्षितश्च स्वजनैश्चिन्तामाप दुरत्ययाम् ॥ 23.12 ॥

sa evaṁ draviṇe naṣṭe dharma-kāma-vivarjitaḥ upekṣitaś ca sva-janaiś cintām āpa duratyayām

इस प्रकार धन के नष्ट हो जाने पर, धर्म और काम दोनों से रहित तथा अपने ही स्वजनों द्वारा उपेक्षित होकर, वह असहनीय चिन्ता में डूब गया।

श्लोक 13 (bhagavata.11.23.13)

तस्यैवं ध्यायतो दीर्घं नष्टरायस्तपस्विनः । खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेदः सुमहानभूत् ॥ 23.13 ॥

tasyaivaṁ dhyāyato dīrghaṁ naṣṭa-rāyas tapasvinaḥ khidyato bāṣpa-kaṇṭhasya nirvedaḥ su-mahān abhūt

अपने खोए हुए धन का दीर्घ काल तक चिन्तन करते हुए, दुःखी और अश्रुओं से गला रुंधे हुए उस तपस्वी को अत्यन्त प्रबल वैराग्य उत्पन्न हुआ।

श्लोक 14 (bhagavata.11.23.14)

स चाहेदमहो कष्टं वृथात्मा मेऽनुतापितः । न धर्माय न कामाय यस्यार्थायास ईदृशः ॥ 23.14 ॥

sa cāhedam aho kaṣṭaṁ vṛthātmā me ’nutāpitaḥ na dharmāya na kāmāya yasyārthāyāsa īdṛśaḥ

वह बोला — अहो! कितना कष्टपूर्ण है यह — मैंने अपनी आत्मा को व्यर्थ ही संताप दिया, जबकि जिस धन के लिए यह इतना श्रम किया, वह न धर्म के लिए था, न काम के लिए।

श्लोक 15 (bhagavata.11.23.15)

प्रायेणार्थाः कदर्याणां न सुखाय कदाचन । इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च ॥ 23.15 ॥

prāyeṇārthāḥ kadaryāṇāṁ na sukhāya kadācana iha cātmopatāpāya mṛtasya narakāya ca

कंजूसों का धन प्रायः कभी सुख के लिए नहीं होता; यह इस लोक में तो आत्म-संताप का कारण बनता है, और मरने पर नरक का कारण बनता है।

श्लोक 16 (bhagavata.11.23.16)

यशो यशस्विनां शुद्धं श्लाघ्या ये गुणिनां गुणाः । लोभः स्वल्पोऽपि तान् हन्ति श्वित्रो रूपमिवेप्सितम् ॥ 23.16 ॥

yaśo yaśasvināṁ śuddhaṁ ślāghyā ye guṇināṁ guṇāḥ lobhaḥ sv-alpo ’pi tān hanti śvitro rūpam ivepsitam

यशस्वियों के शुद्ध यश को, गुणवानों के प्रशंसनीय गुणों को, थोड़ा-सा लोभ भी वैसे ही नष्ट कर देता है, जैसे कोढ़ इच्छित सौन्दर्य को नष्ट कर देता है।

श्लोक 17 (bhagavata.11.23.17)

अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये । नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ता भ्रमो नृणाम् ॥ 23.17 ॥

arthasya sādhane siddhe utkarṣe rakṣaṇe vyaye nāśopabhoga āyāsas trāsaś cintā bhramo nṛṇām

धन को साधने में, प्राप्त करने में, बढ़ाने में, रक्षा करने में, व्यय करने में — तथा उसके नाश और भोग में भी — मनुष्यों को केवल परिश्रम, त्रास, चिन्ता और भ्रम ही प्राप्त होता है।

श्लोक 18 (bhagavata.11.23.18)

स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः । भेदो वैरमविश्वासः संस्पर्धा व्यसनानि च ॥ 23.18 ॥

steyaṁ hiṁsānṛtaṁ dambhaḥ kāmaḥ krodhaḥ smayo madaḥ bhedo vairam aviśvāsaḥ saṁspardhā vyasanāni ca

चोरी, हिंसा, झूठ, दम्भ, काम, क्रोध, अभिमान, मद, फूट, वैर, अविश्वास, स्पर्धा —

श्लोक 19 (bhagavata.11.23.19)

एते पञ्चदशानर्था ह्यर्थमूला मता नृणाम् । तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत् ॥ 23.19 ॥

ete pañcadaśānarthā hy artha-mūlā matā nṛṇām tasmād anartham arthākhyaṁ śreyo-’rthī dūratas tyajet

— तथा (स्त्री, द्यूत, मद्य जैसे) व्यसन — ये पन्द्रह अनर्थ मनुष्यों के लिए धन-मूलक ही माने गए हैं; अतः कल्याण के इच्छुक पुरुष को धन नामक इस अनर्थ को दूर से ही त्याग देना चाहिए।

श्लोक 20 (bhagavata.11.23.20)

भिद्यन्ते भ्रातरो दाराः पितरः सुहृदस्तथा । एकास्निग्धाः काकिणिना सद्यः सर्वेऽरयः कृताः ॥ 23.20 ॥

bhidyante bhrātaro dārāḥ pitaraḥ suhṛdas tathā ekāsnigdhāḥ kākiṇinā sadyaḥ sarve ’rayaḥ kṛtāḥ

एक अकनी (छोटे सिक्के) के लिए भाई, पत्नी, माता-पिता और मित्र, यद्यपि सब स्नेहयुक्त हों, आपस में बिखर जाते हैं और तुरन्त शत्रु बन जाते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.11.23.21)

अर्थेनाल्पीयसा ह्येते संरब्धा दीप्तमन्यवः । त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहृदम् ॥ 23.21 ॥

arthenālpīyasā hy ete saṁrabdhā dīpta-manyavaḥ tyajanty āśu spṛdho ghnanti sahasotsṛjya sauhṛdam

अत्यल्प धन के लिए भी ये लोग उत्तेजित और क्रोध से जलते हुए, प्रतिस्पर्धी बनकर शीघ्र ही मैत्री त्याग देते हैं, और सहसा सौहार्द छोड़कर एक-दूसरे को नष्ट करने लगते हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.11.23.22)

लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद्द्विजाग्र्यताम् । तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम् ॥ 23.22 ॥

labdhvā janmāmara-prārthyaṁ mānuṣyaṁ tad dvijāgryatām tad anādṛtya ye svārthaṁ ghnanti yānty aśubhāṁ gatim

देवताओं द्वारा भी प्रार्थनीय मनुष्य-जन्म पाकर, और उसमें भी श्रेष्ठ द्विजत्व पाकर, जो लोग उसकी उपेक्षा करते हुए अपने ही हित का नाश करते हैं, वे अशुभ गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.11.23.23)

स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं प्राप्य लोकमिमं पुमान् । द्रविणे कोऽनुषज्जेत मर्त्योऽनर्थस्य धामनि ॥ 23.23 ॥

svargāpavargayor dvāraṁ prāpya lokam imaṁ pumān draviṇe ko ’nuṣajjeta martyo ’narthasya dhāmani

स्वर्ग और मोक्ष दोनों का द्वार स्वरूप यह मनुष्य-लोक पाकर, कौन-सा मरणधर्मा पुरुष अनर्थ के आगार, धन में आसक्त होगा?

श्लोक 24 (bhagavata.11.23.24)

देवर्षिपितृभूतानि ज्ञातीन् बन्धूंश्च भागिनः । असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्तः पतत्यधः ॥ 23.24 ॥

devarṣi-pitṛ-bhūtāni jñātīn bandhūṁś ca bhāginaḥ asaṁvibhajya cātmānaṁ yakṣa-vittaḥ pataty adhaḥ

देवता, ऋषि, पितर, भूत, बन्धु-बांधव और स्वयं अपने आत्मा को — इन भागीदारों को बांटे बिना जो यक्ष के समान धन का संचय करता है, वह अधोगति को प्राप्त होता है।

श्लोक 25 (bhagavata.11.23.25)

व्यर्थयार्थेहया वित्तं प्रमत्तस्य वयो बलम् । कुशला येन सिध्यन्ति जरठः किं नु साधये ॥ 23.25 ॥

vyarthayārthehayā vittaṁ pramattasya vayo balam kuśalā yena sidhyanti jaraṭhaḥ kiṁ nu sādhaye

प्रमादवश धन कमाने के व्यर्थ प्रयास में मैंने अपना धन, अपनी अवस्था और अपना बल गंवा दिया, जिनसे कुशल पुरुष सिद्धि पाते हैं — अब वृद्ध होकर मैं क्या साध सकूंगा?

श्लोक 26 (bhagavata.11.23.26)

कस्मात् सङ्क्लिश्यते विद्वान् व्यर्थयार्थेहयासकृत् । कस्यचिन्मायया नूनं लोकोऽयं सुविमोहितः ॥ 23.26 ॥

kasmāt saṅkliśyate vidvān vyarthayārthehayāsakṛt kasyacin māyayā nūnaṁ loko ’yaṁ su-vimohitaḥ

विद्वान पुरुष धन के व्यर्थ प्रयास में बार-बार क्यों क्लेश उठाता है? निश्चय ही यह सारा संसार किसी की माया से भली-भांति मोहित है।

श्लोक 27 (bhagavata.11.23.27)

किं धनैर्धनदैर्वा किं कामैर्वा कामदैरुत । मृत्युना ग्रस्यमानस्य कर्मभिर्वोत जन्मदैः ॥ 23.27 ॥

kiṁ dhanair dhana-dair vā kiṁ kāmair vā kāma-dair uta mṛtyunā grasyamānasya karmabhir vota janma-daiḥ

जिसे मृत्यु ग्रस रही है, उसके लिए धन और धन देने वालों से, कामनाओं और उन्हें पूर्ण करने वालों से, अथवा पुनर्जन्म देने वाले कर्मों से भी क्या प्रयोजन?

श्लोक 28 (bhagavata.11.23.28)

नूनं मे भगवांस्तुष्टः सर्वदेवमयो हरिः । येन नीतो दशामेतां निर्वेदश्चात्मनः प्लवः ॥ 23.28 ॥

nūnaṁ me bhagavāṁs tuṣṭaḥ sarva-deva-mayo hariḥ yena nīto daśām etāṁ nirvedaś cātmanaḥ plavaḥ

निश्चय ही सर्वदेवमय भगवान हरि मुझ पर प्रसन्न हैं, जिन्होंने ही मुझे इस अवस्था तक पहुंचाया, तथा मुझे वैराग्य, जो आत्मा के लिए नौका के समान है, प्रदान किया।

श्लोक 29 (bhagavata.11.23.29)

सोऽहं कालावशेषेण शोषयिष्येऽङ्गमात्मनः । अप्रमत्तोऽखिलस्वार्थे यदि स्यात् सिद्ध आत्मनि ॥ 23.29 ॥

so ’haṁ kālāvaśeṣeṇa śoṣayiṣye ’ṅgam ātmanaḥ apramatto ’khila-svārthe yadi syāt siddha ātmani

अब मैं शेष बचे हुए समय में, अपने समस्त स्वार्थ (परम हित) के विषय में असावधान न होकर, अपने शरीर को कृश करूंगा, यदि इससे आत्मा में सिद्धि प्राप्त हो सके।

श्लोक 30 (bhagavata.11.23.30)

तत्र मामनुमोदेरन् देवात्रिभुवनेश्वराः । मुहूर्तेन ब्रह्मलोकं खट्वाङ्गः समसाधयत् ॥ 23.30 ॥

tatra mām anumoderan devās tri-bhuvaneśvarāḥ muhūrtena brahma-lokaṁ khaṭvāṅgaḥ samasādhayat

इस विषय में तीनों लोकों के स्वामी देवगण मुझ पर अनुग्रह करें; राजा खट्वांग ने तो एक ही मुहूर्त में ब्रह्मलोक को सिद्ध कर लिया था।

श्लोक 31 (bhagavata.11.23.31)

श्रीभगवानुवाच इत्यभिप्रेत्य मनसा ह्यावन्त्यो द्विजसत्तमः । उन्मुच्य हृदयग्रन्थीन् शान्तो भिक्षुरभून्मुनिः ॥ 23.31 ॥

śrī-bhagavān uvāca ity abhipretya manasā hy āvantyo dvija-sattamaḥ unmucya hṛdaya-granthīn śānto bhikṣur abhūn muniḥ

श्री भगवान ने कहा — इस प्रकार मन में निश्चय करके, अवन्ति देश के उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने अपने हृदय की ग्रन्थियां खोल दीं, और शान्त मुनि-भिक्षु बन गया।

श्लोक 32 (bhagavata.11.23.32)

स चचार महीमेतां संयतात्मेन्द्रियानिलः । भिक्षार्थं नगरग्रामानसङ्गोऽलक्षितोऽविशत् ॥ 23.32 ॥

sa cacāra mahīm etāṁ saṁyatātmendriyānilaḥ bhikṣārthaṁ nagara-grāmān asaṅgo ’lakṣito ’viśat

अपनी बुद्धि, इन्द्रियों और प्राण को संयत रखते हुए, वह इस पृथ्वी पर विचरण करने लगा; भिक्षा के लिए नगरों और गांवों में, बिना पहचाना जाकर, आसक्तिरहित होकर प्रवेश करता।

श्लोक 33 (bhagavata.11.23.33)

तं वै प्रवयसं भिक्षुमवधूतमसज्जनाः । दृष्ट्वा पर्यभवन् भद्र बह्वीभिः परिभूतिभिः ॥ 23.33 ॥

taṁ vai pravayasaṁ bhikṣum avadhūtam asaj-janāḥ dṛṣṭvā paryabhavan bhadra bahvībhiḥ paribhūtibhiḥ

हे भद्र! उस वृद्ध, विरक्त भिक्षु को देखकर दुष्ट जन उसका अनेक प्रकार के अपमानों से तिरस्कार करते थे।

श्लोक 34 (bhagavata.11.23.34)

केचित्त्रिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम् । पीठं चैकेऽक्षसूत्रं च कन्थां चीराणि केचन । प्रदाय च पुनस्तानि दर्शितान्याददुर्मुनेः ॥ 23.34 ॥

kecit tri-veṇuṁ jagṛhur eke pātraṁ kamaṇḍalum pīṭhaṁ caike ’kṣa-sūtraṁ ca kanthāṁ cīrāṇi kecana pradāya ca punas tāni darśitāny ādadur muneḥ

कोई उसका त्रिदण्ड छीन लेता, कोई उसका भिक्षापात्र-कमण्डलु, कोई आसन, कोई जपमाला, और कोई उसकी गुदड़ी और चीथड़े; फिर उसे दिखाकर, पुनः देने का बहाना कर, मुनि से वे वस्तुएं छीन लेते।

श्लोक 35 (bhagavata.11.23.35)

अन्नं च भैक्ष्यसम्पन्नं भुञ्जानस्य सरित्तटे । मूत्रयन्ति च पापिष्ठाः ष्ठीवन्त्यस्य च मूर्धनि ॥ 23.35 ॥

annaṁ ca bhaikṣya-sampannaṁ bhuñjānasya sarit-taṭe mūtrayanti ca pāpiṣṭhāḥ ṣṭhīvanty asya ca mūrdhani

नदी-तट पर बैठकर भिक्षा से प्राप्त अन्न खाते समय भी पापी लोग उस पर मूत्र त्याग देते और उसके सिर पर थूकते थे।

श्लोक 36 (bhagavata.11.23.36)

यतवाचं वाचयन्ति ताडयन्ति न वक्ति चेत् । तर्जयन्त्यपरे वाग्भिः स्तेनोऽयमिति वादिनः । बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद् बध्यतां बध्यतामिति ॥ 23.36 ॥

yata-vācaṁ vācayanti tāḍayanti na vakti cet tarjayanty apare vāgbhiḥ steno ’yam iti vādinaḥ badhnanti rajjvā taṁ kecid badhyatāṁ badhyatām iti

मौन-व्रत धारण किए हुए उसे बोलने के लिए विवश करते; न बोलने पर पीटते; कुछ लोग 'यह चोर है' कहकर वाणी से धमकाते; और कुछ 'बांधो, बांधो' कहते हुए उसे रस्सी से बांध देते।

श्लोक 37 (bhagavata.11.23.37)

क्षिपन्त्येकेऽवजानन्त एष धर्मध्वजः शठः । क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत् स्वजनोज्झितः ॥ 23.37 ॥

kṣipanty eke ’vajānanta eṣa dharma-dhvajaḥ śaṭhaḥ kṣīṇa-vitta imāṁ vṛttim agrahīt sva-janojjhitaḥ

कुछ लोग उसे तिरस्कार से यह कहकर अपमानित करते — 'यह तो धर्म का ध्वज उठाए हुए एक पाखण्डी है, जो धन गंवाकर और परिजनों द्वारा त्यागे जाने पर इस वृत्ति का सहारा लिए बैठा है।'

श्लोक 38 (bhagavata.11.23.38)

अहो एष महासारो धृतिमान् गिरिराडिव । मौनेन साधयत्यर्थं बकवद् दृढनिश्चयः ॥ 23.38 ॥

aho eṣa mahā-sāro dhṛtimān giri-rāḍ iva maunena sādhayaty arthaṁ baka-vad dṛḍha-niścayaḥ

'अहो! देखो इस महान् सत्त्वशाली, गिरिराज हिमालय के समान धैर्यवान् को — यह बगुले की भांति मौन से दृढ़ निश्चय के साथ अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा है' —

श्लोक 39 (bhagavata.11.23.39)

इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयन्ति च । तं बबन्धुर्निरुरुधुर्यथा क्रीडनकं द्विजम् ॥ 23.39 ॥

ity eke vihasanty enam eke durvātayanti ca taṁ babandhur nirurudhur yathā krīḍanakaṁ dvijam

— इस प्रकार कुछ लोग उसकी हंसी उड़ाते, कुछ उस पर अपशब्द फेंकते, और कुछ उसे बांधकर इस प्रकार बन्दी बना लेते, मानो वह उनका खिलौना हो।

श्लोक 40 (bhagavata.11.23.40)

एवं स भौतिकं दुःखं दैविकं दैहिकं च यत् । भोक्तव्यमात्मनो दिष्टं प्राप्तं प्राप्तमबुध्यत ॥ 23.40 ॥

evaṁ sa bhautikaṁ duḥkhaṁ daivikaṁ daihikaṁ ca yat bhoktavyam ātmano diṣṭaṁ prāptaṁ prāptam abudhyata

इस प्रकार वह जान गया कि अन्य प्राणियों से, देवताओं से, और अपने ही शरीर से जो-जो दुःख उसे प्राप्त हो रहा है, वह सब उसके भाग्य में निश्चित होकर भोगने योग्य ही था।

श्लोक 41 (bhagavata.11.23.41)

परिभूत इमां गाथामगायत नराधमैः । पातयद्भिः स्व धर्मस्थो धृतिमास्थाय सात्त्विकीम् ॥ 23.41 ॥

paribhūta imāṁ gāthām agāyata narādhamaiḥ pātayadbhiḥ sva dharma-stho dhṛtim āsthāya sāttvikīm

इन नीच पुरुषों द्वारा गिराए जाने के प्रयत्न में तिरस्कृत होते हुए भी, वह अपने धर्म में स्थिर रहा, और सात्त्विक धैर्य का आश्रय लेकर यह गीत गाने लगा।

श्लोक 42 (bhagavata.11.23.42)

द्विज उवाच नायं जनो मे सुखदुःखहेतु- र्न देवतात्मा ग्रहकर्मकालाः । मनः परं कारणमामनन्ति संसारचक्रं परिवर्तयेद् यत् ॥ 23.42 ॥

dvija uvāca nāyaṁ jano me sukha-duḥkha-hetur na devatātmā graha-karma-kālāḥ manaḥ paraṁ kāraṇam āmananti saṁsāra-cakraṁ parivartayed yat

उस द्विज ने कहा — ये लोग मेरे सुख-दुःख के कारण नहीं हैं, न देवता, न मेरा अपना शरीर, न ग्रह, न कर्म और न काल; वे तो मन को ही परम कारण मानते हैं, जो संसार-चक्र को घुमाता है।

श्लोक 43 (bhagavata.11.23.43)

मनो गुणान् वै सृजते बलीय- स्ततश्च कर्माणि विलक्षणानि । शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानि तेभ्यः सवर्णाः सृतयो भवन्ति ॥ 23.43 ॥

mano guṇān vai sṛjate balīyas tataś ca karmāṇi vilakṣaṇāni śuklāni kṛṣṇāny atha lohitāni tebhyaḥ sa-varṇāḥ sṛtayo bhavanti

अत्यन्त बलवान मन ही गुणों को उत्पन्न करता है, और उन्हीं से भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्म उत्पन्न होते हैं — शुक्ल, कृष्ण और लोहित; उन्हीं से उन्हीं गुणों के अनुरूप विविध गतियां प्राप्त होती हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.11.23.44)

अनीह आत्मा मनसा समीहता हिरण्मयो मत्सख उद्विचष्टे । मनः स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान् जुषन् निबद्धो गुणसङ्गतोऽसौ ॥ 23.44 ॥

anīha ātmā manasā samīhatā hiraṇ-mayo mat-sakha udvicaṣṭe manaḥ sva-liṅgaṁ parigṛhya kāmān juṣan nibaddho guṇa-saṅgato ’sau

स्वयं निश्चेष्ट आत्मा, मेरा सुहृद, स्वर्णिम (हिरण्मय) रूप में, चेष्टारत मन के साथ रहते हुए भी केवल साक्षी बना रहता है; परन्तु यह जीव मन को ही अपना लिंग मानकर उसे धारण कर, कामनाओं का भोग करता हुआ, गुणों में आसक्त होकर बंध जाता है।

श्लोक 45 (bhagavata.11.23.45)

दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि । सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताः परो हि योगो मनसः समाधिः ॥ 23.45 ॥

dānaṁ sva-dharmo niyamo yamaś ca śrutaṁ ca karmāṇi ca sad-vratāni sarve mano-nigraha-lakṣaṇāntāḥ paro hi yogo manasaḥ samādhiḥ

दान, स्वधर्म, नियम और यम, शास्त्र-श्रवण, कर्म और सद्व्रत — इन सबका अन्तिम प्रयोजन मन का निग्रह ही है; मन का समाधान होना ही परम योग है।

श्लोक 46 (bhagavata.11.23.46)

समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं दानादिभिः किं वद तस्य कृत्यम् । असंयतं यस्य मनो विनश्यद् दानादिभिश्चेदपरं किमेभिः ॥ 23.46 ॥

samāhitaṁ yasya manaḥ praśāntaṁ dānādibhiḥ kiṁ vada tasya kṛtyam asaṁyataṁ yasya mano vinaśyad dānādibhiś ced aparaṁ kim ebhiḥ

जिसका मन एकाग्र और पूर्णतः शान्त हो चुका है, बताओ, उसे दान आदि साधनों से क्या करना है? और जिसका मन असंयत रहकर नष्ट हो रहा है, उसके लिए भी दान आदि साधनों से और क्या लाभ है?

श्लोक 47 (bhagavata.11.23.47)

मनोवशेऽन्ये ह्यभवन् स्म देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति । भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान् युञ्ज्याद वशे तं स हि देवदेवः ॥ 23.47 ॥

mano-vaśe ’nye hy abhavan sma devā manaś ca nānyasya vaśaṁ sameti bhīṣmo hi devaḥ sahasaḥ sahīyān yuñjyād vaśe taṁ sa hi deva-devaḥ

अन्य सभी इन्द्रियां मन के अधीन रही हैं, किन्तु मन स्वयं किसी अन्य के अधीन नहीं होता; वह बलशालियों में भी बलशाली, भयंकर देवता है — जो उसे वश में कर ले, वही वास्तव में देवों का देव है।

श्लोक 48 (bhagavata.11.23.48)

तं दुर्जयं शत्रुमसह्यवेग- मरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् । कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यै- र्मित्राण्युदासीनरिपून् विमूढाः ॥ 23.48 ॥

tam durjayaṁ śatrum asahya-vegam arun-tudaṁ tan na vijitya kecit kurvanty asad-vigraham atra martyair mitrāṇy udāsīna-ripūn vimūḍhāḥ

असह्य वेग वाले, हृदय को कचोटने वाले उस दुर्जय शत्रु (मन) को न जीतकर, कुछ मूढ़ पुरुष इस लोक में मनुष्यों से व्यर्थ विरोध करते हैं, और किसी को मित्र, किसी को शत्रु तथा किसी को उदासीन मान बैठते हैं।

श्लोक 49 (bhagavata.11.23.49)

देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः । एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति ॥ 23.49 ॥

dehaṁ mano-mātram imaṁ gṛhītvā mamāham ity andha-dhiyo manuṣyāḥ eṣo ’ham anyo ’yam iti bhrameṇa duranta-pāre tamasi bhramanti

मन से बने इस शरीर को ही अपना लेकर, 'मेरा' और 'मैं' — इस प्रकार अन्धबुद्धि हुए मनुष्य, 'यह मैं हूं', 'यह दूसरा है' — इस भ्रम के कारण अन्तहीन अंधकार में भटकते रहते हैं।

श्लोक 50 (bhagavata.11.23.50)

जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् । जिह्वां क्वचित् सन्दशति स्वदद्भि- स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥ 23.50 ॥

janas tu hetuḥ sukha-duḥkhayoś cet kim ātmanaś cātra hi bhaumayos tat jihvāṁ kvacit sandaśati sva-dadbhis tad-vedanāyāṁ katamāya kupyet

यदि तुम कहो कि दूसरे लोग सुख-दुःख के कारण हैं, तो इसमें आत्मा का, जो कि पार्थिव (भौतिक) दोनों से भिन्न है, क्या संबंध है? यदि कोई अपने ही दांतों से कभी अपनी जीभ को काट ले, तो उस पीड़ा में वह किस पर क्रोध करे?

श्लोक 51 (bhagavata.11.23.51)

दुःखस्य हेतुर्यदि देवतास्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत् । यदङ्गमङ्गेन निहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे ॥ 23.51 ॥

duḥkhasya hetur yadi devatās tu kim ātmanas tatra vikārayos tat yad aṅgam aṅgena nihanyate kvacit krudhyeta kasmai puruṣaḥ sva-dehe

यदि देवता ही दुःख का कारण हों, तो भी विकाररहित आत्मा का उसमें क्या सम्बन्ध है? जब कोई एक अंग किसी दूसरे अंग से आहत हो जाए, तो पुरुष अपने ही शरीर में किस पर क्रुद्ध हो?

श्लोक 52 (bhagavata.11.23.52)

आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजस्वभावः । न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मान्न सुखं न दुःखम् ॥ 23.52 ॥

ātmā yadi syāt sukha-duḥkha-hetuḥ kim anyatas tatra nija-svabhāvaḥ na hy ātmano ’nyad yadi tan mṛṣā syāt krudhyeta kasmān na sukhaṁ na duḥkham

यदि आत्मा ही सुख-दुःख का कारण हो, तो उसमें अपने ही स्वभाव के अतिरिक्त और क्या हेतु है? आत्मा से भिन्न तो कुछ है ही नहीं — यदि हो भी, तो वह मिथ्या है — तब न सुख है, न दुःख; फिर किस पर क्रोध किया जाए?

श्लोक 53 (bhagavata.11.23.53)

ग्रहानिमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै । ग्रहैर्ग्रहस्यैव वदन्ति पीडां क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ 23.53 ॥

grahā nimittaṁ sukha-duḥkhayoś cet kim ātmano ’jasya janasya te vai grahair grahasyaiva vadanti pīḍāṁ krudhyeta kasmai puruṣas tato ’nyaḥ

यदि ग्रह ही सुख-दुःख का निमित्त हों, तो अजन्मा आत्मा का इस जन्मधारी वस्तु से क्या सम्बन्ध? ज्योतिषी कहते हैं कि ग्रह तो केवल परस्पर एक-दूसरे ग्रह को ही पीड़ा पहुंचाते हैं — तो उस स्थिति से पृथक् पुरुष किस पर क्रोध करे?

श्लोक 54 (bhagavata.11.23.54)

कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तद्धि जडाजडत्वे । देहस्त्वचित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्ममूलम् ॥ 23.54 ॥

karmāstu hetuḥ sukha-duḥkhayoś cet kim ātmanas tad dhi jaḍājaḍatve dehas tv acit puruṣo ’yaṁ suparṇaḥ krudhyeta kasmai na hi karma mūlam

यदि कर्म ही सुख-दुःख का कारण हो, तो आत्मा का इससे क्या सम्बन्ध, चाहे वह चेतन हो या जड़? यह शरीर तो अचेतन है, और यह पुरुष तो सुपर्ण (उससे परे उड़ने वाला, चेतन) है — किस पर क्रोध किया जाए, जबकि कर्म का कोई वास्तविक मूल ही नहीं है?

श्लोक 55 (bhagavata.11.23.55)

कालस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मकोऽसौ । नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वम् ॥ 23.55 ॥

kālas tu hetuḥ sukha-duḥkhayoś cet kim ātmanas tatra tad-ātmako ’sau nāgner hi tāpo na himasya tat syāt krudhyeta kasmai na parasya dvandvam

यदि काल ही सुख-दुःख का कारण हो, तो उसी काल-स्वरूप आत्मा का उसमें क्या सम्बन्ध? अग्नि अपने ही ताप से नहीं जलती, न हिम अपनी ही शीतलता से पीड़ित होता है — किस पर क्रोध किया जाए, जबकि द्वन्द्व किसी अन्य से ही जन्य नहीं है?

श्लोक 56 (bhagavata.11.23.56)

न केनचित् क्वापि कथञ्चनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य । यथाहमः संसृतिरूपिणः स्या- देवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥ 23.56 ॥

na kenacit kvāpi kathañcanāsya dvandvoparāgaḥ parataḥ parasya yathāhamaḥ saṁsṛti-rūpiṇaḥ syād evaṁ prabuddho na bibheti bhūtaiḥ

किसी भी स्थान में, किसी भी प्रकार से, इस परम आत्मा को द्वन्द्व का प्रभाव कभी स्पर्श नहीं करता; अहंकार ही संसार-रूप को धारण करता है — जो पुरुष यह जान लेता है, वह किसी भी प्राणी से भयभीत नहीं होता।

श्लोक 57 (bhagavata.11.23.57)

एतां स आस्थाय परात्मनिष्ठा- मध्यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभिः । अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव ॥ 23.57 ॥

etāṁ sa āsthāya parātma-niṣṭhām adhyāsitāṁ pūrvatamair maharṣibhiḥ ahaṁ tariṣyāmi duranta-pāraṁ tamo mukundāṅghri-niṣevayaiva

पूर्वकाल के महर्षियों द्वारा भी आश्रित इस परमात्मनिष्ठा का आश्रय लेकर, मैं भी मुकुन्द के चरणों की सेवा द्वारा ही इस अनन्त तमस के पार जाऊंगा।

श्लोक 58 (bhagavata.11.23.58)

श्रीभगवानुवाच निर्विद्य नष्टद्रविणे गतक्लमः प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम् । निराकृतोऽसद्भिरपि स्वधर्मा- दकम्पितोऽमूं मुनिराह गाथाम् ॥ 23.58 ॥

śrī-bhagavān uvāca nirvidya naṣṭa-draviṇe gata-klamaḥ pravrajya gāṁ paryaṭamāna ittham nirākṛto ’sadbhir api sva-dharmād akampito ’mūṁ munir āha gāthām

श्री भगवान ने कहा — इस प्रकार धन के नष्ट होने पर वैराग्य को प्राप्त, थकान-रहित होकर संन्यास ले पृथ्वी पर विचरण करते हुए, दुर्जनों द्वारा तिरस्कृत होने पर भी अपने धर्म से अविचलित रहकर उस मुनि ने यह गीत गाया।

श्लोक 59 (bhagavata.11.23.59)

सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः । मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः ॥ 23.59 ॥

sukha-duḥkha-prado nānyaḥ puruṣasyātma-vibhramaḥ mitrodāsīna-ripavaḥ saṁsāras tamasaḥ kṛtaḥ

सुख और दुःख देने वाला पुरुष के लिए कोई और नहीं है, केवल उसकी अपनी आत्मा के विषय में भ्रम ही है; मित्र, उदासीन और शत्रु — यह सारा संसार अज्ञान से ही रचा गया है।

श्लोक 60 (bhagavata.11.23.60)

तस्मात् सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया । मय्यावेशितया युक्त एतावान् योगसङ्ग्रहः ॥ 23.60 ॥

tasmāt sarvātmanā tāta nigṛhāṇa mano dhiyā mayy āveśitayā yukta etāvān yoga-saṅgrahaḥ

अतः हे तात! अपनी बुद्धि को मुझमें लगाकर, सम्पूर्ण रूप से मन का निग्रह करो; इतना ही योग का सार-संग्रह है।

श्लोक 61 (bhagavata.11.23.61)

य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः । धारयञ् श्रावयञ् शृण्वन् द्वन्द्वैर् नैवाभिभूयते ॥ 23.61 ॥

ya etāṁ bhikṣuṇā gītāṁ brahma-niṣṭhāṁ samāhitaḥ dhārayañ chrāvayañ chṛṇvan dvandvair naivābhibhūyate

जो कोई इस भिक्षु द्वारा गाए हुए, ब्रह्मनिष्ठा से युक्त इस गीत को एकाग्रचित्त होकर धारण करता है, दूसरों को सुनाता है, अथवा स्वयं सुनता है, वह कभी सुख-दुःख के द्वन्द्वों से पराभूत नहीं होता।

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