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एकादश स्कन्ध · अध्याय 25

त्रिगुण और गुणातीत अवस्था

अध्याय 24अध्याय-सूचीअध्याय 26

श्लोक 1 (bhagavata.11.25.1)

श्रीभगवानुवाच गुणानामसम्मिश्राणां पुमान् येन यथा भवेत् । तन्मे पुरुषवर्येदमुपधारय शंसतः ॥ १ ॥

śrī-bhagavān uvāca guṇānām asammiśrāṇāṁ pumān yena yathā bhavet tan me puruṣa-varyedam upadhāraya śaṁsataḥ

श्रीभगवान ने कहा — हे पुरुषश्रेष्ठ, अब मुझसे यह सुनकर समझो कि पुरुष असम्मिश्रित अर्थात् पृथक्-पृथक् गुणों के संसर्ग से किस प्रकार अपना स्वभाव प्राप्त करता है।

श्लोक 2 (bhagavata.11.25.2)

शमो दमस्तितिक्षेक्षा तपः सत्यं दया स्मृतिः । तुष्टिस्त्यागोऽस्पृहा श्रद्धा ह्रीर्दयादिः स्वनिर्वृतिः ॥ २ ॥

śamo damas titikṣekṣā tapaḥ satyaṁ dayā smṛtiḥ tuṣṭis tyāgo 'spṛhā śraddhā hrīr dayādiḥ sva-nirvṛtiḥ

मन-निग्रह, इन्द्रिय-संयम, सहनशीलता, विवेक-दृष्टि, तप, सत्य, दया, सुधारणा, संतोष, त्याग, निःस्पृहता, श्रद्धा, लज्जा, करुणा आदि गुण, तथा अपने में ही तृप्ति — ये सत्त्वगुण के लक्षण हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.11.25.3)

काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदा सुखम् । मदोत्साहो यशःप्रीतिर्हास्यं वीर्यं बलोद्यमः ॥ ३ ॥

kāma īhā madas tṛṣṇā stambha āśīr bhidā sukham madotsāho yaśaḥ-prītir hāsyaṁ vīryaṁ balodyamaḥ

काम, चेष्टा, मद, तृष्णा, अहंकार, आशीष की कामना, भेदबुद्धि, [इन्द्रिय-]सुख, उन्माद-भरा उत्साह, कीर्ति में प्रीति, हास्य, बल-प्रदर्शन तथा पराक्रम का उद्यम — ये रजोगुण के लक्षण हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.11.25.4)

क्रोधो लोभोऽनृतं हिंसा याच्ञा दम्भः क्लमः कलिः । शोकमोहौ विषादार्ती निद्राशा भीरनुद्यमः ॥ ४ ॥

krodho lobho 'nṛtaṁ hiṁsā yācñā dambhaḥ klamaḥ kaliḥ śoka-mohau viṣādārtī nidrāśā bhīr anudyamaḥ

क्रोध, लोभ, असत्य-भाषण, हिंसा, याचना, पाखंड, थकान, कलह, शोक, मोह, विषाद, पीड़ा, अधिक निद्रा, [व्यर्थ] आशा तथा भय के कारण उद्यमहीनता — ये तमोगुण के लक्षण हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.11.25.5)

सत्त्वस्य रजसश्चैतास्तमसश्चानुपूर्वशः । वृत्तयो वर्णितप्रायाः सन्निपातमथो शृणु ॥ ५ ॥

sattvasya rajasaś caitās tamasaś cānupūrvaśaḥ vṛttayo varṇita-prāyāḥ sannipātam atho śṛṇu

इस प्रकार सत्त्व, रज तथा तम की वृत्तियाँ क्रमशः प्रायः वर्णित कर दी गयीं। अब उनके सम्मिश्रण (सन्निपात) को भी सुनो।

श्लोक 6 (bhagavata.11.25.6)

सन्निपातस्त्वहमिति ममेत्युद्धव या मतिः । व्यवहारः सन्निपातो मनोमात्रेन्द्रियासुभिः ॥ ६ ॥

sannipātas tv aham iti mamety uddhava yā matiḥ vyavahāraḥ sannipāto mano-mātrendriyāsubhiḥ

हे उद्धव, 'मैं' और 'मेरा' — यही वह बुद्धि है जिसमें तीनों गुणों का सम्मिश्रण रहता है। मन, विषय, इन्द्रियों तथा प्राणों के द्वारा किया जाने वाला संसार का समस्त व्यवहार भी इसी सन्निपात का रूप है।

श्लोक 7 (bhagavata.11.25.7)

धर्मे चार्थे च कामे च यदासौ परिनिष्ठितः । गुणानां सन्निकर्षोऽयं श्रद्धारतिधनावहः ॥ ७ ॥

dharme cārthe ca kāme ca yadāsau pariniṣṭhitaḥ guṇānāṁ sannikarṣo 'yaṁ śraddhā-rati-dhanāvahaḥ

जब यह जीव धर्म, अर्थ तथा काम में पूर्णतया स्थापित हो जाता है, तब उसे प्राप्त होने वाली श्रद्धा, आसक्ति तथा धन — यही गुणों का वह सन्निकर्ष (मिश्रण) है।

श्लोक 8 (bhagavata.11.25.8)

प्रवृत्तिलक्षणे निष्ठा पुमान् यर्हि गृहाश्रमे । स्वधर्मे चानुतिष्ठेत गुणानां समितिर्हि सा ॥ ८ ॥

pravṛtti-lakṣaṇe niṣṭhā pumān yarhi gṛhāśrame sva-dharme cānu tiṣṭheta guṇānāṁ samitir hi sā

जब मनुष्य गृहस्थाश्रम में प्रवृत्ति-लक्षण वाली निष्ठा रखता है और अपने स्वधर्म का पालन करता है, तब भी यही गुणों की संयुक्त अवस्था है।

श्लोक 9 (bhagavata.11.25.9)

पुरुषं सत्त्वसंयुक्तमनुमीयाच्छमादिभिः । कामादिभी रजोयुक्तं क्रोधाद्यैस्तमसा युतम् ॥ ९ ॥

puruṣaṁ sattva-saṁyuktam anumīyāc chamādibhiḥ kāmādibhī rajo-yuktaṁ krodhādyais tamasā yutam

जिस पुरुष में शम आदि गुण दिखें, उसे सत्त्वयुक्त समझना चाहिए; जिसमें काम आदि हों, उसे रजोयुक्त; तथा जिसमें क्रोध आदि हों, उसे तमोगुण से युक्त जानना चाहिए।

श्लोक 10 (bhagavata.11.25.10)

यदा भजति मां भक्त्या निरपेक्षः स्वकर्मभिः । तं सत्त्वप्रकृतिं विद्यात् पुरुषं स्त्रियमेव वा ॥ १० ॥

yadā bhajati māṁ bhaktyā nirapekṣaḥ sva-karmabhiḥ taṁ sattva-prakṛtiṁ vidyāt puruṣaṁ striyam eva vā

जब कोई पुरुष अथवा स्त्री अपने नियत कर्मों के द्वारा, किसी भी फल की अपेक्षा किये बिना, भक्तिपूर्वक मेरी आराधना करता है, तब उसे सत्त्व-प्रकृति वाला जानना चाहिए।

श्लोक 11 (bhagavata.11.25.11)

यदा आशिष आशास्य मां भजेत स्वकर्मभिः । तं रजःप्रकृतिं विद्यात् हिंसामाशास्य तामसम् ॥ ११ ॥

yadā āśiṣa āśāsya māṁ bhajeta sva-karmabhiḥ taṁ rajaḥ-prakṛtiṁ vidyāt hiṁsām āśāsya tāmasam

जब मनुष्य किसी कामना की आशा से अपने कर्मों द्वारा मेरी आराधना करता है, तब उसे रज-प्रकृति वाला जानना चाहिए, तथा जो हिंसा की आशा से मेरी उपासना करता है, उसे तमोगुणी समझना चाहिए।

श्लोक 12 (bhagavata.11.25.12)

सत्त्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे । चित्तजा यैस्तु भूतानां सज्जमानो निबध्यते ॥ १२ ॥

sattvaṁ rajas tama iti guṇā jīvasya naiva me citta-jā yais tu bhūtānāṁ sajjamāno nibadhyate

सत्त्व, रज और तम — ये गुण जीव के हैं, मेरे कभी नहीं। ये चित्त में उत्पन्न होकर, जीव को प्राणियों में आसक्त करते हुए, उसे बाँध देते हैं।

श्लोक 13 (bhagavata.11.25.13)

यदेतरौ जयेत् सत्त्वं भास्वरं विशदं शिवम् । तदा सुखेन युज्येत धर्मज्ञानादिभिः पुमान् ॥ १३ ॥

yadetarau jayet sattvaṁ bhāsvaraṁ viśadaṁ śivam tadā sukhena yujyeta dharma-jñānādibhiḥ pumān

जब निर्मल, प्रकाशमान तथा कल्याणकारी सत्त्वगुण अन्य दोनों गुणों को जीत लेता है, तब मनुष्य धर्म, ज्ञान आदि गुणों से युक्त होकर सुख का अनुभव करता है।

श्लोक 14 (bhagavata.11.25.14)

यदा जयेत्तमः सत्त्वं रजः सङ्गं भिदा चलम् । तदा दुःखेन युज्येत कर्मणा यशसा श्रिया ॥ १४ ॥

yadā jayet tamaḥ sattvaṁ rajaḥ saṅgaṁ bhidā calam tadā duḥkhena yujyeta karmaṇā yaśasā śriyā

जब आसक्ति, भेद-भाव तथा चंचलता उत्पन्न करने वाला रजोगुण सत्त्व और तम को जीत लेता है, तब मनुष्य कर्म, यश तथा ऐश्वर्य के लिए प्रयत्नशील होकर दुःख का अनुभव करता है।

श्लोक 15 (bhagavata.11.25.15)

यदा जयेद् रजः सत्त्वं तमो मूढं लयं जडम् । युज्येत शोकमोहाभ्यां निद्रयाहिंसयाशया ॥ १५ ॥

yadā jayed rajaḥ sattvaṁ tamo mūḍhaṁ layaṁ jaḍam yujyeta śoka-mohābhyāṁ nidrayā hiṁsayāśayā

जब मोहग्रस्त और जड़ बना देने वाला तमोगुण रज और सत्त्व को जीत लेता है, तब मनुष्य शोक और मोह से युक्त होकर, अत्यधिक निद्रा, हिंसा तथा [व्यर्थ] आशा से जुड़ जाता है।

श्लोक 16 (bhagavata.11.25.16)

यदा चित्तं प्रसीदेत इन्द्रियाणां च निर्वृतिः । देहेऽभयं मनोऽसङ्गं तत् सत्त्वं विद्धि मत्पदम् ॥ १६ ॥

yadā cittaṁ prasīdeta indriyāṇāṁ ca nirvṛtiḥ dehe 'bhayaṁ mano-'saṅgaṁ tat sattvaṁ viddhi mat-padam

जब चित्त प्रसन्न हो जाता है, इन्द्रियों को शान्ति मिलती है, शरीर में निर्भयता तथा मन में अनासक्ति उत्पन्न होती है, तब उसे सत्त्वगुण की प्रधानता समझो — यही वह अवस्था है जिसमें मुझे प्राप्त किया जा सकता है।

श्लोक 17 (bhagavata.11.25.17)

विकुर्वन् क्रियया चाधीरनिवृत्तिश्च चेतसाम् । गात्रास्वास्थ्यं मनो भ्रान्तं रज एतैर्निशामय ॥ १७ ॥

vikurvan kriyayā cā-dhīr anivṛttiś ca cetasām gātrāsvāsthyaṁ mano bhrāntaṁ raja etair niśāmaya

अत्यधिक क्रियाशीलता से बुद्धि का विकृत होना, चित्त की वृत्तियों का शान्त न होना, शरीर के अंगों का अस्वस्थ रहना तथा मन का भ्रमित रहना — इन लक्षणों से रजोगुण को पहचानो।

श्लोक 18 (bhagavata.11.25.18)

सीदच्चित्तं विलीयेत चेतसो ग्रहणेऽक्षमम् । मनो नष्टं तमो ग्लानिस्तमस्तदुपधारय ॥ १८ ॥

sīdac cittaṁ vilīyeta cetaso grahaṇe 'kṣamam mano naṣṭaṁ tamo glānis tamas tad upadhāraya

जब चित्त उदास होकर विलीन हो जाता है, वह किसी विषय को ग्रहण करने में असमर्थ हो जाता है, मन नष्ट होकर ग्लानि से भर जाता है — इसे तमोगुण समझो।

श्लोक 19 (bhagavata.11.25.19)

एधमाने गुणे सत्त्वे देवानां बलमेधते । असुराणां च रजसि तमस्युद्धव रक्षसाम् ॥ १९ ॥

edhamāne guṇe sattve devānāṁ balam edhate asurāṇāṁ ca rajasi tamasy uddhava rakṣasām

सत्त्वगुण के बढ़ने पर देवताओं का बल बढ़ता है; रजोगुण के बढ़ने पर असुरों का; और हे उद्धव, तमोगुण के बढ़ने पर राक्षसों का बल बढ़ता है।

श्लोक 20 (bhagavata.11.25.20)

सत्त्वाज्जागरणं विद्याद् रजसा स्वप्नमादिशेत् । प्रस्वापं तमसा जन्तोस्तुरीयं त्रिषु सन्ततम् ॥ २० ॥

sattvāj jāgaraṇaṁ vidyād rajasā svapnam ādiśet prasvāpaṁ tamasā jantos turīyaṁ triṣu santatam

जागृत अवस्था को सत्त्व से, स्वप्न को रज से, तथा सुषुप्ति को तम से उत्पन्न जानो। इन तीनों में सदा व्याप्त रहने वाली चौथी अवस्था (तुरीय) है।

श्लोक 21 (bhagavata.11.25.21)

उपर्युपरि गच्छन्ति सत्त्वेन ब्राह्मणा जनाः । तमसाधोऽध आमुख्याद् रजसान्तरचारिणः ॥ २१ ॥

upary upari gacchanti sattvena brāhmaṇā janāḥ tamasādho 'dha ā-mukhyād rajasāntara-cāriṇaḥ

सत्त्वगुण से युक्त ब्राह्मण-स्वभाव के लोग उत्तरोत्तर ऊँची गति को प्राप्त होते हैं; तमोगुण से लोग सिर के बल नीचे-नीचे गिरते हैं; तथा रजोगुण से मनुष्य मध्यम गति में ही भ्रमण करते रहते हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.11.25.22)

सत्त्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः । तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः ॥ २२ ॥

sattve pralīnāḥ svar yānti nara-lokaṁ rajo-layāḥ tamo-layās tu nirayaṁ yānti mām eva nirguṇāḥ

सत्त्वगुण में लीन होने वाले स्वर्ग को, रजोगुण में लीन होने वाले मनुष्य-लोक को, तथा तमोगुण में लीन होने वाले नरक को प्राप्त होते हैं; परन्तु जो गुणातीत हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.11.25.23)

मदर्पणं निष्फलं वा सात्त्विकं निजकर्म तत् । राजसं फलसङ्कल्पं हिंसाप्रायादि तामसम् ॥ २३ ॥

mad-arpaṇaṁ niṣphalaṁ vā sāttvikaṁ nija-karma tat rājasaṁ phala-saṅkalpaṁ hiṁsā-prāyādi tāmasam

जो कर्म फल की अपेक्षा किये बिना मुझे अर्पित होता है, वह सात्त्विक है; जो फल की कामना से किया जाता है, वह राजसिक है; और जो हिंसा आदि से युक्त होता है, वह तामसिक कर्म है।

श्लोक 24 (bhagavata.11.25.24)

कैवल्यं सात्त्विकं ज्ञानं रजो वैकल्पिकं च यत् । प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम् ॥ २४ ॥

kaivalyaṁ sāttvikaṁ jñānaṁ rajo vaikalpikaṁ ca yat prākṛtaṁ tāmasaṁ jñānaṁ man-niṣṭhaṁ nirguṇaṁ smṛtam

कैवल्य (अद्वैत) ज्ञान सात्त्विक है, भेदमूलक ज्ञान राजसिक है, तथा प्राकृत (केवल स्थूल विषयों का) ज्ञान तामसिक कहा जाता है; परन्तु जो ज्ञान मुझमें ही स्थित है, वह गुणातीत माना गया है।

श्लोक 25 (bhagavata.11.25.25)

वनं तु सात्त्विको वासो ग्रामो राजस उच्यते । तामसं द्यूतसदनं मन्निकेतं तु निर्गुणम् ॥ २५ ॥

vanaṁ tu sāttviko vāso grāmo rājasa ucyate tāmasaṁ dyūta-sadanaṁ man-niketaṁ tu nirguṇam

वन में निवास सात्त्विक कहा जाता है, ग्राम में निवास राजसिक कहा जाता है, जुआघर में निवास तामसिक है, तथा मेरे निवास-स्थान में रहना गुणातीत है।

श्लोक 26 (bhagavata.11.25.26)

सात्त्विकः कारकोऽसङ्गी रागान्धो राजसः स्मृतः । तामसः स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रयः ॥ २६ ॥

sāttvikaḥ kārako 'saṅgī rāgāndho rājasaḥ smṛtaḥ tāmasaḥ smṛti-vibhraṣṭo nirguṇo mad-apāśrayaḥ

आसक्तिरहित कर्ता सात्त्विक कहा गया है, आसक्ति से अंधा कर्ता राजसिक कहा गया है, स्मृति (विवेक) से भ्रष्ट कर्ता तामसिक है, तथा जिसने मेरी शरण ली है, वह कर्ता गुणातीत है।

श्लोक 27 (bhagavata.11.25.27)

सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी । तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा ॥ २७ ॥

sāttviky ādhyātmikī śraddhā karma-śraddhā tu rājasī tāmasy adharme yā śraddhā mat-sevāyāṁ tu nirguṇā

आत्मा की ओर उन्मुख श्रद्धा सात्त्विक है, कर्मफल में श्रद्धा राजसिक है, अधर्म में जो श्रद्धा है वह तामसिक है, तथा मेरी सेवा में जो श्रद्धा है वह गुणातीत है।

श्लोक 28 (bhagavata.11.25.28)

पथ्यं पूतमनायस्तमाहार्यं सात्त्विकं स्मृतम् । राजसं चेन्द्रियप्रेष्ठं तामसं चार्तिदाशुचि ॥ २८ ॥

pathyaṁ pūtam anāyastam āhāryaṁ sāttvikaṁ smṛtam rājasaṁ cendriya-preṣṭhaṁ tāmasaṁ cārti-dāśuci

जो भोजन हितकारी, पवित्र तथा सहज ही प्राप्त हो, वह सात्त्विक कहा गया है; जो इन्द्रियों को अत्यन्त प्रिय लगे, वह राजसिक है; तथा जो अपवित्र और कष्टदायी हो, वह तामसिक भोजन है।

श्लोक 29 (bhagavata.11.25.29)

सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम् । तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम् ॥ २९ ॥

sāttvikaṁ sukham ātmotthaṁ viṣayotthaṁ tu rājasam tāmasaṁ moha-dainyotthaṁ nirguṇaṁ mad-apāśrayam

आत्मा से उत्पन्न सुख सात्त्विक है, विषयों से उत्पन्न सुख राजसिक है, मोह तथा दीनता से उत्पन्न सुख तामसिक है, तथा मुझमें आश्रित सुख गुणातीत है।

श्लोक 30 (bhagavata.11.25.30)

द्रव्यं देशः फलं कालो ज्ञानं कर्म च कारकः । श्रद्धावस्थाकृतिर्निष्ठा त्रैगुण्यः सर्व एव हि ॥ ३० ॥

dravyaṁ deśaḥ phalaṁ kālo jñānaṁ karma ca kārakaḥ śraddhāvasthākṛtir niṣṭhā trai-guṇyaḥ sarva eva hi

द्रव्य, देश, फल, काल, ज्ञान, कर्म, कर्ता, श्रद्धा, अवस्था, आकृति (योनि) तथा निष्ठा (गति) — ये सब भी त्रिगुणमय ही हैं।

श्लोक 31 (bhagavata.11.25.31)

सर्वे गुणमया भावाः पुरुषाव्यक्तधिष्ठिताः । दृष्टं श्रुतमनुध्यातं बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ ॥ ३१ ॥

sarve guṇa-mayā bhāvāḥ puruṣāvyakta-dhiṣṭhitāḥ dṛṣṭaṁ śrutam anudhyātaṁ buddhyā vā puruṣarṣabha

हे पुरुषर्षभ, पुरुष और अव्यक्त प्रकृति पर आश्रित सभी भाव गुणमय ही हैं — चाहे वे देखे गए हों, सुने गए हों, अथवा बुद्धि से चिन्तन किये गए हों।

श्लोक 32 (bhagavata.11.25.32)

एताः संसृतयः पुंसो गुणकर्मनिबन्धनाः । येनेमे निर्जिताः सौम्य गुणा जीवेन चित्तजाः । भक्तियोगेन मन्निष्ठो मद्भावाय प्रपद्यते ॥ ३२ ॥

etāḥ saṁsṛtayaḥ puṁso guṇa-karma-nibandhanāḥ yeneme nirjitāḥ saumya guṇā jīvena citta-jāḥ bhakti-yogena man-niṣṭho mad-bhāvāya prapadyate

हे सौम्य उद्धव, ये सब संसार-गतियाँ जीव के गुण-कर्म के बन्धन से उत्पन्न हैं। जिस जीव ने चित्त से उत्पन्न इन गुणों को जीत लिया है, वह भक्तियोग द्वारा मुझमें स्थिर होकर मेरे भाव को प्राप्त होता है।

श्लोक 33 (bhagavata.11.25.33)

तस्माद् देहमिमं लब्ध्वा ज्ञानविज्ञानसम्भवम् । गुणसङ्गं विनिर्धूय मां भजन्तु विचक्षणाः ॥ ३३ ॥

tasmād deham imaṁ labdhvā jñāna-vijñāna-sambhavam guṇa-saṅgaṁ vinirdhūya māṁ bhajantu vicakṣaṇāḥ

अतः इस मानव-देह को प्राप्त कर, जो ज्ञान और विज्ञान की सिद्धि का साधन है, विवेकी पुरुषों को गुणों की आसक्ति को त्यागकर मेरा ही भजन करना चाहिए।

श्लोक 34 (bhagavata.11.25.34)

निःसङ्गो मां भजेद् विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रियः । रजस्तमश्चाभिजयेत् सत्त्वसंसेवया मुनिः ॥ ३४ ॥

niḥsaṅgo māṁ bhajed vidvān apramatto jitendriyaḥ rajas tamaś cābhijayet sattva-saṁsevayā muniḥ

विद्वान मुनि को चाहिए कि वह संगरहित, सावधान तथा जितेन्द्रिय होकर मेरा भजन करे, और सत्त्वगुण का आश्रय लेकर रज तथा तम को जीत ले।

श्लोक 35 (bhagavata.11.25.35)

सत्त्वं चाभिजयेद् युक्तो नैरपेक्ष्येण शान्तधीः । सम्पद्यते गुणैर्मुक्तो जीवो जीवं विहाय माम् ॥ ३५ ॥

sattvaṁ cābhijayed yukto nairapekṣyeṇa śānta-dhīḥ sampadyate guṇair mukto jīvo jīvaṁ vihāya mām

फिर, भक्तियोग में स्थिर तथा शान्तचित्त होकर, वह गुणों के प्रति भी उदासीनता से सत्त्वगुण को जीत ले। इस प्रकार गुणों से मुक्त जीव, जीवभाव को त्यागकर मुझे ही प्राप्त होता है।

श्लोक 36 (bhagavata.11.25.36)

जीवो जीवविनिर्मुक्तो गुणैश्चाशयसम्भवैः । मयैव ब्रह्मणा पूर्णो न बहिर्नान्तरश्चरेत् ॥ ३६ ॥

jīvo jīva-vinirmukto guṇaiś cāśaya-sambhavaiḥ mayaiva brahmaṇā pūrṇo na bahir nāntaraś caret

अन्तःकरण से उत्पन्न गुणों तथा जीवभाव से सर्वथा मुक्त हुआ जीव, मुझ ब्रह्म से ही पूर्ण होकर, न तो बाहर की ओर भटकता है और न भीतर।

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